🌷मंगलकामनाएँ उन्नतमय नववर्ष की🌷कमल काव्य सरोवर🌻 कमल भंसाली🌻 शायर भंसाली द्वारा

🌹 ⏰🌹 दोस्तो, “कमल काव्य सरोवर” ब्लाग साइड (wordpress.com )तीन साल की अवधि में अब तक लगभग चालीस देशों से 25000 लोगों के द्वारा दृश्यत किया गया और 110 फॉलोअर से जुड़ा और लगभग 500 रचनाओं से सजा इसके लिए सभी को नववर्ष की शुभकामनाओं सहित अभिवादन करता है। आप सभी हिंदी भाषी साहित्यिक प्रेमियों का साथ सुहाना और मन प्रफुल्लित करने वाला हमें सदा मिलता रहे, ये हमारी भी प्रार्थना है। ‘शायर’ मेरी सिर्फ जीवन साथी ही नहीं है, वो मेरी सारी रचनाओं का अंतिम सम्पादन करती है, उसे भी नववर्ष की मंगलकामनाए। ” नया वर्ष शुभता भरा हो आपके लिए सफल वर्ष रहे” शुभकामनाओं सहित✍💘कमल भंसाली

नव वर्ष का आया नया सवेरा
चारों दिशाओं में है, उजियारा
हर दिशा से एक ही है,प्रार्थना
हर जीवन सुखी हो, यही कामना
नव वर्ष…..
🌞

नए आयामों का हो, हर नया सफर
पथ में हो कई सफलताओं की डगर
रिश्तों में छाई रहे मृदुलता की बहार
सद् भावनाओं के खुलते रहे नए द्वार
नववर्ष….
🎁

हर मानव का हो,प्राणी मात्र से प्यार
अहिंसा का ही हर दिल में हो विस्तार
कल का दुःख, आज में कभी न समाये
ईष्या, द्वेष की भावना कभी मन न लाये
नववर्ष…
🔔

हम उसी राह चले, जहां धर्म के फूल खिले
हमें सदा स्वस्थ, स्वच्छ पर्यावरण ही मिले
प्रयास हो, हर कोई एक दूजे से गले मिले
साल जब ले विदा, तो प्रेरणा उसी से मिले
नववर्ष…
📚

साल यह सबके लिए हो पूर्ण सुखद व परोपकारी
समृद्धि, प्रसन्नता, सम्पन्नता के सब हो अधिकारी
स्नेह, प्रेम, स्वास्थ्य न हो, किसी की कोई मजबूरी
मंगलकामनाये, शुभता की बरसात सदा रहे जारी
नववर्ष…
🌜⭐🌟🌟🌟🌛

(नया साल आप को स्वस्थ, सम्पन्न व सुखी बनाये
इन्ही भावनाओं के साथ नव वर्ष की शुभकामनाएं…🎂.***शायर भंसाली 💝 कमल भंसाली***🎁

01/01/2018

🌸नये वर्ष के नये संकल्प🌸 भाग 2 🌲संकल्प अनुसन्धान🌲 ✍कमल भंसाली

दोस्तों, नये साल की दस्तक हमारे जीवन में नई ऊर्जा की चाह पैदा करती है। हमें कुछ पुरानी गलत आदतों से दूर होने को प्रेरित करती है । तीन मुख्य संकल्प क्षेत्र पर हम यहां चर्चा अवश्य करेंगे जो आज के आर्थिक, सामाजिक और व्यवहारिक युग के वातावरण में हमें सक्षम बनाते है। हमारे दैनिक जीवन हम में जितने भी छोटे छोटे संकल्प करते है, उनकी धुरी इन तीन क्षेत्रों के अंतर्गत ही ज्यादा घूमती है। आइये, जाने उनके बारे में विस्तार से।

