नफरत दिल में इतनी✍💝 कमल भंसाली

नफरत दिल में न इतनी बसाये
कि संसार में अनचाहे बन कर रह जाये
जीना सब का बराबर का हक
हो सके तो दिल को यह बात समझाये
इंसान है इसलिए सही होगा
इंसानियत की राह के ही मुसाफिर कहलाये
नफरत..

हर धर्म यही कहता मैं सब में एक समान सा रहता
तुम फिर क्यों इसे अलग अलग होने का संकेत देते
कितने अच्छे कितने बुरे अगर स्वयं को तुम जान लेते
मैं जीवन का सार बन तुम्हारे आत्मा मे ही सदा बसता
नफरत..

बातें बड़ी बड़ी करके खेल कई प्रकार के खेलते
आडम्बरों की छाया में क्यों इतने पाप को झेलते
स्वयं समझने का दावा कर स्वयं ही अनजान रहते
स्वार्थ में नैतिकता की राह एक कदम भी नहीं चलते
नफरत…

सीधा सा जीवन कम जरूरतों की चाहत रखता
विलासिता के मटमैला चोले में वजूद फंस जाता
हसरतों के वश में आकर वो सब कुछ भूल जाता
माया जाल में फंस जाता वो इंसान नहीं रह पाता
नफरत…

फलसफा जीवन का इतना साँसों का राज जितना
जीना है सही तो हर कर्म में अहिंसा का साथ रखे
सत्य की सीढ़ियों से सफलता की मंजिल को पाना
मानवता ही धर्म इसे ही जीवन भर ये विश्वास रखे
नफरत…..
रचियता✍ 💖 कमल भंसाली

****असहजता के शिकार आपसी सम्बन्ध****भाग 1★★कमल भंसाली

आज संसार अपनी ही तैयार की हुई विषमताओं की खाई में बेठा हजारों तरह से बीमार सम्बंधों के कारण जीवन की मूल्यता का अफ़सोस न कर उन्हें ही आरोपित करने की गलती कर रहा है। अपनी चेतना और संवेदनाओं को शायद वो आज के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिवेश में भूल गया है।

विषय को आगे बढ़ाये उससे पहले हमें दो प्रसिद्ध दार्शनिको के इन कथनो पर जरा गौर कर लेना उचित लगता है। “Epictetus” एक यूनानी स्ट्रोक दार्शनिक थे उन्होंने जीवन का गंभीरता से अध्ययन किया और सिखाया “दर्शन” से जीवन जीने का तरीका सैद्धान्तिक अनुशासन नहीं होता खासकर आपसी नजदीकी सम्बंधों में, जिन्हें आहत होने का खतरा हर समय बना रहता है।

“Clear thinking requires proper training so that we are able to properly direct our will, stick, with our true purpose and disover the conections we have to others and the duties that follow from those relationship”.

Confucius एक चीनी दार्शनिक थे, उन्होंने जीवन के सम्बन्ध में लगभग कुछ ऐसा ही कहा
कि जीवन तो सरल साधा ही होता है, हमारे आपसी सम्बन्ध ही इसे जटिल बनाता है। “Life is really simple, but we insist on making it complicated”

आज हम जिस धरा पर अपना जीवन व्यतीत कर रहे है, वो प्रकृति के नियमोनुसार आज भी हमें सही रास्ते चलाने की कोशिश करती है, जिससे हर प्राणी का अस्तित्व सुखपूर्ण बना रहे। पर हम इस पहलू पर गौर ही नहीं करते क्योंकि हम सच्चाई से हमारे जीवन को दूर ले जा रहे है। मानव मस्तिष्क का अगर तेजी से विकास नहीं होता तो शायद आज भी मानसिक सुख की मात्रा अपनी उत्तमता के साथ प्राप्त करता। महत्वकांक्षा उसके पास उतनी ही होती जितने की वो कामना करता परन्तु वस्तुस्थिति विपरीतता का संकेत दे रही है। आज कृत्रिम आधुनिक साधनों के बाजार से जीवन ऊपरी सतह पर चमत्कारिता भरा उत्साह पूर्ण और सुखी सम्पन्न लगता है, परन्तु भीतर से निरहि, निराशावादी और तन्हाईयों का शिकार हुआ ही है, अगर हम ईमानदारी से इस तथ्य पर गौर करे तो। मानवता का निर्माण कोई एक दिन में सम्पन्न नहीं हुआ न ही आज की सामाजिक व्यवस्था का। मानव विकास की प्रक्रिया और उसके सामाजिक विकास का इतिहास आज हमारा चिंतन का विषय नहीं पर उसके तहत जीवन के सुख दुःख के निर्माण में हमारी आपकी भूमिका की तलाश अब जरूरी हो रही है, क्योंकि जीवन को सुख की छांव देने वाले रिश्ते और सम्बन्ध कई लाईलाज आत्मिक और शारीरिक बीमारियों से ग्रसित हो रहे है। गंभीर चिंतन अगर करे तो भविष्य ऐसीअनहोनी होनें के संकेत दे रहा है कि सबके रहते इंसान अकेला हो रहा है और मानवता धीरे धीरे धरती से अपना नाता तोड़ रही है। इसके क्या परिणाम भविष्य के गर्भ में कहा नहीं जा सकता ? पर कुछ समझा जरूर जा सकता है। आइये, कोशिश करते है, सबसे पहले दाम्पन्त्य जीवन के बनते बिगड़ते स्वरूप का, आज के युग के वातावरण अनुमोदन अनुसार।

सन्दर्भ चर्चा :वर्तमान
देश : भारत
व्यवस्था :सामजिक
चिंतनीय सम्बन्ध : पति- पत्नी
जीवन क्षेत्र : दांम्पत्य जीवन
प्रभावित क्षेत्र : आज का जीवन भविष्य के अन्तर्गत

