“सम्बन्धों” मुक्तक आज के संदर्भ में

दोस्तों,
मुक्तक के रुप आज के बनते -बिगड़ते सम्बन्धों को समझने की एक मेरी अनचाही कोशिश है। नहीं चाहता सांसारिक सम्बन्ध जीवन की गरिमा भूल जाये। सबसे बड़ा खतरा संस्कारों को भूल नई स्वतंत्र राहों की तलाश से है। पर कहते है जो जुड़ता वो बढ़ता जो टूटता वो विलीन हो जाता। भगवान से प्रार्थना है सम्बन्धों की दुनिया सदाबहार रहे। शुभकामनाओं सहित✍ लेखक व रचियता**कमल भंसाली
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रिश्ते जो एक बार बिगड़ जाते
वापस कम ही जुड़ पाते
क्योंकि सच्चाई के जो पन्ने होते
वो नदारद हो जाते
बिन सही मलहम के हरे घाव तो
हरे ही रह जाते
लगे जख्म भी कभी सूख नहीं पाते
इसलिए
बिगड़े आपसी सम्बन्ध कभी सुधर नहीं पाते

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समझने की बात समझनी जरूरी होती
हर सम्बन्ध की अपनी कुछ मजबूरी होती
छोटी चिंगारी बन जब कोई बात बिगड़ जाती
निश्चित है, हर रिश्तों को स्वार्थ की बीमारी लग जाती
अच्छे रिश्तों की छवि दिल छोड़ दिमाग में चढ़ जाती
लाइलाज बीमारी है यह रिश्तों के प्राण तक ले जाती

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जीवन और सम्बन्ध का है आपसी गढ़ बंधन
एक दूसरे के पूरक करते समझ के अनुबन्धन
“खुद जियो और दूसरों को जीने दो” है प्रबंधन
जिससे विश्वास की सीमा का न हो कभी उल्लंघन

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अर्थ के संसार ने आज रिश्तों की परिभाषा बदल दी
हर रिश्तों की कीमत जरुरत अनुसार तय कर दी
बिन संस्कारों की जिंदगी बिन परवाह की राह चलती
“कल को किसने देखा” कहकर आज पर ही इतराती
जब तन्हा हो असहाय बन जाती, फांसी पर चढ़ जाती
जीवन में सम्बन्धों के महत्व का अदृश्य संदेश दे जाती

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न कोई माता, न कोई पिता, युग अब यही सन्देश देता
स्वयं से ही स्वयं बना रिश्तों की महिमा को ठुकरा देता
जीना खुद का अधिकार, अब खुद को यह ही भाता
हर सम्बन्ध अब दिल के अंदर की यात्रा नहीं करता
बाहरी दुआ सलाम में मधुरता से मुस्करा कर रह जाता
सतह पर जरुरत के समय तक थोड़ी देर साथ चलता
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सब मुक्तक यही कहते “सम्बन्धों” से जीवन बनता
सम्बन्ध से ही जीवन आगे की तरफ यात्रा करता
हर रिश्ता हर दिन का सहयात्री, सोये को जगाता
भावपूर्ण हो जो स्नेह,विश्वास और प्रेम से निभाता
जीवन की हर मंजिल तक हर “सम्बन्ध”अमर रहता
🌷🌷🌷
💖💖 ✍ रचियता💘 कमल भंसाली 💝💝

👉संस्कार 👈🏃लुप्त होता आकार🏃✍कमल भंसाली

” संस्कार” शब्द की व्याख्या करने से पहले हमें जीवन की उस अनुभूति के बारे में हर दृष्टिकोण सेथोड़ा चिंतन करना जरुरी हो सकता है , जिनमे मानवीय संवेदना अपना अस्तित्व तलाश करती है। आज की भौगोलिक स्थिति में हमारी भूमिका की साख अगर कोई है, तो हमारे “संस्कार”। भारत की सम्पन्नता में आज तक संस्कार की अहम भूमिका रही और आज भी उसकी तलाश किसी ने किसी रुप में की जाती है। इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले हम यह जानने की कौशिश जरुर कर सकते है कि विरासत में मिली यह गुणवत्ता क्या हमारे जीवन में आज भी मौजूद है ? सच्चाई से अगर उत्तर दिया जाय तो कह सकते है, कि अब इसका अंतिम स्वरुप ही हमारे पास है, और वो भी रुग्ण अवस्था में। जरा गौर कीजिये, जिस देश में नारी को देवी और माँ, बहन के रुप में देखा जाता था आज उसकी स्थिति कितनी दर्दनाक हो रही है। जहां परिवारों में माता-पिता और बुर्जगों को सही सम्मान दिया जाता, आज वो अकेलेपन की हतासा के साथ जीवन बिताने को मजबूर हो रहे है। भारतीय जीवन कुछ समय से पहले तक दासता के अंतर्गत ही रहा, चाहे वो राजा महाराजाओं का था, या विदेशियों का, उसके अनुरुप ही साधनों की सीमितता भी थी । देश जब स्वतन्त्र हुआ, तब उसके सामने गरीबी एक चुनौती के रुप में सबके सामने खड़ी थी। देश बंट कर हमें मिला, पर समस्याओं के सहित। हमारी पुरानी संस्कृति के संस्कार की समर्थ भूमिका ने हमारे अभी के जीवन को बेहतर बनाने में अपना बहुत कुछ दाव पर लगाया। कहने को तो हम विकास के पथ पर आज काफी आगे की तरफ जा रहे है, परन्तु बहुत कुछ पीछे छोड़ कर, उन्ही में एक है, हमारे सुखी करने वाले संस्कार, जिनमे साधन कम पर आपसी प्रेम का न सूखने वाला सागर हमारे पास था। कहते है, सुख के कई आधार होते है, जिनमे मानव मन खुशियों के नये नये स्वरुप तलाशता है, मन की यहीं चंचलता उसे दुःख की राह पर ले जाता है। आधुनिक युग आर्थिक सम्पन्नता के साथ नवीन साधनों से सजा है, उसकी भव्यता के सामने सरल संस्कारों की एक भी नहीं चल रही, हर दिन बेदम होकर मर रहे है, हां वो संस्कार आज भी अपनाये जा रहे तोड़ मरोड़ कर, जिनमें भव्यता है।

