😱अंतिम कविता 😱 रिश्तों के संदर्भ में 😭मुक्तक के रुप में 😲कमल भंसाली

गम इतने है कि किस किस किस को याद करुं
जख्म खाये दिल ने इतने किस पर मलहम करुं
गैर भी इतना दर्द नहीं देते अपनों की क्या बात करुं
फूल जब कांटे बन जाये तो जीने की क्या बात करुं

हर गम इतना आसान नहीं कि उसका बयान करुं
वफ़ा की कीमत होती बेवफाई पर क्यों ध्यान करुं
जीने की कई वजह है तो उम्र की क्यों गिनती करुं जहर पीना आसान तो अमृत पर क्या विश्वास करुं

कल के सपनों की आज हक़ीक़त कुछ और है
बुरे समय में हर रिश्ते की दीवार बहुत कमजोर है
अंतिम समय में हर सादा पन्ना भी शंकित दागदार है
कुछ नहीं बचा अब सिर्फ अंतिम सांस का इंतजार है

दोस्तों, हर गम का अपना इतिहास है कैसे बयां करुं
अपनों के दिये सरबती गम भारी कैसे उन्हें कम करुं
बोझिल सी मुस्कराहट कैसे दर्पण पर विश्वास करुं
है,खुदा इस बन्दे को समझा कैसे अपना उद्धार करुं

माना अंतिम कविता बड़ी बेरुखी दे देती
पर अंदर के छिपे दर्द को शुकुन भी देती
चंद क्षण ही सही कुछ तो सही सा गुजरा
दर्द कुछ अंदर भी रहा पर सत्य से निखरा

अपने सपने जब पराये नयनों में बस जाते
तो गम के अहसास नासूर बन दिल में दुखते
रिश्तों के धागे को चूर कर स्वयं भी बिखर जाते
अनुभव की दुकान में बिन मूल्य ही बिक जाते

चलो हकीकत यही स्वीकार करने को कहती
जिंदगी अपनों के रहम से नहीं स्वयं ही चलती
अब गम नहीं सताते, दर्द की दुकान नहीं लगती
समझ गई जिंदगी, जीने की भी कोई कला होती

😃मंजिल की खुशबू 💆✍ कमल भंसाली

सपनें हजारों देखे तुमने प्यारी जिंदगी
ख्याल भी बहुत आते तुम्हें प्यारी जिंदगी
समझ जरा हर आहट को आना नहीं कहते
दूर के ढोल तो सदा योंही सुहाने लगते
सपने सच नहीं होते, सब ख्याल अपने नहीं होते

आ जरा
बैठ मेरे पास
दे, अपना हाथ
अब समझ जरा
जीने का राज गहरा
मेहमानी अंश हम में है भरा
समझ ज्यादा सुविधाओं का खतरा
तन मन जिसने बनाया हमारा
वो रखता सारा हिसाब तुम्हारा

हर कोई, किसी का साथ नहीं निभाता
हर दीप पथ को आलोकित नहीं करता
तुम निहार, सबको सबका एक ही यथार्थ
इस जहां का दस्तूर प्यार में भी होता स्वार्थ

हर क्षण, यह समझाता
कर्म ही सच्चा दोस्त
हर, हकीकत में साथ निभाता
फल कुछ भी मिले
स्वीकार दिल से करता
नये आयामों से उसे सजाता
फिर, हमसफ़र बन साथ सदा निभाता
तेरी चाही मंजिल तक तुम्हें पंहुचाता

न गम कर न पाने का
न मायूस हो
किसी के बेगानेपन का
आगे तेरी, प्यारी मंजिल
कर रहीं, इंतजार तेरे आने का
आ ले चलता, उस राह पर
जहां अपनी मंजिल से
मिलकर, हर कोई मुस्कराता
अपने होने के अहसास को
नन्हीं आशा की बूंदों से खुशनुमां बनाता
हर ख्याल, हर सपना
जिसके आलिंगन को तरसता…रचियता✍कमल भंसाली