हालांकि हमारी चर्चा इस महत्वपूर्ण विषय पर है पर संसार निर्माणकारी यह सम्बन्ध आज नई नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। हमारे देश में इस सम्बन्ध से गरिमामय जीवन की पहचान बनती है, ऐसा आज भी विश्वास किया जाता है। पर आज हकीकत कुछ और ही बयान कर रही कर्तव्यों और अधिकारों के चक्रव्यूह में इसका अस्तित्व आत्मिक न रहकर आधुनिक साधनों के अधीन हो गया है। आज के युग को आर्थिक युग का दर्जा देकर हमने कितनी बड़ी गलती की इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में जरुर कहीं न कहीं समाया है। उसके दुष्परिमाणों से पता नहीं हम कब तक अपने आप को बचाने में सफल होंगे, अभी फिलहाल कहना भी कठिन है।

हमारा देश की सामाजिक व्यवस्थायें कई किस्म के रीती रिवाजों से अंलकृत है, अतः पति-पत्नी के बन्धन दिवस पर उत्साह से इस बन्धन को सामाजिक मान्यता दी जाती है और ऐसे सम्बन्ध के लिए उपयुक्त शब्द “विवाह” का प्रयोग किया जाता है। हर धर्म में इसके लिए कुछ शपथों का भी उपयोग किया जाता है, जिससे सम्बन्ध सिर्फ शरीर तक सीमित न रहकर दिल के भीतर अपनी जगह तय कर ले। इस रिश्ते से दो शरीर के मिलन को विधिवत अनुमति दी जाती है, जिससे उनसे पैदा होने वाली सन्तान से परिवार का निर्माण जारी रहे, अतः हमारे धर्म- शास्त्रों के अनुसार ही इस बन्धन को कुछ मर्यादाओं का ख्याल रखने की हिदायत संस्कारों के तहत दी जाती है । जीवन की सुगमता को और सहज करने में विवाह की भूमिका बहुत ही सुंदर और स्वच्छ वातावरण तैयार करनें की होती है। तथ्य कहते है, नारी की गरिमा ही इस रिश्ते को विस्तृता या संकुचिता की ज्यादा जिम्मेदार होती है क्योंकि उसे प्रकृति ने कई संवेदनशील गुण पुरुष से अलग दिए है। नर- नारी दोनों ही जीवन की गति के सन्तुलित पहिये है।

आज नारी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का दावा हम जरूर कर सकते है, पर तथ्य कहते है नारी ने ज्यादा समय नर को समझने के लिये लगाया इससे उसके पास नर की जानकारी ज्यादा सक्षम होती है और पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था में वो उसे व्यवस्थित रखने में सफल भी हो जाती है।
चूँकि आज विवाह विवाद का विषय बन रहा है, कल के बन्धन आज टूट रहे है, रिश्तों के मधुरमय होने से पहले कई तरह के जायज नाजायज कारण विच्छेद की स्थिति तैयारी कर रहे है। सम्बंधों का बनना बिगड़ना आज साधारण सी बात लगने लगी । कानूनी प्रक्रियाओं में दोनों का जीवन
आंशका, भय, डर, ख़ौफ़ से रुग्ण और कमजोर पथ की तरफ अग्रसर होने लगता है। सामजिक कमजोरियों के कारण कानूनी दावपेंच से ही समाधान की कोशिश की जाती है, जिसमे समय, धन, और स्वास्थ्य की बलि निश्चित है बाकी परिणाम अनिश्चित रहते है।

समस्या काफी गंभीर होती है जब काफी सालों का साथ दोनों मे से किसी एक की गलत नासमझी से बिखर जाता है या टूटने के कगार पर पंहुच जाता है। इस तरह की परिस्थितियों का निर्माण एक दिन में नहीं होता पर आसार दिखने के उपरान्त भी कमजोर सामाजिक और पारिवारिक दीवारों के अंदर अंतिम परिणाम का शिकार हो जाता है, जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों के भविष्य पर घातक रूप से होता है। स्वार्थ भरा माता पिता का यह स्वरूप उन्हें अंदर तक खोखला कर सकता है। यहां सवाल जो उभर कर प्रगट होता है, उसमें कोई सभ्य शालीनता नहीं तलाशी जा सकती अतः उत्तर तलासना सिर्फ संशय का शोधन करना ही कहा जा सकता है।

मनुष्य काफी हद तक परिस्थितियों का दास है, दोनों ही प्राणी नर- नारी अपनी शारीरिक सरंचना के कारण स्वतः ही ऐसी स्थितियों का निर्माण कर लेते जो उनको चरित्रमय जीवन से दूर ले जाती है, जहां यथार्थ से ज्यादा अधूरी हसरतों की भूमिका होती है। भारतीय परिवेश के दाम्पन्त्य जीवन में आज अर्थ का महत्व काफी बढ़ गया है। नारी गृह की सशक्त गृहणी की भूमिका के दायरे से बाहर अपनी दूसरी क्षमताओं को तलाशने में लग गई, इससे पारंपरिक गृह स्वामिनी जैसा मान सम्मान की अब मोहताज भी नहीं है। समानता के आधार पर वो आज अपना जीवन साथी तलाशती है।

उपरोक्त चर्चा से यह कभी नहीं समझना चाहिए कि आपसी सम्बंधों में किसी एक की भूमिका की वकालत की जा रही है। जब भी किसी नाजुक सम्बन्ध का अनुशंधान किया जाय तो कुछ सत्यता भरे कटु अंशों को चर्चा में सम्माहित करना जरूरी होता है, अन्यथा बिना निष्कर्ष का ये लेख अधूरा ही रहेगा। इस चर्चा का ध्येय इतना ही कि जीवन पूरक इस सम्बन्ध की गरिमा को बनाये रखने कि जिम्मेदारी मर्द और औरत दोनों की आज के युगानुसार बराबरी की है और इस तथ्य को मानकर ही प्रेम भरे कर्तव्य से इस अटूट बन्धन को जीवन पर्यन्त निभाने का प्रयास करना चाहिए।