‘संस्कार’ शब्द का अर्थ होता है, “शुद्धिकरण” और इसका सम्बंध मानव जीवन से एक जन्म से कई जन्मों तक चलता रहता है, जब तक उसे जन्म मरण की प्रक्रिया से छुटकारा नहीं मिलता, उसे हम निर्वाण की स्थिति कहते है, ऐसा हमारे ग्रन्थ बताते है। उनके अनुसार संस्कार के दो रुप हो सकते है, एक आंतरिक और दूसरा ब्राह्म रुप। आंतरिक रुप की रक्षा के लिए रीति रिवाजों का सहारा लिया जाता है, जो हकीकत में संस्कारों का ब्राह्म रुप ही हैं। इनका उद्देश्य की पूर्व जन्म से जितनी आत्मिक उन्नति हुई, उससे हम इस जन्म में आगे बढ़े।
ऐसा मानना है, कि भारतीय संस्कारों का निर्माण ऋग्वेद के अंतर्गत शुरु हुआ। संस्कारों का निर्माण आंतरिक आत्मा शुद्धि के साथ सामाजिक नियमों के तहत हुआ, जिससे जीवन को आनन्दमय और सक्षम धरातल मिले। “कुमारिल ” आठवीं सदी का एक तंत्रवार्तिक ग्रन्थ के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से सक्षम होता है, पूर्व जन्म के कर्मो के दोषों को दूर करने से और नये आत्मिक गुणों के उत्पादन से। संस्कार ये दोनों काम करता है, इसलिए ज्ञानित पुराने भारत में संस्कारों की सदा विशिष्ठ भूमिका रही। गौतम धर्म सूत्र में संस्कारों की संख्या चालीस बताई गई, जिनमे जन्म, मरण, और विवाह सम्बंधित संस्कार ही आजकल ज्यादा नजर आते है, आत्मिक शुद्धि संस्कारों का आडम्बरों सहित प्रयोग करने के कारण अब संस्कारों की श्रेणी में रखने से संकोच आता है।

हमने संस्कार को ऊपर शुद्धिकरण बताया, क्योंकि जीवन को स्वच्छ रखना प्रायः सभी का लक्ष्य होता है, अतः हमारा हर कर्म संस्कारयुक्त हों, ऐसी दिनचर्या को अपनाना हमारा ध्येय होना चाहिए। जब आज हम आधुनिक और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने की कोशिश कर रहे है, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए, संस्कार वहां भी होते है और वहां संस्कार के कई शब्द है, जिनका वो अपने दैनिक कार्य को उत्कृष्ट बनाने में काम लेते है। आइये जानते है, संस्कार सम्बंधित कुछ शब्द :

*IMPROVEMENT * PERFECTING
*REFINING. * AN INBORN POWER OF FACULTY
*A CONCEPT. * INFLUENCE
*INVESTITURE
*WITH THE SA. * ANY OF VARIOUS ESSENTIAL SANCTIFYING OR PURIFICATORY RITES AS THE
FIRST TAKING OF SOLID FOOD
*REFINEMENT. * CEREMONY
*FINISHING. * ADORNING
*SACRAMENT * PURIFICATION
*( साभार इंटरनेट से )
संस्कार को culture और manners जैसे और भी कई शब्दों से पहचाना जा सकता है। शब्दों की ज्यादा व्याख्या करना यहां हमारा ध्येय नहीं है, अतः आगे बढ़े उससे पहले हम यह मान लेते है, जीवन को सुधारमय गति मानव निर्मित शुद्ध संस्कार ही दे सकते है। संस्कार नहीं होते तो परिवारों का प्रेम भरा निर्माण नहीं होता, रिश्तों की सही पहचान नहीं होती, बड़े, छोटों का ज्ञान नहीं होता, धर्म नहीं होता और शायद यह संसार भी व्यवस्थित नहीं चलता। आज समाज चारों तरफ से अव्यवस्थित और तनाव ग्रस्त महसूस कर रहा है, मान मर्यादाओं की आस्था भी कमजोर पड़ रही है, असत्य वचन बेधड़क इन्सान की जबान से फिसल रहे है, हालात इस कदर बिगड़ रहें है, कि आपसी विश्वास पर प्रश्नचिन्ह लग रहे है। आखिर, ये सब हालात क्या संस्कारों के पतन के कारण नहीं हो रहे ? सही चिंतन इसे नकार नहीं सकता।

