🙌संवेदन पूर्ण सत्य🕸️कमल भंसाली

“दुनिया में अगर कोई सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है वह है “दूसरों के द्वारा बोलेजाने वाला सत्य”, यह एक तथ्य है, इससे इंकार करना शायद ही आसान होगा। “सत्य” बोलने वाले लोगो की तादाद नगण्य के आसपास ही अब रहती परन्तु किसी समय झूठ बोलने वालो की गिनती हुआ करती थी, इस बात को आज का आधुनिक युग शायद ही स्वीकार करेगा। आज सत्य को एक हारा हुआ खिलाड़ी या नेता भी स्वीकार करने से झिझकता है। शाश्वत चिंतन करे तो ये बात समझ में आ सकती है कि दुनिया का अस्तित्व पूर्ण सत्य में आज भी समाया है, हम चाहे या नहीं प्रकृति अपने आप को सत्य से अलग नहीं कर सकती। हम कितना ही झूठ का दैनिक जीवन में प्रयोग कर ले पर आत्मा उसे अंदर तक नहीं ले पाती, हमारे बोले हुए किसी भी झूठ पर उसका कराहना महसूस किया जा सकता है।

“हम जी रहे है यह सत्य हो सकता है” परन्तु हम ‘सही’ जी रहे ये संदेहपूर्ण है। सवाल किया जा सकता है, क्या सत्य पूर्ण जीवन जीया सकता है ? उत्तर आज के युग में आसान नहीं लग रहा कारण जीवन की गतिविधिया आजकल झूठ के इर्द गिर्द ही ज्यादा समय बिता रही है। कभी सत्य को जीवन की धुरी समझा जाता था, आज उसकी जगह झूठ ले रहा है, इसे जीवन की विडम्बना ही कहे क्योंकि जीवन आज इसी कारण शायद टूट कर बिखर रहा है। जीवन को आज सब सांसारिक सुविधायें बहुत तेजी से प्राप्त हो रही है और बताना भी जायज नहीं होगा जीवन अपना सास्वत मूल्य खो चूका है, और स्वयं ही किसी त्रासदी का शिकार होकर दुनिया को अलविदा कह देता है। सही भी है, झूठ का भारीभरकम वजन कब तक ढोयेगा।

चाणक्य राजनीति के गुरु थे उन्होंने राजधर्म के लिए कई तरह की चालाकियों का सहारा लिया परन्तु झूठ को दूर रहकर। उनके इस कथन पर गौर करते है ” सत्य मेरी माता है। आध्यात्मिक ज्ञान मेरा पिता है। धर्माचरण मेरा बंधु है। दया मेरा मित्र है। भीतर की शांति मेरी पत्नी है। क्षमा मेरा पुत्र है। मेरे परिवार में ये छह लोग है।” काश आज के राजनेताओं में इस तरह के विचार अपनाये हुए होते तो निश्चित ही भारत आंतरिक रुप से कमजोर और गरीब राष्ट्र की गिनती में न होता।

इंसान का व्यक्तित्व प्रकृति ने बड़ी सूझबूझ वाला बनाया है, सर्वगुण और अवगुण वाले संसार में उसको अपना व्यक्तित्व स्वयं निर्धारण करने का अधिकार भी उसे दिया। सक्षम व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के जीवन दर्शन पर सरसरी नजर डालने से इस बात से इंकार नहीं करना पड़ेगा कि बिना असत्य का सहारा लिए वो इस मंजिल तक पंहुचे है।

असहाय सी स्थिति है आज जीवन की, भाग्य से प्राप्त खुशहाली अति अर्थ के दीमक से हर दिन जीवन को छीजत प्रदान कर रही है। पल की मोहताज जिंदगी अर्थ के कारण कटुता भरे वातावरण में कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों के विषालु कीटाणुओं से ग्रस्त हो रही है। इस का प्रमुख कारण हम सब समझकर भी नहीं समझते वो है “अति दौलत की भूख”।
हर रोज हमारे आसपास ही क्या हमारे स्वयं के जीवन मे उसकी कमी या अति, जीवन को संकुचित होने का अनुभव कराती है। जब की जानते है, जब तक जीवन है, तब तक मालिक होने का दावा कर सकते है पर उसके बाद उसका मालिक कोई और स्वतः ही हो जाता। अतः इस सत्य को स्वीकार कर लेना ही सही होता है अर्थ के कारण किसी भी सम्बन्ध को कटुता का अनुभव न दिया जाय। कठिन समय मे आपसी प्रेम काफी फलदायक होता है।

कहते है जीवन की शुरुआत प्रेम से हुई और प्रेम सदा सत्य से संपन्न रहना पसन्द करता है, झूठ से वो सदा नफरत करता है। किसी शारीरिक बंधन के चलते वो झूठ को मजबूरी से सहन करता है। इस तथ्य को रिश्तों की दुनिया में सदृश्य समझा जा सकता है। रिश्तों के बनते बिगड़ते तेवर जीवन को कई तरह से प्रभावित करते है। रिश्तों की मधुरता जीवन को सकारात्मक चिंतन प्रदान कर उसे मजबूत कर सकती है। गलत भावनाओं के बस में होकर रिश्तों में कटुता का संकेत देना मात्र जीवन के पथ को कठोरता प्रदान कर सकता है, अतः रिश्तों के प्रति हमारी संवेदनशीलता में सत्य का अंश सही मात्रा में रखना उचित लगता है। जीव विज्ञानी डेविड जार्ज हस्कल का यह कथन आज के युग अनुसार अक्षरस सत्य लगता है कि ” The forest is not a collection of entities (but) a place entirely made from strands of relationship”.

आलोचना से पीड़ित प्रेम कभी भी जीवन को सुख नहीं देता परन्तु समझने की बात है बिना आलोचना का प्रेम चापलूसी की या गुलामी की श्रेणी में आता है, प्रेम का निम्नतम पतन भी यहीं होता है, इस सत्य को कितना ही कड़वा कह लीजिए पर ह्रदय इसे स्वीकार कर सन्तुलित रहता है। आधुनिक अर्थतन्त्र की इस दुनिया की विडंबना ही कहिये इंसान के पास हजारों साधनों का भरपूर भंडार हर दिन तैयार हो रहा है, शरीर नाच रहा सब कुछ भोग रहा पर मन तो खालीपन का शिकार हो रहा। सबके रहते इंसान जब उम्र या किसी कारण से लाचार होता है तो टूट कर बिखर जाता है और दिल के अरमान दिल मे ही रह जाते, कोई सुनने वाला, कोई मन से सेवा करने वाला नहीं रहता उसके आस पास। इसका एकमात्र सत्य उतर यही हो सकता:

“जो दिया नहीं वो मिला नही
झूठ से सत्य कभी दबा नहीं
प्रेम को साधन नहीं संवेदना चाहिए
सही जीने के लिये इस सत्य की समझ चाहिए”

लेखक: कमल भंसाली ।

🚱सारगर्भित जीवन🚱कमल भंसाली

“It seems to me that the natural world is the greatest source of excitement; the greatest source of visual beauty; the greatest source of intellectual interest. It is the greatest source of so much in life that makes life worth living.” ***David Attenborough***

सही ही लगता है, प्रकृति, प्यार और इंसान दुनिया की तीन बेशकीमती ताकते है। जिनके बिना इस संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती, जहां हम एक संक्षिप्त अवधि का जीवन अनेक तरह के अहसासों के साथ हर क्षण जीने का प्रयास करते है। इसी प्रयास को शायद हम जीवन भी कहते है। मानव का सबसे पहला रिश्ता अगर प्रकृति से माना जाय तो गलत नहीं है, क्योंकि हर प्राणी ही नहीं, हर वस्तु का सृजनकर्त्ता किसी न किसी रुप में वो ही है। अंततोगत्वा यही कहना सही होगा जीवन प्रकृति और प्रेम का सुंदर समिश्रण है। सही ढंग से जीने से आत्मानंद का अहसास जीवन अवधि तक होता रहेगा। सारगर्भित जीवन का अहसास स्वर्ग जैसा आनन्द इसी धरती पर प्रकृति, प्यार और इंसानी परिवर्तन से पाया जा सकता है, लेखक का मानना है यह सिर्फ एक सही और सुंदर कार्यकुशलता में विश्वास रखने वाला प्रबुद्ध व्यक्तित्व ही कर सकता है।

कुछ लोग ये मानकर सन्तोष कर लेते है, सुख और दुःख कर्मो के साथ भाग्य का खेल है। कथन की सत्यता या असत्यता पर सवाल न उठाकर यह प्रश्न किया जा सकता है, कि अगर ऐसा होता भी है तो क्या निष्क्रिय जीवन किसी भी तरह का अनुभव दे पाता ? माना जीवन की किसी भी स्थिति पर कोई दावा नहीं प्रस्तुत किया जा सकता, पर हम कह सकते है कि हमारे सांसारिक जीवन की एक सत्यता को आज भी हम मानते है कि जीवन सुख दुःख की छांव तले ही अपनी आयु सीमा की ओर का सफर करता है। इस यात्रा के दौरान जब भी जीवन असहज हो विपरीत परिस्थितियों का अनुभव करता है, तब, दुःख अपनी चरम सीमाओं के साथ उसकी मजबूती की परीक्षा लेने हर जगOह तैयार रहता है। यही समय सही होता है जब जीवन को अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करना चाहिए, उसे हर गलती का सही मूल्यांकन कर दुःख को सारी निराशाएं वापिस लौटाकर अपने आगे के पथ की निरंतरता को सहजता प्रदान करनी चाहिये। पर ऐसा होता नहीं क्यों की सुख का आदी जीवन सुख भोगते भोगते बहुत सी कमजोरियों की गुलामी करने लगता है। प्रश्न किया जा सकता है, क्या सुख के कारण जीवन की क्षमताओं का ह्यास होने लगता है ? इस प्रश्न का सहज व सरल उत्तर यही है कि “अति” कैसी भी हो कितनी भी हो, नुकसान दायक ही होती है। जैसे हर देश सीमाओं के द्वारा विभक्त होता है, हर अति की सीमा संयमन होती है। अपनी क्षमताओं से ज्यादा उल्लंघन करने से जीवन विरोधी तत्व संग्रहित हो, खिन्नता का वातावरण तैयार करते है, और सुख के क्षण के अहसास उनके सामने लाचार से हो जाते है।