तथ्य कहते प्यार में चाहे शर्त न भी हो परंतु किसी भी प्रकार के सम्बन्ध के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। ध्यान यह भी रहे गर्मजोशी में बनाये गये किसी भी प्रकार के प्रेममय सम्बन्ध अति शीघ्र हिम बन पिघल भी सकते है। दिल की भावनाओं में अगर प्रेम की कदर होती है, तो बिना किसी सम्बन्ध के जीवन प्रेम का उपासक बना रहता है, हमारी भावनाओं में इस विचार को कभी भी गहराई नहीं देनी चाहिए कि दिल को तो भगवान ने टूटने के लिये बनाया है। मार्क ट्वैन का कथन इस सन्दर्भ में बहुत ही मार्मिक है ” Never allow someone to be your priority while allowing your self to be their option”। क्रमश….लेखक कमल भंसाली

🍀कर्म का मर्म🍀धर्म के मर्म का दूसरा चरण🌷कमल भंसाली

तय है, “धर्म” स्वयं ही परिभाषित होता है, यह कोई मीमांषा का मोहताज भी नहीं होता। जो लोग दैनिक कर्तव्य को धर्म से जोड़कर जीना चाहते, वहां धर्म उनकी आत्मा की पहरेदारी करता नजर आता है। जीवन सभी को सहजता से जीनें के लिए ही मिलता है, पर इन्सान अपने जज्बातों के साथ उदारता बरतने लगता, तो कठिनाइयों को रास्ता मिल जाता और जीवन अविलक्ष्य होकर अवैध मंजिलों की चाह रखने लगता है। आत्मिक अनुसंधान और उससे अर्जित अनुभव ही एकमात्र इस अवस्था का समाधान हो सकता है। अगर हमारे दैनिक कर्म करनें की प्रवृत्ति में नैतिकता समावेश हो, जो साधारण चिंतन में विश्वास रखने वाले के लिए एक असहज क्रिया है क्योंकि चाहतों का चक्रव्यूह में फंसा मन जल्दी से उसे तोड़ नहीं सकता। ऐसी स्थिति में ‘धर्म’ शब्द ही उसे एक संकेतक चेतावनी जरुर देता है कि अति भोग जीवन की मूल्यता नहीं समझ पा रहा अतःउसे नैतिकता से परिचय कराना जरुरी है। प्रलोभ से घिरा इन्सान अपनी इस जगत की असहज महत्वकांक्षाओं के कारण नैतिकता को महज एक बाहरी ही तत्व समझता है, और भूल जाता है, कि नैतिकता और धर्म एक दूसरे के पूरक है, कह सकते है, उनका ‘चोली दामन’ का साथ है। यहां अब जरुरी हो जाता है यह बताने के लिए की धर्म के दस तत्वों का संगम ही ” नैतिकता” है। बिना कर्म नैतिकता की कोई भी परिभाषा नहीं बनती, सही कर्मों को समझ सही ढंग से करना ही ” नैतिकता” है। चूँकि नैतिकता धर्म के साथ हमारे जीवन से जुडी है, अतः संक्षिप्त में नैतिकता की परिभाषा नीति शास्त्र के ज्ञान और उसके अनुरुप किया जानेवाला आचरण होता है। जिसे हम इंग्लिश में morality, moral और ethics जैसे और कई शब्दों के रूप से जानते है।

ध्यान देने की बात है, अतः गंभीरता के साथ हमें यह स्वीकार कर लेना होगा हर जीवन की एक सीमा रेखा होती है, उन सीमाओं के अंतर्गत हर कर्म की अपनी गुणवत्ता होती है, इस गुणवत्ता के विरुद्ध किया हर कर्म अनैतिक और अधार्मिक गिना जा सकता है। जीवन की सत्यता वो ही समझ सकता है, जो सत्य की सत्ता स्वीकार करनें में संकोच नहीं करता। जिसने संसार या इस सृष्टि की सरंचना की उसने बहुत सोच समझकर मानव की भूमिका तय की है। प्रकृति को हम किसी भी दृष्टि से निहारे, अच्छी लगती इसका एक ही कारण है, सत्य सुंदरता का मालिक है, और संसार में सत्य की चाहत हर किसी को होती है। सत्यता की मजबूती कभी कोई भी झूठ कम नहीं कर सकता, यह बात और है, कुछ समय के लिए वो सत्य से इंसान को दूर कर देता परन्तु सत्य से सामना होते ही वो स्वयं अदृश्य हो जाता पर अपने नुकसान कारी प्रभाव से मानव जीवन की मुश्किलें बढ़ा जाता। कहते है, “झूठ के पाँव नहीं होते” पर दिमाग तेज होता है क्योंकि हर अवगुणों का नेता होता है, अतः उसके चालाक होने पर कोई आश्चर्य भी नहीं होता।

अगर देखा जाय तो हर नैतिकता की कसौटी ‘सत्यता’ ही होती है, आदमी द्वारा कि हर धार्मिक क्रिया अस्तित्वहिन ही रहती है, जब तक वो आत्मा में स्वर्ण शुद्ध “सत्य “को जगह देने के लिए “पूर्ण ईमानदारी” से स्वयं को तैयार नहीं कर लेता। जैसे शरीर अपनी दैनिक क्षुधा शांत करने के लिए भोगवादी बन नाना प्रकार की इच्छायें जागृत करता है, ठीक वैसे आत्मा अपनी पवित्रता की महत्वकांक्षा के लिए हर दैनिक कर्म में एक निष्कलंक सत्य की कामना करती है। हालांकि दैनिक जीवन की परिस्थितया इन्सान को मजबूर और कमजोर बना देती है, और वो आत्मा की कामना पूर्ण करने में अपने आप को ज्यादातर अक्षम ही पाता है। अतः साधारण इन्सान की उपलब्धिया अगर साधारण रहती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये, क्योंकि साधारण और असाधारण का असमान्य फर्क ही तो उसे इस संसार में मान सम्मान का अधिकारी बनाता है।

