मूल्यांकन स्वयं का, सम्बंधों के सन्दर्भ में ★ भाग 2★ कमल भंसाली

रिश्ते हो या कोई भी सम्बन्ध, वो, विकल्पों पर ही अपनी भूमिका को तलाशते है, प्रेम और स्नेह में समाहित न तो सब रिश्ते हो सकते है, न ही जुड़े हुए सम्बन्ध, क्योंकि स्वार्थ की अल्प आकांक्षा हर रिश्ते के अस्तित्व में जरुर होती है । बाहरी सतह से हर रिश्ते की मधुरता से उसकी गरिमा का पूर्ण अहसास विश्वास के साथ नापना अति मुश्किल काम है। अतः रिश्तों से ज्यादा आशा कभी नहीं करना भी एक समझदारी होती है । इस कलयुग में हम राम और हनुमान या कृष्ण और अर्जुन या फिर कृष्ण और सुदामा के सम्बंधों का मूल्यांकन करने की चेष्टा नहीं कर सकते, क्योंकि उनके सम्बंध आत्मा से बने थे।

आज अर्थं के युग में पूर्ण आत्मिक सम्बंध तो पति और पत्नी के रिश्तों में भी नहीं सुलभ होते है। पति-पत्नी के उन रिश्तों में प्रेम का आगमन धैर्य और व्यवहार विवेचना के बाद आता है, जिनका सम्बन्ध पारिवारिक सहमति से होता है, और जिनका शादी से पहले आपसी परिचय नहीं होता, जिन्हें हम अंग्रेजी में “arrange marriage” के नाम से जानते है। ऐसे सम्बन्ध जब सही परिपक्वता से पलते है, तो बेशुमार प्यार से शूमार हो जाते है।परन्तु ये बात “love marriage” के सन्दर्भ में कहने में जरा संकोच का अनुभव होता है, क्योंकि वहां अल्प पहचान में मन की दशा सन्तुलित नहीं रह सकती। यहां आकर्षण खासकर प्रथम, जिसमें उम्र की चाहना ज्यादा होती है, किसी भी दूसरे अनचाहे पहलू को दरकिनार कर देता है। हालांकि इस विचारधारा को समझदार निर्णय में लागू नहीं करना चाहिए, आखिर परिस्थितिया सब सम्बंधों में एक जैसी नहीं हो सकती। बिना मेल की प्रेम कहानियों के कुछ तत्व जिन में हिंसा का प्रयोग किसी रुप में भी हो सकता है, वो अगर प्रेम है, तो निसन्देह एक दुःखद पक्ष है। इसमे सहानुभूति दिखाने के सिवाय या दुःख प्रकट करने के सिवाय हम कुछ नहीं कर सकते। सच में ज्यादा, ऐसे रिश्ते वासना से ज्यादा जुड़े होते है, और अनैतिकता इनमें पूर्ण रुप से समायी रहती है।

हर रिश्तें में कुछ तत्व होते है, ऐसे तत्वों का कोई भी स्वरुप हो सकता है, ये जब पवित्र मन से जागृत किये जाए तो उन से संचारित रिश्ते जीवन के लिए लाभकारी और शुभ होते है, इनमें प्रेम, आस्था, स्नेह, ईमानदारी, सत्यता, संयम और पूर्ण विश्वास की ऊर्जा स्वस्थ गतिशीलता प्रदान कर सकती है, यह रिश्ते जिंदगी भर पूरी निष्ठां के साथ हर परिस्थितियों में अपनी क्षमता दिखाते रहते है। परन्तु ऐसे रिश्ते आज के आर्थिक युग में एक कल्पना मात्र के सिवाय कोई अस्तित्व नहीं रखते। हालांकि, अगर इनमें से कुछ तत्व रिश्तों में पनपते है, तो वक्त के अनुसार “सम्बन्ध सहयोगी” हो सकते है।