1. स्वास्थय:-

समय का सदपुयोग करना आज की सबसे बड़ी समस्या हमारे जीवन चिंतन की है, आज साधनों के अति प्रयोग से जीवन काफी निराश हो रहा है। पिछले कुछ दसक से आपसी मानवीय सम्बंधों में भावुकता भरे प्रेम के अदृश्य होने से जीवन की अनुरुदनि घुटन बढ़ रही है। मोबाइल और डिजिटल क्रान्ति की तेजी से जीवन को इतना भी समय नहीं मिल रहा कि वो जिस्म और दिमाग की व्यथा भरी समस्याओं पर सही चेतना से अवलोकन कर सके। इसका सबसे बड़ा प्रभाव इन्सान के दिमाग पर पड़ रहा और जीवन गलत आदतों का शिकार हो रहा है। पुराने समय में जहां शारीरिक श्रम जीवन को स्वस्थ रखता, आज दिमागी और मानसिक मेहनत से आँखों को सबसे ज्यादा कृत्रिम रोशनी सहन करनी पड़ती है । स्वास्थ्य तनाव तथा थकावट का अनुभव हमारा दैनिक जीवन ज्यादा कर रहा है। नये साल में हमें स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है। हम चाहेंगे, नया साल हमारे स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ ऊर्जात्मक सवेरा लाये और वो तभी संभव हो सकता है जब हम सिर्फ “Early Riser” ही न बने अपितु कुछ समय सुबह की अनुपम सैर, योग और सेवा कार्य आदि में लगाये। हमार सारे संकल्प इस सिद्धांत के तहत होना चाहिए ” पहला सुख निरोगी काया” । जीवन तभी सब चाहित साधन भोग सकता है, जब वो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सम्पन्न रहे। हम आज मिलावट के युग में तो रह ही रहे है, पर साथ में विदेशी और शीघ्र बनने वाले व्यंजनों के शौकीन भी हो गये है, जो हमारी पाचनशक्ति के लिए एक खतरनाक नई चूनोती है। स्वास्थ्य और स्वाद दोनों का सन्तुलन बनाये रखने का अगर नये साल में सही प्रयास हो तो साल भर की स्वास्थ्य चिंताए काफी कम हो सकती है।
अतः नया साल का प्रथम संकल्प स्वास्थ्य के लिए स्वास्थ्य कारी हो यह चाहत किसी और की नहीं हमारे प्रिय जीवन की है, समझने की बात है। बाकी जीवन को जब तक सांस सही मिलती रही तब तक वो मजबूरी से भी जी लेगा, अपना यह कर्तव्य अच्छी तरह से समझता है। हम न समझे, तो क्या ?

