😱अंतिम कविता 😱 रिश्तों के संदर्भ में 😭मुक्तक के रुप में 😲कमल भंसाली

गम इतने है कि किस किस किस को याद करुं
जख्म खाये दिल ने इतने किस पर मलहम करुं
गैर भी इतना दर्द नहीं देते अपनों की क्या बात करुं
फूल जब कांटे बन जाये तो जीने की क्या बात करुं

हर गम इतना आसान नहीं कि उसका बयान करुं
वफ़ा की कीमत होती बेवफाई पर क्यों ध्यान करुं
जीने की कई वजह है तो उम्र की क्यों गिनती करुं जहर पीना आसान तो अमृत पर क्या विश्वास करुं

कल के सपनों की आज हक़ीक़त कुछ और है
बुरे समय में हर रिश्ते की दीवार बहुत कमजोर है
अंतिम समय में हर सादा पन्ना भी शंकित दागदार है
कुछ नहीं बचा अब सिर्फ अंतिम सांस का इंतजार है

दोस्तों, हर गम का अपना इतिहास है कैसे बयां करुं
अपनों के दिये सरबती गम भारी कैसे उन्हें कम करुं
बोझिल सी मुस्कराहट कैसे दर्पण पर विश्वास करुं
है,खुदा इस बन्दे को समझा कैसे अपना उद्धार करुं

माना अंतिम कविता बड़ी बेरुखी दे देती
पर अंदर के छिपे दर्द को शुकुन भी देती
चंद क्षण ही सही कुछ तो सही सा गुजरा
दर्द कुछ अंदर भी रहा पर सत्य से निखरा

अपने सपने जब पराये नयनों में बस जाते
तो गम के अहसास नासूर बन दिल में दुखते
रिश्तों के धागे को चूर कर स्वयं भी बिखर जाते
अनुभव की दुकान में बिन मूल्य ही बिक जाते

चलो हकीकत यही स्वीकार करने को कहती
जिंदगी अपनों के रहम से नहीं स्वयं ही चलती
अब गम नहीं सताते, दर्द की दुकान नहीं लगती
समझ गई जिंदगी, जीने की भी कोई कला होती

🌷सच और प्यार🌷मुक्तक युक्त कविता✍ कमल भंसाली

सदिया बीती प्यार रहा अमर
पथिक चलना ऐसी ही डगर
प्यार ही हो तेरी असली मंजिल
खुशियों के फूल खिलेंगे हर पल

💖

खूबसुरती जिस्म की बदलती रहती
अवधि सांसों की भी कम हो जाती
पर प्यार की रंगत एक जैसी रहती
प्यार से रहो, धड़कने भी ये चाहती

💝

पल का प्यार, स्वाति बन कर चमकता जाता
सच्चाई की धवलता से पलमें कीमती हो जाता
रंग बदलता इजहार आरजूये ही करता जाता
इससे प्यार का अहसास कभी नहीं कर पाता

💕

हर रिश्ते में प्यार का ही बन्धन होता
खून से तो सिर्फ इसका सम्पर्क रहता
आपसी समझ बन जाता है जब प्यार
तो जीवन अपनी मंजिल करता तैयार

💑

कहते है जब तक प्यार और सच साथ साथ रहते
जीवन की बगिया में खुशियों के फूल खिलते रहते
झूठ की शराब में जो प्यार को ओतप्रोत कर रखते
एक दिन प्यार की चाहत में तिल तिल कर तरसते

👄

प्यार को जग में भगवान से कभी कम नहीं समझना
जीवन के नभ का इसे सूर्य और चन्द्रमा ही समझना
प्यार को उजियारा,सत्य को आत्म ज्ञान हीसमझना
सच्चे प्रेम को अटूट अनमोल जीवन बन्धन समझना

💟

सभी तपस्याओं का सार है, सत्य, प्यार भरा जीवन
अति चाहत की लालसा में जब भटक जाता इंसान
उसे इस लोक से उस लोक तक नहीं मिलते भगवान
कर्म बन्धन से परेशां कैसे करेगा आत्मा का निर्वाण

