🌺सरस्वती वंदना🌺 कमल भंसाली

वन्दना माँ वंदना
असत्य जीवन को दो मुक्ति का दान
वीणा वादिनी मां लो मेरा सज्ञान
हंसवाहिनी उर आनन्द का दो वरदान
वंदना मां वंदना
🌺🌺🌺
दिल में अगर है सच्ची भक्ति
मां बढ़ा दो जग में भारत की शक्ति
हर जीवन में ज्ञान की भक्ति
बढ़ती रहे सही आस्थाओं की आशक्ति
जीवन न हो चाहे महान
इंसानियत का रहे ज्ञान
मां तुम हो महान
वंदना मा वंदना
🌺🌺🌺
बसंत का आगमन
सुन्दरता का सही मूल्यांकन
पवित्रता का सही आंकलन
जीवन मूल्यों का पूर्ण संचालन
उल्लासित अनुशासित हो आत्मा
ये ही दे दो जरा सा विज्ञान
सकल सफल हो हर प्रार्थना
वंदना मां वंदना
🌺🌺🌺
अज्ञानता के अंधेरो के
श्वेत साधारण आराधना के फूल
करना जरा स्वीकार
बढ़ा दो जीवन का आकार
कर दो दूर हर मन का विकार
मानव मन बन जाये निर्मल नीर
जीवन में रहे सदा मंगलमय भोर
बहे स्वस्थ, सम्पन्न पवन जो न कभी हो अधीर
ऐसे जीवन की ही रहे सदा भावना
मंगल रहे सब की हर कामना
वंदना मा वंदना
🌺🌺🌺
✍️ कमल भंसाली

09/02/2019

🙆सुख का निर्माण🎅भाग 2💆अनुसंधानिक तत्वों की तलाश✍कमल भंसाली

सुख दुःख दोनों की भूमिका का अगर विश्लेषण करने की प्रक्रिया को हम आगे बढ़ाते है, तो उनमें जो एकमात्र सहमति नजर आती है, वो सिर्फ मानव जीवन के सन्दर्भ में है। दोनों का मानव जीवन को निरन्तरता का बोध देना है। दोनों तत्व इसके अलावा मानव जीवन में विरोधाभ्यास का अनुभव देते रहते है, क्योंकि दोनों का आधार अलग अलग स्थान से आता है। सुख की मन से आशिकी है, मन को जो भा जाये वो सुख की अहसासित ऊर्जा बन जाती है। शरीर की चाहत भोगिक होती है, वो जब तक किसी चाहत को भोग नहीं लेता और उससे सन्तुष्ट नहीं होता तब तक किसी भी प्रकार की सुखमय ऊर्जा ग्रहण नहीं कर पाता। इसलिए शरीर को भोग वासना का पुजारी भी कहा गया है। अगर हम मन व शरीर के सुख दुःख की जरूरतों का विश्लेषण करे तो प्रमुख अंतर यही नजर आता है, कि शरीर की चाहते (Desires) अर्थ शास्त्र के सिद्धांत LAW OF UTILITY से काफी प्रभावित है। इस सिद्धान्त के अनुसार शरीर की भूख उपयोगिता पर निर्भर करती है। ज्यों ज्यों शरीर किसी भी वस्तु या पदार्थ का भोग करता है, उसी अनुसार उसकी तृप्ति उस वस्तु या पदार्थ के प्रति बढ़ती जाती है, तो एक स्थिति पर जाकर उसका लगाव उस वस्तु या पदार्थ के प्रति समाप्त होने की आशंका शुरु होने लगती है। पर मन की स्थिति चंचलमय बनी रहती है, उसकी दूसरी चाहते कभी सन्तुष्ट नहीं होती सदा ही उकसाती रहती, “मन मांगे और ( more)” ।

यहां सुख और दुःख के तत्वों का गहराई से विवेचन करना और समझना बहुत जरुरी है। मानव प्रवृति की सबसे बड़ी नासमझी यही है, जो उससे जुड़ा उसको उसने कभी ठीक से नहीं समझा। “जीवन जीना भी एक कला है” जरा इस वाक्य पर आज ध्यान दीजिये, बहुत ही कलात्मक व्यक्तित्व के निर्माण की तरफ इशारा कर रहा है। पर हम इससे परिचित होकर भी अजनबी जैसा व्यवहार करते है, जब की खुशियों के निर्माण में इसकी बहुप्राविधिक भूमिका बेमिसाल है। जिसमें सुख दुःख दोनों को बुद्धिमानी से विवेचना करने की सलाह है, तथा उन्हें जीवन में कैसे सन्तुलित तरीके से अपनाया जा सकता है के प्रति एक चेतनात्मक रवैया रखने की भी सलाह भी है। अगर जिंदगी के प्रति हमारी संजीदगी है तो हमें सबसे पहले इस तथ्य को स्वीकार भी कर लेना चाहिए, वस्तुतः जीवन कोई साधारण नहीं होता, वो तो सब तरह के असाधारण अस्त्रों से सुसज्जित होकर ही इस धरा पर आता है। हम ही उसके मालिक और चालक दोनों है। हमारी नादानी कहिये या नासमझी हम उन्हे अपने अनियंत्रित मकसदों के सामने बिना कोई योजना के गलत प्रयोग करते है, अतः साधारण मानव बन रह जाते है। जबकि सुख चिंतकों ने हमसे सदा आग्रह किया कि ” Happiness is not something you postpone for the future; it is something you design for the present.” Jim Rohan, author.