अंत में एक सवाल सदा ही सबके लिए चिंतन की बात है, जिंदगी किसी को भी बार बार नहीं मिलती, दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां मृत्यु नहीं पहुँचती, खुशहाल जिंदगी संस्कार के पेड़ पर ही उत्तम फल लगा सकती है, इस जीवन को संस्कार ही सही दिशा निर्देश बता सकता है। अति आधुनिक जिंदगी बिन प्रेम अकेलापन, तन्हाई, सन्त्रास, और दर्दीली ही होती है, उम्र की डगर पर। रुपये की अधिकता बिना संस्कार जीवन को साधनों का सुख शायद दे दे, पर शरीर और मन को खोखला कर देता है, तभी हम उन संस्कारों की बात करते है, जिन्हें हम ने अपनाने में लापरवाही की।

भविष्य का अगर सही निर्माण इस युग की जरुरत रही, तो निश्चित तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए, हमें संस्कार को अपनाना है, नहीं जो मिल रहा है, उसे स्वीकार कर लेना ही उत्तम रहेगा।

चार्ल्स डार्विन के अनुसार ” In the long history of humankind ( and animalkind, too ) those learnt to collaborate and improvise most effectively have prevailed. ”

चूँकि, संस्कार जीवन स्त्रोत्र है, हमें विरासत में मिलते है, अतः इनका पालन विनम्रता से किया जाना चाहिए, और हमें अपने बच्चों की शिक्षा में इसे सम्मिलित भी करने चाहिए, जिससे हम उनके साथ अपने जीवन का तालमेल रख सके। यही एक सही संभावना है, भविष्यत जीवन को खुशहाल रखने की।

विडम्बना है संस्कारों की आज का अति शिक्षित युवक उनके अपनाने को परतन्त्रता के संदर्भ में देखता है,और बीते युग की पुरानी विचारधारा समझ कर स्वयं को भी अपनाने से दूर रखता है। अपनी संतान को सिर्फ जीवन बिगाड़ने वाले आधुनिक साधनों का उपहार देता है। ये तो पंचतन्त्र की उस कहानी के उस ज्ञानी को सदृश्य करने जैसा लगता है, जिसमें नायक उसी पेड़ की डाल को काट रहा होता,जिस पर वो बैठा होता है। वक्त के साथ समझौता करना सही तब तक ही होता है, जब तक वो जीवन की गरिमा को दूषित नहीं करता। ध्यान दीजिए, जिस गांव में बारिश न हो, वहां की फसले खराब हो जाती है और जिस घर में धर्म और संस्कार न हो, वहाँ की नस्लें खराब हो जाती है । संस्कार संसार मे हमारे व्यक्तित्व को निखार सकता है, अंहकार नहीं-सही शिक्षा तो यही है।

संस्कारों को सही और उपयोगी रीति रिवाजों में खोजने से कई अमृतमय गुण प्राप्त होते है, जैसे प्रणाम, आशीर्वाद, प्रेम, स्नेह, विश्वास, अंहिसा, सत्य, समृद्धि, ज्ञान, तपस्या, शान्ति आदि, विचार कीजिये क्या इनसे संस्कारित होना अच्छा नही है ?

नहीं तो फिर कबीर के इस दोहें से हमें, अपने आप को सन्तोष देना होगा….

करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय ।
बोया पेड़ बबूल का , आम कहां से खाय ।।

