नये वर्ष के नये संकल्प🌺भाग 3🌷आत्मिक अनुसंधान चर्चा🌲कमल भंसाली

जब कभी प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता हमारी नजरों से टकराती है तो निश्चित है उसकी इस सुंदरता से हमें आनन्द और प्रसन्नता का अनुभव होता है। ठीक ऐसे ही जब किसी असाधारण व्यक्तित्व से हम मिलते है, तो हम उस मिलन को अपने जीवन की एक धरोहर समझते है। हमारी विडम्बना भी यही है कि हम उसके दूसरे पहलू पर कभी या तो गौर नहीं करते या हमारे अंदर इस तरह के जज्बातों को समझनें की समझ नहीं है कि व्यक्तित्व किसी का योंही प्रखर और आकर्षक नहीं होता उसके पीछे उसकी दृढ़ स्वयं परिवर्तन की चाह और क्षमता होती है। क्यों नहीं कुछ प्ररेणा उनसे स्वयं के जीवन को मिले ! जीवन सिद्धान्त तो यही कहता है, ऐसे व्यक्तित्व प्रेरणा के स्त्रोत होते है और उनसे हम भी जीवन को आकर्षक और लुभावना बना सकते है। शुरुआती जिंदगी से हर कोई एक साधारण गुण और अवगुणों से युक्त इंसान होता है, यह उस विशिष्ट इंसान की मानसिकता थी, उसने अपने जीवन के कुछ अवगुणों पर गौर किया और अपने जीवन से उन्हें धीरे धीरे स्थानांतरित कर उनकी जगह सही गुणों का विकास कर उन्हें महत्व दिया। इस तरह के परिवर्तन की सोच का सही समय अभी हमारे लिए भी है, जब आनेवाला साल हमें बेहतर ढंग से जीने का आह्वान करता है। पिछली हमारी चर्चाओं में हमने इस बारे में काफी चिंतन और अध्धयन किया अब समय आ गया कि उनके अनुरूप हम स्वयं को कुछ नये संकल्पों से सुधारे, ध्यान इतना ही रहे संकल्प सिर्फ संकल्प बन मर न जाये, उन्हें सदाबहार रख हम उन के द्वारा प्राप्त सकारत्मक परिवर्तन को अपने जीवन तत्वों में समाहित कर ले।

पीछे, हमने जिन तीन क्षेत्रों की चर्चा की हकीकत में उन्हीं से प्रभावित हो हमारा जीवन अपना काफी विस्तार करता है और एक दिन अपनी पूर्णता को प्राप्त भी करता है। कहते है, जीवन के अंतिम पड़ाव पर प्राणी में गंभीरता आ जाती है क्योंकि वो उस समय अपनी सफलताओं से ज्यादा अपनी असफलताओं से पीड़ित रहता है। मनन करता अपनी उन कमजोरियों का जिससे उससे उसका जीवन कठिन हुआ। उसका अपनी प्राप्त सांसारिक उपलब्धियों के प्रति प्रेम भी नगण्य हो जाता है । संसार से विदा लेते समय अपनी आत्मा की गहनता में जाने का मन होता है, जिस पर वो कभी कभार ध्यान देता था या देता भी न था।अगर हम कभी अपने दैनिक जीवन के तौर तरीको का स्वयं अवलोकन करते तो शायद सहज में ही समझ में आ जाता कि छोटी छोटी उपलब्धियों के लिए हमने अपनी बड़ी बड़ी खूबियां दाव पर लगा दी है। यानी अपने किसी नैर्सिगक गुण या गुणों की आहुति इस तरह के यज्ञ में दी है, तत्काल के परिणाम का क्षणिक ख़ुशी में विलीन होते ही हमें सहज महसूस हों जाता है, कहीं न कहीं ये हमारी आत्मा की हार है। अर्थ क्षेत्र की उपलब्धियों पर ही गौर करे तो हमें ऐसे कई एहसास आज भी हो सकते है । ज्यादा अर्थ संचय की चाह के लिये स्वास्थ्य पर किया गया किया गया अत्याचार जीवन की समय सीमा को कमजोर करता है इसलिए दोस्तों, वर्ष की सुंदर व स्वस्थमय शुरुआत से पहलें हम अपने मन व दिल को दुरुस्त कर लेना चाहिए । अपने लिये स्वयं तय किये नये निर्देशों व संकल्पों का पालन कर जीवन को सही व्यक्तित्व का उपहार देने का प्रथम दृढ़ संकल्प स्वीकार कर लेना उचित लगता है।