जिन रिश्तों में दिल से चाहत होती है, वो रिश्ते उन से ज्यादा परिपक्व होते है, जो दिमाग से बनते है, ऐसे रिश्ते गुमराह करने वाले हो सकते है, क्योंकि ये किसी विशेष उद्धेश्य के लिये बनाये जाते है। ऐसे रिश्तों में शब्दों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। किसी ने सही कहा ” रिश्ता दिल से होना चाहिए, शब्दों से नहीं, नाराजगी शब्दों से होनी चाहिए, दिल से नहीं”। जिन रिश्तो में हर जगह सहमति का माहौल रहता है, वो सम्बन्ध किसी आनेवाले खतरे का संकेत दे सकते है। अतः कोई भी सम्बन्ध की परिपूर्णता, हमारी समझ पर निर्भर करती है।

अपने व्यक्तित्व पर आलोचक होना सहज नहीं होता, हर असफलता का दायित्व इंसान या तो स्थिति की प्रतिकूलता पर या अपने कमजोर भाग्य के ऊपर डाल सन्तोष कर लेता है। किन्हीं ख़ास वजह से अगर वो अपनी किसी विशेष गलती को स्वीकार कर भी ले तो भी उसके प्रति वो ज्यादा समय तक गंभीर नहीं रह पाता। इस वजह से वो अपने सम्बंधों का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता। समझने की बात यही है, कि सम्बंधों की सही मीमांसा ही जीवन को प्रेरणामय बना सकता है। अपनी गलतियों का सही विश्लेषण खासकर रिश्तों और सम्बन्धो के सन्दर्भ में कई तरह से करने की आदत डाल ले, तो हर सुयोग्य सम्बंध हमारे लिए उपकारी साबित हो सकता है।
हमें सदा यह ख्याल करना चाहिए कि रिश्तों की गरिमा मानव को शिष्ट और विशिष्ट दोनों ही बना सकता है, अगर नैतिक संस्कारों के साथ हर सम्बंध निभाया जाय। प्रकृति को ही देख ले, कितने सम्बंध वो निभाती है, वो फूलों को भी उसी तरह सहजती है और काटों को भी। हमारे जीवन में माँ की भूमिका भी कुछ वैसी है, वो भी सन्तान को उसी तरह सरंक्षण देती है, चाहे बेटा नालायक हो या आज्ञाकारी। शास्त्रों की बात करे तो पिता और गुरु की भूमिका व्यक्तित्व को निखारने और जीवन को प्रखरता देने में कोई कमी नहीं रखते। ये तीनों सम्बंध जीवन निर्माण के प्रारम्भिक मूल्यता तय करते है, हमें इनका ऋणी मानकर कभी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। दुनिया में इंसान बन कर आये है, तो इस पर अभिमान नहीं करना ही अच्छा होता है, क्योंकी प्राणों के मालिक हम नहीं है, न ही हमें अपनी जीवन अवधि का पता है, तो अभिमान तो हमारे पास रिश्तों और सम्बंधों के प्रति होना भी नहीं चाहिए।

अर्थ की भूमिका को हम आज जीवन से नकार भी नहीं सकते, जीवन अगर कहीं गलत होता है, तो अर्थ की व्यवस्था के कारण, सम्बंधों में तनाव भी इसके कारण होता है। अर्थ के मामले में जब किसी के भाग्य की कमजोरी होती है, लाजमी है, सबसे पहले इंसान रिश्तों की तरफ आशा की नजर से सहयोग की अपेक्षा करता है, और हो सके कुछ समय के लिए थोड़ा आर्थिक सहयोग मांग भी ले, तो ऐसी परिस्थितियों में उसकी पात्रता पर चिंतन कर ही जबाब संयमित शब्दों से ही देना चाहिए। अगर रिश्तेदार और दोस्त अपने चारित्रिक मूल्यों में स्वच्छ है, तो मेरा मानना है, अपनी क्षमता अनुसार उसका सहयोग करना रिश्तों के प्रति सही चिंतन होगा। सहयोग करने से पहले उसकी भी भूमिका मन में तय करले कि ये ऋण नहीं दे रहा हूँ, एक प्रिय को सहयोग कर रहा, न की व्यापार,अतः इस सहयोग को सामनेवाला जब वापस करे, तभी मान्य है। इस के बावजूद भी सम्बन्धो में मौलिकता रखे, तो निश्चित है, ऐसा इंसान जो सम्मान अपने आप के अंदर पाता है, वो आत्मिक और अमृतमय रसों से सरोबार होता है। इस सहयोग के प्रति इतनी ही सावधानी रखनी होती है, इसकी चर्चा किसी से न करे, सिर्फ सामनेवाले की पात्रता में विश्वास रखे, क्योंकी उसे मालुम है, देनेवाला उसके लिए भगवान से कम नहीं है। अगर भाग्य के किसी कारण से सहयोग लेना पड़े तो हमें उसे स्थिति के सुधार के साथ उनका सहयोग उन्हें धन्यवाद सहित वापस दे देना, चाहिए, इससे भाग्य क्षमता का सुधार होगा।