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रवि: ।
सत्येन वायवो वान्ति सर्व सत्ये प्रतिष्ठतम्।।

( सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है , सब सत्य पर आधारित है )

अगर उपरोक्त श्लोक के अर्थ पर गौर करे तो यही कहना सही होगा की “सत्य ही जीवन” है। झूठ का जंगल कितना ही विस्तृत क्यों न हो जाये, सत्य की समर्थता को वो कभी भी नहीं छू सकता।

हम बात नैतिकता के सन्दर्भ में आगे बढ़ाये तो स्वभाविक है, एक सवाल हमें परेशान कर सकता है, लालच, मोह, क्रोध, स्वार्थ और कई क्षणिक गलत अवस्थाओं में नैतिक तत्वों की क्यों कमी हो जाती है ? यहां हमें कंफ्यूश के उस कथन को प्राथमिकता देनी होगी जब उन्होंने इसी तरह के एक सवाल में जबाब दिया,” Wisdom, compassion and courage are the three universally recognized quality of men.” यानी एक श्रेष्ठ इंसान हमेशा नैतिकता के बारे में सोचता है, साधारण इंसान केवल सुविधा के बारे में सोचता है। तो क्या सुविधाओं को नैतिकता का शत्रु समझा जाय। शायद कदापि नहीं क्योंकि जरुरी सुविधाये इंसानी जीवन के लिए जरुरी है। कहते है ‘अति’ हर साधन की सही नहीं होती क्योंकि उसकी चाह में नकारत्मक तत्व अपना अस्तित्व बोध इंसान को नैतिक चिंतन से दूर करने की कोशिश करते है और देखा गया भी है अति साधनों की भूख कभी तृप्त नहीं होती।

मानव और उसका व्यक्तित्व काफी हद तक एक ही तलाश के मालिक है, जिनकी चाह होती है उन्हें सही उद्धेश्य प्रेरित, आनन्दित जीवन की प्राप्ति हों, और उसके लिए उन्हें संसारिक जीवन धारा की गतिविधि में नैतिक तत्वों का उचित समावेश रखना होगा। चूँकि नैतिकता हर कर्म में लिप्त रहती है, और उसका अदृश्य भाग दैनिक जीवन का मूल्यांकन, देश, समाज, जाती, भाषा, धर्म आपसी मानव सम्बन्धो के दिशा निर्देश के अनुसार तय करता रहता है। नैतिकता का मतलब मानवता की मर्यादा को आत्मिक सुरक्षा प्रदान करना होता है, क्योंकि सृष्टि की रचना करने वाले ने सजीव प्राणियों में सिर्फ मानव को असीमित अधिकारों से साथ सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमता का वरदान दिया है। अतः सृष्टिकर्ता कभी नहीं चाहेगा उसकी गलत धारणाओं का अंजाम बाकी की मानवता को भोगना पड़े।

हमारे सांसारिक साधारण जीवन के सम्बंध में नैतिकता की जो सही परिभाषा Potter Stewart के अनुसार दी जो सकती, वो ” “Ethics is knowing the difference between what you have right to do and what is right to do” है।
क्रमश…..लेखक: कमल भंसाली

💖प्रेम 💔 जीवन निर्माणिक प्रथम तत्व 👉 जीवेश जीवनानंद👈 भाग 2✍ 🍂कमल भंसाली 🍂✍

” जीवन के आनन्द “को परिभाषित करना सहज और सरल नहीं है, इसको महसूस करना ही ज्यादा महत्व पूर्ण है । अगर हम इसकी अनुभूति को ही इसकी परिभाषा मान ले तो शायद कोई अतिशयोक्ति भी नहीं होनी चाहिए क्यों कि सबसे पहली अनुबन्धिता जीवन की शायद हमारे शरीर के अंदर वास करने वाली आत्मा से है। चूँकि जीवन शरीर की उपलब्धि है, अतः शरीर उस पर अपना सर्वेश अधिकार समझता है। शरीर और आत्मा वैसे एक दूसरे के पूरक होते है, परन्तु जैविक अनुसन्धान कहता है, दोनों की भूमिका कभी कभी एक दूसरे के विरुद्ध काम करती है, इसका शायद एक ही कारण हो सकता है, शरीर भोग द्वारा ज्यादा आनन्द कि प्राप्ति चाहता है और अदृश्य आत्मा ज्यादातर त्याग व संयम द्वारा अपना उत्थान चाहती है। फिर भी, दोनों का उद्धेश्य सुख और दुःख का भविष्यत अनुसन्धान ही लगता है। कर्म की धूरी से प्रभावित जीवन ज्यों ज्यों विचरण करता है, तब वो बहुत सारे जैविक तत्वों के सम्पर्क में आता है, जिनको वो अपनी विस्तृतता के सफर का साथी मान लेता है। जन्म से पूर्व और बाद में हर जीवन एक तत्व से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है, और उससे जन्म पूर्व ही अपनी अवधि तक साथ निभाने का वादा भी ले लेता है, वो है “प्यार” जिसे हम प्रेम भी कहते है और इसकी अभिव्यक्ति को एक इंग्लिश शब्द और भी आकर्षक नाम देता है, ” लव” (Love)। प्यार जीवन का सिर्फ दोस्त ही नहीं उसका एक हथियार भी कहा जा सकता है, जिसमें हजारों तरह की शक्तियों के अलावा एक विशिष्ठ शक्ति भी होती है, जिससे हिंदी में “भावना” और इंग्लिश में “इमोशन” ( Emotion) नाम से हमारा परिचय है। परन्तु कहते है ना इस जग में किसे भी पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती, कुछ कमियों का उनमें धरोहित होना जरुरी होता है, क्योंकि प्रकृति विकास की माँ है, और सन्तान की कमियों को छुपाना हर माँ अच्छी तरह जानती है। चूँकि हम हिंदी भाषा में अपनी चर्चा को अंजाम दे रहे है, अतः सही होगा हम इसी भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्द ही ज्यादा प्रयोग करे फिर भी चर्चा की उत्तमता के लिए किसी भाषा से परेहज करना भी उचित नहीं लगता, अतः यहां हम 1880 में विलियम जेम्स के उस सिद्धांत पर भी एक नजर डालना चाहेंगे जिसके अनुसार भावना को सिर्फ मानसिक अवस्था का उत्पादन नहीं मान सकते क्योंकि उसका सम्बंध कहीं न कहीं शरीर कि अवस्था से भी होता है। भावनाओं का “दैहिक सिद्धांत” भी होता है, हालांकि इस सिद्धांत को बीसवी सदी तक कोई समर्थन नहीं मिला पर नई सदी के मनोविश्लेषणकर्ता कच्चिओप्पो, जोसफ ई लिटु और रॉबर्ट ई. जेजाक -कोशिकाविज्ञानी ( न्यूरोलिजकल ) ने विलियम जेम्स के लेख ‘व्हाट इज एन इमोशन’ के द्वारा इस तर्क पर बल दिया गया कि ज्यादातर भावनत्मक विचार का कारण शरीर कि बदलती अवस्थाये होती है। लगभग इसी समय डैनिश मनोवैज्ञानिक कार्ल लेग ने मिलता जुलता सिद्धांत पेश किया इसलिए मनोविज्ञान कि दुनिया में ‘जेम्स- लेग’ के सिद्धांत के नाम से प्रसिद्ध है। इस सिद्धांत और इसके तथ्यों के अनुसार परिस्थितियों के बदलने से काया उत्पीड़ित भावना शारीरिक स्वभाव के कारण सद्द: समय की सीमित अवधि का परिणाम है। ध्यान से गौर करे तो बात हमारे समझ में आ सकती है, क्यों कि हमारे आपसी व्यवहार निर्माण में कुछ इस तरह की स्थितियों से हमारा स्वयं का भी सामना होता है। तथ्यपूर्ण हकीकत समझाती है, जीवन की कार्य प्रणाली को सिद्धान्तों से समझना मुश्किल काम है, क्योंकि जीवन स्वयं एक सिद्धांत यात्रा तय करता है।