🔴विशिष्ट🔴कमल भंसाली🔘

image

बिखरी मंजिले
टूटे सपने
अक्सर मुझे छेड़ते
कहते रहते
आओ हमें
जरा सा भी छू लो

मैं बेदम सा सिपाही
इधर उधर दौड़ता
पर अपनी ही
कमजोरी की
सड़ी गली आदतों की
जंजीरे नहीं तोड़ पाता
निरस्त हो
उनकी और ही झांकता

देख मेरी
मायूसियों की फितरत
फिर भी
उनका स्वभाव नहीं बदलता
आज भी
वो उकसाते
सच मानिए
मेरे पीछे
वैसे ही दौड़ते

गलत न समझिये
मेरी इस हरकत को
उनको
अपनी गिरफ्त में लेना
आज भी
मैं अपना धर्म समझता
नौकरी जिसकी
कर रहा
नमक उसी का
अंदर से बोलता

कर्तव्य की वेदी पर
शहीद होना ही
अपना धर्म है
इतनी सी बात
मैं सही समझता
शपथ मेरी
मुझे समझाती
जो नहीं थकता
प्रयासित रहता
एक दिन
बिखरे सपने समेटता

हर मंजिल को
पकड़ कर
नई राह तलाशता
उन्हीं राहों में
उन्हें खड़ाकर
विशिष्ट कहलाता …..
रचियता….कमल भंसाली

₹₹** पहचान**₹₹ कमल भंसाली

image

वक्त न बदला, मैं ही बदल गया
कल तक सब के साथ ही चला
आज अकेला ही राही रह गया
पथ मेरा, कितना खुदगर्ज हो गया

कल तक जो अपनेपन का दंभ भरते
मेरे साथ ही अपने हर कदम बढ़ाते
नाज था उन्हें मुझपर , हमराही कहते
आज वही चेहरे, मुझे भीड़ समझते

छोटी सी “अर्थ” की एक हल्की बून्द
रिश्तों की परिभाषा का सच समझाती
भ्रमित नीर से निपजी सम्बंधों की खेती
क्यों जिंदगी, बेवजह अपनी पीठ पर ढ़ोती

कल के लिए, नभ् को मैंने कितना संवारा
फिर भी आज, डूब गया मेरा हर सितारा
देखो, भाग्य का खेल होता कितना गहरा
अपनों से ही मन को नहीं मिलता सहारा

कहने को सब है, आज भी मेरे अपने
पर दिल नहीं देखता, अब उनके सपने
उनकी निगाहों में शक ही झिलमिलाता
प्यार तो अब उनके बहानों में बह जाता

सच तो यह है, कोई किसी का नहीं होता
कपड़े उतारों, तो हर इंसान नंगा ही होता
जीवन एक रंग का सदाबहार सपना नहीं
दूसरों की मजबूरी पर हंसना गुनाह नहीं

मेरी यह कविता, नहीं एक स्वस्थ सन्देश ही समझो
जीवन में अर्थ के अनर्थ की जहरीली संभावना समझो
कल तक जिस “कमल” के फूल ने सबको महकाया
आज, मुरझा गया, तो उसका उपयोग कम नहीं समझो

रिश्तों की कमजोर दीवारे जब गिरती
जीवन के प्रांगण में जगह बढ़ जाती
शिकायत नहीं, अब ख़ुशी ही मिलती
खुद को पहचान, अब, खुद से ही मिलती……..कमल भंसाली

***”सपने” तो सपने *** हकीकत या ख्याल ?★★कमल भंसाली★★

image

सपने तो है, सपने
न ये गैर, न ही अपने
जब भी आते, कुछ संकेत
जीवन को दे जाते
इनके है, कई प्रकार
हम न समझे, ये बात कुछ और..

सच यही लगता,
सपना ही, ख्बाब बन जाता
खुली आँख
मार्गदर्शक बन जाता
बंद पलकों में
तैरता ही रहता
जब तक
आशा, निराशा की
दुनिया का अवलोकन
नहीं कर लेता
न, इसकी मंजिल
न ही, इसका ठौर
हम न समझे, ये बात कुछ और….

