👏मेरे प्रभु👏कमल भंसाली✍️

हे प्रभु
खूबसूरती मेरे जीवन को दीजिये
मेरी सारी कमियों को हर लीजिये
पथ की कठिनाइयों को दूर कीजिये
महत्व जीवन का सब समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
जिसे अभी तक जीवन समझता रहा
आपको भूल रास्ते नये तलाशता रहा
उनकी हर कमी को ही अपनाता रहा
इस भूल को मेरी आज सुधार दीजिये
👏
हे प्रभु
मानव मन मेरा सदा कमजोर रहा
वासनाओं के फूल ही सूंघता रहा
संयम ही जीवन है ये भूलता रहा
इस भूल का निदान समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
असत्य की धुरी पर घूमता रहा जीवन
पथ भटका न मिली कोई सही मंजिल
आदर्शों के गीत तो सदा ही गाता रहा
पर अपनाने से हरदम ही कतराता रहा
जीवन की सही मीमांसा समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
जीवन आपका दिया है पवित्र वरदान
समर्पण आप में ही रहे जब तक रहे प्राण
जिस विधि से करुं मैं सही से वापस प्रयाण
उस यज्ञ की सारी रस्में आज समझा दीजिये
👏
हे प्रभु
सकल सफल रहे मेरा यह अनमोल जीवन
हर पथ आपको समर्पित होकर बने पावन
इस जन्म की हर पीड़ा का हो यहीं समापन
गमन पथ को अब मेरी मंजिल समझा दीजिये

👏🏼रचियता और प्रार्थना कार✍️ कमल भंसाली👏

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☃आधुनिक जिंदगी⛄ कमल भंसाली

मासूम सी जिंदगी
आधुनिकता में खो गई
बड़ी होकर छोटी हो गई
अपने होने का मकसद भूल गई
कल की चिंता में
आज का सवेरा भूल गई
अपने अंधेरों में
चन्द क्षण
चमकते जुगनुओं का शिकार हो गई
छोटी सी….

अनजानी सी
बन रहती
थोड़े से पल मिले
वो भी अनिश्चित
फिर भी कहती
अभी मंजिले और भी ओ
लक्ष्य और भी
आज नहीं कल मेरा
सब कुछ हासिल कर लू
तो चैन की सांस लू
पर मन नहीं करता उसका
कभी अपना वजूद भी तोल लू
मासूम सी..

आज की जिंदगी
हसरतों को दोस्त कहती
संयम को दुश्मन समझती
तन के प्रेम में आत्मा को रुलाती
रंगीनी के झूले में मदहोश सी रहती
संस्कारों को पुरातन जूठन समझती
रोज दुःखी हो सुख का अभिनय करती
अति के ताप से खराब मशीन बन जाती
अनुपयोगी हो कबाड़ खाने की शोभा बढाती
अपने होने के अहसास को खांस खांस ढ़ोती
आधुनिकता की दौड़ में निस्सहाय हो योंही गुजर जाती
बिन संस्कारों के रह कितना कुछ अफसोस कर जाती
रचियता✍ कमल भंसाली

” प्यार और वासना” ….एक चिंतन भरी चर्चा..भाग 2 अंश 2 ★★कमल भंसाली ★★

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“वासना” शब्द कि विडम्बना यही है, एक जायज क्रिया के साथ नाजायज की तरह व्यवहार किया जाता है। अंदर से सबका इससे आंतरिक रिश्ता होते हुए भी, इस के प्रति अवहेलना और तिरस्कार पूर्ण नजरिया रखते है। आखिर, वासना से इतनी घृणा क्यों ? क्या वासना प्रेम की एक जरूरत नहीं, क्या वासना आकांक्षाओं का सुंदर स्वरुप नहीं है ? ऐसे और भी सवाल है, जिनके उत्तर हम यहां तलाशने की कोशिश करते है, पर उससे पहले हमें वासना का सही परिचय प्राप्त करना होगा। वात्सायन ऋषि थे, उन्होंने वासना एक स्वरूप कामवासना के बारे में बहुत कुछ लिखा, उन्होंने भी स्वीकार किया, बिना वासना प्रेम का अस्तित्व नहीं है, हकीकत में बिना वासना प्राणी जीवन धरती पर आ नहीं सकता। ये संसार बनानेवाले की महत्व पूर्ण चिंतन का वास्तविक कारण है, अतः वासना शब्द से नफरत करना कहीं भी जायज नहीं लगता। यहां यह बताना जरुरी है, अभी, हम यहां कामवासना नहीं, सिर्फ वासना के बारे में बात कर रहे है। दोनों में बुनियादी फर्क इतना ही है, काम का शरीर से, और वासना का मन से सम्बन्ध है। अतः कामवासना का मतलब हुआ, मन की दैहिक या शारीरिक वासना। जब की वासना का इंगित रुख सिर्फ मन और आत्मा से जुड़ा है, जिसे इंग्लिश में हम “Lust” के नाम परिचित है, हालांकि दोनों जीवन साथी है।