लेखक* कमल भंसाली

👽दर्दीली जीवन संध्या👽कमल भंसाली

दोस्तों,
नमस्कार,
हम मनुष्य है, जीवन का यह स्वरूप जब तक मोहक रहता तब तक जिंदगी खुशनुमा गुलिस्तान कि सैर करती, अपने होने पर गर्व करती। पर कहते है, ना, अति हर का अंत होती है। बनाने वाले ने मनुष्य में मनुष्यता नष्ट न हो, इसलिए समझदारी से उसके जीवन को अवधि प्राण देकर सीमितता का अनुभव करने का संदेश अपनी तरफ से दे दिया। भारतीय जीवन शैली ने इसे बड़ी समझदारी से स्वीकार किया और पारिवारिक सम्बन्धों को विनम्रता भरे संस्कारों के हाथों में सौंप दिया। पर, बदलते समय की तेजी से मनुष्य का दिमाग संस्कारों को छोड़ ” पूर्ण स्वतंत्रता” की तरफ भाग रहा है, कहना न होगा ये दौड़ उन्हें मानवीय संवेदना से दूर कर सकती है और एकाकी जीवन के सारे दर्द उनकी झोली में डाल सकती है।परन्तु कहते है ना, दौड़ में इसकी परवाह कौन करे ?
प्रस्तुत कविता आज की तरफ़ प्रस्तर होती इन्ही समस्याओं का समाधान तो नहीं पर संकेत जरूर देती है, जीवन सन्ध्या सिर्फ आधुनिक साधनों के सहारे बिताई नहीं जा सकती । आप कभी किसी वृद्ध आश्रम कदम रखिये, आपको समझ में आ जायेगा कि संसार का स्वरूप और स्वभाव कितनी तेजी से बदल जाता है। ये भी शायद आपको समझ में आ जाये कि आज की मंजिल आधुनिक भले ही हो, पर बिन संस्कार भरे अहसास की दौड़ है, जिस में सिर्फ तन्हाई और पश्चाताप है। माफ कीजियेगा, अगर कहीं आप इससे सहमत नहीं तो निश्चित है, ये कविता आपके पढ़ने के लिए उपयोगी नहीं है, इसका मुझे खेद है।✍ कमल भंसाली✍

कभी, उम्र के अंतिम पड़ाव पर
खड़ा होकर
जीवन संध्या के क्षितिज को निहारता
तो, अवनी पर
लड़खड़ाते कदमों के लिए
सहारा तलाशता
दीवारों के भी कान होते
कभी दे देती
पर जिन पर करता गरुर
“वो”
मेरे इसे बुढ़ापे का दर्द कहते
क्योंकि वो अभी बेदर्द रहते
कुछ भी कहे “वो”
मेरे अपने बीते सपने है
कहना उनका हक
सुनना मेरी मजबूरी
समझता ज्यों उम्र बढ़ती
अपनेपन की खुशबू घटती
पर मैं तो यही मानता
जीना मुझे नहीं आता
हकीकत तो यही है
दोस्त
कुछ सांसे
आज भी मेरे साथ
वरना
अब कोई वजह भी
साथ नहीं निभाती
बिन वजह
जिंदगी
हर दम उदासी की छांव तलें
अंतिम क्षण की
नगण्य भूमिका निभाती….

गीत जिंदगी
जिनके आज तक गाती
वो सब सुर
अब पराये लगते
गले लगकर रोने के साधन
अब बेजान लगते
जितने पन्ने आज तक लिखे
उनके अक्षर धुंधले
गहरे मटमैले
स्वाह जीभ के नीचे
दबे बुदबुदाते
क्षीण होती काया को कंपकपाते
अपनेपन की स्याही
सूख जाने से
शायद अपने लिखे सुंदर शब्दों
के रंग भी बदल जाते
दस्तूर है, शायद
जो वो भी निभाते….

दुखः न समझना
इसे सिर्फ मेरा
कल की बुनियाद
में छिपा है, आज का अंधेरा
कठपुतली का खेल
संसार के मंच पर अव्यावृत
हार इसमें परिमित
मै तो खेल हारा
दुआ करूंगा
बचा रहे सब का
अपना सुरमई सवेरा
रिश्तों को अतिरेक प्यार
अदृश्य हो रहे सदा तैयार
ऐसा अनुबन्धन मन का हो
“मुझसे ज्यादा जग होशियार”
ये ही जीवन जंग का सही हथियार
आखिर मानते हो ना
मरिचिकाओं का जंगल है, संसार
“दोस्त” फिर एक बार कहता
“हार न करना कभी स्वीकार”
आखिर, इस पथ के एक दिन है, सब दावेदार….
रचियता 👉कमल भंसाली👈