रिश्तों और सम्बन्धो को जब हम नहीं तोलते तो वक्त तुलवा देता है, तब मालूम पड़ता है, हमने उनको किस तरह से महत्वपूर्ण बनाकर रखा है। अन्धकार होने से पहले हर रिश्ते के दीपक में प्यार, स्नेह का तैल, और समझ की बाती तैयार रखना ही समझदारी होगी, पता नही जीवन में कब किसी भी कारण से लोड शेडिंग हो जाए। समझने की बात है, जीवन जरुरत का नाम भी है। अगर हम प्रेम और सेवा भरे व्यक्तित्व के मालिक है, तो कोई भी अँधेरा हमें मोहताज नहीं बना सकता।

रिश्तों और सम्बंधों की गरिमा के प्रति अगर चेतना सही हो तो जीवन हर परिस्थिति में आश्वस्त रहता है, सक्षमता बढ़ती है, और मधुरमय वातावरण तैयार करता है। इंसान जब कभी यहां से प्रस्थान करता है, तो एक सन्तोष उसके पास रहता है, कि उसने एक सही जीवन जीने की सफलतापूर्वक कोशिश की, उसने अपने जीवन ऋण के प्रति कोई अन्याय नहीं किया। रिश्ते और सम्बंध आखिर, सही व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन करते है, अंतिम क्षणों के बाद भी ……क्रमश..***कमल भंसाली****

मूल्यांकन स्वयं का…सम्बंधों के सन्दर्भ में…भाग 1 ★★कमल भंसाली ★★

स्वयं को चिन्हित कर, स्वयं का मूल्यांकन करने वाले विरले ही महापुरुष होते है। दूसरों के व्यक्तित्व और उनके कार्य पर नजर रखने वाले सब जगह नजर आते है, हो सकता है, हम भी उनमें से एक हो ? अगर ऐसा है, तो निश्चित है, हम एक कमजोर व्यक्तित्व के मालिक है। हमारा जीवन बिना किसी सार और उद्धेश के चल रहा है। क्यों नहीं हम आज विचार करे, हम अपने व्यक्तित्व को सही और शुद्ध कसौटी पर परखे। समय रहते, अगर हम अपनी कमियों को समझले, और उन्हें दूर करने की चेष्टा करे, तो हो सकता हम अपने जीवन को एक सही पहचान दे सके।

हमें मानने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, कि हम इस धरती के साधारण से इंसान है, और हर आती जाती सांस के मोहताज है। परन्तु जब जीवन मिला है, तो कोई उद्धेश्य इसमे भेजने वाले का जरुर है, नहीं तो हमें वो और किसी दूसरे रूप में भी भेज सकता था। इंसानी जीवन मिलना कोई साधारण बात तो है, नही, यह हमारा प्रथम चिंतन हमें प्रेरित करता है, कि हम अपना स्वयं मूल्यांकन समय समय पर करते रहे, पर हम करते नहीं, क्योंकि हम अपने को इसका दावेदार नहीं समझते। इस भूल का सुधार हम जितना जल्दी करेंगे, उतना जल्दी ही हमारा जीवन आत्मिक आनन्द प्राप्त करना शुरु कर देगा। किसी एक क्षेत्र की सीमित सफलता चाहे हमें महान न बनाये, पर गरुर और अभिमान कि परत हमारे व्यवहार पर लगा देती है। इस से बचने वाला इंसान बहुत दूर तक की यात्रा सहजता से करता है। अभिमान जिस मानवीय व्यवहार को प्रभावित करता है, उन्हें हम सम्बंध या रिश्ते भी कहते है। आज हम इसी बाबत कुछ चिंतनमयी चर्चा संक्षिप्त में करे, तो क्या हर्ज है ?

