“सम्बन्धों” मुक्तक आज के संदर्भ में

दोस्तों,
मुक्तक के रुप आज के बनते -बिगड़ते सम्बन्धों को समझने की एक मेरी अनचाही कोशिश है। नहीं चाहता सांसारिक सम्बन्ध जीवन की गरिमा भूल जाये। सबसे बड़ा खतरा संस्कारों को भूल नई स्वतंत्र राहों की तलाश से है। पर कहते है जो जुड़ता वो बढ़ता जो टूटता वो विलीन हो जाता। भगवान से प्रार्थना है सम्बन्धों की दुनिया सदाबहार रहे। शुभकामनाओं सहित✍ लेखक व रचियता**कमल भंसाली
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रिश्ते जो एक बार बिगड़ जाते
वापस कम ही जुड़ पाते
क्योंकि सच्चाई के जो पन्ने होते
वो नदारद हो जाते
बिन सही मलहम के हरे घाव तो
हरे ही रह जाते
लगे जख्म भी कभी सूख नहीं पाते
इसलिए
बिगड़े आपसी सम्बन्ध कभी सुधर नहीं पाते

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समझने की बात समझनी जरूरी होती
हर सम्बन्ध की अपनी कुछ मजबूरी होती
छोटी चिंगारी बन जब कोई बात बिगड़ जाती
निश्चित है, हर रिश्तों को स्वार्थ की बीमारी लग जाती
अच्छे रिश्तों की छवि दिल छोड़ दिमाग में चढ़ जाती
लाइलाज बीमारी है यह रिश्तों के प्राण तक ले जाती

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जीवन और सम्बन्ध का है आपसी गढ़ बंधन
एक दूसरे के पूरक करते समझ के अनुबन्धन
“खुद जियो और दूसरों को जीने दो” है प्रबंधन
जिससे विश्वास की सीमा का न हो कभी उल्लंघन

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अर्थ के संसार ने आज रिश्तों की परिभाषा बदल दी
हर रिश्तों की कीमत जरुरत अनुसार तय कर दी
बिन संस्कारों की जिंदगी बिन परवाह की राह चलती
“कल को किसने देखा” कहकर आज पर ही इतराती
जब तन्हा हो असहाय बन जाती, फांसी पर चढ़ जाती
जीवन में सम्बन्धों के महत्व का अदृश्य संदेश दे जाती

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न कोई माता, न कोई पिता, युग अब यही सन्देश देता
स्वयं से ही स्वयं बना रिश्तों की महिमा को ठुकरा देता
जीना खुद का अधिकार, अब खुद को यह ही भाता
हर सम्बन्ध अब दिल के अंदर की यात्रा नहीं करता
बाहरी दुआ सलाम में मधुरता से मुस्करा कर रह जाता
सतह पर जरुरत के समय तक थोड़ी देर साथ चलता
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सब मुक्तक यही कहते “सम्बन्धों” से जीवन बनता
सम्बन्ध से ही जीवन आगे की तरफ यात्रा करता
हर रिश्ता हर दिन का सहयात्री, सोये को जगाता
भावपूर्ण हो जो स्नेह,विश्वास और प्रेम से निभाता
जीवन की हर मंजिल तक हर “सम्बन्ध”अमर रहता
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💖💖 ✍ रचियता💘 कमल भंसाली 💝💝