2. आर्थिक मजबूती:-

आज अर्थ का दर्द ही संसार में ज्यादा फैला है, यह दर्द भी विचित्र होता है, कहीं इसकी बढ़ोतरी से लोग परेशान है तो कहीं इसकी कमी से । आज साधन इजाद करने वाला इंसान उसका गुलाम हो चूका है। कृत्रिम शारीरिक सुख के अधीन हो मानव अर्थ का दास बन चूका है। इसका जाल भी इतना मजबूत है कि साधारण व्यक्तित्व वाला इन्सान जिंदगी भर असन्तुष्टि के कारण तनाव ग्रस्त हो जाता है। हर नये वर्ष मे इसके प्रति हमारी चेतना एक सन्तुलित नीति तय करने का अनुरोध करती है। इस नीति में प्रमुख तत्व सिर्फ संयम ही रहे तो जीवन जरूरतमय अर्थ की ही कामना करेगा तथा इसके अनुसार अनुपालन से मितव्यता का महत्व हमारे जीवन को सदाबाहर स्वस्थ महक से प्रफुलित रखेगा। दोस्तों, गुजारिस है, आप अपने आनेवाले साल को बेहतर बनाना चाहते है तो इस सिद्धांत पर गौर कीजियेगा ” Money saved is money earned” । आज क्रेडिट कार्ड, बैंक व आपसी ऋण एक बिमारी बन कर हमें गलत पथ का दावेदार बनाने की निरन्तर कोशिश करे उससे पहले हमें इनके प्रति एक संयमित दिशा निर्देश तालिका बना लेनी चाहिए। जीवन को सुख और शांतिमय बनाना है तो ये स्वीकार करना सही होगा, ” जितनी बड़ी चदर उतना ही पैर फैलाना”। समझने की बात है, ज्यादा चिंताए हमें शीघ्र ही चिता का रास्ता दिखा सकती है । आनेवाले साल से पहले संयमित जीवन और बचत के महत्व के संकल्प अपना कर हम जीवन को सार्थकता और मजबूती दे सकते है। यह बात भी हमें ध्यान रखनी होगी कि हमारे नये संकल्पों में जरूरी अर्थ उपार्जन के प्रति नकारत्मक्ता कभी नहीं होनी चाहिये, संयम और मितव्यता कभी ऐसी सलाह नहीं देती। आज का आर्थिक दौर में कमाने के साधनों की कोई कमी नहीं है, वैसे ही अर्थ खोने के खतरे भी बढ़ रहें है, दोनों ही परिस्थितयों के प्रति जागरूक रहना सही होगा। लालच, जुआ, सट्टा, अति विश्वास, झूठी विलासिता और भी नुकसान के तत्वों से बचना हमारे लिए बेहतर होगा। शेयर बाजार के अच्छे निवेशक बने पर नकली सौदो के जुआरी नहीं। अपनी मासिक बजट योजना को उचित मॉर्गदर्शन दीजिये। आजकल बचत के सुरक्षित हजारों तरह के उत्पादन बाजार में आ रहे है, अध्ययन कर, ज्ञान बढ़ा कर, जानकारों के साथ विचार विमर्श कर हम अपनी तनाव रहित पूंजी का निवेश इनमें कर बढ़ोतरी करे तो शायद नया साल हमें एक सुनहरे भविष्य से सज कर हमारे जीवन को सुख और सम्पन्नता का अहसास दे सके।

3. समय और कर्म :

कर्म इंसान की सकारत्मक ऊर्जा तैयारी करता है और समय का सदुपयोग जीवन के प्रति स्वस्थ आस्था प्रदान करता है, ऐसा जीवन शास्त्र से सम्बंधित जानकारी रखनेवाले लोग अच्छी तरह से जानते है। आज आदमी की कीमत उसका कार्य तय करता है। कर्मशील इंसान जीवन में इसकी भूमिका को भूलता नहीं और शारीरिक स्वास्थ्य की अनुकूलता तक अपने चुने हुए व्यवसाय, नौकरी या अन्य तरह के कामों में जीवन को उलझाये रखता है, इसका कारण समय के साथ तालमेल बढ़ाना । जीवन में निराश के आगमन का प्रथम कारण ही है, समय का उपयोग न कर, खाली रहकर वक्त नष्ट करना। इंतजार ही एक ऐसा तत्व है जिसको ज्यादा सहन करना असहज होता है, निराश जीवन इसका जल्दी शिकार होता है। नये साल के लिए तय किये संकल्पों को योजनामय करने के लिए समय और कर्म दोनों ही महत्व रखते है ।हमें यह जानकर ही आगे बढ़ना होगा कि शारीरिक श्रम और दिमागी काम का आपसी संतुलन रहने से समय की भी कीमत बढ़ जाती है। हम जीवन के अच्छे और खराब क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्व व सन्तुलन कायम रख सकने में सफल भी हो सकते है। सवाल उठता है, कैसे जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए हम समय का प्रयोग करे ? इस सन्दर्भ में दो तथ्य हमारा साथ निभा सकते है वो है शारीरिक चेतना और आत्मिक ज्ञान, फर्ज बन जाता है हमारा हम आलस्य और झूठ से इनको दूर रखे।