🙏🙏🙏 रचियता👉 कमल भंसाली👈

★★झूठ को सहारा, सत्य बेचारा ■■■एक चिंतन■■■ कमल भंसाली

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सत्य और झूठ जीवन के झूले में दो छोर का काम करते है, आजकल, इस कथन को हम चाहकर भी झुठला नहीं सकते। सच की जरुरत सभी को रहती है, पर उसका सब समय साथ निभाना आसान नहीं है, यह हमें स्वीकार कर लेने कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, क्योंकि निश्चित है, कलयुग में आसमान नहीं गिरेगा न ही किसी के लिए धरती फटेगी। सच की कीमत अनमोल होती है, उसे प्राप्त करना आसान नहीं होता। सच और झूठ दोनों का सम्बंध आत्मा से है, सच आखिर सच है, कभी कडुआ भी लगता है, परन्तु परिणाम सटीक और सही ही बताता, अतः आजकी लोभ भरी जीवन शैली इससे दूर ही रहना चाहती है। झूठ मीठा जहर जरुर है, पर गुनाह की दुनिया में रहने वाले इसका भरपूर उपयोग करते है। आधुनिक युग की जीवन शैली भी इससे अछूती नहीं है, दैनिक जीवन की छोटी छोटी समस्याओं को इससे ही निपटने की कोशिश जरुर करती है। झूठ आधुनिक युग का लाइलाज मानसिक रोग बन गया है, न चाहते हुए भी आदतन इन्सान इसका प्रयोग कर लेता है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यही है, की झूठ बोलते आजकल कोई आत्मिक दुःख का भाव नहीं बनता, उलटा चिंतन यह हो रहा है, कि सत्य को कभी उजगार कर दिया तो शायद मेरी सामाजिक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। आइये, थोड़ा विश्लेषण सच और झूठ का आज के युगानुसार करने की चेष्टा करते है, जानने की यह भी कोशिश करते है, क्या वाकई दैनिक जीवन में हम इन दोनों से कैसे प्रभावित हो रहे है ! ,फिर इसको रोकने में अपनी असमर्थता का भी जिक्र कर लेते है। क्योंकि, हम जानते है, इस प्रयास में आगे हम जा नहीं सकते, आखिर निजी स्वार्थ बिना साधनों भरी जिंदगी हमें कैसे भोग सकेंगे।

शुरुआत आत्मा के साथ करते है, क्योंकि जीवन के सफर में अंतिम पड़ाव पर इनका मूल्यांकन हर तन को करना पड़ता है, गौर करने से यह बात कई बार स्थापित भी की जा सकती है। एक प्राण जाते इंसान के चेहरे पर गौर करने से हमें कभी नजर आता है, कि उसके चेहरे पर पसीना और शरीर में दर्द की प्रकाष्ठता तड़पाती है। कहते है, इसी समय इंसान को सत्यता के दरवाजे से गुजर कर अपनी अगली यात्रा का वीजा लेना पड़ता है और हम जानते है, कि दूसरे अच्छे देश के लिए वीजा प्राप्त करना कितना दुःखदायी होता है। ख़ैर, जब आत्मा की बात कर रहे है, तो थोड़ा पीछे के युग का वो दर्शन आगे लाते है।

रामायण या महाभारत की अगर बात करे तो ग्रन्थ यही बताते है, सत्य जीवन शैली में छाया हुआ था, असत्य को जल्दी गले लगाने से डरते थे। भूल से भी इसका प्रयोग हो जाता, तो लोग प्रायश्चित करने की सोचते। रावण में कई अवगुणों का जिक्र होता है, पर उसमें एक गुण सत्य का था, उसके चलते वो भगवान शिव का परम् भक्त कहलाने लगा और असीम शक्तियों का मालिक बना। परन्तु, जब उसने झूठ का सहारा लेकर माँ सीता का अपहरण किया तो उसे भगवान राम को नष्ट करना पड़ा। कुछ इस तरह महाभारत के युद्ध में हुआ जब सत्यनिष्ठ युधिष्ठरजी को गुरु द्रोणाचार्य का वध करने अश्वथामा हाथी का वध कर सत्य को स्थापित करना पड़ा, हालांकि यह छल के अंतर्गत था, परन्तु इससे उनको भी प्रायश्चित के साथ द्रोणाचार्य के श्राप को भोगना पड़ा। दोनों ही उदाहरण से साबित हो सकता है, जीवन तत्व सच ही है।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप।।