वासना का शाब्दिक अर्थ पर बिना गौर किये, उसके बारे में सही मूल्यांकन प्राप्त करना असंभव है, वासना का सही अर्थ है, कामना, इच्छा ( जैसे मन की वासना ), भावना ( जैसे काम वासना ), अज्ञान, ( जैसे वासना का तिरोहित होना )। गौर कीजिये, कौन सा प्रेम है, जिसमे कामना, भावना और अज्ञान का समावेश न हों। किसी भी रिश्ते के प्रेम में इसके किसी एक तत्व का समावेश तो रहेगा। माँ के रिश्ते पर गौर करे, तो इसमे भविष्य की सुरक्षा तिरोहित है। हमारी विडम्बना है, हम सत्य से दूर भागते रहते है, उसका सामना करना, हमारे वश कि बात नहीं है। हम प्रेम की बात करते है, पर जब वासना से सम्बंधित कोई चर्चा आती है, तो मानों हम असभ्य लोगों के प्रदेश का सफर कर रहे है। समझने की बात है, शरीर प्रेम से बना है, और जिंदगी भर प्रेम पाने में अपना अस्तित्व खो देता है, ज्यादातर असफल होकर इस संसार से विदा भी हो जाते है। असफलता का एक ही कारण है, उसने प्रेम में तो वासना को ढूंढा, पर वासना में प्रेम ढूंढने से वो कतराता रहा। मूल के प्रति उसका लगाव कम होता, ब्याज के आकर्षण में ही फंसता है, यह मानव स्वभाव है।

वासना शारीरक और मानसिक क्षमता को पूर्ण करने वाला महत्वपूर्ण सूत्र है, इसकी अवहेलना करना, अपने अस्तित्व को नकारना जैसा है। शरीर सम्बन्धी वासना एक दैहिक क्रिया है, इसके अलग अलग स्वरुप है। भारतीय संस्कृति इसके एक ही स्वरुप को मान्यता देती है, वो है, पति-पत्नी के रिश्तों में, जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त हो गई है। पर, वास्तिवकता यहीं है, अब यह एक विश्वास का प्रश्न है, जिसका उत्तर भी शायद सही न हो, पर यह सही है, आज रिश्तों के दूसरे दायरों में भी इसे स्वीकार किया जाता है। दैहिक वासना का स्वरूप आधुनिकता ने इतना बिगाड़ दिया, की समलैंगिता के सम्बंधों की मान्यता के लिए आंदोलन होने लगे है, कई देशो में जिनमे हमारा देश भी शामिल है, उन्हें मान्यता देने के करीब पँहुच रहे है। हकीकत यही कहती है, जो भी कर लो, अपने स्वार्थी आयाम बदल लो, पर प्रकृति अपने उद्धेश्य से कभी नहीं भटकती है, मानव भटकता है, और अपना नाश वो खुद ही अपनी हरकतों से खुद ही कर लेता है। चूँकि हमारा यह विषय यहां नहीं है, अतः हम इसे वक्त के ऊपर ही छोड़ देते है। बाकी हम को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए, कि वासना से हम भी वंचित नहीं रह सकते, परन्तु उचित और अनुचित के दायरे में रहे, तो जीवन निर्णायक पथ का हकदार बन जाता हैं।

वासना का मनोज्ञान करना है, तो “आत्मा” शब्द पर आस्था जरुरी है, जो इस सरंचना के पक्ष को नहीं पहचाने की कोशिश करते, उनके लिए वासना दरिंदगी से ज्यादा कुछ नहीं हो सकती, हकीकत में वो सामाजिक सुरक्षा पर आक्रमण करने वाले दानव बन जाते है। काम, शरीर की स्वभाविक और प्राकृतिक क्रिया है, सुंदरता से काम विचलित होता है। काम जब संयमित नहीं रहता, तो उसका सौंदर्य बोध अपराधिक आकार में बदल जाता है, और अत्याचार और दुराचार की सारी सीमाये लांघने की कोशिश करता है। आत्मा की पवित्रता इसे रोकने की जबरदस्त कोशिश करती है, धर्म के प्रति आस्था की बातें समझाती है, इसके बावजूद भी अगर वासना का रुप नहीं बदलता, तो मानवता को अनिष्टता झेलनी पड़ती है। आज साधनों की अतिरिक्तता ने हमारी चाहतों पर तेज गति के पंख लगा दिए है, हमारी इच्छायें अनियमित हो रही है, काया को सुखी करने माया की जरुरत बढ़ रही है, तब हमें समय कहां, ये चिंतन करने का कि नैतिकता हमारी आत्मा में किधर सो रही है।