हर दिन की उपयोगिता को समझकर जीवन समर्थित कार्य को समय देने के बाद भी कुछ समय जो बचे, उसमें सुबह की शुद्ध वातावरण की प्रकृतिमय सैर, योग, ध्यान को उचित स्थान देना सही होगा। साप्ताहिक समय में अच्छा साहित्य अध्ययन, अपने पसन्दीदा मन को खुश रखने वाले कार्य मसलन दोस्तों और अपनों के साथ मनोरंजन देने वाले प्रोग्रामों में सम्मलित होना, जिससे दैनिक तनावों से राहत मिले। साल में एक बार अपने पसन्दीदा पर्यटन के लिए सोचना अच्छा संकल्प कहा जा सकता है। आशावादी परिणाम प्राप्त करने के लिए हमें सी.बी.एडवर्ड के इस कथन को ध्यान से पढ़ना होगा, ” Insight on getting the very best out of what you have to do. Be positive in your attitude. Merely negative cricism never got anyone anywhere. Moaning (कराहना) groaning (दुःखी होकर कराहना) makes work ten time harder. It is not only job you are doing makes life good. It is the spirit you put in it. ध्यान देकर अगर हम सोचे हम स्वयं के लिए भी नहीं दूसरों के लिये भी उतने ही महत्वपूर्ण बन सकते है, जब तक हम कर्म की सही मीमांसा समझते है। वैसे भी गीता के इस श्लोक से भी जीवन में कर्म का महत्व स्वयं ही समझ में आ जाता है।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि ”

सीधे शब्दों में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संसार के हर प्राणी को ये ज्ञान प्रदान किया है ” तेरा कर्म में ही अधिकार है ज्ञान निष्ठा में नहीं । कर्ममार्ग में कर्म करते तेरा किसी भी अवस्था में कर्मफल की इच्छा नहीं होनी चाहिये न ही तू कर्मफल का हेतु बन और तेरी अकर्म में भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये”।

समय के अनुसार किये अच्छे कर्म सफलता और असफलता दोनों ही अवस्था में सन्तोष दायक जीवन को गतिमय रखते है। आनेवाले साल की सुगमता भी परिवर्तन पर निर्भर होती है, तय हमें करना होगा परिवर्तन की शुरुआत कब और उसकी दिशा किस और होगी ! *** क्रमश…..

लेखक: कमल भंसाली

🌴आत्मिक आधार🌴कुछ विचार🌿कमल भंसाली🌿

जीवन एक आस्था है
एक आत्मिक विश्वास है
निरन्तरता से भरा प्रयास है
समझ मे आ जाये
तो सार्थक हो जाये
न आये तो एक भटकाव है।
💑
जन्म के बाद एक ही निर्विवाद सत्य
“मृत्यु” ही है, जो स्थायित्व कि सरंक्षता में
अनिश्चित होते हुए भी निश्चित है।
👆
नियति के अनुसार ही बुद्धि का महत्व है, बुरे समय मे श्रेष्ठ बुद्धि भी अपना असर खो देती है, अच्छे समय मे निम्नतम बुद्धि वाला भी सर्वेश्रेष्ठ प्रयास कर जाता है।
मापदण्ड जीवन का यही है, कोई भी अपने आप को कभी सर्वेश्रेष्ठता के अंहकार से सुशोभित करने की चेष्टा न करे, नहीं तो इतिहास गवाह है, पतन का रास्ता भी पास से गुजरता है।वैसे जीवन के हश्र का जिक्र भी क्षण के दुःख का निर्माण करता है।
🙏
सही यही है, जीवन अद्भुत उपहार है, प्रकृति का और सब प्राणी का अपना समर्पित अधिकार उस पर है, अतः भगवान महावीर के इस कथन में अपना जीवन समर्पण कर देना उचित होगा, 👉 स्वयं भी जियों और दूसरों को भी जीने दो 👈 👉 Live & Let Live☝
🍀🐞
किसी भी तरह के नहीं खत्म होनेवाले मतभेद या संधर्ष का एक मात्र अचूक निदान “क्षमा” ही है, जिसका उपयोग आत्मिक पवित्र व्यक्तित्व वाला ही कर सकता है, क्योंकि क्षमा “वीरस्य भूषणम” है। साधारण व्यक्तित्व वाला तो सिर्फ उसकी बातें ही कर सकता है, तभी तो सांसारिक और पारिवारिक असहनशीलता बढ़ रही है, और आंतकवादी और अलगाव वादी शक्तियां इसका भरपूर प्रयोग कर असुरक्षा का माहौल तैयार करने में सफल हो जाती है।
🌸
स्वास्थ्य जीवन की सबसे मुख्य जरुरत है, साधन उसकी आंकाक्षाओं की पूर्ति मात्र है, पर देखा गया है, मानव स्वभाव साध्य से ज्यादा साधनों को महत्व देकर अपने ही बनाये जाल में मकड़ी की तरह उलझ जाता है। जिसमें से निकलना उसके लिए अंतिम समय तक कठिन हो जाता है। इस तरह की लापरवाही जब ज्यादातर उच्च शिक्षित लोगों से होती है, तो खेद होता है कि आखिर शिक्षा की बुनियाद में जीवन के प्रति इस लापरवाही का अंजाम सही ढंग से क्यों नहीं बताया जाता।🌷 🌸कमल भंसाली🌸

