💔 अफसोस 💖 कमल भंसाली

बहकती रही नादान जिंदगी, मै सदा प्रेप्सू ही रहा
खुशियों की तलाश में टूट कर सदा बिखरता रहा
मदहोशी में अप्रमाणित रिश्तों को ही गले लगाता रहा
किसके लिए क्या हूं ? सच के इस सवाल को टालता रहा
बहकती…

प्रेम की परिभाषा सिर्फ इतनी ही समझ पाया
जब भी चाहा जिसको, उसी ने मुझे ही रुलाया
देने की आतुरी ने, उन्हें कुछ और ही समझाया
हिसाब इतना ही रखा, सबके दिल मे स्वार्थ पाया
बहकती…..

कर गुजर गया जो जीवन मे, वो अफसोस नहीं
बिन मंजिल के इस राही की नई कोई खोज नहीं
उपलब्धियों के संसार मे नगण्यता का हूं, अवतार
फर्क क्या पड़ता ? जब संसार को मै स्वीकार ही नहीं
बहकती….

कभी हुआ होगा ऐसा सच के दर्पण को मैने नहीं छुआ
तब हर रिश्ता दिल के मंदिर में मूर्ति बन स्थापित हुआ
जब काले साये गम के मंडराने लगे वही फूल बने अंगारे
जिनमें रहते सौरभ भावुक भरे अहसासित प्रेयम सितारे
बहकती…

मत समझना यह अफसोस है अपना कोई मेरा
सोया मन जाग रहा, सब साफ है कोई नहीं मेरा
कल के सफर में अकेले ही जाना अब निश्चय मेरा
दुआ करना, किसी जिंदगी में न हो अपनत्व का अंधेरा
बहकती…..

सारांश:
कह नहीं सकता जग झूठा या फिर मेरा अफसोस
कह नहीं प्रेम किसका सच्चा किसका किससे खास
नाप तोल की तराजू पर नहीं तुलता यही है “अफसोस”
संभावनों के बाट ही गलत, यही है शायद सही सारांश

रचियता✍कमल💔भंसाली✍