कुछ संकल्पों की एक सूची तैयार करे उससे पहले हमें इस सोच पर ध्यान देना होगा कि गुजरा समय कभी वापस नहीं आता पर हर क्षण के प्रभाव से हमारे जीवन को प्रभावित कर जाता। एक क्षण का उच्चतम चिंतन आदमी को पुरस्कार का हक दिला देता और एक क्षण का निच्चतम चिंतन जेल का दरवाजा भी दिखा देता। नैतिकता की कितनी भी हम अवहेलना अपने जीवन में करे पर जब स्वयं की चाही नैतिक जिम्मेदारी हमें दूसरों से नहीं मिलती तो कभी यह क्यों नहीं सोचते कि इसका तिरस्कार तो हमारा भी किया हुआ है। धर्म शास्त्रों ने तो सदा इंगित किया ” जैसी करनी वैसी भरणी” । अतः हमारे संकल्प जीवन सुधारक ज्यादा हो, तो निश्चित है समाज से प्राप्त होने वाले सुख से हम कभी वंचित नहीं रहेंगे।

सच और झूठ:-

जीवन कैसा भी हम जीये, सच और झूठ से वंचित रहना नामुमकिन होता है। इसकी मात्रा के उपयोग से ही सुख दुःख का स्वरूप भी बनता है। तय है किसी भी तरह के झूठ का बाहरी चेहरा कृत्रिमता के कारण आकर्षक और सुंदर होता है परन्तु सच की पवित्रता के सामने सदा ही फीका लगता है। सच में नैतिकता का तप समाहित होता और शुद्ध सच तो किसी भी तरह के आवरण से परेहज भी करता है। हम अगर अर्थ के नफे, नुकसान के सिद्धांत की जरूरत के अनुसार भी अगर झूठ का अति प्रयोग कर रहें है तो हमें किसी के बताये इस तथ्य पर भी ध्यान देना सही होगा ” सच वह दौलत है जिसे पहले खर्च करों और जिंदगी भर आनन्द करों, झूठ वह कर्ज है जिससे क्षणिक सुख या राहत पाओं पर जिंदगी भर चुकाते रहो” । चूंकि, हम संसारिक जीवन जीते है और सब तरह की परिस्थितियों से जीवन को गुजरना पड़ता है अतः आज के युग अनुसार झूठ के प्रयोग को पूरा बन्द नहीं किया जा सकता क्योंकि कभी कभी ये भी सोचना पड़ता है “लोहा को लोहा” काटता है। विपरीत परिस्थितयों में रिश्तेदार व सम्बंधियों का रुख भी अविश्वासकारी व असहयोगी हो जाता है, और सच यहां खतरनाक स्थिति पैदा कर देता है, ऐसी स्थिति में सब जगह सत्य का प्रभाव इन्सान को कमजोर करता है। चाणक्य सिद्धांत कठिन परिस्थितियों में प्रयोग योग्य कहा जा सकता है, कि “प्रेम और युद्ध” में सब जायज है। अतः दोस्तों आज की जिंदगी में सच और झूठ का प्रयोग बहुत ही समझदारी से करना चाहिए पर हर जगह झूठ को पहल देना आत्मिक कमजोरी ला सकता है और यह गलती ज्यादा न हों यह ध्यान नये वर्ष में हमें जरुर रखना चाहिए, सत्य को मन के पास रखकर। कोशिश करे नये साल में झूठ से ज्यादा सत्य वचन कहे।

सम्बन्ध :-
रहीम के दो दोहों पर गौर करते है ।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय ।
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय ।।
(रहीम कहते है कि प्रेम का नाता नाजुक होता है, इसे झटका देकर तोडना उचित नहीं होता। यदि यह प्रेम का धागा एक बार टूट जाता है तो फिर इसे मिलाना कठिन होता है और यदि मिल भी जाए तो टूटे हुए धागे के बीच में गाँठ पड़ जाती है।
*****

रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सो बार।
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टुटा मुक्ता हार।।
( यदि आपका प्रिय सौ बार भी रूठे, तो भी रूठे हुए प्रिय को मनाना चाहिए, क्यों कि यदि मोतियों की माला टूट जाए तो उन मोतियों को बार बार धागे में पीरो लेना चाहिए।