🐾संस्कार🐾 कमल 


” संस्कार” शब्द की व्याख्या करने से पहले हमें जीवन की उस अनुभूति के बारे में हर दृष्टिकोण से थोड़ा चिंतन करना जरुरी हो सकता है , जिनमे मानवीय संवेदना अपना अस्तित्व तलाश करती है। आज की भौगोलिक स्थिति में हमारी भूमिका की साख अगर कोई है, तो हमारे “संस्कार”। भारत की सम्पन्नता में आज तक संस्कार की अहम भूमिका रही और आज भी उसकी तलाश किसी ने किसी रुप में की जाती है। इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले हम यह जानने की कौशिश जरुर कर सकते है कि विरासत में मिली यह गुणवत्ता क्या हमारे जीवन में आज भी मौजूद है ? सच्चाई से अगर उत्तर दिया जाय तो कह सकते है, कि अब इसका अंतिम स्वरुप ही हमारे पास है, और वो भी रुग्ण अवस्था में। जरा गौर कीजिये, जिस देश में नारी को देवी और माँ, बहन के रुप में देखा जाता था आज उसकी स्थिति कितनी दर्दनाक हो रही है। जहां परिवारों में माता-पिता और बुर्जगों को सही सम्मान दिया जाता, आज वो अकेलेपन की हतासा के साथ जीवन बिताने को मजबूर हो रहे है। भारतीय जीवन कुछ समय से पहले तक दासता के अंतर्गत ही रहा, चाहे वो राजा महाराजाओं का था, या विदेशियों का, उसके अनुरुप ही साधनों की सीमितता भी थी । देश जब स्वतन्त्र हुआ, तब उसके सामने गरीबी एक चुनौती के रुप में सबके सामने खड़ी थी। देश बंट कर हमें मिला, पर समस्याओं के सहित। हमारी पुरानी संस्कृति के संस्कार की समर्थ भूमिका ने हमारे अभी के जीवन को बेहतर बनाने में अपना बहुत कुछ दाव पर लगाया। कहने को तो हम विकास के पथ पर आज काफी आगे की तरफ जा रहे है, परन्तु बहुत कुछ पीछे छोड़ कर, उन्ही में एक है, हमारे सुखी करने वाले संस्कार, जिनमे साधन कम पर आपसी प्रेम का न सूखने वाला सागर हमारे पास था। कहते है, सुख के कई आधार होते है, जिनमे मानव मन खुशियों के नये नये स्वरुप तलाशता है, मन की यहीं चंचलता उसे दुःख की राह पर ले जाता है। आधुनिक युग आर्थिक सम्पन्नता के साथ नवीन साधनों से सजा है, उसकी भव्यता के सामने सरल संस्कारों की एक भी नहीं चल रही, हर दिन बेदम होकर मर रहे है, हां वो संस्कार आज भी अपनाये जा रहे तोड़ मरोड़ कर, जिनमें भव्यता है।

‘संस्कार’ शब्द का अर्थ होता है, “शुद्धिकरण” और इसका सम्बंध मानव जीवन से एक जन्म से कई जन्मों तक चलता रहता है, जब तक उसे जन्म मरण की प्रक्रिया से छुटकारा नहीं मिलता, उसे हम निर्वाण की स्थिति कहते है, ऐसा हमारे ग्रन्थ बताते है। उनके अनुसार संस्कार के दो रुप हो सकते है, एक आंतरिक और दूसरा ब्राह्म रुप। आंतरिक रुप की रक्षा के लिए रीति रिवाजों का सहारा लिया जाता है, जो हकीकत में संस्कारों का ब्राह्म रुप ही हैं। इनका उद्देश्य की पूर्व जन्म से जितनी आत्मिक उन्नति हुई, उससे हम इस जन्म में आगे बढ़े।

ऐसा मानना है, कि भारतीय संस्कारों का निर्माण ऋग्वेद के अंतर्गत शुरु हुआ। संस्कारों का निर्माण आंतरिक आत्मा शुद्धि के साथ सामाजिक नियमों के तहत हुआ, जिससे जीवन को आनन्दमय और सक्षम धरातल मिले। “कुमारिल ” आठवीं सदी का एक तंत्रवार्तिक ग्रन्थ के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से सक्षम होता है, पूर्व जन्म के कर्मो के दोषों को दूर करने से और नये आत्मिक गुणों के उत्पादन से। संस्कार ये दोनों काम करता है, इसलिए ज्ञानित पुराने भारत में संस्कारों की सदा विशिष्ठ भूमिका रही। गौतम धर्म सूत्र में संस्कारों की संख्या चालीस बताई गई, जिनमे जन्म, मरण, और विवाह सम्बंधित संस्कार ही आजकल ज्यादा नजर आते है, आत्मिक शुद्धि संस्कारों का आडम्बरों सहित प्रयोग करने के कारण अब संस्कारों की श्रेणी में रखने से संकोच आता है।

हमने संस्कार को ऊपर शुद्धिकरण बताया, क्योंकि जीवन को स्वच्छ रखना प्रायः सभी का लक्ष्य होता है, अतः हमारा हर कर्म संस्कारयुक्त हों, ऐसी दिनचर्या को अपनाना हमारा ध्येय होना चाहिए। जब आज हम आधुनिक और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने की कोशिश कर रहे है, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए, संस्कार वहां भी होते है और वहां संस्कार के कई शब्द है, जिनका वो अपने दैनिक कार्य को उत्कृष्ट बनाने में काम लेते है। आइये जानते है, संस्कार सम्बंधित कुछ शब्द :

*IMPROVEMENT * PERFECTING
*REFINING. * AN INBORN POWER OF FACULTY
*A CONCEPT. * INFLUENCE
*INVESTITURE
*WITH THE SA. * ANY OF VARIOUS ESSENTIAL SANCTIFYING OR PURIFICATORY RITES AS THE
FIRST TAKING OF SOLID FOOD
*REFINEMENT. * CEREMONY
*FINISHING. * ADORNING
*SACRAMENT * PURIFICATION
*( साभार इंटरनेट से )