इस लेख का सारांश आप तय करे तो इतना ही कीजियेगा की वर्तमान के अच्छे जीवन को हम चाहे तो काफी और बेहतर कर सकते है। जी हां, “परिवर्तन” बहुत हि मोहक और अदाकारी शब्द है, परन्तु निरन्तरता से ही ये जीवन सहायक दोस्ती निभाता है, नहीं तो अजनबी की तरह कुछ क्षण के लिए ही मुस्कराता है। कुर्त लेविन के अनुसार यदि किसी चीज को अच्छी तरह समझना चाहते है तो उसे बदलने की कोशिश करनी चाहिए, खासकर आदतों को। हम जीवन में जिन दैनिक सुखों का अनुभव करते है या करना चाहते है वो मन की खुशियां ज्यादातर सफलता और आपसी सम्बंधों की मधुरता में ज्यादा निहित होती है। शरीर का स्वस्थ स्वास्थ्य और अर्थ का संक्षिप्त साम्राज्य अगर हमारे पास है और उन पर हमारा आत्मिक शासन नीतिगत के तहत सही ढंग से काम कर रहा है तो सदा यकीन इसी पर कीजिये, इस चिंतन के साथ की इससे ” बेहतर” अभी कुछ और भी आगे है। प्रकृति का एक निश्चित सन्देश हर मानव को जन्मतें ही मिल जाता है, मेरी शुद्धता तेरी जीवन साँसों की चाहत है हो सके तो इस रिश्ते की गरिमा को समझ कर ही मेरे साधनों का जरुरतमय और सही उपयोग करना। काश हम इस सन्देश की गरिमा को समझ पालन कर पाते। निश्चित मानिए, सार्थक जीवन का यही सही सार है, प्रकृति की महिमा को समझा, अपने ही जीवन की आस्थाओं को मान सम्मान का अहसास कराता है।

हर इंसान बेहतर होता है, हर एक का जीवन जीने का तरीका भी भिन्न होता है, पर सभी का मनपसंद जीवन पथ खुशियों की राह चाहता है। आइये, कुछ चमत्कारिक तथ्यों पर गौर करते है, जिन्हें हम जानते है, पर अपनाने की कोशिश बहुत ही कम करते है। इस तथ्य से इस लेख का कभी कोई इंकार नहीं कि हम अभी भी बेहतर जीवन जी रहे है, पर बेहतर को और बेहतर बनाने से परहेज करना भी सही नहीं महसूस होता। एक समझ भरी सही सलाह को सही रुप से समझने से इंकार भी नहीं होना भी उचित होता है। अगर कुछ अदृश्य कुशलता का हम प्रयोग कर हम स्वयं की खुशियों, सफलता और सम्बंधों को कुछ क्षणों के लिए और बढ़ाते है, तो निसन्देह इसे हम सोने पर सुहागा ही कहेंगे। चलिए जानते है, कैसे कुछ अतरिक्त क्षणों को जिससे इन्हें हम हासिल करने का प्रयास कर सकते है।

यहां स्वयं के लिए यह मानना उचित होता है कि हम दुनिया में अच्छे और बुरे दोनों ही रुप से मूल्यांकित होते है, अतः गलत भी स्थिति वश हमारा कोई मूल्यांकन करता है, तो वो हमारे लिए निराशा का कारण न होकर स्वयं को अवलोकन करने का आधार मानना चाहिए। इस तरह हमारी भावनाओं में उत्साह और उमंग भरे तत्वों का आवागमन होता रहेगा और सही समय पर हमारे प्रति नकारत्मक चिंतन रखने वाले अपने गलत चिंतन की दिशा भी बदल देंगे।

जिंदगी को अगर हम सिर्फ साँसों की आवाजाही का साधन न मान उसे कुछ अतिरिक्त प्रयासों से उसे मान देते है, तो निश्चित है, ऐसे सही प्रयास, सही राह की सैर करने वाले लोगों की राह में खुशियों के फूल बिखरेने का काम कर सकते है। इन प्रयासों में साँसों और मस्तिष्क का तालमेल का रहस्य इंग्लिस फिल्मों के कलाकार Allisan Janney के इस कथन में निहित है, गौर जरूर कीजिये ” I do the best I can. Everything is everybody else’s problem. संसार में अपने सीमित अस्तित्व की पहचान ही सक्षमता निर्माण के योग्य होती है। कुछ लोग सस्ती प्रसिद्धि के चक्कर में इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते है, ये एक मानसिक कमजोरी के अलावा कुछ नहीं है।

जब अवस्थाये कभी विपरीतता का सन्देश दे तो हमें तीन तत्वों पर सदा ध्यान देना चाहिए वो है समझ, समय और संयम इनका सही अनुपात में उपयोग आत्मिक और मानसिक स्वास्थ्य को सम्बल प्रदान कर सकता है। ऐसी अवस्था में परिवार में मुख्य अनुभवी माता पिता और बुजर्ग लोगों के सुझावों पर जरूर प्रध्यान करना चाहिए क्योंकि वक्त की कसोटी पर उनका ज्ञान काफी सार्थक होता है। परिवार के हो रहे विभाजन से जीवन को काफी क्षति पंहुच रही है, ये इन दिनों में घट रही आत्महत्या की घटनाओं से समझा जा सकता है। माना जा सकता है, परिवर्तन एक सांसारिक नियम है, साथ में साधनों के विकास अनुरूप मानव स्वभाव भी बदलता रहता है। पर परिवर्तन और बदलाव अगर जीवन को आनन्दमय होने का अहसास दे, तो सही लगते है, नहीं तो गलत परिणाम का खामियाजा जिंदगी को ही भुगतान करना है। ये ही सोच अगर हम परिवर्तनमय होते है, तो सही दिशा की ओर हम अपनी जिंदगी का रुख कर रहे है, यकीन कीजिये। सारगर्भित जीवन हमारी आंतरिक मानसिक दशा का सम्पन्न मूल्यांकन तो करता ही है, साथ में हमें इस जहां में आने का मकसद भी बताता है।
जीवन को सारगर्भित करने वाले कुछ इंसानों के इन कथनों पर एक नजर इनायत की डालिये, कहना न होगा जीवन के गुलशन में आनन्द की बहार छा जायेगी, अगर इनसे हम अपने जीवन में कुछ परिवर्तन करते है, तो।

1. शेक्सपियर के अनुसार हमें किसी की भावनाओं से इसलिये कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए कि हम उससे आगे बढ़ जाये। हो सकता है हम कुछ क्षण के लिए जीत जाये पर ऐसे सक्षम इंसान का सानिध्य हम जिंदगी भर के लिए खो देंगे।
2.नेपोलियन के अनुसार संसार को खराब आदमियों से फैलायी हिंसा उतना डर नहीं है, जितना कि अच्छे लोगों की चुप्पी से।
3.आइंस्टीन ने अपनी सफलताओं के लिए उन लोगों को धन्यवाद दिया जिन्होनें उन्हें किसी भी तरह के सहयोग से इंकार किया। इससे उन्हें स्वयं हर कार्य करने की प्रेरणा मिली।
4. अब्राहम लिंकन ने दोस्ती की परिभाषा कुछ इस तरह की ” अगर दोस्ती आपकी कमजोरी है तो यकीन कीजिये आप दुनिया के सबसे मजबूत आदमी है।
5. किसी को हर समय खिलखिलाते देख कभी इस बात का अंदाज नहीं लगाना चाहिए कि उनके जीवन में दुःख है ही नहीं, हां, यह हो सकता उन्होंने दुःख को संयम से आत्मसात करना सीख लिया होगा..शेक्सपियर
6. मौका मिलना सूर्य उदय के समान है अगर आप देर से जागरुक होते है तो हो सकता है आप उसे खो दे। ..विलियम आर्थर
7. सत्य है, जब हम सफल होते है तो शायद बहुत से लोग हमें प्रेरणा के लायक समझे परन्तु जब कभी हम असफलता के अन्धकार में प्रवेश करते है तो हमारी छाया भी हमारा साथ नहीं निभाती। हिटलर
8. खुदरा रेजगी सदा शोर करती है, परन्तु नोट सदा शांत रहते है, यानी जब हमारा सफलताओं मूल्य बढ़ता है, तो हम गंभीर हो जाते है ..शेक्सपियर
9. मैदान में हारा हुआ इंसान फिर से जीत सकता है पर मन से हारा इंसान कभी नहीं जीत सकता।
लेख समापन से पहले अर्नाल्ड श्र्वाजनगेर के इस कथन पर ध्यान देना सही होगा कि ताकत जीतने से नही आती, आपके संघर्ष आपकी ताकत पैदा करते है। जब आप मुसीबतों से गुजरते है और हार नहीं मानते है, वही ताकत है, शायद वह आपके जीवन की सारगर्भिता भी हो। सारांश में जीवन में सही मौलिक परिवर्तन अपनाइये, जीवन आपसे प्यार करेगा। लेखक: कमल भंसाली