ये जानना भी शायद हमारे लिए दिलचस्प हो सकता है, कि सुख दुःख कौन कौन सी गलियों से होकर हमारे जीवन क्षेत्र में प्रवेश करते है। इसके लिए हमें अपने दैनिक जीवन में सतत कायम रहनें वाली कुछ सकारत्मक ऊर्जाओं से दोस्ती करनी पड़ेगी, उनका नाम उत्साह, उमंग, जोश जैसे तूफानी शब्द है। जिसे आप और हम इंग्लिश में शायद एक शब्द से समझ जाये, जिसके बारे में Robert Heaven Schaeffer फरमाते है ” Enthusiasm is the thing that makes the world go round. Without its driving power nothing worth doing has ever been done. It alleviates the pain of poverty and the boredom of riches. Apart from it joy cannot live. Therefore, it should be husbanded with zeal and spent with wisdom. To waste it is folly; to misuse it, disastrous.”।

हम जरा आगे बढ़े, उससे पहले हमारा यह तय करना जरुरी हो जाता है, कि क्या हम हकीकत में जीवन को जी रहे है, या उसे निभा रहें है ? क्योंकि दोनों ही दो छोर है, आखिर जीवन यात्रा को पूर्ण करने के लिए हमें एक छोर से शुरु होना ही होगा। जिन्होंनें निभाने वाले छोर की यात्रा पसन्द है, उनके लिए यहां कहने को कुछ नहीं बचता, सिवाय शुभकामनाओं परन्तु जिन्होंने जिंदगी के कर्मठ छोर को अपना मकसद माना, उन्होंने अपनी क्षमताओं का सदुपयोग कर कई तरह की सफलतायें अर्जित करने की चेष्टायें की, सही मायनों में उन्होंने जीवन में रोमांच से कई तरह की खुशिया हासिल भी की है।सुख और दुःख भी एक मनोविज्ञान का विषय है, इसे हम भाग्य से जोड़ते है, सन्तोष के लिए सही हो सकता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों ने सुख और दुःख की अनुभूति को व्यवहारिक कुशलता का परिणाम भी बताया, पर इसकी सीमितता से इंकार नहीं किया जा सकता। वैसे देखा जाय आदमी का अपना चिंतन भी सुख दुःख का निर्माण करता रहता है। कभी बिना कारण भी नकारत्मक चिंतन से दुःख का अहसास होता है। प्राकृतिक आपदाए, शारीरिक बीमारियां जैसे दुःख इंसानी क्षमताओं की परीक्षाये होती है, जब तक ये हादसों में परिणित नहीं होती तब तक आदमी इनसे असहनीय दुःख नहीं पाता। जीवन निभानेवाले आदमी का चिंतन इन्हे दुःख का कारण मान ले पर निर्भीक आदमी इनका मुकाबला करता है।

माना जा सकता है, सुख दुःख कोई कारखाने का उत्पादन नहीं कि तादाद में जमा किया जा सकता अगर ऐसा होता तो यहां कुछ भी नहीं लिखा जा सकता क्योंकि फिर दुःख का उत्पादन कोई नहीं करता, सुख सस्ता हो जाता और नीतिगत बात यह भी सही है, कि सस्ते को खरीदने में भी मजा नहीं आता। अतः सुख का निर्माण किया जा सकता है,पर उसका उत्पादन नहीं। निर्माण और उत्पादन का फर्क एक एक ईंट को सजाकर भवन निर्माण करने वाले कारीगर से जांनना उचित होगा।

निर्माण एक कलात्मक क्रिया है, अतः जरुरी हो जाता है जानना कि हमारा अंतर्मन किस तरह की खुशियां चाहता है, और उसके चिंतन की क्षमता किस तरह की है। शरीर का हर अंग कारीगर नहीं होता, कुछ अंग सिर्फ समान इकट्ठा करने का काम कर सकते है। खुशियों को शरीर के धरातल की मजबूती चाहिए, ये पहला नियम हमें सदा ध्यान में रखकर हमें अपने स्वास्थ्य में सन्तुलन बनाये रखना चाहिए। चाणक्य नीति के अनुसार आलस्य शरीर का सबसे खतरनाक शत्रु है, उससे दोस्ती का मतलब हम जिंदगी में कभी अपनी ख़ुशी की चाहत नहीं कर सकते। ऐसी अवस्था वाले इंसान के लिए बेहतर है, वो दूसरों को खुश देखकर स्वयं खुश रहे।

आल्स्योपहता विद्या परहस्तगताः धनम् ।
अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम् ।।

आलस्य विद्या को नष्ट करता है। दूसरे के अधिकार में गया धन वापस नहीं आता। कम बीज वाला खेत नष्ट हो जाता है। बिना नायक के सेना हार जाती है। …चाणक्य निति

लेखक चेस्टरफील्ड का मानना है ” आलस्य मूर्खो का अवकाश दिवस है ” ।

विचारक जेरिमी टेलर तो यहां तक कहते है, ” आलस्य जीवित व्यक्ति की मृत्यु है ”

पर श्री मलूकदास जी ने आलस्य करने वालो को यह कहकर बहुत शान्ति दी …..

“अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम,
दास मलूका कह गए सब के दाता राम” ।

अर्थ- अजगर को किसी की नौकरी नहीं करनी होती और पक्षी को भी कोई काम नहीं करना होता, ईश्वर ही सबका पालनहार है, इसलिए कोई भी काम मत करो ईश्वर स्वयं देगा।

दोस्तों युग परिवर्तन नियम के अनुसार ऐसे कथन अमान्य की श्रेणी में आते है, अतः इसे चेतावनी ही समझे, क्योंकि सुख की अनुभूति ही सिर्फ सर्वश्रेष्ठ जीवन की चाहत हो सकती है। लेखक ***✍ कमल भंसाली …..क्रमश….