रहीम दास जी कि इस सीख का हम अपने जीवन में कितना महत्व दे ये आज के वातावरण में कहना कठिन लगता है पर ये तय है हर सम्बन्ध की गरिमा प्रेम के तत्व पर ही निर्भर की करती है। प्रेम आत्मा से निकल कर आता है और हर सम्बन्ध को गरिमा से मान सम्मान देता है, हमें इसे स्वस्थ और स्वच्छ रखना भी चाहिए।सब के साथ प्रेम से रहने का संकल्प जीवन को भरपूर ऊर्जा की संपन्नता प्रदान कर सकता है। परन्तु, दुनिया सब लहजे से बदल रही है, सम्बन्धी, रिश्ते- नाते, समाज के आपसी सम्बन्ध कल तक जो दुनियादारी के हिस्से थे, आज वो सब व्यक्तिगत हो गए। यहां तक की एक ही छत के निचे रहनेवाले पति-पत्नी के सम्बन्ध में कुछ हिस्सा ही आपसी रह गया है। दिल की बाते अब दिल में ही रहती है, अपनों के वनिस्पत बाहरवालों के सहारे ही जिंदगी की समस्याओं का हल ढूंढना सही लगता है। व्यवहारिक दुनिया में आर्थिक क्षमता का भीतरी मूल्यांकन ही रिश्तों की प्रगाढ़ता तय करती है। आप किसी भी रिश्ते का खून का सम्बन्ध होनें पर भी उस पर प्यार और स्नेह का दावा नहीं कर सकते। समय आ गया है, आपसी खून से सम्बंधित रिश्तेनातों के प्रति हमें कुछ बदलाव अपनी सोच में करना पड़े जिससे कम से कम हमारा बाहरी प्रेम बना रहें। इनके बारे में ज्यादा सोचने से इंसान खुद ही तनाव भोगता है, जिससे जीवन को अप्रसन्नता ही मिलती है। कार्यकालि रिश्ते को हम अगर मधुर व्यवहार और कुछ आत्मिक प्रेम से संजो कर रखे तो वो हमारे लिए काफी सहयोगी हो सकते है। बाकी जिन घरों में आज भी प्यार और मान सम्मान का महत्व है, वहां किसी भीं नये संकल्प की जरूरत नहीं होती। समय अनुसार स्वयं को बदलने का संकल्प ही उचित है।

आत्मिक संकल्प:-

वर्ष जैसे विदा हो रहा है वैसे एक दिन हमें भी विदा होना है। हम में और उसमें एक ही सबसे बड़ा फर्क है, उसको हमने बनाया और हमें किसी अनजान शक्ति ने। हमनें वर्ष को सिर्फ गिनती तक ही मान्यता दी पर हमें तो नियति ने हजारों गुण – अवगुणों से युक्त होनें का मौका दिया है, जिससे हम अपने आने का उद्देश्य स्वयं में ही ढूंढ कर उस शक्ति को दुनिया से जाकर निराश न करे। हमारी रचना में दो पहलू पर शायद उसने ज्यादा ध्यान दिया और आत्मिक तथा संसारिक प्राणी हमें बनाया। धर्म और अधर्म की तराजू पर ही हमारी अगली गति तय होती है ऐसा हर धर्म शास्त्र बताता है और हमारा विश्वास भी यही है। हमारे सारे संकल्पों में सारे धार्मिक तत्व न हों पर नीति शास्त्रों पर विश्वास कर हमें हर संकल्प में अगर नैतिकता, संयम, प्रेम, धर्म, विश्वास जैसे तत्वों का विकल्प रखे तो निश्चित है, साल मधुरमय, ज्ञानोदय और आत्मिक हो सकता है। सभी के लिए नव वर्ष शुभता से सजकर आये, ये ही कामना लेखक करता है। गुजारिस भी है, इस लेख को उपदेश पाठ न समझे अपितु इसे जीवन सुधार विवेचना के रुप में ही परखे क्योंकि “To be beautiful means to be yourself. You don’t need to be accepted by others.You need to accept yourself”.-Thich Nhat Hanth.
**लेखक: कमल भंसाली**

” आनन्द” 😃जीवन सूत्र भाग 3 अंश 1😆 कमल भंसाली

सत्य ही कहा गया है, “इन्सान को अगर ऊजालों को तलाशना है, तो उसे अंधेरों का अनुभव करना जरुरी है” । आखिर यह अँधेरा है,क्या !और मानव जीवन ज्यादा देर तक उसे क्यों नही सहन कर पाता ? प्रश्न उचित लगता है। सीधे सीधे ओशो के शब्दों में कहे, तो “अँधेरा, अज्ञान है, प्रकाश ज्ञान है”। आत्मिक अज्ञानी ही ज्ञान तलाशता है, चलिए हम भी उनमें शामिल हो ज्ञान के प्रकाश की एक हल्की झलक तो प्राप्त करने की कोशिश करें।

सृष्टि का नियम है, वो हर प्राणी को सक्षमता तो प्रदान करती है, परंतु जब सवाल पूर्णता का आता है, तो ज्ञान का सहारा लेने को कहती है। आज का इन्सान इस मामले में काफी सजग प्रतीत होता है, परन्तु उसकी सजगता में कहीं न कहीं एक प्रश्न उभर कर आ ही जाता है, आखिर इस ज्ञान से वो हासिल कर क्या करना चाहता है ! ऊपरी सतह से इस का उत्तर कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है, वो आनन्द, सुख, आराम और शान्ति को अपनाना चाहता है या फिर उसका कोई ऐसा लक्ष्य है, जो उसे सही जीवन की दिशा बता दे।