सत्य के सन्दर्भ में संत कवि कबीरदासजी का अनमोल और जीवन उपयोगी यह दोहा प्रायः हम लोग सभी समय समय पर गुनगुनाते रहते है, पर आत्मा इससे बेअसर रहती है, क्योंकि इसके व्यवहारिक पहलू पर ही सिर्फ नजर भर रहती है, जीवन आदर्श में आज इसका महत्व नजर कभी कभार ही आ सकता है। दुनिया को देखने और समझने के लिये दो दर्पण हम सदा प्रयोग करते है, एक खुद को निहारने के लिए, दुसरा दुनिया के कार्य कलापों की समीक्षा के लिए। कहने की बात नहीं होनी चाहिए कि हम अपने झूठ को संवार कर सत्य के रुप में ही निहारते है।

जैसे जीवन को परिभाषित नहीं किया जाता, वैसे ही सत्य की सही परिभाषा खोजना आसान नहीं है। अगर मनोविज्ञान के जानकार की बात करे तो उनका सार यही आता है, कि जिसके बोलने बाद याद रखने की जरुरत नहीं हो, वो सत्य है या सत्य के आसपास है। उनके अनुसार बोले हुए झूठ को याद रखना पड़ता है। झूठ को स्थापित करने के लिए कई बार झूठ और बोलना पड़ता है, फिर भी वो सत्य नहीं बन सकता। इसे भी एक सही तथ्य मानना जरुरी है, कि सत्य लम्बी अवधि तक छुपाना मुश्किल से भी मुश्किल होता है। सत्य चैन देता है, झूठ परेशानी बनकर ऐसा मेहमान बन जाता है, जिसको सत्य के द्वारा ही आत्मा से निकाला जा सकता है।

सच शीतल होता है, निरन्तरता का अबाधित प्रवाह है, झूठ ठहरा हुआ, दलदल जिसमें फंसने वाला शायद ही तबतक निकले, जब तक वो सत्य का सहारा न ले। प्रश्न आज जो हमारे सामने खड़ा है ? उसका उत्तर शायद आसान नहीं है, पर जानना भी जरुरी है, जब सच इतना गुणमयी है, तब हम अपनी जीवनशैली में उसका उचित प्रयोग क्यों नहीं कर पाते ? क्यों हम छोटी छोटी गलतियों पर झूठ का दामन पकड़ लेते है ? उत्तर तो शायद ही कोई सही मिले, पर एक चिंतन जीवन को जरुर करना चाहिए कि झूठ का सहारा किसी भी समस्या का समाधान नहीं, सिर्फ कुछ समय के लिए एक सांत्वना भर है। आज आधुनिक उपकरणों का युग है, किसी भी बात की प्रत्यक्ष कीमत आंकनि जब मुश्किल होती है, तो झूठ अति उत्तमता लेकर सत्य का बोध कराने की चेष्टा करता है। मोबाइल का जब से प्रसार हुआ, झूठ व्यापार से परिवार तक फेल गया, विश्वास कमजोर हो रहा है, आदमी भय से आक्रान्त होकर सत्य का साथ निभाने से कतराने लगा है। धर्म कितना ही विरोध करता है, झूठ का, परन्तु अंततः वो भी कमजोर साबित हो रहा है। सवाल यह भी है, क्यों झूठ और सत्य का चिंतन आज के सन्दर्भ में ही किया जाय, जबकि यह तो सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया का एक तत्व रहा है ? इसका उत्तर इतना ही काफी है, कि सत्य
उस समय इतना कमजोर नहीं था, झूठ पर शर्मिंदगी का अहसास होता था, झूठ बोलनेवालों को स्वयं लज्जा का अनुभव होता था। आज की विडंम्बना यही है, की झूठ को दैनिक जीवन शैली में मान्यता मिल गई, और यह स्वीकार कर लिया गया कि झूठ बोलना कोई गुनाह नहीं एक सम्भाविक दैनिक क्रिया है। आज तभी तो यह कोई दावा नहीं कर सकता कि वो सत्यनिष्ठ है, सदा सच बोलने की कौशिश करने वाला इंसान है।