🌸नये वर्ष के नये संकल्प🌸 भाग 2 🌲संकल्प अनुसन्धान🌲 ✍कमल भंसाली

दोस्तों, नये साल की दस्तक हमारे जीवन में नई ऊर्जा की चाह पैदा करती है। हमें कुछ पुरानी गलत आदतों से दूर होने को प्रेरित करती है । तीन मुख्य संकल्प क्षेत्र पर हम यहां चर्चा अवश्य करेंगे जो आज के आर्थिक, सामाजिक और व्यवहारिक युग के वातावरण में हमें सक्षम बनाते है। हमारे दैनिक जीवन हम में जितने भी छोटे छोटे संकल्प करते है, उनकी धुरी इन तीन क्षेत्रों के अंतर्गत ही ज्यादा घूमती है। आइये, जाने उनके बारे में विस्तार से।

1. स्वास्थय:-

समय का सदपुयोग करना आज की सबसे बड़ी समस्या हमारे जीवन चिंतन की है, आज साधनों के अति प्रयोग से जीवन काफी निराश हो रहा है। पिछले कुछ दसक से आपसी मानवीय सम्बंधों में भावुकता भरे प्रेम के अदृश्य होने से जीवन की अनुरुदनि घुटन बढ़ रही है। मोबाइल और डिजिटल क्रान्ति की तेजी से जीवन को इतना भी समय नहीं मिल रहा कि वो जिस्म और दिमाग की व्यथा भरी समस्याओं पर सही चेतना से अवलोकन कर सके। इसका सबसे बड़ा प्रभाव इन्सान के दिमाग पर पड़ रहा और जीवन गलत आदतों का शिकार हो रहा है। पुराने समय में जहां शारीरिक श्रम जीवन को स्वस्थ रखता, आज दिमागी और मानसिक मेहनत से आँखों को सबसे ज्यादा कृत्रिम रोशनी सहन करनी पड़ती है । स्वास्थ्य तनाव तथा थकावट का अनुभव हमारा दैनिक जीवन ज्यादा कर रहा है। नये साल में हमें स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है। हम चाहेंगे, नया साल हमारे स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ ऊर्जात्मक सवेरा लाये और वो तभी संभव हो सकता है जब हम सिर्फ “Early Riser” ही न बने अपितु कुछ समय सुबह की अनुपम सैर, योग और सेवा कार्य आदि में लगाये। हमार सारे संकल्प इस सिद्धांत के तहत होना चाहिए ” पहला सुख निरोगी काया” । जीवन तभी सब चाहित साधन भोग सकता है, जब वो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सम्पन्न रहे। हम आज मिलावट के युग में तो रह ही रहे है, पर साथ में विदेशी और शीघ्र बनने वाले व्यंजनों के शौकीन भी हो गये है, जो हमारी पाचनशक्ति के लिए एक खतरनाक नई चूनोती है। स्वास्थ्य और स्वाद दोनों का सन्तुलन बनाये रखने का अगर नये साल में सही प्रयास हो तो साल भर की स्वास्थ्य चिंताए काफी कम हो सकती है।
अतः नया साल का प्रथम संकल्प स्वास्थ्य के लिए स्वास्थ्य कारी हो यह चाहत किसी और की नहीं हमारे प्रिय जीवन की है, समझने की बात है। बाकी जीवन को जब तक सांस सही मिलती रही तब तक वो मजबूरी से भी जी लेगा, अपना यह कर्तव्य अच्छी तरह से समझता है। हम न समझे, तो क्या ?

2. आर्थिक मजबूती:-

आज अर्थ का दर्द ही संसार में ज्यादा फैला है, यह दर्द भी विचित्र होता है, कहीं इसकी बढ़ोतरी से लोग परेशान है तो कहीं इसकी कमी से । आज साधन इजाद करने वाला इंसान उसका गुलाम हो चूका है। कृत्रिम शारीरिक सुख के अधीन हो मानव अर्थ का दास बन चूका है। इसका जाल भी इतना मजबूत है कि साधारण व्यक्तित्व वाला इन्सान जिंदगी भर असन्तुष्टि के कारण तनाव ग्रस्त हो जाता है। हर नये वर्ष मे इसके प्रति हमारी चेतना एक सन्तुलित नीति तय करने का अनुरोध करती है। इस नीति में प्रमुख तत्व सिर्फ संयम ही रहे तो जीवन जरूरतमय अर्थ की ही कामना करेगा तथा इसके अनुसार अनुपालन से मितव्यता का महत्व हमारे जीवन को सदाबाहर स्वस्थ महक से प्रफुलित रखेगा। दोस्तों, गुजारिस है, आप अपने आनेवाले साल को बेहतर बनाना चाहते है तो इस सिद्धांत पर गौर कीजियेगा ” Money saved is money earned” । आज क्रेडिट कार्ड, बैंक व आपसी ऋण एक बिमारी बन कर हमें गलत पथ का दावेदार बनाने की निरन्तर कोशिश करे उससे पहले हमें इनके प्रति एक संयमित दिशा निर्देश तालिका बना लेनी चाहिए। जीवन को सुख और शांतिमय बनाना है तो ये स्वीकार करना सही होगा, ” जितनी बड़ी चदर उतना ही पैर फैलाना”। समझने की बात है, ज्यादा चिंताए हमें शीघ्र ही चिता का रास्ता दिखा सकती है । आनेवाले साल से पहले संयमित जीवन और बचत के महत्व के संकल्प अपना कर हम जीवन को सार्थकता और मजबूती दे सकते है। यह बात भी हमें ध्यान रखनी होगी कि हमारे नये संकल्पों में जरूरी अर्थ उपार्जन के प्रति नकारत्मक्ता कभी नहीं होनी चाहिये, संयम और मितव्यता कभी ऐसी सलाह नहीं देती। आज का आर्थिक दौर में कमाने के साधनों की कोई कमी नहीं है, वैसे ही अर्थ खोने के खतरे भी बढ़ रहें है, दोनों ही परिस्थितयों के प्रति जागरूक रहना सही होगा। लालच, जुआ, सट्टा, अति विश्वास, झूठी विलासिता और भी नुकसान के तत्वों से बचना हमारे लिए बेहतर होगा। शेयर बाजार के अच्छे निवेशक बने पर नकली सौदो के जुआरी नहीं। अपनी मासिक बजट योजना को उचित मॉर्गदर्शन दीजिये। आजकल बचत के सुरक्षित हजारों तरह के उत्पादन बाजार में आ रहे है, अध्ययन कर, ज्ञान बढ़ा कर, जानकारों के साथ विचार विमर्श कर हम अपनी तनाव रहित पूंजी का निवेश इनमें कर बढ़ोतरी करे तो शायद नया साल हमें एक सुनहरे भविष्य से सज कर हमारे जीवन को सुख और सम्पन्नता का अहसास दे सके।

3. समय और कर्म :

कर्म इंसान की सकारत्मक ऊर्जा तैयारी करता है और समय का सदुपयोग जीवन के प्रति स्वस्थ आस्था प्रदान करता है, ऐसा जीवन शास्त्र से सम्बंधित जानकारी रखनेवाले लोग अच्छी तरह से जानते है। आज आदमी की कीमत उसका कार्य तय करता है। कर्मशील इंसान जीवन में इसकी भूमिका को भूलता नहीं और शारीरिक स्वास्थ्य की अनुकूलता तक अपने चुने हुए व्यवसाय, नौकरी या अन्य तरह के कामों में जीवन को उलझाये रखता है, इसका कारण समय के साथ तालमेल बढ़ाना । जीवन में निराश के आगमन का प्रथम कारण ही है, समय का उपयोग न कर, खाली रहकर वक्त नष्ट करना। इंतजार ही एक ऐसा तत्व है जिसको ज्यादा सहन करना असहज होता है, निराश जीवन इसका जल्दी शिकार होता है। नये साल के लिए तय किये संकल्पों को योजनामय करने के लिए समय और कर्म दोनों ही महत्व रखते है ।हमें यह जानकर ही आगे बढ़ना होगा कि शारीरिक श्रम और दिमागी काम का आपसी संतुलन रहने से समय की भी कीमत बढ़ जाती है। हम जीवन के अच्छे और खराब क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्व व सन्तुलन कायम रख सकने में सफल भी हो सकते है। सवाल उठता है, कैसे जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए हम समय का प्रयोग करे ? इस सन्दर्भ में दो तथ्य हमारा साथ निभा सकते है वो है शारीरिक चेतना और आत्मिक ज्ञान, फर्ज बन जाता है हमारा हम आलस्य और झूठ से इनको दूर रखे।

हर दिन की उपयोगिता को समझकर जीवन समर्थित कार्य को समय देने के बाद भी कुछ समय जो बचे, उसमें सुबह की शुद्ध वातावरण की प्रकृतिमय सैर, योग, ध्यान को उचित स्थान देना सही होगा। साप्ताहिक समय में अच्छा साहित्य अध्ययन, अपने पसन्दीदा मन को खुश रखने वाले कार्य मसलन दोस्तों और अपनों के साथ मनोरंजन देने वाले प्रोग्रामों में सम्मलित होना, जिससे दैनिक तनावों से राहत मिले। साल में एक बार अपने पसन्दीदा पर्यटन के लिए सोचना अच्छा संकल्प कहा जा सकता है। आशावादी परिणाम प्राप्त करने के लिए हमें सी.बी.एडवर्ड के इस कथन को ध्यान से पढ़ना होगा, ” Insight on getting the very best out of what you have to do. Be positive in your attitude. Merely negative cricism never got anyone anywhere. Moaning (कराहना) groaning (दुःखी होकर कराहना) makes work ten time harder. It is not only job you are doing makes life good. It is the spirit you put in it. ध्यान देकर अगर हम सोचे हम स्वयं के लिए भी नहीं दूसरों के लिये भी उतने ही महत्वपूर्ण बन सकते है, जब तक हम कर्म की सही मीमांसा समझते है। वैसे भी गीता के इस श्लोक से भी जीवन में कर्म का महत्व स्वयं ही समझ में आ जाता है।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि ”

सीधे शब्दों में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संसार के हर प्राणी को ये ज्ञान प्रदान किया है ” तेरा कर्म में ही अधिकार है ज्ञान निष्ठा में नहीं । कर्ममार्ग में कर्म करते तेरा किसी भी अवस्था में कर्मफल की इच्छा नहीं होनी चाहिये न ही तू कर्मफल का हेतु बन और तेरी अकर्म में भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये”।

समय के अनुसार किये अच्छे कर्म सफलता और असफलता दोनों ही अवस्था में सन्तोष दायक जीवन को गतिमय रखते है। आनेवाले साल की सुगमता भी परिवर्तन पर निर्भर होती है, तय हमें करना होगा परिवर्तन की शुरुआत कब और उसकी दिशा किस और होगी ! *** क्रमश…..