परिवार…बिखरता दर्द…..कमल भंसाली ….भाग 1

रिश्तों की दुनिया की अनेक विविधताएं है, रिश्तों के बिना न परिवार, न समाज, न देश की कल्पना की जा सकती है, कहने को तो यहां तक भी कहा जा सकता कि रिश्तों बिना जीवन कैसे जीया जा सकता है ? सवाल यही है, क्या आज भी रिश्तों की गरिमा के प्रति इन्सान की जागरुकता सही और उचित है ? मेरे अनुसार, हमारी रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता काफी कमजोर हुई है, इन वर्षो में, जब से हम आर्थिक चेतना का उपयोग दैनिक जीवन में ज्यादा करने लगे है। चलिए, अंतर्मन के किसी कोण से इस सवाल का उत्तर दीजिये, क्या आप वो ही आदर, सम्मान बुजर्गों और माँ बाप को देते है, जो वो आज से कुछ समय पहले हमसे भरपूर पाते थे ? जानता हूं, आप सत्य से आँख नहीं चुरा सकते। अगर आप फिर भी सहमत नहीं है, तो बता दीजिये आज बुजर्गो तथा माँ, बाप के साथ जो घटित घटनाओं का वर्णन समाचार पत्रो, टी. वी. तथा अन्य साधनों से हम तक पंहुचता है, वो सभी असत्य है ? याद कीजिये, कुछ सालो पहले के वो दिन, अगर आप इस सदी से पहले पैदा हुए हैं, तो आप को याद होगा, हमारा एक संयुक्त परिवार होता था, जिसे अब खोजना पड़ता है, उस समय क्या परिवार जिस शासन और अनुशासन व्यवस्था के अंतर्गत चलता था, क्या आज हम ऐसी व्यवस्था के अंतर्गत अपना छोटा सा परिवार चला रहे है ? थोड़ी हिचकिचाहट का अनुभव, शायद हो रहा है, क्योंकि हम जानते है, कि आज परिवार शब्द एक उच्चारण मात्र रह गया है। हर सदस्य अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता का भरपूर उपयोग खुद के लिए कर रहा है। उसकी भावनाओं में परिवार के प्रति अपनत्व की भावना कमजोर होती दिख रही है। परिवार की मजबूरी है, खुली स्वतन्त्रता से सुखी नहीं रह सकता,उसे संस्कारों की भी जरुरत होती है। परिवार का बिखरने से हर एक प्रभावित हुआ है, हमे प्रेमयुक्त जो सुरक्षा मिलती उससे हम ही वंचित हुए है। इस में दोष हमारा ही है, परिवार की परम्परा को हम ने ही तोड़ा है। सवाल उठता है, परिवार क्यों बिखरते है, इसके दो प्रमुख कारण हो सकते है, आर्थिक समृद्धि और अति स्वतन्त्रता की चाह। पारिवारिक रिश्तों का सारा दरमदार आपसी सम्बन्धों की पारस्परिक व्यहारिकता से जुड़ा है।”रिश्ते या आपसी सम्बंधों में तनाव, शक और गलतफहमी के पेड़ की उपज होती है, और आदमी की समझ को जहरीला बनाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान होता है। इस समझ के कारण परिवारों में राजनीति का प्रयोग होने लगा, परिवार टूट कर बिखरने शुरु हो गये है”। यह भी कई लोगों का विश्लेषण है, जो काफी हद तक सही है।

परिवार की भूमिका को आज हम भले ही हल्के से ले, पर इतिहास गवाह है, परिवार बिना संस्कार की खेती मुश्किल है। आज व्यवहार की दुनिया में बेहद तंगी का दौर चल रहा है, आदमी की गुणवता की कीमत, परख की मोहताज हो रही है। आपसी रिश्तों में मधुरता की तलाश करने पर ऊपरी सतह तक खोखली नजर आने लगी है। ऐसे में चिंता की बात यही है, कहीं हम नितांत अकेले होकर मानसिक अवसाद के शिकार न हो जाए। परिवार की खासकर संयुक्त परिवार की उपयोगिता आज भले ही कम समझ में आ रही है, परन्तु जिस दिन आदमी ऊपरी दिखावट का यथार्थ जान लेगा, तब उसे अपनी आर्थिक गुलामी का अफ़सोस जरुर होगा। मैं यहां कोई डर और भय का वातावरण नहीं तैयार कर रहा हूं, क्योंकि भय की शुरुवात तो होने लगी है, आदमी घर से अशांत होकर निकलता है, और जानता है, वो चलती सड़क पर ही नहीं, वो अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है। किसी तरह का घटनाक्रम घटने से शायद उसे सहारा देने वाला भी कोई नहीं मिले, यह जीवन की लाचारी नहीं तो क्या है ?

