बेहतर जीवन शैली भाग ५ अंतिम अंश…..कमल भंसाली

“परिवार”..इन्सान की सबसे सुंदर व्यवस्था, कई प्रकार के संक्रमणकारी रोगों से ग्रस्त हो गया है, अपनी कमजोरी के कारण बुलन्द आवाज में नहीं धीमे आवाज में अपनी अंतिम स्थिति का आगाज सभी को दे रहा है । आज “बेहतर जीवन शैली”के इस भाग में, हम अंतिम बार यह चर्चा करें कि आखिर क्या परिवार का अस्तित्त्व बचाया जा सकता है ? परन्तु उस से पहले जानते है, कि आखिर परिवार की प्रभाव शालीनता पर कौन से घातक हथियारों ने आक्रमण किया ?
इतिहास के पन्नों में एक उदाहरण प्रभावशाली परिवार का हम याद करें, जिसमे भगवान राम ने पिता के आदेशों का पालन कर परिवार की गरिमा को एक नया मजबूत स्थान दिया. जबकि वो स्वयं भगवान थे । युग परिवर्तन के आज के दौर से थोड़े समय पहले तक परिवार अपनी लय में चल रहा था, परन्तु आदमी को जैसे जैसे अति स्वतंत्रता का चस्का लगा, वैसे वैसे परिवार नवीन रोगों से ग्रसित होने लगा। इसी सन्दर्भ में हम दो प्रमुख कारणों का अवलोकन करते है ।

1.. विचार धाराओं की टकराहट….एक आदमी अपने जीवन काल में कम से कम तीन पीढ़ियों का सामना करता है, एक जिस से आया, दूसरी खुद की, तीसरी अपनी सन्तान की । प्रथम से वो सीखता, दूसरा यानी,खुद पालन या संशोधन करता, तीसरी को वो जो विरासत में आगे दे जाता। हर पीढ़ी के अपने कुछ परिवर्तन होते है, जो समय, काल और जगह के कारण जरूरी बन जाते है, उनकी अवेहलना करने से आपसी टकराहट की संभावनाये परिवार में बढ़ जाती है । बड़े बुजर्ग के पास अनुभव और संयम होते हुए आजकल तटस्थ की भूमिका में रहते, क्योंकि यह राम का युग नहीं, कलियुग है, जहां आदेश पालन कराना,मुश्किल ही होता है। यह बात नहीं की पहले भी विरोध नहीं होता था, परन्तु नीति गत और विधि गत विरोध को समर्थन सामाजिक मूल्यों पर ही मिलता। समाज की पृष्ठभूमि आज से ज्यादा सशक्त उस समय थी। उस समय खान पान और पहनावे सब तय थे, उनमे संस्कारों के कारण विद्रोह कम था, शिक्षा से ज्यादा आत्मा का प्रयोग चिंतन में किया जाता था। सर्व हिताय: सर्व सुखाय: को ध्यान में रख कर ही इंसानी चिंतन रहता था।
देश स्वतंत्र हुआ, कई परिवारों का पलायन अपने निश्चित स्थानों से देश विभाजन के कारण करना पड़ा। आर्थिक तंगी का दौर था, फिर भी परिवार अपनी गरिमा नहीं भूला। परन्तु मानव मन अब अपना संयम अब खो चूका है। वो भोगवादी और लालसा वादी पाश्चात्य संस्कृति का दीवाना बन गया। दीवानगी में विचारों का महत्व नगण्य ही होता है।अतः यह रोग लाइलाज है, क्योंकि इसमे परिवार के सभी तंतु विपरीतता में काम करते है.