झूठ के कई प्रकार हो सकते है, परन्तु सत्य एक ही रकम का होता है। झूठ पकड़ा जा सकता है, सत्य निर्विक होता है, अतः उसे कोई परीक्षा अनुतीर्ण नहीं कर सकती । पता नहीं, हम जीवन के उस आत्मिक पहलू पर क्यों नहीं गौर कर रहे है, जिसकी पवित्रता के बिना हम अंदर से खुश, सुखी, और प्रसन्नता का अनुभव हमें नहीं हो पाता। हमारा चिंतन क्यों इस तथ्य पर गौर नहीं कर रहा कि एक दिन तो झूठ से अर्जित नाम, दौलत और शौहरत छोड़ कर जाना पड़ेगा और ईश्वर के सामने खड़ा होना होगा, निसन्देह वहां झूठ हमारा, कोई काम नहीं आयेगा। हो, सकता है, सत्य साधारण जीवन दे, पर वो स्वच्छ और सफल जीवन कहलायेगा। हमें भूलना नहीं चाहिए कि हमारे देश में ही पैदा हुए थे, सत्यनिष्ठ राजा हरिश्चंद्र ….आखिर थे, वो भी इन्सान, तो फिर हम क्यों सब जगह झूठ का सहारा ले ….क्या यह सही चिंतन नहीं है ? …..क्रमशः ….कमल भंसाली

जलजला जीवन……कमल भंसाली

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जो बीत गया, वो बीत गया
जो रह गया, वो रह गया
अधूरापन, जिंदगी का जो रहा
वो, सबके सामने आ गया

अंदर से मन भ्रांत हो गया
बाहर से फिर भी शांत हो गया
कसमकस जिंदगी की
क्या था, क्या हो गया
सपनों में मन
फिर सो गया
★★
चारपाई तो सत्य के के लिए लगाई
पर झूठ के आवरण में समा गई
व्यवहार की सर्दी में
सच्चाई झूठ की रजाई में
एक साथ सो गई
★★★
रजनीगन्धा के फूलों से
आत्मा को सजाना था
सच कहूं, अपने साजन को
ही रिझाना था
पर चंचलता ने हद कर दी
अपनी मेहँदी
किसी और के नाम कर दी
कल की सुहागरात को
उजालों में ही, बदनाम कर दी
★★★★

झूठी सी शान
करती मुझे परेशान
कहती मान या ना मान
मैं, तेरी नाजायज मेहमान
जीना है, तो जी
बैठ मेरे पास, झूठ की बोतल
जी भर कर पी…. कमल भंसाली
★★★★★★

मर्म, सही दृष्टिकोण का…बेहतर जीवन शैली भाग..११..अंश..१..कमल भंसाली

आज हम बेहतर जीवन शैली का सबसे अहम सवाल, जो शायद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका व्यक्तितत्व निर्माण के दौरान निभाता है, कि हमारा नजरिया जिंदगी के प्रति क्या है ? इस पर चर्चा करते है, दोस्तों, इसे हम अपने आपसे यों भी पूछ सकते है, कि अपनी जिंदगी के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है ? तय यही है, की अभी हम जिस तरह से जी रहे, वही सत्य है। जीवन के हजारों दृष्टिकोणों का मूल्यांकन समय समय पर हमारे लिए जरूरी है, परन्तु ऐसा हम नहीं करते। जितना समय हम निर्जीव साधनों की देख रेख में लगाते है, उस से कम समय शायद हम अपना आत्म निरीक्षण में लगाते है। जीवन कोई साधारण बात नहीं है, हमारे शरीर का हर अंग अपनी निश्चित कार्य प्रणाली पर निर्भर है। हम हमारी सारी आत्मिक और शारीरिक अनभूतियों से ही, उसे आनन्द और निराशा के कई रंगों के रस का रस्वादन कराते है।