आज की विचारधारा ने अर्थ की मजबूती को ही जीवन की पूर्ण मजबूती समझ लिया है, इस समझ के अनुसार कोई भी ऐसा शारीरिक सुख नहीं है, जो अर्थ से खरीदा नहीं जा सकता। बेचारे मन को तो हमने सारे दिन साधनों की खरीद फरोख्त में लगा दिया, भला ऐसे में उसे आत्मिक आनन्द की तलाश का समय कहां मिलेगा ? मैंने ही नहीं, शायद आपने कभी अनुभव किया होगा कि घर में तमाम कीमती साज समान से सजे होने के बावजूद श्मशान जैसी वीरानी लिए हम रहतें है। वैसे ख़ौफ़ भरे वातावरण में घर में कामकरने वाले भी चलते फिरते रोबोट की तरह लगते है। एक बन्धी बंधाई जिंदगी, बिना किसी आत्मिक ख़ुशी के कब तक स्वस्थ रह सकेगी, यह एक ज्वलन्त प्रश्न है, इसका समाधान नहीं होने से मानसिक और शारीरिक रोगों से हमारा बचाव भाग्य पर ही निर्भर करता है। डॉक्टरों और चिकित्सकों की राय में ब्लड प्रेशर व डाईबिटिज मानसिक तनाव के सहयोग से शरीर के भीतर अपना अस्तित्व ढूंढते है। आखिर अकेला भ्रमित जीवन कहाँ से सही जीवन शैली अपनाये, कई मनोचिकित्सक तो यहां तक स्वीकार करते है, बिना बड़े बुजर्गो के परिवार गलत दिशा ले लेते है, और किसी भी संगीन परिस्थिति के सामने ऐसे परिवार घुटने टेक देते है,अपने जीवन के कदम आत्महत्या की ओर अग्रसर कर देते है। कहने में कोई सार नहीं कि पूरा परिवार अगर समाज से घुलमिल कर रहता, तो शायद ही ऐसी नौबत आये। हम कितना ही अपने आप को महत्व दे, पर परिवार के बिना जीवन की कल्पना करना सहज नहीं है। देखा गया कि बच्चे बड़े होने के बाद जब अपना परिवार तैयार करने लगते है, तो वो उस परिवार के प्रति गफलत और नासमझी करने लगते है, जिनसे उनका उद्गगम हुआं था। भूल जाते है, उस से बदतर स्थिति भविष्य में उनके निजी परिवार की भी होनी है, इस सत्य से वो दूर रहने की कोशिश आज कर रहे, परन्तु वक्त बीतते देरी कितनी लगती है।

आखिर संयुक्त परिवार की वकालत मैं, क्यों कर रहा हूं ? इसका एक ही कारण है, आज का अवसाद। सन्तान होते हुए भी नहीं जैसी स्थिति हो तो जीवन को फिर किस सही भूमिका की तलाश है ? हंसने के लिए वातावरण न बने, तो फिर किस ख़ुशी की बात हम कर रहे है ? विषम स्थिति में विश्वास योग्य माहौल नहीं तो फिर क्या जीवन समस्याओं का समाधान सरलता से कर पायेगा ? उम्र की बढ़ती सीढ़ियों को क्या सहारे की जरूरत नहीं होगी ? बीमारी के समय सिर्फ अर्थ से पाये इलाज से हम स्वस्थ हो जाएंगे ? ऐसे अनगिनत और कई सवालो के जबाब शायद ही हम दे पाये। समझने की बात है, अभी तक पुराने परिवारो के संस्कारों के कारण अभी तक जीवन कुछ सुरक्षित है, नहीं तो अर्थ का अनर्थ शायद और भी जटिलता हमें दे सकता है। अभी भी बहुत सी जगह है, जहां पड़ोसी भी काम आते है, नहीं तो आज आदमी परिचय का मोहताज हो रहा है। इसका साधारण सा कारण अंहकार और अभिमान है, जो किसी की सहायता भी नहीं करना चाहता, न ही किसी का सहयोग लेना चाहता, कुछ लोग इसे अहसान कहते है। दंभ, घमंड़ इन्सान में, अर्थतन्त्र का तोहफा है, उसे अस्वीकार चन्द समझदार लोग ही करते है। सूक्ष्मता से अगर अध्ययन करे, परिवार की गंभीरता भरी छवि में हम एक अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते है, कहते है ना, परिवार से ही गुणता का विकास होता है।……क्रमश…..कमल भंसाली

सम्बन्ध……कमल भंसाली

न आस्मां मेरा, न जग तेरा, फिर क्या तेरा मेरा
जीवन की धूप में ऐसे कभी नहीं आता, सवेरा
उजालों की परवाह न कर, पर अंधेरों से डर
तय कर जिधर जा रहा, क्या वही है, तेरा घर

असत्य की वेदी पर, कितने सत्यों की दी बलि
तू कहता मोह करने, से जीवन फलता फुलता
मेरा तो मानना है, आडम्बरों में जीवन खोता
सच्चा प्रेम ही, जीवन को तत्वपूर्ण पथ दिखाता

प्रेममय है प्रभु, जीवनमयी है, अनिश्चित सांस
फिर क्यों छाए निराशा, जगा जरा सोई आश
मरीचिका के जंगल में मायावी होता सबकुछ
समझ,कुछ भी लालसाओं से नहीं होता तुच्छ