भावना की जब हम बात छेड़ चुके है तो यह हमें स्वीकृत हो जाना चाहिए कि हम भी अपने दैनिक जीवन का ज्यादा से ज्यादा समय भावना द्वारा उत्पादित कर्मों को ही देते है। कहते है प्रेम के पंख नहीं होते पर यह उड़ता ही रहता है
यह धरातल से उड़ता हुआ अनन्त की ऊंचाई पर जाने वाला उपग्रह बनना चाहता है। इस तरह कि स्थिति मानव जीवन क्या देवताओं तक को नसीब नहीं हो सकती, इसके अनेक कारणों में एक कारण है, जीवन में कुछ नकारत्मक तत्वों का सहज प्रवेश कर जाना, उनमें एक तत्व “स्वार्थ” जो आत्मिक आनन्द की उच्चता सहन नहीं कर सकता। हम अपने जीवन का अगर धीमी गति से अवलोकन करे तो यह सहज समझ में आनेवाला कारण हमारे प्रेममय जीवन का असाध्य रोग के
स्वरुप में नजर भी आ जाता है, जो आत्मा को स्वस्थ सांस नहीं लेने देता। इंसानी लाचारिया इतनी कमजोर होती है, वो अपनी महत्वकांक्षाओं के कारण काया का साथ जल्दी छोड़ नहीं पाती। गौर करे, हम अपने जीवन पर तो तथ्य झुठलाना सहज नहीं होगा कि “त्याग” रुपी इसकी औषधी का हमनें बहुत कम बार प्रयोग किया है, पर जिसने भी अपनी जीवन शैली में इसका प्रयोग किया उसने निश्चित ही अपनी आत्मा को जीवानन्द का अमृत रस पिलाने का आभास हुआ है। ‘प्यार’और ‘आनन्द’ दोनों ही आत्मिक और शारीरिक ऊर्जाओं के सार्थक उच्चतम परिणाम है, और सार्थक जीवन का सही अनुभव है, जिसने भी जितने क्षण इस स्थिति का अनुभव किया है, निसन्देह उसे अपना जीवन अमृत तुल्य, मूल्यवान और कीमती होने का अहसास जरुर हुआ है।

एक क्षण का चिंतन अगर सहजता से किया जाय तो हम नहीं नकार सकते कि प्रेम बिना जीवन अस्तित्व विहीन होता है और आनन्द से दूर हो जाता है। अगर जीवन की आंतरिकता के बारे में हम बात करे तो ये स्वीकार करनें में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि हमारे अस्तित्व की बुनियाद में भी कुछ दुर्लभ प्यार भरे क्षण ही थे, जिनसे हम कभी कभी महत्वपूर्ण हुए है। हम प्रायः कहते है, हमें भगवान (God) या सर्वेशर ने बनाया जो स्वयं भक्ति प्रेम का भूखा होता है, यानी प्रेम ही भगवान है । धर्म, जाति, और रीती -रिवाज आदि जन्म के बाद के तथ्य है, ये जीवन को जन्म लेने के बाद ही अपने अंकुश में रख सकते है। उस से पहले प्रेम ही एक मात्र सक्षम क्रिया है, जो जीव निर्माण में अपना अस्तित्व जन्म से लेकर मृत्यु तक कायम रख सकती है, इसी प्रेम का सहायक तत्व “स्नेह” है, जिससे भावुकता का काफी अंश समाया रहता है, पर इसकी विशेषता भी विचित्र है यह कमजोर होते हुए भी नकारत्मक चिंतन नहीं रखता परन्तु भावुकता का अंश जब ज्यादा ग्रहण कर लेता है, तो अंचाहें दुःख भरे परिणाम जीवन को आपसी रिश्तों के अंतर्गत दे ही देता है।