संस्कार को culture और manners जैसे और भी कई शब्दों से पहचाना जा सकता है। शब्दों की ज्यादा व्याख्या करना यहां हमारा ध्येय नहीं है, अतः आगे बढ़े उससे पहले हम यह मान लेते है, जीवन को सुधारमय गति मानव निर्मित शुद्ध संस्कार ही दे सकते है। संस्कार नहीं होते तो परिवारों का प्रेम भरा निर्माण नहीं होता, रिश्तों की सही पहचान नहीं होती, बड़े, छोटों का ज्ञान नहीं होता, धर्म नहीं होता और शायद यह संसार भी व्यवस्थित नहीं चलता। आज समाज चारों तरफ से अव्यवस्थित और तनाव ग्रस्त महसूस कर रहा है, मान मर्यादाओं की आस्था भी कमजोर पड़ रही है, असत्य वचन बेधड़क इन्सान की जबान से फिसल रहे है, हालात इस कदर बिगड़ रहें है, कि आपसी विश्वास पर प्रश्नचिन्ह लग रहे है। आखिर, ये सब हालात क्या संस्कारों के पतन के कारण नहीं हो रहे ? सही चिंतन इसे नकार नहीं सकता।

अंत में एक सवाल सदा ही सबके लिए चिंतन की बात है, जिंदगी किसी को भी बार बार नहीं मिलती, दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां मृत्यु नहीं पहुँचती, खुशहाल जिंदगी संस्कार के पेड़ पर ही उत्तम फल लगा सकती है, इस जीवन को संस्कार ही सही दिशा निर्देश बता सकता है। अति आधुनिक जिंदगी बिन प्रेम अकेलापन, तन्हाई, सन्त्रास, और दर्दीली ही होती है, उम्र की डगर पर। रुपये की अधिकता बिना संस्कार जीवन को साधनों का सुख शायद दे दे, पर शरीर और मन को खोखला कर देता है, तभी हम उन संस्कारों की बात करते है, जिन्हें हम ने अपनाने में लापरवाही की।

भविष्य का अगर सही निर्माण इस युग की जरुरत रही, तो निश्चित तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए, हमें संस्कार को अपनाना है, नहीं जो मिल रहा है, उसे स्वीकार कर लेना ही उत्तम रहेगा।

चार्ल्स डार्विन के अनुसार ” In the long history of humankind ( and animal kind, too ) those learnt to collaborate and improvise most effectively have prevailed. ”

चूँकि, संस्कार जीवन स्त्रोत्र है, हमें विरासत में मिलते है, अतः इनका पालन विनम्रता से किया जाना चाहिए, और हमें अपने बच्चों की शिक्षा में इसे सम्मिलित भी करने चाहिए, जिससे हम उनके साथ अपने जीवन का तालमेल रख सके। यही एक सही संभावना है, भविष्यत जीवन को खुशहाल रखने की।

संस्कारों को सही और उपयोगी रीति रिवाजों में खोजने से कई अमृतमय गुण प्राप्त होते है, जैसे प्रणाम, आशीर्वाद, प्रेम, स्नेह, विश्वास, अंहिसा, सत्य, समृद्धि, ज्ञान, तपस्या, शान्ति आदि, विचार कीजिये क्या इनसे संस्कारित होना अच्छा नही है ?

नहीं तो फिर कबीर के इस दोहें से हमें, अपने आप को सन्तोष देना होगा….

करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय ।
बोया पेड़ बबूल का , आम कहां से खाय ।।

लेखक* कमल भंसाली

●●●नया साल, तलाशते आयाम●●● 【कमल भंसाली 】

आज, हर पल को हम नव पल्लवित करेंगे
नये साल में इनको ही, चारों ओर उन्नत करेंगे
नई आशाओं से जीवन को नया आयाम देंगे
ह्र्दय से देश को सुख, शान्ति का पैगाम देंगे

देश है हमारा, इस जीवन का आशियाना प्यारा
अपने ही घर में हमसे ही न उछले कोई चिंगारी
स्वस्थ माहौल में रहकर हम यह विचार करेंगे
सुखी रहे हम देशवासी, इसका इंतजाम करेंगे

छोटी छोटी बातों से न हो दिल हमारा, ह्र्दयघाती
न ही करेंगे ऐसे कर्म जिससे दुनिया कहे,जज्बाती
देशप्रेमी बन, इसकी सुखी समृद्धि की बात करेंगे
किसी भी बात पर मतभेद हो हजारों, पर न बटेंगे

माँ भारती की हम सन्तान, संस्कारो का दूध पीया
तब खून खराबे क्यों करे, अहिंसा का अमृत पिये
मेहरवानी उसकी, देश को हर संसाधन से सजाया
मन से इसको समझ, गरीबी का भूत दिल से भगाये