अनगनित के चक्कर में रहे,सारे सवाल अधूरे
उत्तर की चिंता में हमने, कितने जीवन गुजारे
क्या अच्छा नहीं होगा, जरा,इस जन्म को संवारे
परीक्षा लेने नहीं, श्रेष्ठ अंक देने स्वंय प्रभु पधारे

मर्म यही है, सार भी यही, मेरे दोस्त
जीवन मृत्यु दोनों ही हमारे, तुम्हारे
रैनबसेरा के साथी, आज मिले, कल बिछड़ेंगे
बता, तुम्हारे हमारे सम्बन्ध किस जन्म में सुधरेंगे ?……कमल भंसाली

बिगड़ती मानसिकता, भविष्य का डर….. कमल भंसाली

आज कल जो हिंसा और कमजोर मानसिकता से पूर्ण घटनाक्रम घट रहें है, उनसे मानव मन कि स्थिति विचित्र और नहीं समझने योग्य हो गई है। हम दैनिक समाचार पत्रों पर नजर डाले तो शायद हीं ऐसा पृष्ठ सामने आये, जिसमे अपराधिक समाचार न हों। सवाल है, ऐसा क्यों हो रहा है ? काफी कुछ चिंतन का विषय है, आज का दैनिक जीवन ! ‘प्रेम’ के नाम पर जो उत्पाद समाज भोग रहा है, वो कहीं साबित नहीं करता, हम शिक्षित हो रहे है, हम आत्मिक भूमिका को अपनी शिक्षा प्रणाली से दूर रखकर गलत राह के राही बन गए है। हकीकत तो यही समझा रही है, कि हमारा जीवन दर्शन अर्थ और साधनों का इतना मोहताज हो गया, कि वो भूल गया अंतरंग आत्मिक ख़ुशी क्या होती है ?
आखिर ऐसा कुछ क्या हुआ, जो हमारी मानसिकता का अंधापन बढ़ा रही है। समझने की चेष्टा करते है।

आज, इंसान जब संसार में जब समझ की पहली अनुभूति का अहसास करता है, तो वातावरण अनुसार, उसके हाथ पांव मचलने लगते है, दिमाग में कुछ चाहत की तरंगे उठने लगती है। परिवार उसे पालने के लिए, इतने कृत्रिम साधनों का प्रयोग करता है, कि , तभी से वो, अपनी काया की चाहत भरी तरंगों का दासत्व स्वीकार करने लगता है, और उसकी हर इच्छा का गुलाम बन जाता है। उस दिन से वो उसकी हर इच्छा की पूर्ति करना अपना धर्म मान लेता है। समझा जा सकता है, आज साधनों से भरपूर संसार उसी चाहत का और इन्सान की गुलामी का नतीजा है। यहां तक तो बात ठीक थी, वो चाहत के कारण जीवन जरुरी साधनों का निर्माणकर्ता था, पर जब से वो खुद साधनों का गुलाम होने लगा, तबसे मानवीय गुणों का उसमे ह्यस होने लगा, यह एक चिंता की बात है।

इसी सन्दर्भ में यह तथ्य भी हमें स्वीकार कर लेने में कोई हर्ज नहीं, अति साधनों के प्रयोग से हम अपने जीवन को मौलिकता से दूर ले जाकर उसे बीमारियों की नगरी की तरफ ले जा रहे हैं, या फिर उसे अशांति के घने जंगल में भटकने के लिए छोड़ रहे है। हकीकत यहीं कहती है,सत्य की तरफ न देखकर, उससे मुंह मोड़ कर हम अपनी कमजोरियां रात दिन बढ़ा रहे है। इसमें दो राय नहीं हो सकती, बिना उपकरण और साधनों के बिना जीवन गतिमय नहीं हो सकता, पर गति जब अति हो जाए, तो ब्रेक का प्रयोग भूलने से दुर्घटना होना निश्चित है, और सब दुर्घटनाओं से शुभ का फल नहीं अर्जित किया जा सकता, यह भी तय है।

