🌾पथ हार🌾 एक आत्मिक सुधार 👌 “प्रार्थना” 👃 कमल भंसाली👃

पथ हार
बैठ गया
एक नहीं कई बार
नजर न आया
एक भी सवेरा
नहीं जानता, सर्वेश्वर
कब दूर होगा जीवन अंधियारा
बचा सिर्फ
एक ही सहारा
लब पे रहता
अब सिर्फ नाम तुम्हारा
***
माफ़ कर देना
मनःस्थिति समझ लेना
हताश होकर
कर बैठा पुकार
“प्रभु” आओं
मेरे मन द्वार
इस जीवन के पालनहार
सिर्फ इतना बता दों
कब आओगे
कशमकश के
इस भँवर से निकाल दोगे
जन्म मरण मेरा
सार्थक कर दोगे
मुझे अपने में समेट
इस अस्तित्व बोध को कब
सम्पूर्णता दोगे
***
अंतर्मन हुआ गदगद
कहीं से आई जब
आत्म स्वीकृति की झंकार
छवि एक अदृश्य नयनों में उतरी
बिन किसी आकार
बोली इस प्रकार
“मैं” वहां ही हूँ कहां ?
जहां तुम नही
जब तुम स्वयं में नहीं
तब मैं वहां नही
विश्वास तुम्हारा
जब जग जाएगा
तब तुम्हें
मेरे अस्तित्व का पता लग जायेगा
हर अँधेरा
अपना सन्दर्भ तलाशने चला जाएगा
स्वर्णिम सवेरा
तुम्हारे कदम चूम ने आएगा
विकल्प चुनता जीवन
नई आस्था में समा जाएगा
तब सब कुछ् तुम्हारा
मुझ में समा जाएगा
एक निर्वाणित पथ
तुम्हारे सामने बिछ जाएगा
तब तुम नहीं भी पुकारोगे
स्वयं तुम्हें लेने आऊंगा
हर बन्धन से मुक्त कराऊंगा
जिस पथ के तुम दावेदार
उसी पथ पर साथ ले जाऊँगा
***
सागर की उदित लहरों को देखों
उसकी चंचलता में नजर आऊंगा
खिलती हुई कलियों की मासूमियत परखों
उनके खिलने में नजर आऊंगा
***
उगते भास्कर की रशिम निहारो
उसकी किरणन में नजर आऊंगा
अपने मन की रिक्तता तलाशों
सच की किसी शून्यता में मिल जाऊँगा

***
पथ हार न बेठना
कर्म के मर्म को समझना
आत्म धर्म की चेतना में
जीवन अर्पण का महत्व समझना
संसारी कल्याणी बन
अपने यहां होने के
सत्य की प्रस्तुति को समझना
गुनाह है “पथ हारना”
इसमें अदृश्यत् हमारे आपसी बन्धन को समझना
मानव जीवन को दी
मेरी इस साधना की अमृतता को समझना ……रचियता***कमल भंसाली

रचियता **कमल भंसाली

स्वर्णिम पल….कमल भंसाली

है, जिन्दगी के चाहे चार दिन
जीना तो पड़ेगा हर ‘पल’, हर क्षण
चाहे, जहर है, या अमृत जीवन
पीना तो पड़ेगा, हर ‘पल’, हर कण

‘पल’, जीवन सफर का एक हि रास्ता
राही को चलना, मंजिल का वास्ता
न यहां आज, न परसों,न ही कोई कल
जो है, वहीं है, यह निष्ठांत अछूता ‘पल’

अपरिचित सा भविष्य, हर ‘पल’ में रहता
मनमोहक, मधुर बन हर ,’पल’ छिन लेता
रातों की नींद में सितारे तक गिनवा देता
बड़ा जालिम, न जीने देता, न मरने देता

बुलन्दियों की गहरी घाटी में विलीन वर्तमान
बहुत कुछ देकर जाता, पर न करता अभिमान
सन्देश ही भेजता, जो आज, वो नहीं होगा कल
देख, समझ कर इंसान चल, आगे है, दूसरा ‘पल’

समझने लायक होता है, ‘पल’ का हर कमाल
हर ‘पल’, करता आशा और निराशा का निर्माण
देखते युग बदल जाता, पर रहता चंचल ‘पल’
उम्र को तराजू में तोल देता, वो ही है, यहीं ‘पल’

वर्तमान का हर लेखा, देता इतिहास को सौंप
जानेवाल ‘पल’, कितना निरहि, बिन संताप
इस ‘पल’ को जानना, यहीं है समय, यही वक्त
काल का निर्माणकर्ता, क्षणिक, पर पूर्ण सत्यत:

‘पल’ से बन्धी, हर सांस की डोर,
इसी से शुरु होती, आभामय भोर
जागों तो आएगा, सुरमई सवेरा
नहीं तो जिंदगी में, रहेगा अंधेरा

सच है, हर ‘पल’ नहीं सुनहरा
हर ‘पल’ में राज छुपा है, गहरा
न कोई इसका नाप, न हीं तौल
मणिमय ‘पल’, बिन मूल्य अनमोल

‘पल’ विश्वास, ‘पल’में समायी आस्था
‘पल’में ही आशा, पल में ही निराशा
पर, ‘पल’ का नहीं , किसी से वास्ता
‘पल’ तो है, प्रभु तक पँहुचने का रास्ता

मैं नहीं कहता, कहता हर ‘पल’
जीवन राही, मेरे साथ चला चल
देख दूर नहीं, तेरी प्रतीक्षित मंजिल
आज नहीं तो कल कहेगा, ‘स्वर्ण पल’
…..कमल भंसाली