हर जीवन यात्रा, माता के गर्भ से शुरु होती है, हर प्राणी की, पिछले जन्मों का लेखा जोखा का भी उसमे असर होता होगा। परन्तु, बिना प्रमाण उस पर बहस करने से अच्छा है, हम इस जन्म को सार्थकता प्रदान करे, और जीवन उद्धेश्य को समझने की कोशिश करते रहे। कहते है, प्रथम कदम से ही इंसान को समझ मिलनी शुरु हो जाती है। उसेअपनी शारीरिक पूर्णता और क्षमता का अहसास हो जाता है, वो अपनी भूख की पहली ललक से समझ जाता है, उसे इतने दिन कहां आश्रय मिला था, और दुनिया के प्रथम, स्नेहशील, विशुद्ध प्रेम का अनुभव, वो माँ के आँचल के अंदर पाकर, इस जीवन के प्रति आशस्वत हो जाता है, और वो अपनी दैहिक और कुछ हद तक मानसिक प्रगति की तरफ अग्रसर होने लगता है। माँ के स्नेह भर प्यार का अहसास के बाद उसे जो पूर्ण सुरक्षा का अनुभव होता है, वो होती है, पिता की बांहे, जहां उसे दैनिक अनुभव से अहसास हो जाता कि माँ और पिता के अनुबन्ध का वो एक उपहार है, जिसमें वो अपना भविष्य अवलोकन करता है, और उसे अपनी प्रगति और सुरक्षा के आश्वासन का अहसास हो जाता है l चूँकि उसे संसार में अपनी भूमिका को स्वयं ही ढूंढना है, वो उसकी तलाश में समझदार होकर अपने जीवन की मकसद यात्रा शुरु कर देता है, धीरे धीरे प्रकृति उसकी सारी प्रारम्भिक बाहरी सुरक्षा सुविधा वापस लेनी शुरु कर देती है। यहीं से वो अपने संस्कार, ज्ञान, बुद्धि, विवेक से अपनी स्वयं की जीवन यात्रा प्रारम्भ कर देता है। जैसे कोई भी यात्रा में असुरक्षा का खतरा रहता है, वैसे सही जीवन यात्रा भी काफी कठिन होती है, खतरों से भरपूर होती है। इसे सुलभ और सुखद बनाने में एक रक्षा कवच की तरह काम करता है ” सम्बंध “।