सबसे पहले यह बता देना जरूरी है, की इस लेख का कतिपय उद्धेश्य नहीं है, आज के युग में साधनों के प्रयोग के विरुद्ध जाया जाय। उद्धेश्य यहीं है, कि जीवन में सुख का अनुभव होता रहे, जिंदगी स्कारत्मकत्ता से अपनी तय उम्र प्रेम और शांति से गुजारे। अनियमितता से जिन्दगीं को तनाव ही मिल सकता है, शुकून नहीं। तय हमें करना है, कि हमें आखिर क्या चाहिए ? पता नहीं आधुनिक शस्त्रों के निर्माण करने वाले वैज्ञानिकों ने इस तथ्य पर अति गौर क्यों नही किया, कि आखिर मानव इन शस्त्रों का प्रयोग अपने को ही नष्ट करने में करेगा, उसे किसी बाहरी लोक से तो कोई खतरा अभी तक नजर नहीं आया। पहले आम आदमी घर में किसी भी प्रकार का अस्त्र रखना अशुभ मानता था, सिर्फ सीमा के प्रहरियों या पुलिस अधिकारियों तक ही इनकी पहुंच थी। धीरे, धीरे, अराजकता बढ़ी, तभी तो आज ये सरलता से प्राप्त किये जा सकते है। इसका यही अर्थ निकलता है, कि आपसी विश्वास, स्नेह, प्रेम की कमी हो रही है। क्या यह स्थिति मानव विनाश के प्रारम्भिक संकेत तो नहीं है ? आश्चर्य, नही होगा अगर दैनिक समाचारों की विवेचना से यह तथ्य भी सामने उजागर होता है, कि प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा मानव निर्मित संघारक घटनाये आज ज्यादा हो रही है।.

यह निश्चित तथ्य है, प्रकृति की सरंचना में धरातल का निर्माण एक साथ ही हुआ, मानव के अस्तित्व से पहलें कई तरह के जीव जन्तु और पेड़ पौधों का निर्माण हो चूका था। यह भी एक आश्चर्य की बात है, मानव जाती का विस्तार शुरु में प्रेम के तत्व से ही हुआ, फिर घृणा कहां से आई ? इसका एक मात्र कारण,स्वार्थ की भावना का पनपना ही हो सकता है। स्वार्थ के पनपने के साथ जो कारण जोड़ा जा सकता है, वो है, धरती पर साधनों का जरुरत से ज्यादा विकास, और उनके प्रति स्वामित्व का बोध होना। कहनेवाले यह भी कहते है, कलयुग है, अंत तो होना ही है, पर क्या अंत भी घृणात्मक हो, यह उनके आत्म चिंतन की बात है ।

निसन्देह, उपकरणों के विस्तार से जीवन को तेजी मिली, पर उसके लिए नैतिकता को अपने कई नैसर्गिकी गुणों को नैष्कर्म्य बनाना पड़ा जिसके कारण भीतरी सुख का अनुभव कमजोर होने लगा। सब कुछ होते हुए भी जिंदगी अपने आप को अकेली अनुभव करनें लगी है, आखिर क्यों ? वक्त की बात है, गांवों से निकल कर जीवन ने जब शहरों की तरफ अपना रुख किया, तभी से उसमें में कई तरह के परिर्वतन होना शुरु हो गया। यह आश्चर्य की बात है, कि शहरों में रहने वाले लोग अब शान्ति के लिए ग्राम जीवन अच्छा मानते है। इसका कारण शहरों का बढ़ता प्रदूषण तथा सामाजिक सुरक्षा का कमजोर होना। रिश्तों का व्यपारिकरण ने रही सही कसर पूरी करके आज इन्सान को लाचार कर दिया।आज गांव भी इन्हीं रोगों से ग्रस्त हो गए। शहर के संसर्ग ने उसे साधनों का एड्स दे दिया। आखिर, शांति धीरे धीरे अदृश्य हो जायेगी, उसे किसी भी जगह तलाशना मुश्किल काम ही रह जाएगा। राम ने वनवास जंगल में क्यों बिताया, बुद्ध और महावीर जैसे राजाओं ने वन में हीं शांति की तलाश क्यों की, राजमहल में उन्हें क्यों नहीं मिली ,सब साधनों के होते ,यह आज एक अनुत्तरित सवाल है ?जंगल को काट कर तहस नहस करने वाला मानव, पत्ता नहीं क्यों यह समझ रहा कि हकीकत में वो प्रकृति के पेड़ की उसी शाखा को काट रहा है, जिस पर वों सुख शांति से बैठा है।