चलिए इस मर्म को भी तलाशते है, क्यों इन्सान जीवन को नये नये आयाम देकर आनन्दमय और उत्साही जीवन प्राप्त करना चाहता है ? इस चर्चा को आगे प्रस्तुति देने के लिए हमें थोड़ी विगत की सैर करनी चाहिए, जब मानव अपनी प्रारंभिक अवस्था में बिना साधनों के अपना अस्तित्व तलाश रहा था। आश्चर्य की बात है, आज की स्थिति और उस समय की स्थिति में एक समानता नजरआ रही है, पहले मानव बिन साधनों के आत्मिक आनन्द ढूंढता था, आज साधनों के रहते भी वो, उसी आनन्द को तलाश रहा है। मानते है, ना आप। तो बताइये ज्यादा साधनों को प्राप्त करने का मानव स्वभाव क्या सही है !

यहां बता देना उचित होगा कि पहले इंसान के पास सुख के साधन कम थे, आज इनकी गिनती असंभव है। जरा सी चेतना का सहारा लेकर हम आगे बढ़ते है, तो अहसास होगा पहले ज्ञान की रफ़्तार धीमी थी, आदमी धीरे धीरे अर्जित कर ता था अतः ज्यादा दैहिक सुख से अनजान था, नैतिकता के दायरे में रहकर ही आत्मिक आनन्द को तलाशता था। आज साधनों की अधिकता के बावजूद भी एक अनजान सा ख़ौफ हर समय उसके आनन्द या सुख को संकुचित करता रहता है। आखिर ये संकुचन क्या है ?, कैसा है, क्या यह किसी बाहरी प्रक्रिया की देन है !

सदिया बीत गई, आज तक बड़े बड़े महर्षि भी इस सवाल के उत्तर की तलाश करने का साहस ज्यादा दिन नहीं कर पाते, देह थक जाती, मन अवसादों से विचलित हो जाता, तब उनकी आत्मा में शायद एक प्रश्न लहरा जाता, कि जो अब तक की जीवन यात्रा की, क्या वो सही दिशा की लौकिक यात्रा थी ! क्या यह लौकिक यात्रा ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है ? जानता हूँ, ऐसे प्रश्न हर एक के दिमाग में नहीं आ सकते, आते तो शायद दुनिया के विस्तार के साथ “सच” जैसा अमृतमय तत्व कभी निम्नतम स्तर पर आज नहीं होता, ईमानदारी को ढूंढना नहीं पड़ता, रिश्तों को प्रेम के अहसास को याद नहीं दिलाना पड़ता, शान्ति को खोजना नहीं पड़ता, पर्यावरण कोई तर्क का विषय नहीं होता और शायद हर प्राणी को अपना सही अस्तित्व की खोज के लिए इधर उधर भटकना नहीं पड़ता। पर कहते है, जब धुरी से कोई अस्तित्व हट जाता है, तो उसके घूमने की लय असंगत हो जाती है, आज का जीवन भी असन्तुलित होकर सही सुख का अनुभव नहीं कर पा रहा है। एक रिक्तता का अनुभव हम सभी अंदर से कर रहे, चाहे स्वीकार करे या नहीं, सत्य तो यहीं है, चाहे हम इस सत्य से भी हम अपनी दैनिक आदत की तरह मुंह घुमा ले।

जीवन में दो तत्व काफी महत्वपूर्ण माने गए है, जी, हाँ, हम कर्म और धर्म की ही बात कर रहे है। किसी भी प्राणी को लीजिये उसका जीवन इन दोनों के ऊपर ही काफी हद तक निर्भर है, मानव चूँकि विशिष्ट श्रेणी का प्राणी है, अतः उसके लिए ये दोनों तत्व ही जीवन सार का निर्माण कर सकते है, निसन्देह इनकी गुणवत्ता उसके चिंतन पर ही निर्भर करती है। कर्म और दैहिक धर्म से ही हमारा अस्तित्व जगत में आता है, इन्हीं की दिशा निर्देश पर जीवन को चलने के संकेत मिलते है, जीवन चलता भी है, पर मन की गति का इनके साथ तालमेल धीरे धीरे कम होने लगता है, क्योंकि मन की तासीर चंचलता है, उसे अति बन्धन अस्वीकार्य होते है परन्तु उसे राजनीति आती है, अतः वो अपनी तिकड़मों से सदा भ्रम के रास्तों में चाहतों के प्रति इंसान को उकसाता ही रहता है। जिस इंसान की आत्मिक शक्ति कमजोर होती है, वो मन के इस भ्रमजाल में उलझ जाता है, और आत्मिक आनन्द को संसारिक सुखों में तलाशता रहता है, और जीवन लक्षित परमानन्द को जानने से कतराता रहता है, जबकि वो ही सही जीवन सार है। समझने की बात है, कि अंत का आनन्द परम् आनन्द ही सही जीवन की सही मीमांसा है।