लेखक: कमल भंसाली

🕟 वक्त का जैविक “अर्थ”💰कमल भंसाली✒

दोस्तों, “वक्त” या “समय ” शायद संसार का पहला आश्चर्य है, जो अपनी एक ही लय में चलता है, फिर भी, संसार में हर परिवर्तन का जिम्मेदार माना जाता है। वक्त की यह जादूगिरि काफी कुछ सोचने पर मजबूर करती है, आखिर वक्त कि इस कलाकारी का मानव जीवन पर इतना गहरा प्रभाव क्यों है। मानव आखिर वक्त से डरता क्यों है, ? खराब वक्त के नाम से सहम क्यों जाता है ? क्यों वो आखिर अपने कार्यो कलापों के परिणामों के लिए वक्त पर निर्भर रहता है ?, सवाल और भी कई हो सकते है पर जबाब एक ही दिया जा सकता है, कि हम माने या नही, वक्त संसार का राजा है, एक छत्र इस सृष्टि पर राज कर रहा है, और अंत तक करता रहेगा, बिना किसी विरोध के । सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में शायद वक्त का निर्माण प्रथम हुआ, ऐसा माना जा सकता है, क्योंकि हर तत्व की उपयोगिता का निर्णय वक्त के द्वारा कराया जाता है। सृष्टि के निर्माण में वक्त की भूमिका को दो तत्वों के अंतर्गत स्वीकार किया जा सकता है। दोनों ही तत्वों को हम साकारत्मक्ता और नकारत्मक्ता के नाम से पहचानते है, इन के अंतर्गत ही कर्मफल का निर्माण किया गया, यह एक विश्लेषण के अंतर्गत ही समझना होगा, क्योंकि किसी भी जीवन सम्बन्धी तत्व निर्माण को जानना हमारे वश में नहीं है। इसका एक ही कारण है, सृष्टि निर्माण हमारी देन नहीं, अपितु हम उसका एक अंश मात्र है। कोई हमारी भी भूमिका होगी, जिसके कारण अभी हम यहां है। पर यह तय किया जा सकता है, हम अपने जीवन में वक्त से बंधे है, और उसकी आज्ञा अनुसार ही चलने में समझदारी होगी। वक्त को हम यहां जीवन निर्माण और आत्मिक निर्माण के तहत ही समझने की कोशिश करे, तो शायद हमारा जीवन कुछ मूल्यांकित हो, विशिष्ठ नहीं, तो कम से कम सार्थकता प्रदान करने लायक हो जाए। इन्हीं सन्दर्भों में हम वक्त से प्रभावित अपने जीवन को एक सही दिशा की ओर मोड़ने की चेस्टा कर सकते है, अगर हम किसी दिशा से भ्रमित जीवन जी रहे है। चलिए आगे बढ़कर वक्त की गुणवत्ता की हल्की तलाश करते है, पूर्ण तलाश की शायद हमारी क्षमता न हों।

सबसे पहले हम अपने ही जीवन के बारे में थोड़ी सी चर्चा कर लेते है। आखिर जीवन क्या है ? सवाल सीधा है, सही उत्तर देना शायद कठिन हो पर इतना जरुर समझते है, “स्पंदन” जीवन की कसौटी है। इसके अंतर्गत वो हर वस्तु आ जाती है, जिसमे जीवन है, मानव, पशु, प्रकृति सभी वो शामिल है, जिनमे स्पंदन हो। जिसमे स्पंदन हो उसे जीवित माना जाता है, स्पंदन अगर चला जाता है, या नहीं है, तो उसे निर्जीव के नाम से पुकारा जाता है। सृष्टि का निर्माण सजीव तत्व से किया गया, इसलिए स्पंदन का होना न होना सजीव, निर्जीव को परिभाषित करता है।

सभी प्राणी अपना जीवन जीते है, और वक्त के अनुरुप जीवन जीना शायद उनकी समझदारी है। हम यहां मानव जीवन में वक्त की भूमिका तलाश रहे, अतः हमारा सारा ध्यान अपने जीवन को वक्त के अनुसार खुशमय बनाना हीं होना चाहिए। सबसे पहले हम इस बात को स्वीकार कर लेते है, कि वक्त की लय साँसों के साथ ही चलना होता है। इसलिए वक्त का साथ हमारे लिए अमृतमय है, अतः वक्त को मान सम्मान देना हमारी जिम्मेदारी बन सकती है। वक्त के समय, क्षण, पल कुछ इसके अतिरिक्त सुनहरे नाम है, इन्हीं नामों के साथ हम जीवन की सफलताओं और असफलताओं में इसकी भूमिका की चर्चा करते रहते है। इंग्लिश में लोग TIME के नाम से ज्यादातर इसे परिभाषित करते है।

चूँकि, वक्त से जीवन अपनी पूर्णता की सीमा रेखा तैयार करवाता है, अतः हमारी ख़ुशी और उम्मीदों के लिए उसके प्रति हमारा पूर्ण समर्पण होना आवश्यक हो जाता है। सही होगा, उसका सही उपयोग हम जीवन को मान्यता दिलाने के लिए बड़ी बुद्धिमानी से करे। इसकी ऊर्जा आशा और निराशा दोनों का निर्माण कर सकती है। पल पल से बना समय अपनी गुणवत्ता के प्रति अति जागरुक होता है। किसी एक खेल को ही उदाहरण के तौर पर लीजिये, उसमे हर क्षण वो अपनी ऊर्जा का दान करता है, और खेल अपने नियमों के अनुसार परिणाम सहित तय सीमा के अंतर्गत मंजिल प्राप्त कर लेता है। यहां वक्त की भूमिका पूर्णता तक है। कुछ इस तरह भी हमारा जीवन अनगनित घटनाओं से अपना विस्तृत रुप धारण करता है। यहां शेक्सपियर के उन शब्दों को याद करना सही होगा जिसमें उन्होंने वक्त के साथ मानव भूमिका को परिभाषित करने की सही कौशिश की, वो कहते है ” हम सभी प्राणी संसार रूपी रंग मच के कलाकार है, उसमे हमें एक निश्चित समय के लिए कई प्रकार की भूमिकाएं करनी होती है, इनके के लिए हमें आना और जाना पड़ता है।” कुछ ऐसे ही विचार मार्क्स ओरेलियस प्रकट करते है, जब वो कहते ” Time is a sort of river of passing events, and strong is its current; no sooner is a thing brought to sight than it is swept by and another takes its place, and this too will be swept away.”

हम हमारी विडम्बना ही कह सकते है, कि यह जानते हुए भी कि समय या वक्त हमारे जीवन को हर तरह से पल पल प्रभावित करता है, हम उसका सही उपयोग करने में अक्षम है। सन्दर्भों की बात करे तो हमारी हर चीज समय से प्रभावित होती है, चाहे, विचार हो, योजना, कार्य , आलोचना या और कुछ। पल के अनुसार फल का अनुमान भी बनता बिगड़ता नजर आता है। हम कई तरह से समय की चाल को बदलने की चेस्टा भी करते है, पर हकीकत में हम ही उसके अनुकूल अपना व्यवहार बदलते रहते है। सही माने तो यह हमारी विवशता है, दूसरे शब्दों में कहे तो हम “वक्त के दास” है, उसकी हर आज्ञा ही हमारा जीवन स्पंदन है। सच्चाई यही है, जो समय की लय को समझ कर वर्तमान का निर्माण करना चाहता है, वो वक्त का कभी दुरुपयोग नहीं कर सकता । कुछ लोग समय का अपमान गलत कार्य से करते है, और, कुछ देर तक उसका परिणाम अपनी ओर कर लेते है, पर वक्त का पलटा वार उनको एक ही सीख दे कर समझा देता है, मुझे बदलते देर नहीं लगती, तुमने जो महसूस किया वो यह फल या परिणाम नहीं था, परिणाम तो तुम अब भोगोगे। समय की निरन्तरता तभी तक सही रहती है, जब तक उसका ध्रुविकर्ण नहीं किया जाता। Stanford University के सेवा मुक्त प्रोफेसर फिलिप जिम्बारडो ने समय को परिदृश्य करने की चेस्टा की, अपने दस साल के अनुसन्धान के बाद उन्होंने कहा कि “समय को हम अपने व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार ही समझने की कोशिश करते है, इसलिए हमारा हर आचरण उसी रुप से प्रभावित होता है”।