“क्रोध”….एक चिंतन…कमल भंसाली

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हकीकत में, क्रोध हमारी दैनिक मजबूरी है, किसी न किसी बात पर हम क्रोधित होते रहते है, गुस्सा करते रहते है । यह जानते हुए भी कि यह शांति के विरुद्ध की क्रिया है, आ जाता है, तो इसका नियमन और संयमन करना काफी कठिन है ।आइये, जानने कि कोशिश करते है, क्यों क्रोध के आगे मजबूर हो जाते है ?, हालांकि स्वयं को नुकसान करने वाली यह क्रिया नुकसान ही ज्यादा करती है।

किसी ज्ञानी आदमी से जब किसी ने यह सवाल किया कि इंसान का सबसे बड़ी दुश्मनी कौन निभाता है,? तो महापुरुष ने जबाब दिया, ” क्रोध या गुस्सा उसका सबसे बड़ा शत्रु है, जिसे बिना नुकसान के नियंत्रण करना बहुत कठिन होता है।” महापुरुष ने सही जबाब दिया। आज के सामजिक परिवेश पर गौर करने से लगता है, देश, प्रदेश, समाज, धार्मिक पंथ और परिवार इस अवगुण के शिकार हो चुके है। क्रोध में ज्यादा अंश ज्वल शीलता का होने के कारण असहनीय होता है, और क्रोध करने वाला इसका स्वयं ही शिकार होता है, इससे उसके शारीरिक अंगों पर विपरीत और नुकसानदेह प्रभाव तो पड़ते ही है, साथ में मन और आत्मा भी नकारत्मक्ता से प्रभावित होती है। क्रोध की स्थिति में विवेक दिमाग से बाहर भाग जाता है, और अनिष्टता को तांडव मचाने की स्वतन्त्रता मिल जाती है। आइये, जानते है, क्रोध में शरीर की क्या स्थिति हो सकती है। शरीर विशेषज्ञो केअनुसार सबसे पहला असर इसका दिमाग के साथ ह्रदय के सम्पर्क पर पड़ता है, और इंसान के रक्त प्रवाह में अनियमिता शुरु हो जाती है, इससे दिल पर पड़नेवाला प्रभाव कभी कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है। निश्चित है, क्रोध रक्त प्रवाह को धमनियों में असहजता प्रदान करता है, और इस असहजता से हर मानव अंग घबराता है। हालांकि चिकित्सक कहते है, क्रोध एक स्वभाविक प्रक्रिया है, गलत लगने वाले किसी आचरण पर इसका आना सहज है, परन्तु सीमा रेखा के अतर्गत रहे, तो जीवन की सक्षमता को भी दर्शाता है।साफ़ हो जाता है, क्रोध को सिर्फ अवगुण की श्रेणी में हम नहीं रख सकते, जब तक इसका दायरा असहनीय न हों।अति क्रोध का दूसरा प्रभाव सम्बंधों और आपसी रिश्तों पर पड़ता है, कहना न होगा, इनसे रिश्तें टूटते है, और उनका वापस वास्तविक स्तर पर आना मुश्किल होता है। यहां संयम से गुस्सा या क्रोध को रोकना ही उचित होता है। चूँकि, क्रोध की विभिन्न किस्म होती है, तदानुसार उसका रुप भी अलग अलग नाम से जाना जाता है। गुस्सा, द्वेष, बदला, आघात, आक्रमण, ईष्या, रौद्र, भयंकर, आदि स्वरुप क्रोध परिवार के सदस्य है।