👚सुख का निर्माण👚भाग 1✍ कमल भंसाली

मानव जीवन एक मूल्यवान उपहार है, जिसमें खुशियों की कोई सीमा नहीं पर हम अपने ही व्यक्तित्व कि जानी अनजानी गलतियों के कारण उन्हें दुःख के आवरण में ही तलाश करते नजर आते है। सच्चाई हर जीवन का आधार है, यहां तक की हमारा शरीर भी अपनें अंगों पर पूर्ण विश्वास इसलिए करता क्योंकि उनकी कार्य प्रणाली में सच का तत्व समाया है। उसी की बदौलत हम शरीर की स्वस्थता पर निर्भर होकर अपने जीवन क्षेत्र की विस्तृता को नये नये आयामों से सजाने की कोशिश करते रहते है। सभी खुशियां भाग्य और वक्त की सौगात नहीं होती, हकीकत में ज्यादातर खुशिया हमारे दैनिक जीवन के कार्य क्लापों में ही निहित रहती है। यानी यह कहा जा सकता है, कि खुशियों का निर्माण भी किया जा सकता है। दो सवाल यहां स्वयं से करना उचित होगा, पहला फिर करते क्यों नहीं ? दूसरा क्या करना कठिन है ? शायद, पहले सवाल का जबाब हर एक के पास है, खुशियों को भी सच्चाई और ईमानदारी चाहिए, और इंसान का पूर्ण सच्चा होना बहुत कठिन है, क्योंकि एक सामाजिक व्यवस्था में रहने की उसकी मजबूरी है। जहां तक कठिनता का सवाल है, उसमें यही कहा जा सकता है, जीवन अगर अपनी संक्षिप्त उपलब्धियों से सन्तुष्ट होता है, और अति भोगवादी प्रवृत्तियों के आकर्षण से ग्रसित नहीं होता तो सुख के क्षणों का अनुभव विपरीत परिस्थितयों में महसूस करता रहेगा। हमारी कई आत्मिक और मानसिक कमजोरियां ही हमें कठिनता का अनुभव ज्यादा कराती है और हम हर दुःख को भाग्य की देन मान लेते है। इस सन्दर्भ में पुरानी फ़िल्म “दोस्ती” का एक गाना काफी हद तक इस बात का समर्थन करते नजर आता है, कि जीवन में सुख और दुःख एक सिक्के के दो पहलू है, अतः उनके बदलते पहलू पर न गौर करे तो भी सिक्के की वही कीमत रहेगी। गाने के बोल कुछ इस तरह से इस स्थिति का अनुभव कराते है, ” राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है, दुःख तो अपना साथी है, सुख है एक छांव ढलती आती है जाती है” ।

प्रायः सभी धर्म विशेषज्ञ यही कहते संसार दुःख का सागर है फिर वो इसके विपरीत यह भी कहते है, मानव जीवन अनमोल है। यहां तथ्य कुछ दूसरा है, जो शायद हम नहीं समझ पा रहें है, सृष्टि की मेहरवानी ही मानव जीवन है, दूसरे श्रेणी के जीव जन्तु जिनमे भी सजीवता है, काफी हद तक बेबस और लाचार होकर जी ते है। अतः स्पष्ट है, मानव जन्म पाना ही जीवन की पहली और मृत्यु अंतिम खुशी है। यहां प्रश्न उभर सकता है, मौत ख़ुशी क्यों है ? इस सवाल के उत्तर को सही ढंग से समझने से पहले हमें ख़ुशी को परिभाषित करना होगा, हमें समझना होगा आखिर कौन सा अनुभव और अहसास हमें सुख दुःख का अहसास देता है। संक्षिप्त में हम यों भी समझ सकते है कि सुख और दुःख का संबध अनुकूलता और प्रतिकूलता से होता है। जीवन- दर्शन के जानकारों के अनुसार सृष्टि का निर्माणिक तत्व ‘सृजन’ विसर्जन की देन है, उनके अनुसार विसर्जन होने से ही सृजन हो सकता है। वो तो ये भी कहते है, मानव भी विसर्जन की देन है।
सुख का निर्माण कोई अगर करना चाहता है, तो उसे इस सिद्धान्त को अपने अंदर तक तलाशना होगा। उदाहरण के तौर पर जब कोई आदमी किसी भी वस्तु का दूसरों के हित में विसर्जन करता है, तो निश्चित ही सुख की कुछ बूंदों की अनुभूति का आत्मा में सृजन जरुर महसूस करेगा, चाहे उसकी अवधि संक्षिप्त ही क्यों न हो।

एक अंग्रेज संत फैड्रिक लेविस डोनाल्डसन् ने सन् 2015 में अपने प्रवचन में एक प्रश्न के उत्तर में बताया कुछ हमारे किये सामजिक पाप ( Sins )भी होते है, जिनके कारण मानवता को दुःख झेलने पड़ते है।उनके अनुसार वो है:

1.बिना कर्म किये पाया धन
2.बिना विवेक की हुई अय्यासी
3. बिना चरित्र के पाया ज्ञान
4. बिना नैतिकता का व्यापार
5. बिना मानवता का विज्ञान
6. बिना त्याग की पूजा
7. बिना सिद्धांतों की राजनीति