2. असंस्कारित आजादी…पहले परिवार में सीमित आजादी होती थी, परिवार एक अपने ही संविधान से बंधा होता था। राजनीति के चतुर खिलाड़ीआचार्य चाणक्य की उस समय की सर्वश्रेष्ठ परिवार की परिभाषा का आज नगण्य अस्तित्व ही नजर आता है, फिर भी एक बार गौर करते है, उन्होंने क्या कहा,
“जहां सदा आनंद की तरंगे उठती हैं, पुत्र और पुत्रिया बुद्धिमान और बुद्धिमती, पत्नी मधुरभाषिणि, परिश्रम से कमाया विपुल धन, उत्तम मित्र, पत्नी से अनुराग, नौकर से अच्छी सेवा मिलती हों। अतिथि का आदर, परमात्मा की उपासना, श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग होता रहे- ऐसा घर धन्य और प्रशंसनीय है”
आचार्य चाणक्य का बताया पूर्ण ऐसा परिवार अब कल्पना की सीमा रेखाओं से दूर होकर एक सुहावनी कल्पना ही रह गया, परन्तु सत्य यह भी है की ऐसे परिवारों का पहले अस्तित्व था । आज जीवन पूर्ण निजी हो गया, अतः परिवार भी स्वार्थी हो गया और भीतरी राजनीति का शिकार हो गया। परिवार और देश का अस्तित्व का आंकलन तभी किया जा सकता है, जब उनमे कुछ झलक सार्वजनकिता की हों।

उपरोक्त दो कारणों के अलावा परिवार और भी कई छोटी छोटी बीमारियों से ग्रसित है, जब तक उसकी उम्र है, परिवार बेहतर जीवन शैली का एक पहलू सदा रहेगा । देवलोक और नर्क का अगर अस्तित्व हम नहीं नकारते तो परिवार बिना कैसे बेहतर जीवन शैली की कल्पना की जा सकती है।

दोस्तों बेहतर जीवन शैली के इस भाग में परिवार के बारे में हमने काफी अंतरंगता से चिंतन किया, आप अपने विचार और अनुभव अगर लिखना चाहते है, तो अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।भारतीय समाज और संस्कृति परिवार का सुख सदा लेती रही हैं, आज भी परिवार ये सुख देने के लिए तैयार खड़ा है, हम ही अपनी नादानी और नासमझी से इस सुख से धीरे धीरे विमुख हो रहे है । नई पीढ़ी को इस पर कुछ समय निकाल कर मनन करना चाहिये कि परिवार का अस्तित्व ही उनके लिए सुरक्षित भविष्य की रुपरेखा तैयार कर सकता है।जवानी के सारे भ्रम बुढ़ापा और बीमारी इन्सान को दर्द की प्रस्तर मूर्ति बना देता है।

समय अब भी है, परन्तु बागडोर नई पीढी के स्वयं के हाथों में है, उन्हें ही तय करना है, अपना भविष्य !
ये जरूर याद रखे… परिवार से अच्छी सौगात इस संसार में दूसरी हमें मिलनी आसान नहीं होगी, क्योंकि “सुखी परिवार ही सच्चा जीवन आधार”।

चलते चलते…..

जवानी रम है, तो बुढ़ापा गम
परिवार है तो नशा भी कम
दर्द और गम दोनों भी खत्म
परिवार यानी जीवन का संगम..

कमल भंसाली

क्यूँ नाराज है, जिन्दगी

क्यूँ नाराज है, जिन्दगी
बता जरा

क्या हुआ तेरे साथ
उदास है चेहरा
तमन्नओं का छोड़
आ, मेरे पहलू में बैठ
मुस्करा जरा
गम को अलविदा कह
मन को हर्षा जरा
दुःख में दीखता
सब कुछ धुंधला
अब, बता क्या दुःख तेरा

देख दामन्
जब इच्छाओं का फैलाया
कुछ दाग तो है, स्वंयभाविक
समझ जरा
पथ सब समय हो, खुशनुमा
मुश्किल है जरा

अपने पराये की परिभाषा में
न उलझ जरा
कर्म ही सच्चा दोस्त
विश्वास कर मेरा
असत्य से सदा दूर रह
वो पथ नहीं तेरा

तूं, अकेली नहीं दुखी
जग में जा
कौन पूर्ण सुखी
बता जरा

चल उठ चलते है
नई मंजिल नये रास्ते
ढूंढते है, जरा
अब निराश न होना
दुःख के बादल छंट जायेंगे
इंतजार कर,जरा…..

कमल भंसाली