प्रश्न कभी भी हमारे जेहन में आ सकता है या आता होगा जब जीव निर्माण प्रेममय तत्वों से होता है, तो नकारत्मक विचारो और गलत आदतों से क्यों प्रभावित होकर मानव स्वयं को दुःख की गंदी और तकलीफ भरी पगडंडियों की यात्रा कराता है ? उचित प्रश्न का उचित उत्तर तलाशने के लिए हमें भी कुछ तत्वों के आंतरिक स्वभाव का सही और सार्थक अध्ययन करना उचित समझना होगा। हम इस विषय पर शीघ्र ही फिर आयेंगे, तब तक नीचे लिखे वाक्यों पर जरुर चिंतन कीजियेगा जिनमे जिंदगी के कुछ सूक्ष्म प्रश्नो का उत्तर हम तलाश कर सकते है।
” Love is an Emotion experienced by the many and enjoyed by few” या फिर “एक मुस्कराहट हजारों रोमांचित करने आनेवाले क्षणों की आहट” दोनों वाक्य में जिंदगी की आस्था तलाशिये, आपको “जीवेश जीवानन्द ” की सार्थकता शायद समझ में आ जाये और आप इस विषय की चर्चा में लगातार अपना सहयोग देते रहे। क्रमश…..लेखक ✍कमल भंसाली

🐓 मुक्तक🐔 कमल भंसाली🐰

प्रशंसा का भूखा संसार, भूल गया सत्य का प्रकार
अभिमान की वेदी पर स्वाहा,आत्मा कर रही चीत्कार
पन्थों में उलझा धर्म तलाश रहा, अपना स्थायी आधार
अभिमान में गिरा इंसान,भूल गया मानवता का सत्कार
😢😢😢
बात बड़ी हो या छोटी हर एक होती है, मूल्यवान
इनकी कीमत से ही होती हर इन्सान की पहचान
जिसके पास अपने वचन का सही मोल नहीं होता
कितना ही कुछ न हो पास, वो सही इंसान नहीं होता
🐳🐳🐳

स्वार्थ की गगरी कितनी ही भरले कोई भी इंसान
तख्त ताज की दुनिया में सब के सब रहते फकीर
राजा हो या रंक, लेकर आते आधी अधूरी तकदीर
रुप रंग सब बिगड़ जाते, जब आते अति बुरे दिन
🐤🐤🐤
जग के रुप अनेक, कौन सही, कौन गलत
समय ही करता तय, कौन शत्रु, कौन भगत
रिश्तों से अच्छी होती, प्यार भरी सच्ची दोस्ती
निभ गई तो जिंदगी तन्हाई का दर्द नहीं भोगती
🐢🐢🐢

पुत्र हो पुत्री, जो माता पिता को नहीं मानते
वो पिछले जन्म के शत्रु, बदला लेने ही आते
सुख की बूंद में, कितना दुःख समाया रहता
चाहत की दुनिया में, प्रेम सदा पराया ही रहता
🐍🐍🐍

भले का ही भला होता, सत्य ही रहता सिर्फ अचल
जिसने मर्म जीवन का समझा, वो कहलाता इंसान
दूसरे के लिए जीना ही है, एक सही सच्चा जीवन
विश्वास में जो खरा, वो जग के कीचड़ मे “कमल”

रचियता**🌺कमल भंसाली🌺

🚸सुख अनजान, दुःख की पहचान🚸कमल भंसाली😂

आज मानव के पास अति आधुनिक जीवन जीने की हजारों कल्पनायें है, पर जीने के लिए उसकी यह कल्पनायें क्या उसे कोई सुख का अनुभव दे रही है ? प्रश्न बड़ा पेचीदा है, इसका कोई अचानक उत्तर नहीं दिया जा सकता। सबसे पहले हमें यह तय करना होगा कि क्या सुख का चाव सभी को होता है ? इसका जबाब कम ही नकारत्मक आये, क्योंकि हर जीवन सुख की तलाश में ही रहता है। मानव, वर्तमान के सुख से अनजान होकर, अपने अनिश्चित भविष्य की तलाश में प्राप्त सुख की गरिमा भूल जाता है, और दुखी जीवन व्यतित करने लगता है। आखिर ऐसा क्यों होता है, इसकी विवेचना हम जरुर करेंगे, परन्तु उससे पहले हमें अपने आपको अंदर तक तलाशना होगा। वैसे तो सुख दुःख की कोई सटीक परिभाषा हम नहीं कर सकेंगे, क्योंकि दोनों ही अनुभूति है, दोनों ही बाहर की कोई सूरत नहीं रखते। कुछ मनोवैज्ञानिक का मानना है, सुख एक अनुभति है, दुःख यथार्थ है। सुख अहसासित होता है, अतः शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता, पर जिस दुःख में कारण की तस्वीर होती, अतः उसको को व्यक्त किया जा सकता है।