आज की जीवन पद्धति के संदर्भ में उपरोक्त बातों को काफी सीमा तक सही ही माना जाएगा। क्योंकि आज हम रोज अनजाने भय के अंतर्गत ही अपना दैनिक जीवन जीते है। आज कहनें को शिक्षा का प्रसार उच्चतम स्तर पर हों रहा है, पर संस्कारों का होता क्षय शरीर को अति भोगवादी बना कर मानव को इतना कमजोर बना देगा कि शरीर कोई भी हिस्सा मानसिक और आत्मिक सुख के लायक ही नहीं रहेगा। प्रकृति और समय को समझ अगर इंसान संयमित रहें तो वो कई छोटे छोटे सुख के बिंदु अपने दैनिक जीवन में महसूस करता रहेगा। चूंकि हमारे देश में सदा आध्यात्मिक समझ रही है, अतः प्रेम का विस्तार यहां प्रत्येक दिल तक होता आया है। हालांकि हम आज समय का खेल कहकर हर दुःख का निवारण करनें की कोशिश जरुर करते है, पर दिल में तो गम का धुंआ हमारे दिल में प्रेमित शिराओं में सुख की जगह दुःख का ही निर्माण कर रही है। समझने की बात है, सही समय पर रोग की पहचान और उसका सही निदान की कोशिश करना सुख निर्माण की तरफ पहला कदम है। शरीर, मन, आत्मा के प्रति हमारी सचेतना ही सुखी जीवन का आधार है। अतः स्वयं की सक्षमता को ही पहला सुख कहा जा सकता है।

सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।
एतद विद्यातस्मासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ।।

दूसरे पर आधार रखना पड़े वो दुःख, स्वयं के आधीन हो वो सुख; यही सुख दुःख की संक्षिप्त परिभाषा है।

क्रमश….लेखक कमल भंसाली

🚸सुख अनजान, दुःख की पहचान🚸कमल भंसाली😂

आज मानव के पास अति आधुनिक जीवन जीने की हजारों कल्पनायें है, पर जीने के लिए उसकी यह कल्पनायें क्या उसे कोई सुख का अनुभव दे रही है ? प्रश्न बड़ा पेचीदा है, इसका कोई अचानक उत्तर नहीं दिया जा सकता। सबसे पहले हमें यह तय करना होगा कि क्या सुख का चाव सभी को होता है ? इसका जबाब कम ही नकारत्मक आये, क्योंकि हर जीवन सुख की तलाश में ही रहता है। मानव, वर्तमान के सुख से अनजान होकर, अपने अनिश्चित भविष्य की तलाश में प्राप्त सुख की गरिमा भूल जाता है, और दुखी जीवन व्यतित करने लगता है। आखिर ऐसा क्यों होता है, इसकी विवेचना हम जरुर करेंगे, परन्तु उससे पहले हमें अपने आपको अंदर तक तलाशना होगा। वैसे तो सुख दुःख की कोई सटीक परिभाषा हम नहीं कर सकेंगे, क्योंकि दोनों ही अनुभूति है, दोनों ही बाहर की कोई सूरत नहीं रखते। कुछ मनोवैज्ञानिक का मानना है, सुख एक अनुभति है, दुःख यथार्थ है। सुख अहसासित होता है, अतः शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता, पर जिस दुःख में कारण की तस्वीर होती, अतः उसको को व्यक्त किया जा सकता है।

सुख, दुःख जीवन के दो आधार बिंदू है, इसके चारों और हमारे जीवन का तानाबाना बंधा है। ये दोनों ही नहीं होते तो शायद हम जीवन को व्यवस्था देने में अक्षम होते। जीवन की साख कर्म है, सकारत्मक कर्म सुख के क्षणों का निर्माण करे, ऐसा कोई प्रायिक सिद्धान्त नहीं है, पर आत्मिक शक्ति को जरुर सक्षम करता है। जीवन को जीना हम सबकी जरुरत है, पर उसे किस तरह जीना, एक उद्धेश्य है, अपने उद्देश्यों को समझ कर सही दिशा देना हर एक का कर्तव्य है। जो जीवन को सही दिशा की ओर ले जाने का चिंतन करते है, उन्हें सुख के अनगनित क्षण की प्राप्ति होती है, जो इस से भटक जाते है, कहना न होगा उन्हें दुःख के तंग गलियारों से ज्यादा गुजरना पड़ता है। दुःख को अगर हम त्रासदी न समझे, तो वो अनुभव बन कर हमारे लिए सुख के आधार की बुनियाद रख सकते है। परन्तु, ये इतना आसान भी नहीं कह सकते क्योंकि इसके लिए प्रचुर धैर्य की जरुरत होती है, और आज के तेज जीवन से इसकी आशा आखिर कितनी की जा सकती है ? मानव मन जब तक अति साधनों की आंकाक्षाओं से दूर रहता है, तब वो आंतरिक सुख की अनुभूति को ही ज्यादा प्रमुखता देता है, क्योंकि जीवन का पहला सुख तो काया की स्वच्छता और स्वास्थ्य में ही समाया है। इस सुख की विशेषता कह लीजिये की इस पर हर प्राणी का समान अधिकार है, और सब इसका आनन्द अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को संयमित और कर्मप्रधान कर ले सकते है, शर्त इतनी है, कि इसके प्रति सदा जागरुक रहना होगा। सुख की गिनती में इसको प्रथम रखना काफी समझदारी है, क्योंकि यही बाहरी और भीतरी सुख का अहसास कर आत्मा से आनन्द और दुःख की पहचान करवाता है।