सपनों के कई प्रकार
बनते मन अनुसार
चाहतों के फूल खिलाते
हर एक के रंग
दिखते, बेशुमार
सहमा सा दिलके
कभी हो जाता, बेजार
तब, ख़ौफ़ इन में छा जाता
मन दहशत से
डर जाता
किसी से कुछ
नहीं कहता
पसीने की बूंदों से
तन, नहा जाता
सपने, ऐसे ही करते सफर
हम न समझे, ये बात कुछ और…

सपनों का भी होता, स्वास्थ्य
विचारों से बनता, इनका आकार
दबे हुए, मन के होते, पहरेदार
रौनक नींद की
करती इनका सत्कार
खुली, आँख
आने से कर देते, इंकार
शुद्ध, सच्चे जब भी आते
मन को विचलित कर जाते
सही रास्ते, की तरफ मोड़ जाते
रंगीन सपने, धीरे से खिसक जाते
ये ही है, सपनों की तस्वीर
हम न समझे, ये बात कुछ और….

तलाश प्रेम के अवशेषों की…….कमल भंसाली

अंधेरों से मुझे डर लगता
उजालों की रही सदा तलाश
मन का हर कौण, दहक जाता
जब बिन पत्तियों के उगता पलाश

रोशनी तो हजारों दीयों से की
पर निठ्ठला अंधेरा, कब जाता
दिल को लाख बार समझाया
दर्द, नैनों से छलकाया नहीं जाता

मेरी बेरुखी में कुछ दर्द बसते
वरना, मैं तुम्हारी तरह हंसता
जख्मों की अगर बात करता
यकीनन, बेवफा समझा जाता

उम्र भर की यह मेरी दास्तां
रखती नहीं किसी से वास्ता
सपने सभी चूर चूर हो रहे
भूल गया मंजिल का रास्ता

कल की तो है, शायद बात
हम दोनों चले थे, साथ साथ
कदम तुम्हारे या मेरे भटक गए
कसके पकड़े हाथ, छिटक गए

आओं एक दस्तूर निभा जाते
अब हम अपने सम्बन्धो की नहीं
सरहद तय करने की बात करते
जिस खून से बने, उसी के लिए लड़ते

अंत हम दोनों का है, तय
कब होगा, सिर्फ यही है, भय
भय की चौखट पर खड़े रहना
से, लाख गुना अच्छा है, शहीद होना

सच कहूं, अब अंधेरो में शुकुन मिलता
उजालों की राह, नही चलता
इंसानो की बस्ती में तन्हा रहकर
बचे प्रेम के “अवशेष” हीं ढूंढता…….कमल भंसाली

बुलन्दियों ने कब कहा….. कमल भंसाली…


बुलन्दियों ने कब कहा
इन्सान से, आओं, मुझे “छू” लो
ये तो इन्सान की फितरत ही हैं
वो आकाश की तरफ देखता
जमीं पर पड़े सपनों को
चलते, चलते अपने
पैरों से रौंद्धता

हकीकत से दूर होकर
कब कोई गिरे, को उठाकर
देता हैं, सहारा ?
कहते है, सब का
रखवाला है, “भगवान”
आखिर हम तो है
सिर्फ “इन्सान”

तमन्नाओं के संसार
का भी होता होगा, दस्तूर
बेदर्द बन कर जीओं
कब तक जियेगा, कमजोर
ये, जीवन दुबारा नहीं, मयस्सर

पत्थरों का कोई
खुदा नहीं होता
“मूर्तियो” को कहां
नसीब है, प्राण
फिर भी मुस्कराती
ही, नजर आती

एक तिनके का सहारा
ढूंढने वाला इन्सान
कैसे बन सकता है, महान ?
जब उसके दिल में
नही बसते “सब के भगवान”

भूल जाता, ऊपर देखने वाला
पाँव धरती पर ही चलते
“सांस” ही सिर्फ ऊपर से आती
इसलिए स्थिरता नहीं पाती
कभी आती, कभी जाती
फिर एक दिन, छोड़ जाती
शायद वापस, कभी नहीं आती……..कमल भंसाली

कमल भंसाली