सम्बंध की परिभाषा जीवन के हिसाब से इतनी ही बनती है, जब हम विपरीत परिस्थितयों में गिरने लगते है, तो सहीं सम्बन्ध दीवार बन गिरने नहीं देता। बाकी सम्बन्ध या तो रिश्ते होते है, या व्यवहारिक कार्य क्षेत्र से बनते है, कुछ सम्बंध शरीर के लिए कुछ आत्मा के लिए, कुछ दिल के होते है। हर सम्बंध का अपना क्षेत्र होता है, उसी के अनुरुप ही हमारे जीवन की उनकी जरुरत होती है। सारे सम्बंधों की कड़ी आपसी व्यवहार से जुड़ी होती है, सम्बंध का बनना और बिगड़ना इसी पर निर्भर करता है। सम्बंध का स्वास्थ्य भावना और वाणी पर ज्यादा निर्भर करता है। हमें सम्पन्न और स्वस्थ जीवन के लिए सम्बंधों की भूमिका पर सदा ही गौर करना चाहिए। सम्बंधों की मजबूरी भी होती है, प्रेम के धागे के दो क्षोर होते है, प्रेम पर जब जरा सा आघात दोनों में से कोई भी करता है, तो सम्बंधों की डोर कमजोर होती है। ये तो, हम सभी जानते है, संवेदनशील कई धागों से कोई डोरी या डोर बनती है। इन धागों की विश्वस्ता पर ही उसकी मजबूती निर्भर करती है। इसलिए हर सम्बन्ध का जीवन के सन्दर्भ में समय समय पर मूल्यांकन जरुरी होता है। हर सम्बंध की आस्था को टटोल कर ही कोई नजदीकी सम्बंध बनाना चाहिए। सावधानी बरतना भी उतना ही जरुरी है, जितना सम्बंधों को मधुरता देना। एक गलत सम्बंध जीवन को भी खतरा दे सकता है। सब मिठास भरे सम्बंध असली नहीं होते, समय समय पर कसौटी पर कसने से ऐसा अनुभव भी किया जा सकता है। कुछ सम्बंध कडुवे भी कभी लगते है, जैसे पिता, गुरु या सही दोस्त या शुभचिंतक का, उन पर हमें विश्वास करने का कारण ढूंढना चाहिए क्योंकि किसी समझदार ने कहीं लिखा है, ” रिश्तों की बगियां में एक रिश्ता, नीम के पेड़ जैसा भी रखना, जो सीख भले ही कड़वी देता हो पर तकलीफ में मरहम भी बनाता है”।

सम्बंधों का मनोविज्ञान जाने बिना सम्बंधों की सही विवेचना करना मुश्किल होता है, आइये संक्षिप्त में उसको भी जानने की कोशिश कर लेते है। हर वो रिश्ता खरा है, जो विपरीत स्थिति में हमारा साथ बिना किसी शर्त के निभाता है, ऐसे रिश्ते का अहसान और गरिमा को कभी भी खण्डित नहीं करने की सोच ही, सही सोच है। समय कठिन दौर में चल रहा हो, रास्ता नहीं दिख रहा, सत्य के साथ ऐसे सम्बंधों से राय लेने में कोई हर्ज नहीं है, और अगर वो सहयोग कर रहे है, तो उस सहयोग का सही उपयोग करना चाहिए, स्थिति सही हो जाये तो तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हुए, उन्हें उनका सहयोग वापस कर देना उचित होगा। कहना न होगा, आज के आर्थिक युग में अर्थ की कमी के सन्दर्भ में ही उपरोक्त कथ्य सही है।

सम्बंध शब्द सम और बन्ध दोनों का संयुक्त उद्बोधन है, जिसका मतलब ही होता है, समान सम्बंध इसी दृष्टि से हर सम्बंध को निभाया जाना चाहिए, गरिमा अनुसार। अर्थ की कसौटी पर किसी भी सम्बंध या रिश्ते को परखा जाता है, तो उसमे प्रेम की मात्रा ढूंढने का साहस कम ही लोगों में होता है, और निश्चित है, उनके पास भरपूर ज्ञान है, क्योंकि वो जानते है, अर्थ का वक्त कभी भी बदल सकता है।

हालांकि रिश्तों की तासीर में नजदीकी ही मुख्य है, परन्तु कुछ दुरी का पर्याय होना भी आवश्यक है। सत्य को पूर्ण नंगा देखना मुश्किल काम होता है, क्योंकि आँखे सहन नहीं कर सकती। कुछ आवरण हर सम्बंध की जरुरत है, अतः गरिमानुसार ही व्यवहार ही उचित होता है, इसमें वाणी और शब्द ही सम्बंधों की इज्जत अपने रुत्बों के अनुसार तय करते है, अतः सबंधों को अमृतमय बनाने है, तो अभिमान को दूर रखकर उचित भाषा का प्रयोग श्रेयस्कर होता है। …..क्रमश…..कमल भंसाली