सत्य है, जीवन एक है, पर दृष्टिकोण अनेक है। यह भी तय है, नजरिया बदलता है, इंसान के जीवन का स्वरुप भी बदल जाता है। एक आम इंसान अपनी सोच और आस्था से कमजोर होते जीवन को मजबूती दिला सकता है। बड़े बड़े अविष्कारों के पीछे हमने वैज्ञानिकों के दृष्टिकोणों को बार बार बदलते सुना है, तब जाकर उन्होंने बार बार उनमे सुधार किये है। हकीकत, यही कहती है, कि हम दूसरों के गुणों और अवगुणों का अवलोकन कर लेते है, पर क्या हमनें कभी समय निकाल खुद का निरीक्षण किया, शायद ज्यादातर उत्तर नहीं में ही होगा। हम विशिष्ठता से स्नेह जरुर रखते है, पर यह नहीं जानते की उत्तमता की तलाश अपने अंदर से शुरु करनी पड़ती है। जीवन के हर एक नजरिया में लचीलापन और गंभीरता का समावेश होना जरूरी है । सिद्धांत और सत्य के लिए जीने वाले सत्यकाम आज की निरर्थक आर्थिक और आधुनिक समाज की देन नहीं हो सकता। सच, यही है, हम व्यवहारिक और राजनीति युक्त सम्बंधित समाज का हिस्सा है। इस बदले हुए परिवेश में नैतिकता की स्थिति काफी कमजोर हैं और उस पर पूर्णतिया निर्भर रहना, सांसारिक शब्दों में असफलता को बुलावा देना है। समाज के ज्ञानी सुधारकों को नैतिकता की चट्टान से फिसलते, हम सब ने देखा है।

बेहतर जीवन शैली सबसे पहले यह सुझाव देगी, कि समय काल के अनुरुप हम जीवन और उसके विचारों में सक्षमता पूर्वक परिवर्तन स्वीकार करते रहेंगे। यह भी समझने कि बात है, रीति रिवाजों के नाम पर प्रदर्शित आधुनिकता से सजे आडम्बरों को हम रोक नहीं सकते, पर वक्त की जरुरत के नाम पर उनको बढ़ावा देने से हम बचे, यही सही है। बात वही है, नजरिया समाज के प्रति बदलना होगा। आज के समाज से पहले के समाज की तुलना वर्तमान से करके जी तो सकते है, पर उस जीने में सार्थकता की कमी रहेगी। आधुनिक युग के साधनों ने जगह की दूरी जरुर कम कर दी, पर मन की दूरियां बढ़ा दी।बाहरी प्यार को इतना सुंदर बना दिया की भीतर की कालिख को देखना मुश्किल हो गया। हमें इसी धरातल पर अगर जीवन को बेहतर बनाना है, तो यथार्थ को स्वीकृति देनी ही होगी। यह भी समझने की बात है, कि सब समय सब बातें सही हो,यह जरुरी नहीं है। कुछ बातें पुराने समय की अच्छाइयाँ हो सकती है, पर आज वो बुराइयों के रुप में जानी जा सकती है।

हम पर्दा प्रथा को ही ले, कुछ समय पहले इसे संस्कारों में गिना जाता था, आज इसकी बुराइयों में पहचान करायी जाती है। समय बदलता है, तो जीवन बदलता है, परन्तु रीति रिवाजों और सामाजिक नियमों में उस अनुपात में बदलाव आने में समय लगता है। आज भारतीय समाज का बदलाव बाहर से जितना आकर्षक दीखता है, वाकई क्या ऐसा है ? यह एक अनुत्तरित जिज्ञासा ही होगी, अगर हम क्षेत्र के अनुसार इसका अनुसंधान नहीं करते। किसी भी समाज का विश्लेषण उसकी आर्थिक उन्नति की भूमिका में ही अगर किया जाय, यह एक अर्द्धसत्य हीं होगा। जीवन में अर्थ (धन)के महत्व को बेहतर जीवन शैली कभी नहीं नकारती, परन्तु उससे होने वाले नकारत्मक व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया जरुर कर सकती है, क्योंकि बिना व्यवहार कोई शैली तैयार नहीं हो सकती। अर्थ के बढ़ने से अगर जीवन को सकारत्मक चिंतन नहीं मिलता तो अर्थ बिना अर्थ ही जीवन को समाप्त कर देगा। अर्थ को अगर कर्म के साक्षेप देखा जाय तो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार चार पुरुषार्थों में एक माना गया है, बाकी तीन धर्म, काम और मोक्ष है। सही कामों से हम सीमित धन प्राप्त करते है, तो उसका मानसिक स्वास्थ्य पर स्वच्छ और सकारत्मक प्रभाव पड़ता है, जो जीवन को सही गति देता है। हमे यह चिंतन जरुर करना चाहिए की धन के प्रति हमारा नजरिया अति लालसा से तो प्रभावित तो नहीं है, ना। अगर हम कहें हां, तो शायद हम ऊपर से भव्य, भीतर से खोखला जीवन जी रहे है। इससे न तो अपना भला होगा, न ही परिवार और समाज का। जिंदगी से अगर कभी अगर हम बात करे तो शायद वो सबसे पहले यहीं कहेगी की ” हां, मैं शांत और सही ढंग से जीना चाहूंगी, क्योंकि मैं बार बार धरा पर विभिन्न रुप में वापस नहीं आना चाहूंगी”।