‘अवेहलना’ एक नकारत्मक शब्द ही नहीं, संस्कारों को नष्ट करने वाला जहर है। आज जैसे हमारे देश चीनी उपकरणों से भरा है, वैसे ही ,,,,’अवहेलना’ ने हमारे दिमाग पर कब्जा कर लिया है। स्वतन्त्रता का दुरूपयोग होना ही, आनेवाली गुलामी का संकेत होता है, इसे माने या नहीं पर तथ्य यहीं समझाते है, कि फिलहाल हम अभी आदतों के गुलाम तो हो ही गये। समय बदलता है, विचार भी बदलते है, परंतु जब मानसिकता और मानवीय संवेदनशीलता बदलने लगती है, तो चिंता होना स्वभाविक है। दर्द सभी भोग रहे है, पर साधनों और उपकरणों के अति प्रयोग से व्यवहार में बनावटी संवेदना ही रह गई, जो किसी के काम नहीं आती। हमारे देश के संस्कारिक परिवेश की विशेषता यहीं है, कि धर्म का प्रभाव आज भी बरकरार है, शायद इसलिए हमें अति आधुनिकत्ता से अब तक बचा रखा। जो थोड़ा आत्मिक प्रेम बोध बचा है, शायद कुछ सालों तक जीवन को क्षणिक सुख अनुभूति प्रदान करता रहे।

मेरा मानना यहीं है, कि खानपान का असर स्वास्थ्य के साथ विचारों पर भी पड़ता है। हम अभी तक संस्कारित और स्वास्थ्यवर्द्धक खानपान ही पसन्द करते थे, परन्तु आधुनिककरण की नई सभ्यता को परम्परागत संस्कार और खानपान रास नहीं आ रहा है। धीरे धीरे जीवन साधनों, उपकरणों और बाहरी नए खानपान के व्यंजनों का आदी हो रहा है। शारीरिक श्रम की भूमिका दैनिक जीवन में कमजोर हो गई और आराम दायक साधनों की क्षत्र छाया में दिमागी मेहनत सीमा पार करने लगी। नतीजा जो होना था, वहीं हो रहा है, आदमी भीतर और बाहर दोनों से कमजोर हो रहा है। लालच के जहर ने हर चिंतन को इतना जहरीला बना दिया कि मिलावट करने वाला स्वयं हर पदार्थ निश्चिन्त होकर प्रयोग करने के लिए मजबूर हो गया। आखिर विचारों में शुद्धता नहीं तो अक्षेपा कैसे करे, सब शुद्ध मिले।

कोई ज्यादा वक्त नही बिता, जब लोग भारत को दूध दही की बहने वाली नदियों के देश के नाम से पहचानते थे। आज स्थिति यह है, कि शुद्ध दूध, दही कल्पना मात्र ही रह गये है। सवाल जेहन में एक हीं आता है, आखिर ऐसा क्या हुआ ? जिसके कारण अमृत पैदा करने वाला देश, विष का देश बन गया। अपने हि दैनिक जीवन से खिलवाड़ करने वाला देश किस तरह से उन्नति और सुख की बात सोच सकता है। पग पग पर हिंसा, कदम कदम पर अशांति, हर समय अर्थ की चाह और उसके लिए होने वाले अनैतिक कार्य किसी भी देश के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह ही लगाता है। जैसे शरीर और मन का सन्तुलन बिगड़ जाने से आनन्द की अनुभूति नहीं हो सकती, ठीक वैसे ही किसी भी देश की शासन व्यवस्था तब तक शांतिदायक परिणाम नहीं दे सकती, जब तक ईमानदारी से कार्य न करे, यही कमजोरी, भारतीय लोकतन्त्र को बीमार ग्रस्त कर चुकी है। आखिर सदियों से फलती फूलती ईमानदारी कहां विलुप्त हो गई, पर इसे तलाश करने का समय किसी के पास भी नहीं है। देश शब्द की मार्मिकता में सब अपने स्वार्थ की पूर्ति होते देखना चाहते है। नेता गरीबी के नाम पर अमीर हो जाते है। “गरीबी”शब्द अमीरी की दासी बन गई …यह चिंतन की क्या बात नहीं है ?

पिछले दिन अखबारो, टीवी में मैगी, नूडल्स पर हाहाकार मचा, दिग्गज अभिनेताओ, अभिनेत्रियों और यहां तक खिलाड़ियों ने अपने असीमित लालच के कारण विज्ञापनों में इसे स्वस्थ, रोचक,और शीघ्र बनने वाला आहार बताया। घर, घर में प्रयोग होने वाला यह पदार्थ इतने सालो तक, हमारी कमजोरी बन कर दैनिक जीवन पर शासन करता रहा। कल यह भी भुला दिया जाएगा, कोई नये नाम से हमें फिर परोसा जाएगा और हमारी स्वीकृति भी प्राप्त कर लेगा, बिना जांच परख के। आम इन्सान की उदासीनता समझ में आती है, परन्तु सरकारी संस्थाओं की अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही, क्या दण्डनीय नहीं है ?……क्रमश …..कमल भंसाली

“आत्महत्या”…. निवारण संयमित जीवन ?