हम सब अपने जीवन को सुखी करना चाहते है, यहां तक सब ठीक है, पर जब सुख की अति मात्रा की इच्छा हो जाए, तो दुःख की शुरुआत हो जाती है, यानी हम ही नैसर्गिक दुःख को छोड़कर, प्रायः सभी दुःख के स्वयं निर्माता है। तय है, दुःख ऊपर से नहीं आता, हम ही अपने अंदर भ्रमित हो कर इसे जन्म देते है। घटनाओं का घटना सृष्टि की लय है, हमारा कोई भी हस्तक्षेप इनको रोक नहीं सकता, जब हम किसी घटना से खुद को प्रभावित मान लेते है, तो दुःखी हो जाते है। मानव स्वभाव की विचित्रता ही समझिये कभी दुःख नहीं भी हो तो हमारे लिए अपने बनाये सामाजिक रस्मों रिवाजों के कारण दुःख का प्रदर्शन करना स्वभाविक हो जाता है, हालांकि हमारी आत्मा में उस दुःख की एक भी बून्द नहीं होती। कहते है, अभिमानित और निराश आदमी के पास दुःख की दुकान होती है, उसे सुख कम पसन्द होता है, वो सुख में दुःख की तलाश करता रहता है।

आज आर्थिक युग है, साधनों का भी युग है, सुख और दुःख की छोटी सी परिभाषा इनमे से कुछ लोग निकालते है, जहां अर्थ कमजोर हों और साधन कुछ हाथों में ही ज्यादा दिखता हो तो जीवन दुःख का दर्पण ही बन जाता है। इसकी कमी से जीवन निराशा के सामने समर्पण कर सकता है। अर्थ कमाना एक बाहरी सुख का निर्माण जरुर कर सकता है, परन्तु इस बात की गारन्टी नहीं दे सकता की ज्यादा कमाने से ज्यादा सुख का अनुभव किया जा सकता है। सुख को पुण्य से सहज प्राप्त किया जा सकता है, पर,ज्यादातर पाप कर कमाने वाला अर्थ यह यह दावा नहीं कर सकता। भारतीय जीवन दर्शन में अर्थ को तीसरा सुख जरुर माना, परन्तु ह्रदय से नहीं, मजबूरी से, क्योंकि साधनों से जीवन को गति मिलती है, और नियमित जीवन को लय मे रखने से ही जीवन अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर हो सकता है, इसे हम युग की जरुरत कह सकते है। साधन,जीवन शैली तो प्रदान कर सकते है, इसमे शंका नहीं, पर मन को कमजोर भी करते है, इसे आप और हम अच्छी तरह हर रोज अनुभवित होते है। जीवन युग के अनुसार जीना जरुरी होता है, आज साधनों की जरुरत हर पल रहती है, उनसे पलायन नहीं किया जा सकता, तय है। साधनों का जब हम ज्यादा प्रयोग करते है, तो उनके रख रखाव और उनके उपयोग को बेहतर करने के बाद इंसान के बाद समय ही कहां मिलेगा ? जब शरीर अपने सुख के लिए ही सब समय का दान मांग लेगा तो बेचारा मन उपेक्षाओं के कारण कैसे शांत रहेगा ! जब हम अपनी जीवन शैली को नहीं बदलेंगे तो निश्चित है, इस युग में दुःख शब्द का प्रभाव भी बढ़ेगा। आज आपसी प्रेम, स्नेह, की कमी से निर्भीक जीवन जीना मुश्किल हो रहा, पर फिर भी इंसान अर्थ और साधनों की प्राप्ति के लिए सबकुछ भूलकर दौड़ रहा है, बीमार होकर डाक्टर को अपना दुःख हर रोज सुना रहा है। कैसी है, हमारी यह समझ जीवन के प्रति, क्या यह चिंतनमयी चिंता नहीं है ? सोचिये……

शारीरिक और आर्थिक सुख के अलावा सबसे महत्व पूर्ण एक सुख और भी है, जिसे हम मानसिक या चारित्रिक सुख भी कह सकते है। सबसे अहम् सुख और जीवन उद्देश्य वाला यह तत्व काफी उपेक्षित सा रहता है, दैनिक प्रक्रिया में इस सुख का अहसास जब भी होता है, तब यह साधनाओं से पाये जाने वाले सुख पर काफी भारी पड़ता है। शरीर की लाचारी को नियंत्रित करने के लिए चरित्र की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। चारित्रिक ज्ञान आंतरिक उन्नति को सफलता की ओर अग्रसर भी करता है। चरित्र की दृढ़ता हमें सुख का स्थायी आत्मिक आनन्द तो प्रदान करता है, उसके साथ दुःख को सहजता से सहन करने का अनुभव बढ़ाता है। चूँकि चरित्र जीवन के सुख का आधार स्तंभ समझा जाता है, अतः इसमे उन्ही तत्वों का समावेश जरुरी है, जो पवित्र होते है। पवित्रता जल की तरह निर्मल होती है, उसमे गलत विचारों की गन्दगी जितनी कम पड़ेगी, वो उतनी ज्यादा प्रभावकारी साबित हो सकती है। सत्य, प्रेम, स्नेह, नम्रता, संयम, धर्म, ज्ञान, साधना, दान, त्याग, अंहिसा और भी कई गुणकारी कर्म पवित्रता के तत्व है, इनका दैनिक जीवन में जितना ज्यादा प्रभाव रहेगा, उतना ही सुखमय जीवन हम जी पाएंगे। इस धारणा को हम ज्यादा महत्व नहीं दे सकते है कि भाग्य से ही सुख दुःख मिलते है, क्योंकि इस तरह का चिंतन निराशावादी ज्यादा पसन्द करते है। कर्म प्रधान जीवन अगर बिना अभिमान के जिया जाय, तो निसन्देह दुःख सुख दोनों की चर्चा शायद हमे इस तरह नहीं करनी पड़े। अभिमान, घमण्ड, असत्य, घृणा, हिंसा, स्वार्थ, अनियमितता, लालच, अति वासना, ईष्या, द्वेष, अनादर, अधार्मिक कार्य तथा और कोई भी नकारत्मक तत्वों से जीवन जब तक बचा रहता है, तो कोई भी दुःख अगर आता है, तो भी वो अहसासित नहीं होता, और जीवन अपनी सक्षम गति कायम रखता है।