सुख, दुःख जीवन के दो आधार बिंदू है, इसके चारों और हमारे जीवन का तानाबाना बंधा है। ये दोनों ही नहीं होते तो शायद हम जीवन को व्यवस्था देने में अक्षम होते। जीवन की साख कर्म है, सकारत्मक कर्म सुख के क्षणों का निर्माण करे, ऐसा कोई प्रायिक सिद्धान्त नहीं है, पर आत्मिक शक्ति को जरुर सक्षम करता है। जीवन को जीना हम सबकी जरुरत है, पर उसे किस तरह जीना, एक उद्धेश्य है, अपने उद्देश्यों को समझ कर सही दिशा देना हर एक का कर्तव्य है। जो जीवन को सही दिशा की ओर ले जाने का चिंतन करते है, उन्हें सुख के अनगनित क्षण की प्राप्ति होती है, जो इस से भटक जाते है, कहना न होगा उन्हें दुःख के तंग गलियारों से ज्यादा गुजरना पड़ता है। दुःख को अगर हम त्रासदी न समझे, तो वो अनुभव बन कर हमारे लिए सुख के आधार की बुनियाद रख सकते है। परन्तु, ये इतना आसान भी नहीं कह सकते क्योंकि इसके लिए प्रचुर धैर्य की जरुरत होती है, और आज के तेज जीवन से इसकी आशा आखिर कितनी की जा सकती है ? मानव मन जब तक अति साधनों की आंकाक्षाओं से दूर रहता है, तब वो आंतरिक सुख की अनुभूति को ही ज्यादा प्रमुखता देता है, क्योंकि जीवन का पहला सुख तो काया की स्वच्छता और स्वास्थ्य में ही समाया है। इस सुख की विशेषता कह लीजिये की इस पर हर प्राणी का समान अधिकार है, और सब इसका आनन्द अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को संयमित और कर्मप्रधान कर ले सकते है, शर्त इतनी है, कि इसके प्रति सदा जागरुक रहना होगा। सुख की गिनती में इसको प्रथम रखना काफी समझदारी है, क्योंकि यही बाहरी और भीतरी सुख का अहसास कर आत्मा से आनन्द और दुःख की पहचान करवाता है।

हम सब अपने जीवन को सुखी करना चाहते है, यहां तक सब ठीक है, पर जब सुख की अति मात्रा की इच्छा हो जाए, तो दुःख की शुरुआत हो जाती है, यानी हम ही नैसर्गिक दुःख को छोड़कर, प्रायः सभी दुःख के स्वयं निर्माता है। तय है, दुःख ऊपर से नहीं आता, हम ही अपने अंदर भ्रमित हो कर इसे जन्म देते है। घटनाओं का घटना सृष्टि की लय है, हमारा कोई भी हस्तक्षेप इनको रोक नहीं सकता, जब हम किसी घटना से खुद को प्रभावित मान लेते है, तो दुःखी हो जाते है। मानव स्वभाव की विचित्रता ही समझिये कभी दुःख नहीं भी हो तो हमारे लिए अपने बनाये सामाजिक रस्मों रिवाजों के कारण दुःख का प्रदर्शन करना स्वभाविक हो जाता है, हालांकि हमारी आत्मा में उस दुःख की एक भी बून्द नहीं होती। कहते है, अभिमानित और निराश आदमी के पास दुःख की दुकान होती है, उसे सुख कम पसन्द होता है, वो सुख में दुःख की तलाश करता रहता है।

आज आर्थिक युग है, साधनों का भी युग है, सुख और दुःख की छोटी सी परिभाषा इनमे से कुछ लोग निकालते है, जहां अर्थ कमजोर हों और साधन कुछ हाथों में ही ज्यादा दिखता हो तो जीवन दुःख का दर्पण ही बन जाता है। इसकी कमी से जीवन निराशा के सामने समर्पण कर सकता है। अर्थ कमाना एक बाहरी सुख का निर्माण जरुर कर सकता है, परन्तु इस बात की गारन्टी नहीं दे सकता की ज्यादा कमाने से ज्यादा सुख का अनुभव किया जा सकता है। सुख को पुण्य से सहज प्राप्त किया जा सकता है, पर,ज्यादातर पाप कर कमाने वाला अर्थ यह यह दावा नहीं कर सकता। भारतीय जीवन दर्शन में अर्थ को तीसरा सुख जरुर माना, परन्तु ह्रदय से नहीं, मजबूरी से, क्योंकि साधनों से जीवन को गति मिलती है, और नियमित जीवन को लय मे रखने से ही जीवन अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर हो सकता है, इसे हम युग की जरुरत कह सकते है। साधन,जीवन शैली तो प्रदान कर सकते है, इसमे शंका नहीं, पर मन को कमजोर भी करते है, इसे आप और हम अच्छी तरह हर रोज अनुभवित होते है। जीवन युग के अनुसार जीना जरुरी होता है, आज साधनों की जरुरत हर पल रहती है, उनसे पलायन नहीं किया जा सकता, तय है। साधनों का जब हम ज्यादा प्रयोग करते है, तो उनके रख रखाव और उनके उपयोग को बेहतर करने के बाद इंसान के बाद समय ही कहां मिलेगा ? जब शरीर अपने सुख के लिए ही सब समय का दान मांग लेगा तो बेचारा मन उपेक्षाओं के कारण कैसे शांत रहेगा ! जब हम अपनी जीवन शैली को नहीं बदलेंगे तो निश्चित है, इस युग में दुःख शब्द का प्रभाव भी बढ़ेगा। आज आपसी प्रेम, स्नेह, की कमी से निर्भीक जीवन जीना मुश्किल हो रहा, पर फिर भी इंसान अर्थ और साधनों की प्राप्ति के लिए सबकुछ भूलकर दौड़ रहा है, बीमार होकर डाक्टर को अपना दुःख हर रोज सुना रहा है। कैसी है, हमारी यह समझ जीवन के प्रति, क्या यह चिंतनमयी चिंता नहीं है ? सोचिये……