संयमित जिन्दगी की बात आज कुछ बेमानी सी लगती है, पर सत्य को ठुकराना भी तो आसान कहां ! आज भारत में
आकस्मिक आत्महत्या के ऐसे ऐसे घटना क्रम घट रहे है, जिनके पीछे जो भी प्रकरण हो, पर अंत में जो वास्तिवक तत्व सामने आता, वो एक ही तरफ इशारा करता है, “असंयमित जीवन” | यहां हम एक घटना क्रम की सांकेतिक चर्चा करेंगे, उससे हम समझना जरुर चाहेंगे, क्या संयमित जीवन होता, तो यह घटना घटती ? क्या निराशा के क्षणों में कोई मानसिक सहयोग देने वाला होता तो ऐसे घटनाक्रम से परिवार दुखी होते ? चंद दिनों पहले एक मशुहर गीतकार जिन्होंने कई मशहूर गाने लिखे हैं, उनके इकलौते लड़के ने ट्रेन के सामने कूद कर आत्महत्या की |कहते है, उनको यह पुत्र बड़ी मन्नतों के बाद प्राप्त हुआ और ऐसे पिता के दुःख की सीमा को कोई भी सहजता से अंदाज नहीं लगा सकता | लड़के ने स्वंय आत्म हत्या की तथा साथ में अपनी पत्नी और मासूम लड़की को लेकर ट्रैन के सामने कूद गये | ऐसे दुखद घटना क्रम कई तरह के संशय भरे प्रश्न चिन्तन के लिए छोड़ जाते है, खासकर जब शिक्षित और आर्थिक क्षमता से परिपूर्ण इन्सान ऐसा करते है | गरीब और अभाव ग्रस्त इन्सान अगर करता तो,शायद हम एक ही कारण समझते, वो उसकी आर्थिक अक्षमता का | आज आदमी भीतर से टूटता ही जाता है, उसे संभालने की कौशिश क्यों नही की जाती ?
इसके कुछ पहलू जो सामने हो सकते है , उनका विश्लेष्ण करना जरूरी है,
1- माता-पिता, परिवार,सन्तान, रिश्तेदारों के सम्बन्ध तथा दोस्ती
2-लालसा, अनियमित खर्चे, घोटाले और मानसिक चिन्तन

हालाकिं और भी पहलू इसके हो सकते है, पर हमारा चिन्तन इस तरह की घटनाओं से उन तत्वों की तलाश करने की है, जिनके मार्मिक प्रभाव आसपास के जीवन पर पड़ता है, खासकर नजदीक के रिश्तों पर | उपरोक्त घटना को जोड़कर ही विश्लेष्ण करना सही होगा | “आत्म हत्या ” और “हत्या” में कोई ख़ास अंतर नहीं होता, दोनों ही स्थिति में आत्मा ही मरती है |

1. भारतीय जीवन शैली में कुछ समय पहले तक परिवार का महत्व बहुत से दृष्टिकोणों से देखा जाता था | अर्थ की सीमितता के अंतर्गत सभी का पालनपोषण नैतिक शिक्षा के साथ बंधा था | हर रिश्ते की गरिमा उस रिश्तों के नाम से जुड़ी होती थी | जन्मते ही बच्चों को प्रणाम और विनय की शिक्षा परिवार का हर सदस्य देना शुरु कर देता था | आज अर्थ की बहुतायत के अनेक साधन है, परिवार में माता पिता का वर्चस्व भी बच्चों के कमाने के साथ धीरे धीरे कम होते होते प्राय: खत्म ही हो जाता और विचार न मिलने के कारण का बहाने का सहारा लिया जाता | आधुनिक शिक्षा की सबसे बड़ी कमजोरी यह ही है की वो आमदनी बढ़ाने के बारे में ज्यादा सिखाती परन्तु नैतिकता, संस्कार, परिवार और देश के प्रति जिम्मेदारी के बारे में शांत रहती | उपरोक्त उदाहरण में भी यह बात झलकती है, कहते है लड़का शादी के बाद
परिवार यानी माँ-बाप से अलग रहता था, एक अच्छी नौकरी और अच्छी आमदनी के बावजूद भी किसी मोटी रकम के लिए नैतिकता से दूर होता गया | उसके पास शायद ही ऐसा कोई मार्मिक सम्बन्ध था, जिसको वो अपना दुःख, डर या भय का जिक्र करता | जो अपने माता पिता के प्रेम को न समझा वो दूसरों में प्यार कहां महसूस कर सकता था |
उसकी जीवन संगिनी को अगर नैतिकता में थोड़ी भी रूचि होती तो पति को कदापि नहीं भटकने देती| संक्षेप में इतना समझना ही सही होगा की जो अपने परिवार को अपने से अलग करता है और उनसे सत्य लम्बे समय तक छुपाता है,
उसे भय कमजोर कर देता है |
“परिवार से दूर और अपने से बुजर्गों के अनुभव व ज्ञान की कमी”, मै इसे आज के युग का सबसे मजबूत कारण आत्महत्या का मानता हूँ क्योंकि भगवान के बाद अगर आस्था के लायक कोई है, तो माता पिता है | क्या माता पिता की भूमिका लड़के या लड़की की शादी के बाद समाप्त हो जाती ? माता पिता से जो भी हम छिपाते है कहीं न कहीं यह गलती काफी कीमत लेती है | समझने की बात है वो हमसे कुछ नही मांगते सिर्फ मार्ग दर्शन देंने की इच्छा रखते वो भी सुरक्षा के नाते, पर साधनों और गलत अनैतिक आदतों के शिकार इन्सान यह स्वीकार नहीं कर पाते |
हकीकत के पन्नो पर एक ही बात है वो परिवार ही एक मजबूत सहारा हो सकता है,जो ऐसे घटनाक्रम रोक सकता है |