समय आ गया है, चिंतन को बदलने का, अति साधनों के प्रयोग से शरीर और मन की अवस्था और आयु दोनों ही कम होती है, अतः हम धन अर्जन के साथ प्रेम की भावनाओं में थोड़ी पवित्रता अपना ले। कभी कभी लोग कहते है की पैसा प्रेम का दुश्मन है, बेहतर जीवन जीने वाले शायद ही कभी इस तथ्य को स्वीकार करेंगे। आज हकीकत यहीं है, पैसा है, तो प्यार है, नहीं तो आदमी बेकार है। अतः हम अगर अपने व्यक्तित्व के उच्चतम विकास में विश्वास रखते है, तो हमे सहर्ष कर्म पथ पर सही और नेक आय अर्जित अपनी संयमित जरूरतों के लिए जरुर करनी चाहिए, पर दूसरे आत्मिक विकास गुणों की बढ़ोतरी का प्रयास भी कम नहीं करना चाहिए। इस तरह जीवन दृष्टिकोणों को सही आयाम के अनुसार बदलते रहना चाहिए,।सिद्धान्तों के नाम पर हमारा अपना अड़ियल रुख जीवन को गलत दिशा नहीं दे, यह ध्यान रखकर अपने सही सिद्धांतों को भी आदर हम दे।

हमारा चिंतन बहुत सारी धारणाये जगह जगह से ग्रहण करता है, लाजमी है, सब चिंतन सही परिस्थितिया निर्मण नहीं करे। परन्तु, यह भी तय है, बहुत में से ही कुछ का सही उपयोग किया जा सकता। C.S. LEWIS ने तभी तो अपनी पुस्तक ..That Hideouts Strength में लिखते है, ” There are a dozen views about everything until you know the answer. Then there’s never more than one.”

सच तो यह भी है, कि संघर्ष में हमे अपने सही दृष्टिकोण को कभी भी घबराकर नहीं छोड़ना चाहिए कुछ ऐसा Christian D Larson कहते है कि ” so long as the man with ambition is a failure, the world will tell him to tell him to let go of his ideal, but when his ambition is realized, the world will praise him for the persistence and the determination that he manifested during his dark hours, and everybody will point to his life as an example for coming generation. This is invariably the rule.Therefore pay no attention to what the world says when you are down.Be determined to get up, to reach the highest goal you have in view, and you will.”

ध्यान देने और मनन करे हम, की धैर्य सही दृष्टिकोण की उच्चित और न्याय संगत परीक्षा है, प्रकृति का नियम यही है, जो सही है, वो ही बहुमूल्य है।…..क्रमश ……कमल भंसाली

कमल भंसाली

शुद्ध जीवन……कमल भंसाली

खंडित धारणाओं ने, जब भी आस्थाओं पर किया प्रहार
अपना जीवन पथ भटकता राही, एक नहीं कई बार
मंजिल के पास आकर भी, बन्द अँखियों से उसे ही ढूंढता
जीने की तमाम इच्छाओं का, रहनुमा बन कर् ही घूमता

चन्द सहानुभूति का हो जाता, निष्प्रभ मन मोर
समझौते की शर्तों पर भी, नहीं करता अति गौर
ऊपरी सतह की मुस्कराहट ही, उसकी घबहराट
भीतर में तो छुपी रहती, कायरता की छटपटाहट