चूँकि वर्तमान में हम जी रहे है, तो समय की कीमत का मूल्यांकन आज आर्थिक भाषा में करे तो समय बहुमूल्य है, एक एक पल कीमती हो गया है, परन्तु इसकी कीमत बढ़ने के साथ जीवन के बाजार में सुख, चैन, शांति, प्रेम, सत्य, भाईचारा, मान,सम्मान , इज्जत आदि तत्वों के मूल्यों में भारी गिरावट आ गई, और लेने वाले नगण्य रह गए। ये एक चिंता की बात है। जीवन की विवशता देखिये, वो साधनों की अधिकता से थका और निराश हो रहा है, उसकी प्राणदायी और प्रेमदायी जीवन जीने की क्षमता कमजोर पड़ रही है, क्योंकि साधनों के अनुरुप वक्त की अवधि नहीं बढ़ रही। सवाल उठ रहे है, आखिर हम क्या करे ? उत्तर संक्षिप्त में इतना ही हो सकता है, वक्त की पवित्रता को समझे, जिन उद्धेश्यों के लिए हमें जीवन मिला, उनमे सकारत्मक ऊर्जा की बहुतायत रहे, इसकी कोशिश होनी चाहिए। हमारी जरुरतें वक्त के अनुसार संयमित रहे, पर्यावरण की शुद्धता को वक्त के सन्दर्भ में जाने, अपनी हर अति से वक्त की लय न बिगाड़े, तो वक्त को जरुर लगेगा, कि मानवता को उसकी आज भी जरुरत है।इसका सबसे बड़ा असर ये हो सकता है, कि हम प्राकृतिक आपदाओं से जीवन को सुरक्षित रख सकते और शायद एक अच्छे भविष्य का गुलदस्ता लेकर वक्त हमारा अभिनन्दन करे। याद रखिये, Everyday is a bank account and time is our currency. No one is rich, no one is poor, we’ ve got 24 hours each—Christopher Rice……लेखक **कमल भंसाली**

जीवन चिंतन, भाग 1…सही समय, सही चिंतन….कमल भंसाली

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कहते है, “मन” तन का मन्दिर है, आस्थाओं से बनी ही मूर्ति इस में स्थापित की जाती है। कहना न होगा कि मन्दिर की प्रसिद्धि इसकी पवित्रता पर निर्भर करती है। मूर्ति के प्रति पूर्णआस्था से मानव स्वयं को विशेष बना सकता है, यह अनुभव पूर्ण आस्तिक को ही हो सकता है, और, इस पर तर्क वितर्क की कोई गुंजाइस नहीं होनी चाहिए। आस्तिक परिवर्तन में विश्वास रखता है, तथा अपनी विचारधारा में लचीला पन आवश्यकता अनुसार ला सकता है। इससे इस बात पर भी सहमत हो सकते है, कि आशावादी होना आस्तिक के लिए सहज होता है, वनिस्पत नास्तिक के। परन्तु पूर्ण नास्तिक में भी परिवर्तन की थोड़ी संभावना हो सकती है, जब उसके विचारों की सार्थकता कमजोर हो। परन्तु, हमारी आत्मा का केंद्रबिंदु “मन” शरीर की विभिन्न अवस्थाओं से काफी प्रभावित भी होता है, यह एक सहज साक्ष्य है। इसकी पुष्टि हमारे बचपन, यौवन, अधेड़ और बुढ़ापे की अवस्था के विचारों से की जा सकती है।

जीवन तो जीवन है, उसे किसी भी प्रयास से जीने के लायक तो हर प्राणी को बनाना पड़ता है, पर बात उन्हीं की दूर तक की जाती है, जो उसे विशेष ढंग से जीने की कौशिश करते है। मानव को छोड़ कर शायद ही दूसरा प्राणी सामाजिक दबाब में अपना जीवन जीता हो, अतः उनमें मानव से ज्यादा निर्भीकता और हिंसा का भाव देखा जा सकता है। इसलिए मानव मन का विश्लेषण करने के लिए मनोविज्ञान का अविष्कार किया गया। आज दुनिया जितनी बदली वो मानव मन का ही चमत्कार है। यह बात अलग हो सकती है, आखिर दुनिया आज कितनी सहज है ? ऋषि,मुनियों व जीवन विशेषज्ञ गुरुओं ने जीवन के सात्विक पक्ष पर ज्यादा ध्यान इसलिए दिया की मन की चंचलता से इंसान किसी भी प्राणी को नुकसान न पहुंचाने वाले कर्म करे, पर इस चिंतन की पूर्ण सफलता धीरे धीरे कमजोर हो रही है। अति साधनों के विकास ने मानव मन के हर क्षेत्र में अपना कब्जा करना शुरु कर दिया, और आत्मचिंतन की सारी प्रक्रियाओं से उसे उदासीन कर दिया। आज संसार का जो स्वरूप है, आकर्षक है, साधनों से, परन्तु पूर्णतया असुरक्षित सा महसूस कर रहा है। आज हम “आत्मचिंतन” की भूमिका हमारे जीवन के सन्दर्भ में करे, तो क्या हर्ज है, क्योंकि जीवन की संक्षिप्ता से इंकार करना हमारे लिए अंसभव है। जो, जीने वाले क्षणों की श्रेष्ठता तलाश लेते है, उनके लिये आत्मचिंतन की बात साधारण है।

किसी ने कहा ” जीवन क्षण भंगुर है” , ये कितना सही, कितना गलत , हमारा यहां इसको जांचने का कोई इरादा नहीं है, हम इसका भावार्थः अपनी जीवन शैली में अगर खोजे तो शायद हमे महसूस करने में सहायता होगी की “पल” “पल”से शासित जीवन ही हम जीते है। अतः हर पल जीवन अपना नया रुप प्रस्तुत करता है, हमारे विचारो और कर्म के अनुरुप, अतः कोई कहे “जीवन क्षण भंगुर है” तो काफी हद तक सही लगता है। सवाल यह भी हो सकता है, जीवन पल पल से क्यों शासित रहता है ? तो समझने की कोशिश के अंतर्गत हमें यह ध्यान में लाना होगा, शरीर जीवन के लिए जरुर बना है, परन्तु संचालन तो कोई और कर रहा है, जिसे प्रत्यक्ष में हम नहीं जानते वो कौन है, कैसा है, परन्तु उसने हर चेतन में एक ऊर्जा स्त्रोत अवधि अनुसार सबके तन में स्थापित कर दिया, उसी स्त्रोत से शरीर को स्पंदन मिलता है, उसी से चेतना। स्पंदन अपनी दैनिक जरुरत को व्यवस्था निर्देश देता है, तो चेतना कर्म करने की गति, जिससे हमारे जीवन को सार्थकता मिलती है।

प्रश्न किया जा सकता है, जीवन को इतना महत्व क्यों दिया जाय ? तो उसका उत्तर में इतना ही समझना चाहिए, जो चीज बार बार मिलनी शंकित है, उसका मूल्यांकन साधारण स्तर पर करना बुद्धिमानी की बात नहीं होगी। इस सन्दर्भ में मुझे किसी इन्सान की बनाई ये चार पंक्तिया काफी समझदार लगती है।

रोने से किसी को पाया नहीं जाता
खोने से किसी को भुलाया नही जाता
वक्त सबको मिलता है जिंदगी बदलने के लिए,
पर जिंदगी नहीं मिलती वक्त बदलने के लिए !

लिखनेवाले ने किसी भी एवज में इन पंक्तियों का सहारा लिया हो, पर जीवन की उपयोगिता की सही जानकारी का अनुभव हमें कराता है। हकीकत में जीवन में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, “वक्त”यानी “समय” यानी वही “पल”जिसका जिक्र हमने ऊपर किया। कहा भी गया है, जिसने समय को नहीं समझा, वो जीवन क्या समझेगा ? इसलिए पहला चिंतन हमारा “समय” के लिए होना चाहिए। हमारा दैनिक जीवन ही हमें हर दिन एक आयाम की तरफ अग्रसर कराता है, वो आयाम हर इंसान अपने विवेक से करता है। आयाम का सही और गलत होना, उसीके चिंतन पर निर्भर करता है। एक आयाम के कई पहलू हो सकते है, परन्तु उनमे आपसी तालमेल नहीं हो तो चिंतन उपयुक्त्त हो सकता है, चिंतन में विरोधभ्यास न हों तो उसकी निर्थकता ही सामने आती है, हम अपने अंदर के किसी भी तत्व का गलत सही का मूल्यांकन स्थापित नहीं कर सकते । समय का दुरुपयोग सही चिंतन में अपरिवक्ता के अंतर्गत ही माना जाता है। चिंतन समयनुसार समस्याओं के अनुरुप तभी सार्थकता प्रदान करता है, जब अच्छाइयों और बुराईयों की तुलना प्राणी कर सके। गलती करना उतना नुकसान नहीं करता, जितना गलत होना।

समय जीवन को गति और अवधि दोनों का बोध बड़ी मृदुलता से कराता है, और हमारे कर्म को परिणाम भी मुहैया कराता है। देखा जाय तो एक माँ की तरह व्यवहार करता है, जिससे हम समझ के साथ जीवन जीये। जब साधनों का विकास धीमा था, उस समय जीवन चिंतन करता था, झूठ क्यों बोलू ! आज जीवन चिंतन कम करता, सुविधानुसार झूठ का प्रयोग करते संकोच भी नहीं करता ? क्या समय की गति बदल गई, शायद नहीं, जिंदगी अति शिक्षित हो गई, साधनों के मामले में। साधनों की भूख से इंसान लालच के घोर अँधेरे में चिंतन के नैनों पर पटी बाँध अर्थ की दौलत खोजने में लग गया। परिणाम मानवता जीवन की ऊंचाइयों से फिसल रही है, पता नहीं किस गति से जल्द ही गर्त से गहरी खाई में समा जाए। हम समझते है, कुछ अविष्कारों से जीवन को बदल सकते है, काफी सही है, परन्तु यह भी सही है, प्रकृति सब अविष्कारों के दुष्परिणाम सहन कर लेती है, परन्तु जब वो अपना विरोध किसी भी रुप में दर्ज कराती है, तो हम दहल जाते है। भूंकप को ही लीजिये, एक सेकेंड का हमारा अनुभव हमसे क्या नहीं करा देता ? समय और प्रकृति का रिश्ता माँ- बेटा का है, माँ अपने बेटे का ज्यादा दुरुपयोग एक सीमा तक ही सहन करती है, ये समझने और चिंतन की बात है।