2-.आजकल घर बहुत ही सुंदर और आलिशान बनते है, सजावट पर भी काफी खर्च किया जाता है | कल तक जो दाल रोटी खाते परन्तु अचानक करोड़ों के मालिक बन जाते है | तय है ,शारीरिक मेहनत से होना संभव कम लगता, परन्तु दिमाग की करामात से किया जा सकता है और दिमाग नैतिकता और धर्म दोनों की परवाह ऐसी स्थिति में नगन्य ही करता है | अनैतिकता की बीमारी यह है की वो ज्यादा दिन नहीं चलती और अपने सारे अवगुण से ऐसे घरों की दीवारों के रंगो में मिला देती की उनके निवासी ऐश,आराम और अधार्मिक कार्यो में ही लगे रहते है | चालाकी की ऊर्जा हर समय आपसी सम्बन्धों में भी उन घरों में घुमती रहती है और स्वभाविक है कि आदमी आत्मिक चिन्तन को पुष्टता
नहीं दे पाता | उसका सम्बन्ध गलत आदमियों से हो जाता और धीरे धीरे अपने से ही नही आसपास! के वातावरण से
तन्हा हो जाता | जब सारे रास्ते बंद हो जाए, तो एक ही रास्ता उसे सही लगता वो ” आत्महत्या” का |
हर मानव का अधिकार है की वो आर्थिक उन्नति करे, अच्छे साधनों का प्रयोग करे परन्तु साथ में यह भी तय करे जीवन बिना किसी तनाव के जीना और लम्बे समय तक स्वस्थ जीना तो शायद हमें ऐसे प्रकरणों के बारे में चिन्तन ही न करे |
सोचने की बात है क्या सत्य को अनेक झूठ से लम्बे समय तक छुपाया जा सकता है ? क्या अति चालाकी के रास्तों से हम सदा सुरक्षित गुजर सकते है ? क्या अंहकार में प्रेम और धर्म के बिना जिया जा सकता है ? क्या नैतिकता के अस्तित्व को सदा नकारा जा सकता है ? क्या असंयमित जीवन सदा स्वस्थ और सुरक्षित रह सकता है ? क्या बिना परिवार और माता पिता का ऋण चुकाये हम शांति प्राप्त कर सकते है ? क्या हम बिना किसी के सहारे जीवन के सफर को अंतिम पड़ाव तक तय कर सकते है ? क्या हम अपना गुरु खुद बन सकते है ? क्या अति लोभऔर लालच घातक नहीं होता ? ऐसे और भी सवाल हमें अपने आप से जरुर पूछना चाहिए |

पारिवारिक सरल जीवन कई व्याक्तिगत समस्याओं का निदान सहजता से करने में सक्षम होता है | आपसी सही रिश्ते भी विपत्ति के समय सकारत्मक भूमिका निभाने की चेष्टा करते हैं | आज आर्थिक व आधुनिक युग इसे नकार कर नई नई
समस्याओं से जूझ रहा है | इनके प्रति सत्यता भरा चिन्तन आज की आवश्यकता है, इस पर मनन होना जरूरी है |

कमल भंसाली