वैसे कहा गया है, जीवन में तीन सुख जरुर होने चाहिए, पहला सुख, निरोगी काया, दूसरा सुख माया, और तीसरा सुख चरित्र । कहावत है, पहला व दूसरा सुख अगर कोई कारण साथ नहीं निभा पा रहा है, तो डरने की बात नहीं वापस पाया जा सकता है, परन्तु तीसरा सुख अगर चरित्र नहीं रहता तो फिर हमारे पास शून्य भी नहीं बचता । परन्तु देखा जाता है, चरित्र शब्द माया के सामने फीका दिखाई देता है, पर वास्तव में शायद यह हमारा भ्रम हों क्योंकि जब दुनिया से विदा लेते है, तो हमारे नयनों में अपनी चरित्रिक गलतियां के अफ़सोस का गम, मौत का ख़ौफ़ बन सकती है।

जब हम दुनिया में आते है, तब पहली ख़ुशी का परिचय हम रोते हुए माँ के वात्सल्य से पाते है, जिससे हम आश्वस्त हो जाते है, कि हम अकेले नहीं पूरी दुनिया हमारी है। धीरे धीरे जब जीवन प्रगति की तरफ बढ़ता है तो तीनों सुख के सहयोग से एक सुख और हमारी महत्वकांक्षा बन जाता है,जिसे हम “सामाजिक सुख” कह सकते है। इस सुख में आत्मा का अगर वास रहें तो जीवन उच्चतम शिखर पर विराजमान होकर मानवता प्रेरक बन सकता है, इसमें सिर्फ यही ध्यान रखना होता है कि किसी भी प्रकार का अवगुण इसे कंलकित नहीं करे। इसका वर्तमान सच्चा उदाहरण कोई निस्वार्थ संत ही हो सकता है, जैसे “मदर टरेसा”। अगर वहां तक जीवन नहीं भी पँहुचे तो कम से कम आत्मसन्तोषक तो होना ही चाहिए।

दोस्तों, इस लेख का उद्देश्य सिर्फ जीवन की क्षमताओं को समझना मात्र है, आप और हम इस संसार में आये जब से दुःख, सुख की माला हर पल फेरते है, यह जानते हुए भी कि काफी सुख को दुःख में हम ही परिणित करते है, उसका प्रमुख कारण हम अपनी गलतियों को नजर अंदाज कर दूसरों की गलतियों का विश्लेषण करना है, काश, हम इससे बच सकते । ध्यान रहे, यह सिर्फ एक चिंतन की चर्चा है, सब तथ्य सही हो, दावा नही करता । वैसे, आप जानते ही है, दुःख वो नहीं जो हम अनुभव करते है, दुःख वह है, जो हम से दूसरों को अकारण मिल जाता है, इसलिए मुस्कराते हुए आनन्द लोजिये, और सुखी रहिये.. गुनगुनाइए

राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है,
दुःख तो अपना साथी है ( फ़िल्म दोस्ती )……..बाकी फिर कभी…..लेखक कमल भंसाली

🚩सुख निर्माण 🙋कमल भंसाली

दुःखी मन सुख की चाह न कर
ये संसार सिर्फ तुम्हारा ही नहीं
जो मिल रहा उसी पर गुजारा कर
परछाइयों का कोई अस्तित्व नहीं

आशा निराशा जीवन की डगर
चलते रहना, छोटा सा है, सफर
कोई नहीं अपना, न कोई पराया
रिश्तों की माला में दुःख समाया

बन्धित रिश्तों में दुःख बेशुमार
जलन ज्यादा, मन रहता बीमार
जो तेरा पिछले जन्म का उधार
चुकता करता, इस जन्म का प्यार

लेन देन में रचा गया मिथ्या संसार
कैसे बन सकता सुख का आसार !
तेरे मेरे की बुनियाद में उलझा प्यार
ख़ुशी के कुछ पल ही करता तैयार

भोले से मन बिन पर्यश्रु कर यह स्वीकार
निस्पृह आत्मा ही है.सुख का दृढ़ आधार
मुस्करा कर दे दे, भ्रमित अंधेरों को विदा
“त्याग” ही सुख निर्माणक , याद रख सदा