जरुरी नहीं जीवन में हम आत्मिक आनन्द को केंद्र बिंदू मानकर ही कार्य करे या इस आनन्द को कर्म शक्ति का महत्व दे,। यह तो सहज और सरलता से स्वयं ही प्राप्त होने वाला होता है। नैतिकता और सादगी से प्राप्त जिस तत्व को आसानी से पाया जा सकता है, उसके लिए मश्क्त करना कहां तक उचित है ? सच कहें इसके सहज होने से ही हमारा ध्यान इस पर नहीं जाता, क्योंकि लगातार सहज रहना सरल नहीं है। नये नए साधनों की कल्पना कर हम कैसे आज के वर्तमान युग में सादगी पूर्ण जीवन की कल्पना कर सकते है ! अगर हम इस तरह का चिंतन कर रहे तो निसन्देह हम ज्ञान नहीं तकनीकी बात कर रहे है। सादगी का जीवनभूति साधनों से कोई दुश्मनी नहीं है, सादगी अगर हमारे व्यवहार में है, तो फिर हम क्या अपनाते है, इस से कोई फर्क जीवन में नहीं आ सकता, अनैतिक कार्यों से अगर दूर है, तो कोई भी साधन हमें विचलित नहीं कर सकता, अगर आडम्बरों को जीवन में स्थान न दे, तो कोई भी धार्मिक पंथ हमें नही फुसला सकता, सत्य हमारी जबान पर जब तक है, भय कभी पास नहीं आ सकता, कर्तव्य की ईमानदारी से आत्मा को सदा जागृत अवस्था में रखा जा सकता है, अतः असन्तोष के अलावा किसी से जीवन पर्यावरण दूषित नहीं हो सकता। जब पर्यावरण स्वस्थ रहेगा तो विश्वास कीजिये, जीवन स्वस्थ, सफल, और आनन्दित हो जाएगा, शायद हमें परमानन्द का जरा सा भी अनुभव हो जाए, और जीवन लक्ष्य की तरफ हमारा एक सही कदम बढ़ जाये। हमें सिर्फ ध्यान इतना ही रखना उचित होगा कि आनन्द को एक सफर ही समझे, अंतिम मंजिल नहीं, क्योंकि हमारा सफर ज्यादातर भावात्मक ही होता है, पता नही कब अपना रुख बदल ले। रिचर्ड बैक ने सही कहा है, ” प्रसन्नता वो पुरस्कार है जो हमें हमारी समझ के अनुरुप सबसे सही जीवन जीने पे मिलता है”।*****क्रमश*****लेखक कमल भंसाली

झूठ को सहारा◆◆सत्य बेचारा***कमल भंसाली***

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कोई भी झूठ से कितनी ही दौलत, शौहरत या नाम कमा ले, परन्तु जीवन पथ में उसे सत्य की जरूरत हर पल रहती है । उसका अंतर्मन सदा अपनी कमजोरी का व्याख्यान करता नजर आएगा, और उसके व्यवहार में इसकी झलक वह स्वयं भी करता है। माना जा सकता है, जीवन में बहुत सी ऐसी स्थितियों से इंसान गुजरता है, जब सत्य बोलने की कमजोरी के कारण वो असत्य का सहारा लेकर, आपसी सम्बंधों का निर्वाह कर, दुनियादारी निभाना उसकी मजबूरी हो जाती है। ये बात भी समझने की हो सकती है, कि सत्य अप्रिय होता है, और सब उसे सहीं ढंग से स्वीकार कर भी नहीं पाते। तभी जीवन ज्ञानी विशेषज्ञ कहते है, ऐसी परिस्थितियों में अल्पमात्रा झूठ भी स्वीकार्य है, क्योंकि यहां उसकी भूमिका आटे में नमक जितनी होती है, और आटे को पाच्य बनाना शरीर के लिए जरुरी होता है। संसार में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए भी झूठ की भूमिका को आज की दैनिक जिन्दगी से बाहर करना मुश्किल होता है। तो क्या संसार आज झूठ की धुरी पर घूम रहा ! आंशिक सत्य भी यही है। परन्तु समझने की बात है, धुरी का अस्तित्व सत्य पर ही टिका है, क्योंकि सत्य हर कर्म से जुड़ा है। झूठ को स्थापित करने के लिए कर्म तो करना ही पड़ता है, चाहे वो गलत ही क्यों न हो।