साल जितने भी आये, अब इस पल में सम्मलित हो जाए
इस पल की खेती करे, जीवन हमारा महक महक जाए
हम इस देश के वासी, आओं, आज प्रण एक एक कर जाए
वतन हमारा पल पल में निखर, एक सत्य शिखर बन जाए

★★★★■

कामना भी एक, मनोकामना भी है, एक
जन्मों जन्मों रहे, देश हमारा, यही एक
★★★★★
हर जन्म में राष्ट्र गीत गाये, तिरंगा को सदा लहराये
देश प्रेम का धर्म ही, कर्म बन चारों और बिखर जाए

( आनेवाले नये साल की मंगलकामनाओं सहित…..कमल भंसाली )

परिवार…बिखरता दर्द.. भाग…2…कमल भंसाली

परिवार व्यक्तित्व निर्माण में एक अच्छी भूमिका निभा सकता है, इस तथ्य पर वैसे तो कोई शंका का कारण नजर नहीं आता फिर भी निवारण के लिए इतना कहना जरुरी है, कि संसार की महान से महान विभूतियों ने स्वीकार किया है, कि उनकी सफलता में परिवार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। शालीनता का अगर कोई स्कूल है, तो मेरी नजर में परिवार ही है। परिवार आज भी है, पहले भी था और शायद आगे भी रहे, परन्तु क्या परिवार की गरिमा पहले जैसी है, यह चिंतन की बात है, इस पर हमे गंभीरता से विचार करना चाहिए। आखिर एक स्वच्छ और शालीन परिवार कैसे बनता है ? आइये, थोड़ी चेष्टा करते है, समझने की, शायद भविष्य इसकी जरुरत समझे। पहले परिवार सिर्फ इसी नाम से जाना जाता था, सयुंक्त परिवार (Joint Family), बाद में अविष्कार हुआ, छोटा परिवार का (Nuclear Family), दोनों ही हमारी समझ और समय की देन है। परिवार शब्द की जब व्याख्या करे तो हमारे सामने दादा, दादी, माँ, बाप, भाई, बहन और भाभी के अलावा और भी रिश्तों का माहौल नजर आता है, जिन्होंने इस तरह के पुरे परिवार को कभी देखा, निश्चिन्त ही उन्होंने एक पूर्ण प्रेम भरे वातावरण का सुखद अनुभव किया होगा। क्या सब परिवारों में शांति, प्रेम और भाईचारा रहना संभव है ? इस प्रश्न का उत्तर भी सहजता से दिया जा सकता है, जिस परिवार में अनुशासन और त्याग की भावना रहती है, वैसे परिवार प्राय: सुख का अहसास करते है, दुःख की आद्रता इन्हे कमजोर नहीं करती। हमारे हाल ही में हुए दिंवगत भूतपूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक A.P.J Abdul Kalam के अनुसार “अगर कोईं राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त रखकर सुंदर बुद्धिमान राष्ट्र बनाना है, तो परिवार के तीन सदस्यों की अहम् भूमिका का आदर करना होगा, वो है, माता पिता और शिक्षक”। किसी भी राष्ट्र की समृद्धि में परिवार की भूमिका को छोटा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि परिवार बिना संस्कार और सेवा की भावना आना मुश्किल ही लगता है। देश को, समाज को, यहां तक की हर प्राणी को सेवा की जीवन के हर मोड़ पर जरुरत होती है, यह आप और हम अच्छी तरह जानते है।

भावनाओं के सन्दर्भ में परिवार काफी मजबूती प्रदान कर सकता है, अगर सदस्यों का आपसी तालमेल समझदारी पूर्ण हो, और एक दूसरे की कमियों को दूर करने में सहायक बने, तो निश्चित है, परिवार आर्थिक समृद्धि की नई ऊंचाइयां तो छुएगा, साथ में जीवन भी सही आनन्द प्राप्त करेगा। एक कहावत है, “एक अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता”, एकल परिवार के सीमित सदस्यों में एक प्रकार की घुटन अनुभव कई बार महसूस की जा सकती है, क्योंकि उनके पास जीवन का कमजोर अनुभव होता है। आखिर पुराने परिवार को टूट कर बिखरने की नौबत क्यों हुई, तो इस सन्दर्भ में सबसे प्रमुख कारण अति स्वतन्त्रता की चाह और नैतिकता का असन्तुलित होना है। नैतिकता बन्धन रखती है, और थोड़ा सा बन्धन भी आज असहाय लगता है। कुछ लोगो का चिंतन है कि “आर्थिक जरूरत की असीमित्ता और शिक्षा का प्रसार इसका कारण है”। मुझे लगता है, यह मन्तव्य पूर्ण सत्य नहीं है, अर्थ हर काल में प्रमुख रहा है, शिक्षा सदियों से पसन्द की जाती रही है, उसे जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। कमी तो अपनी आस्था में ही नजर आ रही है, इसका कारण भी सुविधाकारी जिंदगी और उसके लिए असत्य का भरपूर प्रयोग, सच तो यही होना चाहिए कि परिवार सत्यता की धरती पर ही फलताफूलता है, वरना नाम मात्र का परिवार होता है।