जीवन को सत्य से ही समझना पड़ता है, झूठ हमें छलावा ही देता है। जब तक हम उसको नहीं समझते, जिसके कारण हम इस धरती पर है, तो हम जब गौण होंगे, तो शायद कहीं और उसकी कीमत चुकानी ही है, आखिर अर्थ शास्त्र को तो हम सही ही समझते है, ना….आइये चिंतन करते है, फिर एक बार अपने जीवन को सही पथ पर वापस कैसे मोड़े ?, अगर हमने अपनी किसी कमजोरी के अंतर्गत गलत कदम किसी गलत राह की तरफ रख दिये हो, तो। सुबह का भुला शाम को अगर घर वापस आ जाये, तो उसे भूला कहां कहते है ? आखिर, हम अनूह तो नहीं है। ….क्रमश …..कमल भंसाली

चलते चलते …पढ़ लेते है, Richard Aedon का यह सन्देश… “All photos are accurate. None of them is truth”.

💆”प्रेम”💇 जीवन के संदर्भ में⛑कमल भंसाली

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आज साधनों की प्राप्ति करने का दृष्टिकोण, जीवन का जटिल हिस्सा बनता नजर आ रहा है। हम हर काम घर बैठ कर ही करना ज्यादा पसंद करने लगे है, हो सकता है, यह अभी अधूरा सत्य है, पर आनेवाले भविष्य में यह पूर्ण सत्य हो जाएगा, इसे झुठलाना मुश्किल ही होगा। हमें अब यह मानने में शायद ही कोई संकोच होना चाहिए, कि संचार के साधनों का अति तेजी से जो विकास चल रहा है, उससे हम घर बैठे हर तरह की सुविधा प्राप्त कर सकते है। मान लीजिये, हमें किसी को रुपया भेजना है, तो मोबाइल में हमारी बैंक का एप्प यह काम चन्द सैकण्ड में कर सकता है, शर्त इतनी हीं है, एकाउंट में पैसा होना चाहिए। हमें सामने वाले की प्राप्ति की स्वीकृति इसी मोबाइल के द्वारा कुछ क्षण में मिल जाती है। आज हमारे प्रधानमंत्री भी वक्त अनूसार देश को Digital India बनानें की बात करते है, सही भी है, वक्त के साथ तो दौड़ना ही पड़ेगा, अब वक्त के साथ चलने की बात में वो गति कहां ? पर चिंतन की बात यहीं से शुरु हो जाती है, क्या मानव जीवन दौड़ने के लिए है, या सुख, शान्ति के साथ निभाने के लिए है ? एक ऐसा सवाल जिसका उत्तर एक दिन सभी को अपने आप को देना पड़ता है, जब तन साधनों के अतिरेक प्रयोग से समय से पहले अस्वस्थ होकर, ढीला पड़ने लगता है। अब, इस विवेचना को नकारत्मक्ता से न लेकर, भविष्य की एक चिंता के रुप में चिंतन करने के लायक समझना होगा। आइये, आगे बढ़ने से पहले एक बार अपने आप से प्रश्न कर लेते, क्या साधनों को जीवन से इतना खेलने दिया जाय, की हम अपने अंतर्मन और आत्मा की ख़ुशी को ही भूल जाय ?

आज के दैनिक जीवन की हम अपनी समय सारिणी पर गौर करे, सुबह से शाम तक हम वही दिमागी काम ज्यादा करते है, जिससे हमे आर्थिक लाभ ज्यादा हों । देखा तो यहां तक गया है, कि काम की गुणवता से ज्यादा ध्यान काम को किसी भी तरह सम्पन्न कर , अर्थ लाभ करने में लगाया जाता है। कई बार हमारे साथ कुछ ऐसा घटता है, जब कोई काम किसी को देते या लेते है, तो मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए काम में लगने वाले समय को बढ़ा कर बताया जाता है, और उसी अनुसार परिश्रम मूल्य तय किया जाता है, पर हकीकत में काम उससे पहले ही समाप्त हों जाता है, तब ध्यान में आता है, ठगे गये, पर किससे कहे ? आखिर, कहीं न कहीं तो हम भी यही करते है। इंसानी चाह का इतना विस्तृत रुप आखिर सत्य से कितना दूर ले जाएगा, ?, इसे आत्मिक नहीं यथार्थवादी सवाल समझना होगा। अर्थ और अनर्थ की सही परिभाषा पर एक दिन फिर गौर करना ही पड़ेगा। अर्थ शास्त्र जब कालेज में पढ़ा तो उसमे एक सिद्धांत बाजार की मांग और सन्तुष्टि पर था, जिसके अनुसार ज्यों ज्यों मनुष्य किसी भी वस्तु का उपयोग करता है, उसकी तुष्टि बढ़ जाती है, और उस वस्तु की चाह धीरे धीरे कम होने लगती है। अर्थ शास्त्र का यह सिद्धांत Law of Diminishing Marginal Utility की उपयोगिता खाने पीने के समान में तो सही कही जा सकती है, क्योंकी शरीर की क्षमता को सीमितता से बांध कर मानव को धरा पर भेजा गया है, परन्तु सामजिक आर्थिक समानता में इसका उपयोग निम्न ही लगता है। किसी के पास अर्थ बढ़ने से उसकी चाह सिद्धान्त अनूसार कम होनी चाहिए थी, पर अर्थ की भूख तो इन्सान में प्राप्ति के साथ बढ़ती ही जा रही है। साधन भी मानव मन को इस सिद्धांत के विरुद्ध साक्ष्य दे रहे है। अर्थ और उपयोगिता दोनों
जीवन के हर सिद्धांत की धज्जियां उड़ा रहे है।

आखिर हम किस दिशा में अपने मानसिक और शारीरिक विकाश को ले जाना चाहते है ? क्या हम जीवन की भोगवादी संस्कृति से शुकून और चैन पा सकते है, तब तो दिशा सही लगती, परन्तु यथार्थ तो कुछ और ही तथ्य दे रहे है। आज मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या क्या यह चेतावनी नहीं दे रही, संयमित जीवन ही सारपूर्ण है, उसे अपनाकर जीने से जीवन शुद्धता और पवित्रता से पूर्ण आत्मिक और स्वस्थ शारीरिक जीवन पाया जा सकता है, न कि अति भोग और सुविधाओं से। आज यह सब बाते तथ्यपूर्ण नहीं लगती, पर समय आघात सह कर जब पलट वार करता है, तब मानवता को बेहोश होने से कौन बचाएगा, यह चिंता क्यों हमारे दिल में नहीं है ? यह एक दुःख भरी स्थिति है। आज ग्रीस यानी यूनान जहां का राजा सिकन्दर विश्व विजय के अभियान के दौरान भारत को भी जीतना चाहता था, आज आर्थिक और मानसिक पतन के द्वार पर खड़ा है। पूछा जा सकता है, पतन का कारण, पर समझने की बात है, अर्थतंत्र युग में पतन का कारण अर्थ ही होता है। अर्थ का पतन, ‘निकम्मापन’, जो साधनों के असन्तुलित प्रयोग से ही आता है।

देश ही क्यों परिवारों की भीतरी हालात का भी आज सच्चे मन से जायजा ले, तो यथार्थ जो दृश्य आज हर रोज हमारे सामने ला रहा है, वो चेतावनी है, मानव के गरिमा पूर्ण जीवन को। आज बच्चों के पास तकनीकी उपकरण माँ बाप समय से पहले उन्हें दे देते हैं, पर संस्कार और आदर की शिक्षा न वो उनसे तथा शिक्षक से पाता है, अनुशासन की बात तो समझ से परे का चिंतन ही होगा ना, अतः उसे कल्पना से बाहर की बात समझना ही ठीक रहेगा। विज्ञान की एक खूबी है, सुविधाओं के भरपूर उपहार वो मानव को देता है, परन्तु उसकी चेतनाओं को आलसी बना कर जीवन को अपने प्रति समपर्ण करा लेता है। आज विज्ञान का दास मानव है, यह तो पूर्णतयः अभी नहीं कहा जा सकता, परन्तु दिन दूर नहीं जब मानव को मानव के लिए समय नहीं बचेगा।

प्रगति इंसान की जरुरत ही नहीं उसके जीवन का सार हैं, इस तथ्य को कोई भी समझदार आदमी नकारना पसन्द नहीं कर सकता, परन्तु सन्तुलन की बात वो जरुर करेगा, जब भी उससे पूछा जाएगा। यह तो तय है, आदमी केवल शरीर के भरणपोषण के लिए नहीं जीता, उसका मन और आत्मा अपने जीवन को कुछ सार्थकता के साथ जीने की कल्पना करता है। उस के इस चिंतन की प्रगति अगर सात्विक और शांत तरीके से होती है, तो निसन्देह मानव कल्याण कारी भावनओं का मालिक बताया जा सकता है, पर अगर वो इस चिंतन में अपने आर्थिक प्रगति के चिंतन को नहीं भूलता, तो समझिये कल्याण का व्यापारिकरण आनेवाले भविष्य के लिए शुभता भी नहीं ला सकता। जीवन की सीमारेखा हर पल छोटी होती है, और भोग विलास बढ़ते है, तो आत्मकल्याण कैसे होगा ?और उसके बिना मानव जीवन को सार्थकता कैसे मिल सकेगी ?, क्योंकि अमूल्य जीवन किसी भी मूल्य से कतई दूसरी बार नहीं पाया जा सकता।