झूठ कभी कभी सत्य के ऊपर भारी पड़ता है, परन्तु कुछ समय के लिए, अंदर से अपनी ही कमजोरियों से हार जाता है। जीवन सबको कितनी बार मिलता है, कहा नहीं जा सकता परन्तु शायद यह जरुर निश्चित होगा, कि वर्तमान का जीवन ही उसकी अगला स्वरुप और भूमिका तय करता होगा। वर्तमान जीवन बहुत सारी घटना क्रम से गुजरता है, और हर घटना में सत्य की भूमिका होती है, यह निर्विवाद तथ्य है, इसे नकारा नहीं जा सकता। मानव मन अस्थिर होता है, कभी कभी वो इन घटनाओं का असली मकसद समझ नहीं पाता और झूठ का सहारा लेकर इनको अपने सही लक्ष्य से दूर ले जाता है।

झूठ का मनोवैज्ञानिक अध्ययन सबसे कठिन होता है, क्योंकि इसका अध्ययन पूर्ण सत्य को अपनाने वाला ही कर सकता है, जो आज के जीवन में सबसे मुश्किल काम है। इसका सात्विक पक्ष गहरा अन्धकारित होने के कारण इसका सही मूल्यांकन आध्यात्मिक सच्चे सन्त ही कर सकते है। झूठ की सबसे बड़ी खासियत यही है, कि कोई भी इंसान अपनी अंतरात्मा से इसे बोलना पसन्द नहीं करता परन्तु गलत परिणामों से बचने के लिए बोल देता है। विश्लेषण की बात है, जिसकी जड़े अंदर तक न हो, उसका अस्तित्व कब तक ठहरेगा। अतः झूठ आखिर में पकड़ा जाता है, और मानव के व्यक्तित्व को खण्डित कर देता है। जो जीवन को समझते है, वो अपनी वाणी का संयमित प्रयोग इसलिए करते है।

झूठ बोलने के जो सम्भावित कारण हो सकते है, उनमें डर, आत्मछवि और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की भावना, और लोभ। झूठ की संक्षिप्त् परिभाषा इतनी सी है, कि सत्य को विकृत करने की कोशिश झूठ है। पर सवाल यह भी है, आखिर सत्य क्या है ? सत्य की परिभाषा अगर आसान होती तो उसकी खोज में इंसान को भटकना नहीं पड़ता, इसलिए व्यवहारिकता के तत्वों में सत्य को स्थापित किया जाता है। इसलिए वस्तुगत चेतना की अवस्था में ही सत्य की पहचान की जा सकती है। सत्य कैसा भी हो, वो सूर्य और चन्द्रमा की तरह ज्यादा नहीं छुप सकता, भगवान बुद्ध ने यहीं संकेत व्यक्तित्व की प्रखरता के लिए दिया था।

सत्य अहिंसाकारी होता है, अगर झूठ में हिंसा नहीं सम्मलित हो, तो उसका नुकसान ज्यादा हानिकारक नहीं होता। परन्तु आज अर्थ की बहुतायत वाला युग है, इन्सान ने सत्य का कम प्रयोग करते करते निजी स्वार्थ के लिए झूठ को बेबाक अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया है, इसलिए विचारों में विश्वाश की उष्णता कमजोर हो गई। सच यही है, जिंदगी आंतरिक ख़ुशी और प्रसन्नता की मोहताज हो रही है। पैसो के बलबूते पर हम आज भी कोई व्यक्तित्व निर्माण नहीं कर सकते, हाँ, थोड़े समय का ध्यान लोग हम पर केंद्रित जरुर कर सकते है, जब तक उनका आभाष उन्हें भ्रमित करता है, कि हमारा पैसा उनके कुछ काम आ सकता है। धर्म को आडम्बर बनाने वाले साधु जब भी सच के पहलू में झूठ का सहारा लेने की कोशिश करते है, तो उनका धार्मिक नजरिया अपना अस्तित्व खो देता है। इसलिए व्यवहारिक पक्ष जीवन का मजबूत रखने के लिए ऐसे झूठ का प्रयोग करना गलत नहीं होगा, जिससे किसी भी तरह का आघात एक मानव से दूसरे मानव को नहीं पहुंचाता क्योंकि ये आज के आधुनिक युग की मजबूरी है, जहां अति साधनों के कारण चिंतन के लिए समय कम मिलता है। अल्प आयु का चिंतन बिना सार्थकता का ही होता है।

आइये, सच और झूठ की महिमा और प्रभाव हम अपने दैनिक जीवन के सन्दर्भ में तलाश करने की कोशिश करते है पर उससे पहले यहां स्पष्टीकरण जरुरी हो जाता है कि विचार और सुझाव की कसौटी सच और झूठ दोनों से नहीं कर सिर्फ चिंतन की मर्यादा के अंतर्गत करेंगे तो जीवन को प्रभावकारी बनाने में हमें मदद मिल सकती है। नमूने के नजरिये से कुछ तत्वों की तलाश हम आज के युग अनुसार करने की कोशिश करे, तो हर्ज क्या है !