रचियता….कमल भंसाली

परिवार……बिखरता दर्द……भाग 3………..कमल भंसाली

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आज जो संसार का स्वरुप है, उसकी उन्नति में परिवार की भूमिका को नकारना सहज नहीं है। यह विडम्बना आज के स्वरुप की होगी कि आनेवाले समय में सबकुछ होते हुए भी परिवार में, अटूट स्नेह और प्रेम नहीं होगा, अगर हालात इसी गलत दिशा की तरफ मुड़ रहे है, तो निसन्देह मानवता को अपने अस्तित्व के प्रति गंभीर चिंतन की जरुरत है । समय के तीन भाग होते है, यह हम सभी जानते है, वर्तमान, भूतकाल और भविष्य और शायद इनका निर्माण भी बड़ी शालीनता से इंसान को अपनी गलतियों को सुधारने और उसके अनुरुप जीवन को बेहतर और शांत बनाने के लिए किया गया है। समय के मामले में हर इंसान को अपनी भूमिका स्वयं समझनी होती है, अनिश्चित भविष्य उसे बुद्धिमान बनाना चाहता है, बिता हुआ समय उसे समझदार बनाना चाहता है। पर हकीकत कुछ और ही आभाष देती है, समय के प्रति लापरवाही इंसानी फितरत नजर आती है। परिवार शब्द की अगर कोई विशेषताओं पर आत्मिक ज्ञान से अनुसंधान करें तो उसे अपने जीवन की सफलताओं में परिवार की समयानुसार भूमिका में उसके समय की बचत का अनुभव किया जा सकता है। दैनिक जीवन की कई आवश्यकताओं की पूर्ति जब परिवार करता है, तो सोचिये आपकी सफलताओं और आपकी प्रसिद्धि में परिवार कितना उपयोगी है ? आज उसी परिवार की अनदेखी अपनी स्वार्थपूर्ण महत्वकांक्षाओं के कारण जब कोई करता है, तो तय है, उसका सफलता का सफर थोड़े दिनों बाद गुमनामी और स्त्रांश का शिकार होनेवाला है।

आखिर, आज परिवार जो सदियों से अपनी भूमिका सही ढंग से निभा रहा था, उसे किसने बीमार किया और कौन कौन से विषैले कीटाणुओं से त्रस्त वो हुआ ? इसी सन्दर्भ में हम अपना चिंतन गतिमय करे तो यथार्थ यही कहेगा, आपसी अपनत्व और प्रेम जो परिवार की रीढ़ की हड्डी का काम करते थे, वो स्वार्थ और अंहकार के कीटाणुओं से ग्रसित हो गए, और परिवार लकवे की गंभीर बीमारी का शिकार हो निष्क्रिय जीवन निभा रहा है। आइये, एक नजर से, आज के सन्दर्भ में परिवार को बीमार करने वाली हमारी सोच पर कुछ शुद्ध आत्मिक चिंतन कर, अपने आप को शिक्षित बनाने की चेष्टा करे।

अंहकार और अभिमान…..

किसी भी परिवार की शालीनता इन दोनों की मात्रा और आकृति पर निर्भर करती है। ये दोनों तत्व अपना अस्तित्व बोध हर कर्म में कराना चाहते है, मात्रा की अधिकता बिना इनका ज्यादा असर परिवार की शालीनता पर नगण्य ही होता है। पर किसी कारण किसी भी सदस्य में जब इसका अनुपात बढ़ जाता है, तो शालीनता में कमी आ जाना स्वभाविक ही होता है। आजतक परिवारों में इसका इलाज नम्रता के उपदेश से किया जाता था। घर का धार्मिक वातावरण में नम्रता की कभी कमी नहीं होती थी। आधुनिक युग ने घर से धर्म को उठाकर सार्वजनिक जगह पर एक कार्निवल का रुप दे दिया। आज धर्म की चर्चा और उपासना दैनिक जीवन में परिवार के भीतर कम नजर आने लगी, उसकी जगह आपसी तनाव का वातावरण नजर आने लगा। शिक्षा में नैतिक अंश की कमी का होना भी परिवार के लिए भारी पड़ रहा है। घर का स्वामी अनुशासनहीनता को संयमित करने में अक्षम हो रहा है, उसकी विचार धाराओं को सब समय नकारा जाता है। उसकी मजबूरी यही होती है, कि वो परिवार को सिर्फ आर्थिक सम्पन्नता से ही नहीं संस्कारों और आपसी प्रेम से सक्षम करना चाहता है। यह सही है, की उसका चिंतन आज की जीवन शैली के कुछ विपरीत हों पर असली जीवन का मूल्यांकन सदस्यों को भी नहीं भूलना चाहिए।

अंहकार, कभी भी इंसानी भावनाओं पर आक्रमण कर सकता है, उसकी फितरत भी यहीं है, किसी एक सफलता पर यह इंसानी मस्तिष्क में प्रवेश करने की चेष्टा करता है, और परिवार में विद्रोह की भूमिका बनाना शुरु कर देता है। नम्रता की भावना अगर परिपूर्ण है, तो निश्चित है, यह कुछ भी नुकसान नहीं कर पाता। इसलिए परिवार में नम्रता का वातावरण बना रहना चाहिए, जो काफी मुश्किल है। परिवार की बदलती स्थिति जहां सदस्य अलग अलग जगह रहते है, उन का सन्तुलन सही रहना, वर्तमान में परिवारों के सामने चुनौती ही है, इस से इंकार करना असंभव लग रहा है। कहते है, जिस परिवार में हंसी का वातावरण होता है, वहां अंहकार अदृश्य रहता है, तथा कम नुकसान दायक होता है।

अंहकार की लाचारी यही है, वो कभी अदृश्य नहीं रह सकता, अत: उसका प्रभाव परिवार के सदस्यों पर पड़ना लाजमी है। परिवार का हर रिश्ता परिवार की गरिमा होता है, उसे कभी जब इस पीड़ा से गुजरना पड़ता है, तो नकारत्मक ऊर्जा परिवार को बीमार करने में सफलता हासिल कर सकती है, और परिवार का मानसिक विघटन यहीं से शुरू हो जाता है। इस बीमारी का इलाज सहज और सरल है, अगर परिवार बिना तर्क के सभी सदस्यों के सुझाव को उचित स्थान दे और आपसी चिंतन में अगर प्रत्येक सदस्य बेखोप सम्मलित होता है, तो समझ लीजिये आप एक सही परिवार के सदस्य है।

