कच्चे रिश्तें …कमल भंसाली

दोस्तों, जीवन पथ आसान नहीं होता, यह तो हम सभी जानते है, फिर भी हम अपने अंहकार और नादानियों से कभी कभी ऐसी गलती कर जाते है, कि उसका प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ता है। एक ऐसा ही रिश्ता होता है, “पति-पत्नी” का। इस रिश्ते की खूबसूरती इतनी होती है, जिंदगी स्वर्ग जैसी अनुभव देती है। दुःख इसी बात है, कि छोटी छोटी घटनाओं से रिश्तों में दरार पड़ने का क्रम शुरु हो जाता है, कहना ना होगा यह दरार गृहस्थी के मकान को शीघ्र ही ध्वस्थ कर देती है। अनुग्रह है, जिंदगी को समझ कर, कभी ऐसी स्थिति न आने दे, दुर्भाग्य वश अगर ऐसा हो जाता है, तो भावनाओं का स्यंमन कर, अंहकार और अभिमान को छोड़, फिर से जीवन साथी का हाथ दृढ़ता से पकड़े की, इस जन्म में ही नही, जन्मों, जन्मों तक हाथों में हाथ रहे, सदा साथ रहें। इसी दृष्टि से यह कविता एक प्रयास मात्र है।

कल तुम थी, मेरे पास
आज हो गयी, दूर
फर्क इतना ही समझा
पास होकर भी, थी दुरी
दूर होकर हो, आज पास
ये कैसा है, विश्वास ?

जन्मों के रिश्ते
क्यों हुए, आज सस्ते
कहीं कोई, कमी रही
सहमी जिंदगी
बाहर से मुस्कराती रहीं
शायद,अंदर में हमने
नहीं झाँका
खुली खिड़की से
कभी आया हो
प्यार का खुशनुमा
सुहाना सा झोंका
उसी को हमने
तूफ़ान बना दिया
अजनबी होने का दर्द
अपने ही दिल के
रिश्तों को थमा दिया

याद करो
पहली मुलाक़ात
मद्धम से चांदनी रात
मेरे ख्यालात
तुम्हारे जज्बात
निर्झर सितारों से
मैंने भरी तुम्हारी
पवित्र, सिंदूरी मांग
उन सितारों की
ले लो कसम
एक दूजे के लिए
बने हैं, हम

चलो,
पकड़ो मेरा हाथ
कैसे तोड़े
बन्धन,
कैसे किया
हमनें, प्यार पर
घिनौना अतिक्रमण
मौसम का था
कोई अनचाहा स्पंदन
कसम, लो
अब कभी
न समझे
छोटी मोटी बूंदों को
विचलित भावनाओं की
मूसलाधार बरसात
भूल से भी
अगर बिखर जाए
तेरे मेरे जज्बात
हम समेट लेंगे
न देंगे, कोई नया आघात

आशियाने
तिनकों के संग्रह
से बनते
टूट गए, वो
रिश्ते, वापस कहां बनते
आओ
फिर एक बार
हमराही,बन
जीवन पथ पर
आगे ही बढ़ते……..