1. सब जगह सत्य बोलना कोई जरुरी नही है, पर सब जगह झूठ बोलना भी जरुरी नहीं है।
2. झूठ का ज्यादातर प्रयोग कर उसे सत्य की तरह स्थापित नहीं किया जा सकता है, यह भी ध्यान रखने की जरुरत है।
3. सत्य का पूर्ण सहारा हो, तभी किसी की सार्थक और अहिंसक आलोचना उसके कर्म की करनी चाहिए, नहीं तो मौन बेहतर असमहति का अच्छा प्रभाव स्थापित कर सकता है।
4. रिश्तों की मर्यादा खून और दिल दोनों से होती है, अतः अनावयशक झूठ का इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है।
5. कुछ रिश्ते पवित्र होते है, उनमे बेबाक सत्य ही प्रभावकारी होता है, मसलन माता-पिता, पति- पत्नी और जीवन मार्ग दर्शक – गुरु।
6. भगवान और शुद्ध दोस्ती का रिश्ता आत्मा से है, अतः पूर्ण सत्य ही यहां गुणकारी हो सकता है।
7. व्यपारिक, राजनैतिक, और सामाजिक रिश्ते में विश्वास की अधिक मात्रा की जरुरत जरुर होती है, पर स्वार्थ की प्रमुखता के कारण इसमें सच-झूठ का जरुरत के अनुसार प्रयोग करना गलत नहीं कहा जा सकता।
8. देश, प्रकृति, धर्म, दान और प्राणिय प्राण ये पूर्ण आस्था के आत्मिक मन्दिर की मूर्तियां है, अतः यहां सत्य से बेहतर झूठ कभी नहीं हो सकता, अतः इनके प्रति भावना, शुद्ध सच्ची ही कल्याण कारी होती है।
9. जीवन और मृत्यु दो क्षोर है, दोनों ही सांस की डोर से बंधे है, झूठ के अति आक्रमण से कमजोर होते रहते है, परन्तु सत्य की अल्प बुँदे ही इन्हें सही स्थिति में रखने की कोशिश करती रहती है।
10. सत्य को ईमानदारी का साथ देने से जीवन की अगली गति उत्तम हो सकती है।
11. इंसान की इज्जत सत्य कर्म से ही उज्ज्वल होती है।

जैसा की ऊपर हमने कहा, ये कुछ तत्व हो सकते है, जिनसे सच और झूठ को आज के जीवन के अनुसार हमारे जीवन को अपने चिंतन अनुसार हमारी कार्यशैली को प्रभावित कर सकते है, अतः इन्हें अंतिम सत्य की श्रेणी में नहीं रखे, तो उचित होगा। इनके अलावा भी कई तत्व की खोज हर प्राणी अपने सामर्थ्य और अनुभव से कर सकता है।

गौर से पढ़े….
* सत्यस्य वचन श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत् ।
यद्भूतहितमत्यन्तं एतत् सत्यं मतं मम् ।।

{ यद्दपि सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जिससे सर्वजन का कल्याण हो। मेरे ( अर्थात श्लोककर्ता नारद के ) विचार से तो जो बात सभी का कल्याण करती है, वही सत्य है। } ★ ■■■■ कमल भंसाली ■■■■ ★

आदतें… बेहतर जीवन शैली… भाग ७……..

आदतें …..बेहतर जीवन शैली…भाग ७…..

आदमी किसी का दास हो या नहीं हो पर अपनी आदतों का गुलाम जल्दी ही हो जाता है, चाहे वो अच्छी हो, बुरी।
बेहतर जीवन शैली के लिए आदतें स्वागत योग्य है, अगर उनसे जीवन बेहतर होता है, परन्तु उनका विरोध भी करती है, जो उसकी यात्रा में बाधा देती हो। दोस्तों जीवन को जीते जीते कुछ असंभाविक आदतें और व्यवहार दैनिक प्रक्रिया में सहजता से अपना स्थान बना लेते है। क्यों नहीं, हम आज इस मजेदार परन्तु मह्त्वपूर्ण विषय पर चिंतन करे।
हमारे राष्ट्रपिता महात्मा ग़ांधी ने भारतीय परिवेश के अनुकूल कथन इस तरह कहा…
Your beliefs become your thoughts,
Your thoughts become your words,
Your words become your actions,
Your actions become your habits,
Your habitats become your values,
Your values become your destiny.