हर इंसान धर्म की कीमत भी जानता है, और अपने जीवन की भी, । किसी भी धर्म की किताब खोले, उसमे स्नेह, प्रेम, मान सम्मान और अन्य आत्मिक सुधार के तथ्य एक जैसे मिलेंगे, पर यहां भी लालच और शासन की लालसा ने पन्थों में मानव को विभक्त किया। तय तो कहीं भी नहीं है, कि अमुक धर्म का पालन करनेवाला स्वर्ग को प्रस्थान करेगा। क्या ऐसा संभव नहीं की हम अपनी आत्मिक गुणवता बढ़ाये और सही जीवन बिताएं, संयम और धैर्य से प्रेमयुक्त और स्नेहपूर्ण बने रहे। साधनों के साथ आत्मसुधार भी अगर जीवन में रहे तो निसन्देह, हम एक सही जीवन की तरफ अग्रसर हो सकते है। …..क्रमश…..कमल भंसाली

मर्म, सही दृष्टिकोण का…बेहतर जीवन शैली भाग..११..अंश..१..कमल भंसाली

आज हम बेहतर जीवन शैली का सबसे अहम सवाल, जो शायद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका व्यक्तितत्व निर्माण के दौरान निभाता है, कि हमारा नजरिया जिंदगी के प्रति क्या है ? इस पर चर्चा करते है, दोस्तों, इसे हम अपने आपसे यों भी पूछ सकते है, कि अपनी जिंदगी के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है ? तय यही है, की अभी हम जिस तरह से जी रहे, वही सत्य है। जीवन के हजारों दृष्टिकोणों का मूल्यांकन समय समय पर हमारे लिए जरूरी है, परन्तु ऐसा हम नहीं करते। जितना समय हम निर्जीव साधनों की देख रेख में लगाते है, उस से कम समय शायद हम अपना आत्म निरीक्षण में लगाते है। जीवन कोई साधारण बात नहीं है, हमारे शरीर का हर अंग अपनी निश्चित कार्य प्रणाली पर निर्भर है। हम हमारी सारी आत्मिक और शारीरिक अनभूतियों से ही, उसे आनन्द और निराशा के कई रंगों के रस का रस्वादन कराते है।

सत्य है, जीवन एक है, पर दृष्टिकोण अनेक है। यह भी तय है, नजरिया बदलता है, इंसान के जीवन का स्वरुप भी बदल जाता है। एक आम इंसान अपनी सोच और आस्था से कमजोर होते जीवन को मजबूती दिला सकता है। बड़े बड़े अविष्कारों के पीछे हमने वैज्ञानिकों के दृष्टिकोणों को बार बार बदलते सुना है, तब जाकर उन्होंने बार बार उनमे सुधार किये है। हकीकत, यही कहती है, कि हम दूसरों के गुणों और अवगुणों का अवलोकन कर लेते है, पर क्या हमनें कभी समय निकाल खुद का निरीक्षण किया, शायद ज्यादातर उत्तर नहीं में ही होगा। हम विशिष्ठता से स्नेह जरुर रखते है, पर यह नहीं जानते की उत्तमता की तलाश अपने अंदर से शुरु करनी पड़ती है। जीवन के हर एक नजरिया में लचीलापन और गंभीरता का समावेश होना जरूरी है । सिद्धांत और सत्य के लिए जीने वाले सत्यकाम आज की निरर्थक आर्थिक और आधुनिक समाज की देन नहीं हो सकता। सच, यही है, हम व्यवहारिक और राजनीति युक्त सम्बंधित समाज का हिस्सा है। इस बदले हुए परिवेश में नैतिकता की स्थिति काफी कमजोर हैं और उस पर पूर्णतिया निर्भर रहना, सांसारिक शब्दों में असफलता को बुलावा देना है। समाज के ज्ञानी सुधारकों को नैतिकता की चट्टान से फिसलते, हम सब ने देखा है।

बेहतर जीवन शैली सबसे पहले यह सुझाव देगी, कि समय काल के अनुरुप हम जीवन और उसके विचारों में सक्षमता पूर्वक परिवर्तन स्वीकार करते रहेंगे। यह भी समझने कि बात है, रीति रिवाजों के नाम पर प्रदर्शित आधुनिकता से सजे आडम्बरों को हम रोक नहीं सकते, पर वक्त की जरुरत के नाम पर उनको बढ़ावा देने से हम बचे, यही सही है। बात वही है, नजरिया समाज के प्रति बदलना होगा। आज के समाज से पहले के समाज की तुलना वर्तमान से करके जी तो सकते है, पर उस जीने में सार्थकता की कमी रहेगी। आधुनिक युग के साधनों ने जगह की दूरी जरुर कम कर दी, पर मन की दूरियां बढ़ा दी।बाहरी प्यार को इतना सुंदर बना दिया की भीतर की कालिख को देखना मुश्किल हो गया। हमें इसी धरातल पर अगर जीवन को बेहतर बनाना है, तो यथार्थ को स्वीकृति देनी ही होगी। यह भी समझने की बात है, कि सब समय सब बातें सही हो,यह जरुरी नहीं है। कुछ बातें पुराने समय की अच्छाइयाँ हो सकती है, पर आज वो बुराइयों के रुप में जानी जा सकती है।

हम पर्दा प्रथा को ही ले, कुछ समय पहले इसे संस्कारों में गिना जाता था, आज इसकी बुराइयों में पहचान करायी जाती है। समय बदलता है, तो जीवन बदलता है, परन्तु रीति रिवाजों और सामाजिक नियमों में उस अनुपात में बदलाव आने में समय लगता है। आज भारतीय समाज का बदलाव बाहर से जितना आकर्षक दीखता है, वाकई क्या ऐसा है ? यह एक अनुत्तरित जिज्ञासा ही होगी, अगर हम क्षेत्र के अनुसार इसका अनुसंधान नहीं करते। किसी भी समाज का विश्लेषण उसकी आर्थिक उन्नति की भूमिका में ही अगर किया जाय, यह एक अर्द्धसत्य हीं होगा। जीवन में अर्थ (धन)के महत्व को बेहतर जीवन शैली कभी नहीं नकारती, परन्तु उससे होने वाले नकारत्मक व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया जरुर कर सकती है, क्योंकि बिना व्यवहार कोई शैली तैयार नहीं हो सकती। अर्थ के बढ़ने से अगर जीवन को सकारत्मक चिंतन नहीं मिलता तो अर्थ बिना अर्थ ही जीवन को समाप्त कर देगा। अर्थ को अगर कर्म के साक्षेप देखा जाय तो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार चार पुरुषार्थों में एक माना गया है, बाकी तीन धर्म, काम और मोक्ष है। सही कामों से हम सीमित धन प्राप्त करते है, तो उसका मानसिक स्वास्थ्य पर स्वच्छ और सकारत्मक प्रभाव पड़ता है, जो जीवन को सही गति देता है। हमे यह चिंतन जरुर करना चाहिए की धन के प्रति हमारा नजरिया अति लालसा से तो प्रभावित तो नहीं है, ना। अगर हम कहें हां, तो शायद हम ऊपर से भव्य, भीतर से खोखला जीवन जी रहे है। इससे न तो अपना भला होगा, न ही परिवार और समाज का। जिंदगी से अगर कभी अगर हम बात करे तो शायद वो सबसे पहले यहीं कहेगी की ” हां, मैं शांत और सही ढंग से जीना चाहूंगी, क्योंकि मैं बार बार धरा पर विभिन्न रुप में वापस नहीं आना चाहूंगी”।

समय आ गया है, चिंतन को बदलने का, अति साधनों के प्रयोग से शरीर और मन की अवस्था और आयु दोनों ही कम होती है, अतः हम धन अर्जन के साथ प्रेम की भावनाओं में थोड़ी पवित्रता अपना ले। कभी कभी लोग कहते है की पैसा प्रेम का दुश्मन है, बेहतर जीवन जीने वाले शायद ही कभी इस तथ्य को स्वीकार करेंगे। आज हकीकत यहीं है, पैसा है, तो प्यार है, नहीं तो आदमी बेकार है। अतः हम अगर अपने व्यक्तित्व के उच्चतम विकास में विश्वास रखते है, तो हमे सहर्ष कर्म पथ पर सही और नेक आय अर्जित अपनी संयमित जरूरतों के लिए जरुर करनी चाहिए, पर दूसरे आत्मिक विकास गुणों की बढ़ोतरी का प्रयास भी कम नहीं करना चाहिए। इस तरह जीवन दृष्टिकोणों को सही आयाम के अनुसार बदलते रहना चाहिए,।सिद्धान्तों के नाम पर हमारा अपना अड़ियल रुख जीवन को गलत दिशा नहीं दे, यह ध्यान रखकर अपने सही सिद्धांतों को भी आदर हम दे।

हमारा चिंतन बहुत सारी धारणाये जगह जगह से ग्रहण करता है, लाजमी है, सब चिंतन सही परिस्थितिया निर्मण नहीं करे। परन्तु, यह भी तय है, बहुत में से ही कुछ का सही उपयोग किया जा सकता। C.S. LEWIS ने तभी तो अपनी पुस्तक ..That Hideouts Strength में लिखते है, ” There are a dozen views about everything until you know the answer. Then there’s never more than one.”