चूँकि क्रोध काफी हद तक भावनाओं से सम्बन्ध रखता है, खासकर जिनमें तनाव होता है, तो आदमी सिर्फ उसके एक ही पहलू पर गौर करता है, उसे लगता है, उसका इस परिस्थिति में क्रोध करना जायज था, चाहे उसका चिंतन सही न हों। क्रोध का बचपन गुस्सा है, जो किसी भी तरह की विपरीत स्थिति से पैदा होता है। गुस्सा जब तक जायज रहता है, तब तक एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह बाहर शांत रहता है, पर भीतर ही भीतर उसमें विद्रोह की ललक रहती है। इसलिए गुस्से को नियंत्रण की बात हर ज्ञानी आदमी करता है। कहते है, वो आदमी देवता होता है, जिसे क्रोध नहीं आता, परन्तु इसको सत्य नहीं कह सकतें, क्योंकि देवताओं की कहानियों में ऐसे बहुत उदाहरण है, जिसमे देवता भी कुपित होते है, परन्तु ज्यादातर उनका क्रोध अन्याय से सम्बंधित होने के कारण, उनके क्रोध को न्यायोचित बताया गया है।

आखिर, क्रोध आता ही क्यों है ? मानते है, क्रोध जीवन का हिस्सा है, हमारा यह संसार क्रोध के कई कारणों को एक के कार्य से दूसरों को एक कारण क्रोध का दे देता, जब उसमे किसी की भावनाओं को ठेस पंहुचती है। हम अपने जन्म के बाद कई ऐसे दृश्य देखते जिनमे क्रोध, गुस्सा या उसके समकक्ष कोई तत्व हमें आहत करता है, वो जब हमारे चेहरे पर नापसंदगी का भाव दिखाता है, और गुस्से की प्रक्रिया से हम वाकिफ हो जाते है। फ़्रांस के मनोवैज्ञानिक जैक्स लुकान के अनुसार “क्रोध एक मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध है, किसी भी तरह के हमले का अहसास होने पर स्वत: ही हमारी शारीरक प्रणाली उसके लिए तैयार हो जाती है, सक्षमता से मुकाबला करने के लिए”। वो आगे यह भी मानते है, कि यह कमजोरी को छुपाने का मानव ब्रह्मशस्त्र है। हमें. क्रोध जब आता है, जब हम आहत होते दिल से, पर क्रोध और आहत में एक दुरी है, इस दुरी में ही अगर हम संयमित हो जाते है, तो क्रोध को आने से रोका जा सकता है।

क्रोध को कभी भी प्रमाणिक नहीं माना जा सकता, न ही उसे शीघ्र अनुशासित किया जा सकता, क्योंकि यह सदा विवेक के विरुद्ध काम करता है। क्रोध का कारण कुछ भी हो सकता है, झूठ, अन्याय,फरेब, हिंसा, ईष्या, द्वेष, जलन, व्यवस्था, सम्बन्ध या और कोई के प्रति असन्तोष, क्रोध और गुस्सा का कारण हो सकता है। मान लीजिये, कभी हमें कोई काम के लिए, कहीं अति शीघ्र पहुंचना है, और रास्ता किसी कारणवश जाम है, तो अनायस ही हमें ट्रैफिक व्यवस्था पर गुस्सा आने लगता है, यहीं से क्रोध की प्रारम्भिक अवस्था शुरु हो सकती है, अगर जाम किसी कारण काफी देर तक नहीं हटे। प्रारम्भिक अवस्था में क्रोध को सन्तुलित किया जा सकता है। अगर इसे यहां सन्तुलन नहीं करते, तो पता नहीं आगे जाकर यह कहां बिना बरसने वाले बादल की तरह फटेगा, और इसका शिकार वो भी हो सकता है, जिस का कोई दोष नहीं।