हकीकत में, कितना सही और सटीक कहा उन्होंने, हमारा व्यवहार और आदतें हमारी दिनचर्या का वो हिस्सा है,जिसपर हमारी आस्थाए और सोच का प्रभाव देखा जा सकता है। आदतें, हकीकत में व्यक्तित्व की रुपरेखा तैयार करके हमें दुनिया के सामने प्रस्तुत कर हमारा आंकलन कराती है। हम उदाहरण के लिए यहां फिल्मो में नायक नायिका की दिखाई आदतों पर विश्लेषण करे तो उनकी पहचान सहज ही उनके अभिनय से कर लेते है। फ़िल्म कलाकार राजकुमार अपने संवाद अदायगी और अपनी भाव भंगिमा के कारण प्रसिद्ध हो गए, उनके अदायगी और बोलने के तरीके की नकल आज भी की जाती है।

प्रश्न उठता है, आदतें तो आदतें है, उनसे जीवन शैली क्यों प्रभावित होती है । सूक्ष्मता से अगर हम ध्यान दे, तो शायद हम इस के उत्तर में इतना ही कहेंगे की अगर किसी में चोरी की आदत हो,तो क्या उसका जीवन पर प्रभाव नहीं पड़ता ?
अच्छी आदत को मान मिलता, खराब को नकारा जाता है, यह एक व्यवहारिक प्रक्रिया, इसे हम बच नहीं सकते। कई मनोवैज्ञानिक स्वीकार करते है, की आदत पड़ना अनजाने में ही होता है, जानबूझ कर शारीरिक आदत नहीं बनती। बच्चों में कई आदते विकल्प के रुप में पड़ती है,जैसे अंगूठा चूसना। ख़ैर, हम यहां विश्लेषण यही करेंगे की आदतों से जीवन शैली सिर्फ अच्छी आदतों से प्रभावित कैसे की जा सकती है।

कौनसी आदत अच्छी और कौन।सी बुरी, इसका निर्णय नीतिगत आदतों को छोड़कर ही करना चाहिए। ज्यादातर नीतिगत आदतें आदमी स्वयं अपनाता और छोड़ता है, जैसे कोई आदमी झूठ ज्यादा बोलता है, तो यह आदत उसकी अपनी स्वीकृति से बनी। उसके फल को जानते हुए, उसने अपनाया तो उसका परिणाम भी उसकी नजर में है। वो, ही उस पर प्रशासन करता है, अतः वो चाहे तो बेहतर जीवन शैली के लिए छोड़ सकता है ।

आदतें इन्सान की संकल्प शक्ति कमजोर करती है, बड़े मकसद के लिए अगर हमें किसी आदत को छोड़ना पड़े, तो उसके लिए हमें बहुत संयमित होना होगा। बेहतर जीवन शैली आदतों की विवेचना कर मूल्यांकन करने की सलाह देगी, तय हमें करना होगा की हम आदतों के कभी दास न बने और कभी भी गलत आदतों को फलने फूलने नहीं दे।

आदतें कई तरह की होती है,परन्तु हमारा ज्यादातर जीवन शारीरिक और भावात्मक आदतों से प्रभावित होता है।
अच्छी आदतें संस्कारी, परोपकारी और मानव कल्याण कारी के साथ खुद हितकारी होती है, क्योंकि इनका ताल्लुकात आत्मा सें होता है । कुछ आदतें दिल से जुड़ी बड़ी दिलचस्प और स्नेहकारी होती है, उनमें प्रसन्नता, उल्हास, हास्य, जैसी
सकारत्मक उर्जा का समावेश रहता है, पर जब दिल में नकारत्मक भावनाए हो तो क्रोध, ईष्या आदि का की झलक से दुसरों के दिल पर ठेस पँहुचाती है । कुछ आदतें शरीर से सम्बन्ध रखती है, जिनसे छुटकारा पाना सहज नहीं तो मुश्किल भी नहीं होती, सिर्फ दृढ़ संकल्प शक्ति की जरूरत होती है। नशे, शराब और जुए की आदत जिस इंसान में हो,उनका छुटना सहज नहीं होता, उन्हें मनोवैज्ञानिक तरीके से ही छुड़ाया जा सकता है। सार संक्षेप में यही कहा जा सकता है, इंसानी व्यक्तित्व की बुनियाद में आदतों कि महत्व पूर्ण भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता।

कुछ आदते जो प्रायः नजर में आती है। ……

1. आज का काम कल पर छोड़ देना

2. नुक्ताचीनी करना

3.समय को गप्पों में गुजारना

4. बहुत बिना सोचे समझे बोलना

5. अधिक खर्च करना

6. गालियों का प्रयोग कर चिल्लाना

7. दूसरों की खिल्ली उड़ाना

8. बात बात पर भड़कना

9. बिना जरूरत झूठ बोलना

10. दूसरों की निंदा करना

ऐसी और भी कई तरह की आदतें है, जो हमें कमजोर व्यक्तित्त्व का इन्सान बनाती है। हमारी जीवन शैली तभी बेहतर हो सकती है, जब हम गन्दी आदतों के शिकार न बने ….यह तय है ।

कबीर दास जी ने कितनी सुंदरता से फरमाते है…..

“कबीर तन पंछी भया, जहां मन तन उडी जाइ
जो जैसी संगत कर, सो तैसा ही फल पाई”……

कमल भंसाली