💖प्रेमसत्यम💖 कमल भंसाली

दर्द ऐ दास्तां
बहुत कुछ कहती
जिंदगी
गमगीन गेरो से नहीं
अपनों से होती
मोह के चक्रव्यूह में
प्रेम को ढाल समझ
चुप, छुप सब कुछ सहती
जग ने जाने
इसी ख्याल में
तमाम उम्र की पीड़िता बन जाती
मानसिक विक्षप्ता से त्रस्त हो
स्वयं में स्वयं को तलाशती
अफ़सोस से कहती
काश उसे
“अपनों के अपनेपन की समझ होती ” !

समझ अगर
इतनी ही रखे जिंदगी
कोई किसी का कुछ नहीं
किसी की “साँसों” पर,
कोई भी सम्बन्ध न्यौछावर नहीं
शब्दों का खेल है
“प्रेम”
इसमें उलझे नहीं
दस्तूर स्वार्थ के
सब हंस के निभाये
ताकि तीर निशाने पर लग जाये
इसलिए सब “प्रेम” “प्रेम” की रट लगाये

सार यही समझ में आया
दर्द के पहलू में
अपनों का दिया जब गम समाता
प्रत्यमित्र जिंदगी को बना देता
अफ़सोस से
भीतर भीतर ही जिंदगी कुलबुलाती
शायद बुदबुदा कर कहती
काश ” सच्चे प्रेम” और ” मोह” का अंतर समझती
तो प्रेम को प्रदूषित नहीं बनाती
जग में “प्रेम” को परिभाषित कर पाती
।।प्रेम ही “सत्यम, सुंदरम”।।

रचियता कमल भंसाली