अभिमान एक ऐसा तत्व है, जिसका महत्व दैनिक जीवन में नकारना गलत होगा, इसकी सिर्फ अधिकता से खतरा है। “हमें अपने देश पर अभिमान है”, “हमेंअपने परिवार पर अभिमान है” या, “हमें हमारे परिवार के अमुक सदस्य की सफलता पर अभिमान है” । कितने अच्छे लगते है, ह्रदय की गहराई से निकलते है, लाजमी है, प्रभाव भी चमत्कारी होते है। यहां संगठन की मजबूती तो सामने आती है, परन्तु अपनी सक्षमता का अहसास भी दूनिया की नजर से देखा जा सकता है, चाहे वो देश हो, समाज हो या फिर हमारा अपना परिवार। यह भी एक साक्ष्य है, बिना किसी एक विशिष्ठता के अभिमान करना हास्यपूर्ण ही होगा। गौर कीजिये, ” सन्तानो से परिवार बनता, परिवार से समाज और कई रूपांतरों के समावेश से देश बनता तो फिर परिवार अपने योगदान पर गर्व कैसे नहीं करेगा”। एक सही मजबूत परिवार ही देश को सच्चा सैनिक दे सकता है, जिससे हम सुरक्षित रहते है। जरा गौर कीजिये, परिवार के लिए अपने योगदान पर। हमारा सही दृष्टिकोण जीवन में यही हो, हम अंहकार को परिवार के वातावरण से दूर रखकर एक सक्षम परिवार के सदस्य होने का गौरव प्राप्त करने की चेष्टा करेंगे, जिससे हम अपने परिवार, समाज और देश पर सही अभिमान कर सके।…..क्रमश

“वाह” वाह कहना चाहता…..कमल भंसाली

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आत्मा मेरी हुई उदास
जाने का समय है, आसपास
कुछ लम्हें जो बाकी
जीना है, उन्हें हर सांस
पूरी जिंदगी बीत गई
कुछ नहीं किया ख़ास
अंतिम प्रहर में
जीवन को एक बार
नये ढंग से सजाना चाहता
जिंदगी को
“वाह” वाह कहना चाहता

अब तक जो जीया
कह नहीं सकता
कब सुख में हंसा
कब दुःख में रोया
दोनों ही मेरे साथी
दोष उन्हें नहीं देना
अपनी खामियां
अपनी नकारात्मकता से
मुकर नहीं सकता
अब बन्धन मुक्त हो
जिंदगी को
“वाह” वाह कहना चाहता

कौन थे, अपने, कौन पराये
जो खुद न समझा, चलो भूल जाए
अच्छे लगे, अपनत्व के बादल
छाये, पर बरस न पाये
शिकवा दिल अब नहीं करता
मिला जो, भाग्य मानता
जो नहीं मिला, उसे दुःख नहीं मानता
बन हर मोड़ का राही
सभी को सुखी देखना चाहता
जिंदगी को
वाह वाह कहना चाहता

सत्य की धुरी से कई बार बिछड़ा
लालसाओं के जाल ने भी जकड़ा
क्रोध, कामनाओं से अतृप्त रहा
अहंकार के मदिरालय में
नशे में झूमता ही रहा
मन,अब सब छोड़ना चाहता
जिंदगी को
वाह वाह कहना चाहता

जीवन को ख्बाब ही समझा
नित नई मंजिले तलाशता रहा
साँसों को जीवन समझता रहा
समय का मुफ़्त का उपहार
देता रहा सदा सब को उधार
अंतर्मन अब नया रुप चाहता
हकीकत में, अब तक सोया
उठकर अब , जागना चाहता
जिंदगी को
वाह वाह कहना चाहता
आप से शुभकामनायें चाहता……कमल भंसाली

वाह रे, इंसान…तू है, महान …..कमल भंसाली


कहते है, ज्ञानी
“एक”, पल का हंसना
“दो”, पल का रोना
जिंदगी तो है
स्वर्ण माटी से
बना सुनहरा खिलौना
खेल खिला रहा
जन्म से मरण का
हर पहलू समझा रहा
पर, समझना
तेरे, बस में
कहां रहा
वा रे, इंसान… तू है, महान

देख, गंगा का किनारा
छम छम करते उसके धारे
मचलती, उन्मत उतार्य लहरें
मस्ती में झूले
पर, न भूले
ऊपर, काला आसमां
कब बदल जाय
बादलों का रुख
टप टप करते
कब बरस जाए, दुःख
जान कर भी अनजान
वाह रे, इंसान…तू है, महान

कल क्या होगा
फ़िक्र इतनी क्यों ?
जीवन की
बच्ची साँसों की गिनती, क्यों ?
यही, एक पल
ख़ुशी और गम
साथ ही रहते
छलना ही, दोनों का काम
जुदा, जुदा
इसलिए दिखते
इनके लिए, तेरा
इतना अज्ञानी, अभिमान
वाह रे, इंसान….तू है, महान

आसक्ति से देख
तन कितना, सुंदर तेरा
सत्य के दर्पण में
निखरे चेहरा
नग्न, लालसाएं करती
हाल, बेहाल
खेलती कम
खरोंचति ज्यादा
जैसे कोई,
तूं है, शतरंज का
अदना सा प्यादा
फिर भी इतना, इतराना
वाह रे, इंसान… तू है, महान…..

कमल भंसाली