क्रोध मानव स्वभाव की एक स्वभाविक क्रिया है, इससे बचने से किसी भी नई समस्या का आगमन रुकता है। अतः जब हम कभी आहत होते है, तो दिल हि दिल में यह स्वीकार कर लेना चाहियें कि हाँ, यहां “मैं आहत हो रहा हूं, पर मुझे धैर्य रखना हैं”। यह चिंतन, गुस्सा कम करने में काम कर सकता है। सारांश यही है, क्रोध, गुस्सा या इसका कोई भी रुप किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, ये किसी भी नगण्य कारण को विध्वंसक बना सकता है। जायज या नाजायज का क्रोध से कोई तालुकात नहीं, अनिष्ट्टता को जन्म देते, इसे देरी नहीं लगती। किसी भी सम्बन्ध और रिश्ते के लिए यह परमाणु बम से कम नहीं है। परन्तु इसका यह भी मतलब नहीं कोई हमेंआघात दे रहा है, हमारे दिल को ठेस पंहुचा रहा है, हम उसे सहन करते रहें, तो हम एक कमजोर व्यक्तित्त्व वाले इंसान कह लाये जा सकते है। संयम, धैर्य और मजबूत चिंतन से हम उसका प्रतिरोध कर सकते है। कहते है, इंसान की आँखों में उसके ठोस इरादों की झलक रहती है, और सामनेवाले के लिए यह समझने की समझ, कि उसके सामने कौन है ? अतः बहादुरी रखे, अनायास क्रोध को धैर्य से वापस भेज दे। इससे हम पूर्ण सुखी न हो, पर हमारी शारीरिक क्षमता को आघात नहीं पँहुचेगा, यह तय है।

चलते चलते…आइये पढ़ते है, क्रोध पर कुछ महापुरुष क्या कहते है…

” क्रोध वह तेज़ाब है, जो किसी भी चीज पर, जिस पर वह डाला जाये, से ज्यादा उस पात्र को अधिक हानि पंहुचा सकता है, जिसमे वह रखा है” ****मार्क ट्वेन
” क्रोध वो हवा है, जो बुद्धि का दीप बुझा देती है” **** रॉबर्ट ग्रीन इन्गे सोर्ल

” क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है, इससे आप ही जलते है” ***** भगवान गौतम बुद्ध

” हर एक मिनट जिसमे आप क्रोधित रहते है, आप 60 सेकेण्ड की मन की शांति खोते है” ***** रॉल्फ वाल्डो इमर्सन

इसके अलावा दोस्तों, भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय 2 श्लोक 63 में क्रोध पर कहा है…

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम: ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।। 2-63 ॥

( क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मानव अपनी स्थिति से गिर जाता है।)

सन्त कबीर दास जी ने क्रोध पर सही चिंतन धारा दी, उस पर एक नजर डालते है ।

जहाँ दया वहां धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध वहाँ काल है, जहाँ क्षमा वहाँ आप ।।

आज के आधुनिक युग में अति क्रोध आर्थिक नुकसान भी करता है, इसके कई उदाहरण हमारे सामने आते है, जब मान सम्मान के मुकदमों के निर्णय हम तक पहुंचते है।

चिंतन यही है, गुस्सा आने से पहले हम चिंतन करे ” क्या अति गुस्सा जायज है” ?…….कमल भंसाली