सफल सकल आत्मा का दर्पण, टूट कर् हुआ चूर
जिस जीवन से प्यार किया, आहिस्ता से हो रहा दूर
रिश्तों के धरातल पर, अपनों से ही हुआ हर पल मजबूर
समझ नहीं पा रहा मन, क्यों टूटे, चिंतन दर्पण बार बार

असमर्थ संयोजन की ही होगी, कोई थकित कमजोरी
असंयत जीवन ही शायद छोड़ रहा है, निहितार्थ धुरी
समझ गया, जीवन का दर्पण नहीं झेलता, असत्यकारी
पग पग पर झूठ का सहारा ही, बड़ी होती कमजोरी

कल की व्यर्थ कल्पना, अब नहीं हो चिंतन की शैली
कल किसी का नहीं, तो खाली करले चिंता की थैली
यही है, सत्य पल, जो चल कर अगले पल से मिला रहा
जीवन खोयी सार्थकता को गले लगा, निस्पृह मुस्करा रहा

तिरोहित आत्मा ने समझ दिया, अब सबकी पारिमित्य
पदम् कुशन छोड़ मन, पढ़ धैर्य का पहला पारखी पाठ
तिनपहला जीवन है, बाकी है कामनाओं की साठगांठ
सत्य, अंहिसा, और संयम जिसमें हो, वो, शुद्ध जीवन पाय….

कमल भंसाली

वाणी..मधुरता की रानी

“वाणी”, तुम तो मधुर हो
“मैं” ही, कभी कर्कश हो जाता
तुम तो ह्रदय वीणा हो
मन ही, कभी नगाड़ा बन जाता

तुम दृश्य को नयनभिराम
की ऊर्जा प्रदान करती
कभी क्रोध में आँखे ही
उसमें काला रंग डाल देती

उदर के संग रहकर भी
तुम, अमृत संचय करती
स्वाद वशीभूत हो, जीभ
अपच जहर, उगल देती

तुम “पवित्रआत्मा” से “सत्य”
का सदा आश्रीवाद लेती
भ्रमित आत्मा, प्रदूषण कहकर
झूठ के आवरण से बाँध देती

सन्तों और ज्ञानियों ने तुम्हें
सदा माना प्रभु की रानी
कुछ “स्वार्थों” ने बना दिया
तुम्हें काया की नौकरानी

क्या कहूं, आत्मा का “अंहकार”
अंधकार ही पसन्द करता
बाकी तुम्हारी चमक से तो, सारा विश्व्
आत्म विश्ववास से,” मुस्कराता”

भूले दिमाग कि, सदा अनजान रही
तुम तो साथ, रोज निभाती रही
फिर भी, जीवन पथ को संभाल
“आलोक”का दर्शन, कराती रही

जब सरस्वती बन निकलती हो
ह्रदय को सरगम बना देती हो
न समझे अंतरात्मा, तुम्हारी मृदुलता
तब सहम कर, तुम चुप हो जाती हो

तय है, तुम सदा रहोगी महान
मैं ही यहां का, “अजनबी मेहमान”
तुम्हारी चर्चा करेगा, सारा जहां
आज “मैं”यहां, पता नही कल कहां…..

कमल भंसाली

सत्य ही जीवन

बहुत कुछ कहा गया
काफी कुछ लिखा गया
लाखों बार सुना गया
फिर भी “सत्य”को
कभी मन से नही स्वीकारा गया
ज्यादातर, ‘झूठ’ को ही
“सत्य”की तरह स्थापित करने का
प्रयास किया गया

कहते है
सत्य सुंदर होता हैं
मानव सुन्दरता का पुजारी
क्या सत्य कम सुंदर !
फिर उसे क्यों जरूरत पर
दुत्कारा जाता
जबकि वो अपनाने का अधिकारी

‘मेरा’ तो मानना हैं
झूठ कभी सुंदर नही
पर मोहक बन कर आता
अपनी भाषा कों हजारों
सुंदर और आकर्षण युक्त
मिथ्या अलंकारो से
सजा कर प्रस्तुत करता
मधुरता का माहौल
तैयार करता, सत्य की असफलता
का खौफ दिखाता
यहीं इन्सान कमजोर हो जाता
झूठ का प्रयास सफल हो जाता
मानव सत्य की पवित्रता भूल जाता
एक गलत राह का
यात्री बन जाता…..

कमल भंसाली