सच तो यह भी है, कि संघर्ष में हमे अपने सही दृष्टिकोण को कभी भी घबराकर नहीं छोड़ना चाहिए कुछ ऐसा Christian D Larson कहते है कि ” so long as the man with ambition is a failure, the world will tell him to tell him to let go of his ideal, but when his ambition is realized, the world will praise him for the persistence and the determination that he manifested during his dark hours, and everybody will point to his life as an example for coming generation. This is invariably the rule.Therefore pay no attention to what the world says when you are down.Be determined to get up, to reach the highest goal you have in view, and you will.”

ध्यान देने और मनन करे हम, की धैर्य सही दृष्टिकोण की उच्चित और न्याय संगत परीक्षा है, प्रकृति का नियम यही है, जो सही है, वो ही बहुमूल्य है।…..क्रमश ……कमल भंसाली

कमल भंसाली

दैनिक दिनचर्या (समय का सही उपयोग)

“समय” शब्द कितना सीधा सादा, परन्तु कितना महत्वकांक्षी अपने पल पल की कीमत मांगता है | कहता ही रहता है, कि मेरा उपयोग करो, नहीं तो मैं वापस नहीं आने वाला | सच भी यही है, इसका सही उपयोग ही इसकी ‘कीमत’ है |

आज से पहले समय की कमी की चर्चा शायद लोग कम करते थे, क्यों की आर्थिक जरूरतें कम थी, हालांकि, साधनों को विकसित करने के लिए भी उनके पास जरूरत के ज्ञान का अभाव नहीं था,परन्तु हाथ से साधन विकसित करने में समय लगता था|
आज मशीनों को मशीन बनाती है, आदमी तो सिर्फ दिमाग लगाता है | सच भी यही है की “आज आदमी की नहीं उसके दिमाग की कीमत है”|
समय की कीमत जब से इन्सान ने पहचाननी शुरु की तब से वो कहने लगा ” Time is money, Time is precious ,
सही भी है | पंडित जवाहरलाल नेहरु ने लोगों को समय की पहचान देने के लिये ” आराम हराम है” का नारा दिया |
आज समय के प्रति चेतना बढ़ गई और प्राय: हम लोग़ कहते ही रहते की “समय नहीं मिला” या ” अभी मेरे पास समय नहीं हैं” | पर वास्तिवकता मे ऐसे कहने वालों की कहीं अपनी कमजोरी तो नहीं ? यह चिन्तन की बात है, आज हम “समय व्यवस्था” के बारे में चर्चा करते है |

सबसे पहले हम ‘समय’ की कमी के जो प्रमुख कारण हो सकते, उन्हें ही तलाशते है | सबसे पहले हमारी अपनी दिनचर्या को ही क्यों न ले, क्योंकि समय का सदुपयोग या दुरुपयोग करने के लिए हमारे पास एक दिन में चौबीस घंटे होते है और एक साल में तीन सौ पैसंठ दिन तथा हमारे पूरे जीवन काल में (अगर एक सौ वर्ष की जिन्दगी माने तों)मात्र छत्तीस हजार पांच सौ दिन यानि आठ लाख छिन्त्र हजार घंटे, सिर्फ जीने के लीये | मान लेते है कुछ समय के लिए की हम इतना ही जीयेंगे, हालांकि कोई बिड़ला ही इस मुकाम तक पंहुचता है, हो सकता है, उनकी दिनचर्या और उम्र की रेखा मजबूत होती होगी | हाँ, तो हमें एक दिन में कमसे कम आठ घंटे सोने के बाद देने होंगे क्योंकि एक स्वस्थ आदमी के लिए इतना समय सोना जरूरी है | नित्यकर्म,सोना, खाना आदि के लिए दो घंटे तो दिन भर में, मेरे हिसाब से लग जायेंगे | यहां, अगर हम और दुरुपयोग किया समय नहीं गिने तो भी पूरे जीवन काल में हमारे पास बचते हैं, सिर्फ पांच लाख ग्यारह हजार घंटे यानी लगभग इक्कीस हजार दो सौ एकानवे दिन, कितने गरीब है, हम समय के मामले में, हालांकि इतने कम समय में हमारी चाहतें करोड़ों अरबों रुपयों की होती है |

यह जरूरी नहीं था, मेरे लिए की इस तरह से इनको गिनुं पर दिनचर्या की कीमत समझनी उतनी ही जरूरी लगी मुझे जितनी बाजार जाते समय अपने बटुए की | “समय”आज तक सभी के लिए अनमोल(बिना किसी मूल्य का )होता इसलिए इसके प्रति लापरवाही चलती परन्तु अब समय की कीमत तय हो गई, और जो भी हमें अपनी सेवायें देता वो उसकी कीमत जरुर वसूलता है | सच यही है, की “अर्थ”ने “समय” को कीमती बना दिया |

दोस्तों, क्या अब भी हमें अपनी दैनिक दिनचर्या की कीमत नहीं समझनी चाहिये ? क्या हमें सिर्फ आर्थिक उन्नति के हिसाब से अपनी दिनचर्या को बनानी चाहीये ? क्या हमारी दिनचर्या बिना समय के मूल्यांकन रहित होनी चाहिये ?
कई ऐसे महत्वपूर्ण प्रश्न हमें अपने आप से पूछने है, और कम समय में जीवन कैसे बेहतर बिताये, इस पर एक चिन्तन भरी नजर डालनी चाहीये |

सुबह उठना धर्म के अनुसार सही माना जाता है, सूर्य नमस्कार की प्रक्रिया योग भी स्वीकार करता हैं तथा विज्ञान भी मानता है, की सुबह की प्रथम धूप स्वास्थ्य के लिए खासकर चमड़ी के लिए लाभकारी है | कहते भी है, ‘Early riser is early gainer’ , जो लोग सुबह का सद उपयोग स्वास्थ्य तथा आत्मा के लिए करते है, उनके शरीर की ऊर्जा उनसे बेहतर होती, जो देरी से सोने और देरी से जागने के आदि हो जाते है | मुझे याद है जब मै स्कूल में पढ़ता, तो गुरूजी दिन भर का कार्य कर्म की एक समय सारिणी बना कर देते | उनका यही कहना था “अच्छी शुरुवात ही अच्छा परिणाम ला सकती है” |आज हम जो समय की कमी की बात कर रहे, वो कहीं हमारी समय व्यवस्था तकनीक की कमजोरी तो नहीं, ये स्वंय विवेचना की बात है | किसी लेखक ने कहा भी है “आपकी मंजिल की दुरी, जितनी आपकी अपनी योजना अधूरी,” विवेचना की बात है |
हमारा मकसद विवेचना का कदापि यह नहीं है की जिन्दगी बिना समय का ध्यान रखे नहीं गुजार सकते | हमारा मकसद जीवन को तय समय में बेहतर ढंग से सजाना होता है | जिन्दगी में सब तरह के रंग लाने तो हमें अपना नजरिया
समय के प्रति सकारत्मक चिन्तन से ही करना होगा | हमें जो चौबिस घंटे मिले उसमे धर्म, कर्म, परिवार, मानवता सभी का ध्यान रखकर ही बिताना होगा | तभी हम कह सकते है समय कितना ही कम क्यों न हो आज तो मै भरपूर जिया हूँ |
समय में दिन रात का महत्व कम नहीं आँका जाना चाहिए | रात को प्रकृति ने बड़ी सूक्ष्मता के साथ कोमलता से संजों कर बनाया है, उसमे आनन्द, आराम तथा शांति का समावेश किया | दिन में कर्म और दर्शन के हिसाब से मानव को उसका इस दुनिया में अपना महत्व तय करने के लिए समय दिया गया हैं |
आशा है, अर्थ तन्त्र के विकास तथा विज्ञान के प्रकाश के साथ हम अपनी दिनचर्या का संतुलन परिवार और मानव
प्रेम के आपसी सम्बन्धों की गरिमा अनुकूल ही करेंगे | समय की सीमा बढ़ाना हमारे लिये सभंव न हों पर उसके अंतर्गत ही हम भरपूर जीने की कोशिश अपनी पवित्र भावनाओं और सही कर्म के सानिध्य में जरुर कर सकते है |

समय न खराब होता, न ही अच्छा…हमारी सफलता और असफलता से उसका कोई लेना देना नहीं, वो तो निरंतर बहने
वाली स्वच्छ नदी के प्रवाह की तरह है | उसका सही उपयोग ही हमारे जीवन का सही मूल्याकंन है | पलों में बंटकर भी “समय”अपनी सार्थकता का बोध कराता है |

अगर हमने, समय सारिणी या दैनिक कार्यक्रम बनाने का निश्चय किया या बनाते है, तो सुबह में कुछ समय अपनें इष्ट या भगवान की प्रार्थना का उसमे जरुर रखना चाहिए | एक आत्मविश्वास और भरी शुरुआत हो सकती है, हमारे दिन की |
एक प्रार्थना जो बचपन से आज तक पसंद है, हमारे दैनिक जीवन को सकारत्मक ऊर्जा प्रदान कर सकती है, शायद हम सभी जानते है |
“ॐ”
त्वमेव माता च पिता त्वमेव |
त्वमेव बन्धुश्च च सखा त्वमेव |
त्वमेव विद्या द्रविणम् त्वमेव |
त्वमेव सर्वम् मम देव देव ||

चलते चलते ….”काल करे सो आज कर, आज करे सो अब | पल में प्रलय होगी, बहुरी करेगा कब” |

कमल भंसाली