शारीरिक और आर्थिक सुख के अलावा सबसे महत्व पूर्ण एक सुख और भी है, जिसे हम मानसिक या चारित्रिक सुख भी कह सकते है। सबसे अहम् सुख और जीवन उद्देश्य वाला यह तत्व काफी उपेक्षित सा रहता है, दैनिक प्रक्रिया में इस सुख का अहसास जब भी होता है, तब यह साधनाओं से पाये जाने वाले सुख पर काफी भारी पड़ता है। शरीर की लाचारी को नियंत्रित करने के लिए चरित्र की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। चारित्रिक ज्ञान आंतरिक उन्नति को सफलता की ओर अग्रसर भी करता है। चरित्र की दृढ़ता हमें सुख का स्थायी आत्मिक आनन्द तो प्रदान करता है, उसके साथ दुःख को सहजता से सहन करने का अनुभव बढ़ाता है। चूँकि चरित्र जीवन के सुख का आधार स्तंभ समझा जाता है, अतः इसमे उन्ही तत्वों का समावेश जरुरी है, जो पवित्र होते है। पवित्रता जल की तरह निर्मल होती है, उसमे गलत विचारों की गन्दगी जितनी कम पड़ेगी, वो उतनी ज्यादा प्रभावकारी साबित हो सकती है। सत्य, प्रेम, स्नेह, नम्रता, संयम, धर्म, ज्ञान, साधना, दान, त्याग, अंहिसा और भी कई गुणकारी कर्म पवित्रता के तत्व है, इनका दैनिक जीवन में जितना ज्यादा प्रभाव रहेगा, उतना ही सुखमय जीवन हम जी पाएंगे। इस धारणा को हम ज्यादा महत्व नहीं दे सकते है कि भाग्य से ही सुख दुःख मिलते है, क्योंकि इस तरह का चिंतन निराशावादी ज्यादा पसन्द करते है। कर्म प्रधान जीवन अगर बिना अभिमान के जिया जाय, तो निसन्देह दुःख सुख दोनों की चर्चा शायद हमे इस तरह नहीं करनी पड़े। अभिमान, घमण्ड, असत्य, घृणा, हिंसा, स्वार्थ, अनियमितता, लालच, अति वासना, ईष्या, द्वेष, अनादर, अधार्मिक कार्य तथा और कोई भी नकारत्मक तत्वों से जीवन जब तक बचा रहता है, तो कोई भी दुःख अगर आता है, तो भी वो अहसासित नहीं होता, और जीवन अपनी सक्षम गति कायम रखता है।

वैसे कहा गया है, जीवन में तीन सुख जरुर होने चाहिए, पहला सुख, निरोगी काया, दूसरा सुख माया, और तीसरा सुख चरित्र । कहावत है, पहला व दूसरा सुख अगर कोई कारण साथ नहीं निभा पा रहा है, तो डरने की बात नहीं वापस पाया जा सकता है, परन्तु तीसरा सुख अगर चरित्र नहीं रहता तो फिर हमारे पास शून्य भी नहीं बचता । परन्तु देखा जाता है, चरित्र शब्द माया के सामने फीका दिखाई देता है, पर वास्तव में शायद यह हमारा भ्रम हों क्योंकि जब दुनिया से विदा लेते है, तो हमारे नयनों में अपनी चरित्रिक गलतियां के अफ़सोस का गम, मौत का ख़ौफ़ बन सकती है।

जब हम दुनिया में आते है, तब पहली ख़ुशी का परिचय हम रोते हुए माँ के वात्सल्य से पाते है, जिससे हम आश्वस्त हो जाते है, कि हम अकेले नहीं पूरी दुनिया हमारी है। धीरे धीरे जब जीवन प्रगति की तरफ बढ़ता है तो तीनों सुख के सहयोग से एक सुख और हमारी महत्वकांक्षा बन जाता है,जिसे हम “सामाजिक सुख” कह सकते है। इस सुख में आत्मा का अगर वास रहें तो जीवन उच्चतम शिखर पर विराजमान होकर मानवता प्रेरक बन सकता है, इसमें सिर्फ यही ध्यान रखना होता है कि किसी भी प्रकार का अवगुण इसे कंलकित नहीं करे। इसका वर्तमान सच्चा उदाहरण कोई निस्वार्थ संत ही हो सकता है, जैसे “मदर टरेसा”। अगर वहां तक जीवन नहीं भी पँहुचे तो कम से कम आत्मसन्तोषक तो होना ही चाहिए।

दोस्तों, इस लेख का उद्देश्य सिर्फ जीवन की क्षमताओं को समझना मात्र है, आप और हम इस संसार में आये जब से दुःख, सुख की माला हर पल फेरते है, यह जानते हुए भी कि काफी सुख को दुःख में हम ही परिणित करते है, उसका प्रमुख कारण हम अपनी गलतियों को नजर अंदाज कर दूसरों की गलतियों का विश्लेषण करना है, काश, हम इससे बच सकते । ध्यान रहे, यह सिर्फ एक चिंतन की चर्चा है, सब तथ्य सही हो, दावा नही करता । वैसे, आप जानते ही है, दुःख वो नहीं जो हम अनुभव करते है, दुःख वह है, जो हम से दूसरों को अकारण मिल जाता है, इसलिए मुस्कराते हुए आनन्द लोजिये, और सुखी रहिये.. गुनगुनाइए

राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है,
दुःख तो अपना साथी है ( फ़िल्म दोस्ती )……..बाकी फिर कभी…..लेखक कमल भंसाली

🚩सुख निर्माण 🙋कमल भंसाली

दुःखी मन सुख की चाह न कर
ये संसार सिर्फ तुम्हारा ही नहीं
जो मिल रहा उसी पर गुजारा कर
परछाइयों का कोई अस्तित्व नहीं

आशा निराशा जीवन की डगर
चलते रहना, छोटा सा है, सफर
कोई नहीं अपना, न कोई पराया
रिश्तों की माला में दुःख समाया

बन्धित रिश्तों में दुःख बेशुमार
जलन ज्यादा, मन रहता बीमार
जो तेरा पिछले जन्म का उधार
चुकता करता, इस जन्म का प्यार

लेन देन में रचा गया मिथ्या संसार
कैसे बन सकता सुख का आसार !
तेरे मेरे की बुनियाद में उलझा प्यार
ख़ुशी के कुछ पल ही करता तैयार

भोले से मन बिन पर्यश्रु कर यह स्वीकार
निस्पृह आत्मा ही है.सुख का दृढ़ आधार
मुस्करा कर दे दे, भ्रमित अंधेरों को विदा
“त्याग” ही सुख निर्माणक , याद रख सदा

रचियता….कमल भंसाली