😇अंतर्मन की चोट😇✍कमल भंसाली

कल तुमने अंगुली पकड़ी
तो मैने तुम्हे चलना सिखाया
आज कंधे तक क्या आये
मेरे चलने पर एतराज जताया
भूल न जाना उन राहों को
जिन पर मैने तुम्हारे लिए
न्यौछावर कर दिया अपना हर सपना
उन सपनों की कीमत अब भी तुम चुका नहीं सकते
आज अपने सपनों की कीमत मुझसे ज्यादा आंकते
तय सच अधूरा नहीं रहता झूठ कभी पूरा नहीं होता
किसी के बिना किसी का जीवन कभी नहीं रुकता
कोई भी पिता कभी भी मजबूरियों में नहीं झुकता

माना हवाओं का रुख बदल गया
प्यार का चमन भी शायद सो गया
पर तुम मुझे एक बार अपना कह देते
मुझे छू कर ही तुम्हारा होने का अहसास दे देते
बची सांसो को जरा ये अंतिम विश्वास दे देते
आंतरिक सम्बन्ध की क्षमता को स्पष्ट कर देते
सन्तान के सुख का छोटा सा आभास ही दे देते
तो तुम्हें मैं आज भी अपना हिस्सा समझता
माना वक्त है तुम्हारा पर मैं इससे झुक नहीं सकता

नन्हा सा वो स्पर्श तुम्हारा
तुतलाकर पापा पापा पुकारना
तुम्हारी आँखों में मेरे लिए वो स्नेह का कोना
जिदपूरी न होने पर तुम्हारा रोना
तुम्हारी हर ख़्वाईस को हंस कर पूरा करना
कितना कुछ आज खो गया
मैं वृद्ध आश्रम में आ गया
तुम्हारे हर अहसास को भूल गया
चिंता न करना
मुझे सब कुछ खोकर जीना आ गया
चोट खा कर स्वयं उसे सहलाना आ गया
रचियता: कमल भंसाली

🐲ईश्वर की सन्तान🐲….🐤…कमल भंसाली🐤

सितारे, कितने ही गर्दिश में, क्यों न हो ?
आसमान, अपनी चादर में समेट रखता
सन्तान, कितनी ही नालायक, क्यों न हो ?
माता-पिता का प्यार, कभी कम नहीं होता

हकीकत, यही है कहती
सन्तान के लिए ही, वो जीती
उसी सन्तान को, सही राह दिखाते
दुनिया के, हजारों जहर पीती

भूल करे “वो”, सब अपने सर लेती
खुद को गलत, मार्ग दर्शक समझती
अफ़सोस की, कितनी बेबस करवटे
रात की तन्हाई में, इधर उधर बदलती

सन्तान गलत हो, तो नजर झुक जाती
उम्र की सारी रेखाएं, एक साथआ जाती
वो, कुछ नही बोले, पर चेहरा बता जाता
उनकी, सन्तान को सही राह चलना न आता

दुनिया के सुख न मिले, गम नहीं
पर, “सन्तान” किसी की न राह भूले
फूल खिलने की ख़ुशी, चाहे न मिले
हे, प्रभु, खिल कर, “जहर” जग में न फैले

बेजान दिल की, नासमझ सन्तान
कितना ही कर ले, उम्र का अभिमान
कितनी ही प्रगति की, सीढ़ियां चढ़ ले
पर उससे पहले, यह पाठ जरुर पढ़ले

जो जैसा, और जितना, सुख दुःख देता
वो उस से दुगना, उतना ही वैसा पाता
यही सत्य है, यही है, सार्थक जीवन तत्व
माँ बाप से बड़ा, इस जग में कोई नहीं होता

भ्रम में जो रहते, वो धरती का बोझ कहलाते
अपने अस्तित्व जनक को, शर्मिंदगी दिलाते
जो माता पिता के चरणों में, स्नेह से झुक जाते
वों, ही सच्चे, शुद्ध, “ईश्वर” की सन्तान कहलाते………

कमल भंसाली