आज के वातावरण में जो परिवार अपनी क्षमता का सही प्रयोग करता है, वो देश काल में अपनी साख लम्बे समय तक कायम रख सकते है। हमारे देश में भी बहुत से परिवार है, जिनका नाम आज भी शान से लिया जाता है। भारत जातिवादी का देश रहा है, आज भी यहां जाति का ख्याल वैवाहिक सम्बंधों के समय पूरा रखा जाता है, इसका एक सही कारण यह है, कि धर्म, संस्कार के अनुरूप परिवार का वातावरण कायम रहे, हर सदस्य अपने आपको परिवार के वातावरण में सहज अनुभव करे। परन्तु अब यह ख्यालात बदल रहे है, नारी की भूमिका घरेलू कामकाज के प्रति कमजोर पड़ रही है। पहले नारी घर की आंतरिक व्यवस्था को सक्षमता प्रदान करती थी, पुरुष आर्थिक और सामाजिक सीमा का प्रहरी था। आज दोनों ही अर्थ की तलाश में भटक रहे है। शिक्षा जिसमे पहले नैतिकता का समावेश ज्यादा होता था, आज उसने दिमाग को सिर्फ एक ही काम में लगा दिया, अर्थ व नाम की अधिकता कैसे प्राप्त की जा सकती है। निश्चिन्त है, व्यक्तित्व तो कमजोर होना ही था, मानसिक रोगों की बढ़ती गति ने जीवन को अस्वस्थकारी और एकांगी कर दिया। अभिमान को पहले शान कहते थे, जो उनकी विशेष आदतो के रुप में सिर्फ परिवार के भीतर पनपता, उसमे परिवार के हर सदस्य अपनी विशेषता मानता। जैसे कोई परिवार में कोई सदस्य किसी के बड़े बूढ़े के सामने तर्क नहीं करता, तो यह उस परिवार की शालीनता भरी शान समझी जाती। कोई समय था, परिवारों की इज्जत के अनुसार नाई विवाह के सम्बन्ध तय करा देते, एक नारियल का आदान प्रदान ही सम्बन्ध की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त था। आखिर इतना विश्वास पहले कैसे था, जब इसका चिंतन करता हूं, तो गीता का यह श्लोक काफी कुछ स्पष्ट कर देता है।

नासतो विधते भावो नाभावो विधते सत:।
उभयोरपि दृष्टोSन्तस्त्वन्योस्तत्त्वदर्शिभिः ।।

श्लोक का सार संक्षेप यही कहता है, सत्य कभी बदलता नहीं, असत्य ही बदलता रहता है, फिर भी मनुष्य असत्य को ही ज्यादा अपनाता है, वो उसकी ही अधीनता स्वीकार करता है, उसके अनुसार असत्य के बिना काम चल नहीं सकता। पहले हर घर में सुबह की शुरुआत धार्मिक चेतना के अनुसार ही होती थी, और हर सदस्य को बोध रहता था, कि उसके आचरण से परिवार की गरिमा को ठेस न पँहुचे। आज यह सब बातें असत्य ही लगती है, क्योंकि विश्वास की कमी धीरे धीरे दैनिक जीवन में अग्रसर हो रहीं है। यथार्थ में यह आदमी के व्यक्तित्व की एक सबसे बड़ी कमजोरी, परिवार के साथ नहीं चलने से आती है।

ध्यान रहे, इस लेख का उद्धेश्य कतिपय नहीं है, कि पुरानी बातों का गुणगान किया जाय, हाँ यह जरुर प्रयास है, कि जीवन पुरानी अच्छी बातो का मूल्यांकन करता रहे,अपने व्यक्तित्व को प्रखर और उन्नतिमय करे, आखिर जीवन जीने के लिए हमें कुछ समय ही प्रदान किया गया है। जीवन अगर शिष्ट होकर, विशिष्ट बने, तो गलत क्या है ? आज सब कुछ पास होते हुए भी जब आदमी अपनी एक बचकानी हरकत से जीवन का जब गलत रुप समाज के सामने लाता है, तो दुःख का ही अनुभव होता है, कि भूल समय से पहले सुधरी क्यों नहीं ? काश, ऐसे जीवन के पास सुसंस्कृत परिवार का अनुभव होता, तो कोई इंद्राणी अपनी बेटी की अपने झूठ और गलत महत्वकांक्षाओं के लिए हत्या नहीं करती। आज के अनूसार, एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की यह घटना कई प्रश्नो का उत्तर अनुत्तरित ही रख रही है। कहते है, “बिना चिंतन का विकास, विनाश का प्रारम्भ भी हो सकता है”……कमल भंसाली ……क्रमश…