जेस सी स्कॉट के अनुसार “मानव कला का बेहतरीन नमूना है”। कुछ मानको में ऐसा ही लगता है, बनाने वाले ने उसमे हर तरह के रंग का प्रयोग किया है। जब चित्र सुंदर हो तो निश्चित है, उसकी चाहत सभी को होती है, नारी-पुरुष का शरीर जब कलाकार की उत्तम कृति हो, तो चाहत को वासना के सन्दर्भ ही मूल्यांकित करना ठीक होगा, प्रेम तो भीतरी तत्व है, उस में चाहत को तलाशना, सही नहीं कहा जा सकता। नो रस से बना प्राणी, किसी भी रस से अछूता कैसे रह सकता है ? ज्ञानी से ज्ञानी आदमी कह नहीं सकता, उसके पास एक भी चाहत नहीं है। जयशंकर प्रसाद का एक काव्य ग्रन्थ ” कामायनी” है, उनकी इस रचना की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है, हमें अहसास दिलाता कि मानव मन का दर्पण गुण और अवगुण नहीं दिखाता, वो तो उसकी सही मानसिकता की पहचान कराता है, समयनुसार वो उनसे अपनी बुद्धि और विवेक से उनसे अपना श्रृंगार करता है। फ्रायड ने वासना को दैहिक जरूरत माना, और उसने इसकी सीमित स्वतंत्रता को उचित ठहराने में कई परीक्षणों का उदाहरण दिया। कार्ल जुंग स्विट्जरलैंड के एक प्रतिभाशाली मनोवैज्ञानिक और धर्म शास्त्रों के जानकार थे, शुरुवाती दौर में वो फ्रायड के मनोविज्ञान के ज्ञान से प्रभावित थे, परन्तु वो उनकी इस बात से कभी सहमत नहीं हुए कि मानव वासना एवं अन्य इच्छाओं का दास है। 1937, में जुंग भारत आये, और महर्षि रमन के सानिध्य से समझ गए कि ” मानव के भीतर असीमित शक्तियां है, यदि वासनाओं एवं इच्छाओं का रूपांतरण कर दिया जाय तो मानव जीवन एक अनमोल वरदान साबित हो सकता है”।

प्रेम और वासना दोनों को समझना आसान नहीं होता, ऊपरी सतह पर हम इनका विश्लेषण आत्मा और शरीर की प्रक्रिया के रुप में ही करते है, पर जब कभी हमें प्रेम को कसौटी पर कसना पड़ता है, तो हमें लगाव रुपी वासना का सामना करना ही पड़ेगा। वासना मानव मन की सबसे बड़ी दुर्बलता है, क्योंकि जिन तीन तृष्णाओं से मन बंधा दासत्व भोगता है, उसमें कामतृष्णा, भव तृष्णा और विभव तृष्णा
तीनों का संगम होता है। समझने की बात है, संसार पुरुष और नारी द्वारा बना है, उनका आपसी आकर्षण असामान्य नहीं हो सकता क्योंकि दोनों के लिए रुप, शब्द, गंध, रस और स्पर्श से बढ़करअन्य कोई आलंबन नहीं होता । ओशो यानि आचार्य रजनीश के अनुसार “निषेध” मन के लिए निमंत्रण है, विरोध मन के लिए बुलावा है, और मनुष्य जाति इस मन को बिना समझे आज तक जीने की कौशिश करती रही है। सारांश यहीं है, प्रेम निराकार होता है, ह्र्दय से अहसास किया जा सकता है, पर वासना आकारित होती है, अतः चेहरे की रुप रेखा में सम्माहित होती है, किस रुप में, कब पैदा होगी, कहा नहीं जा सकता।….क्रमश…कमल भंसाली

प्यार और वासना…एक चिंतन, भरी चर्चा…भाग 2 अंश 1 *****कमल भंसाली

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दोस्तों, हमने प्रेम के रिश्तों के सन्दर्भ में कुछ पारिवारिक रिश्तों की चर्चा की, परन्तु कुछ रिश्तें जो आज के जीवन में काफी उभर कर पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों पर भारी पड़ रहे है, उनमे कुछ को समझना बहुत जरुरी है। “दोस्ती” और “प्रेयसी” का सम्बन्ध आज के आधुनिक युग में काफी महत्वपूर्ण बनते जा रहे है। दोस्ती का रिश्ता आपसी सहमति से बनने के कारण जीवन को काफी प्रभावित करता है । कुछ इस तरह के रिश्तें जब दैहिक सीमा रेखा को पार करने लगते है, तो काफी संवेदनशील होने का डर रहता है। कहना न होगा, इनके लिये संयम, धैर्य और सही चिंतन की बहुत जरुरत होती है। सबसे पहले हम दोस्ती के रिश्ते की तरफ नजर करते है । इस रिश्ते में एक खूबसूरती है, यह परम्परागत बन्धनों से आजाद होता है । सबसे बड़ी सावधानी दोस्ती के रिश्तें में यही है, कि इसमे वित्तीय लेनदेन से बचना चाहिए, परन्तु आज अर्थ तन्त्र का युग है, अतः इसमे जब वित्तीय लेनदेन होना ,कभी कभी जरुरी हो सकता है। ज्यादातर दोस्ती इस कारण प्रभावित होती है, अतः इसकी सावधानी रखी जाए, तो जीवन के क्षेत्र में दोस्ती चमत्कारी साबित हो सकती है। अमेरिका में एक कहावत का प्रचलन है कि ” जब आप किसी दोस्त से रुपया मांगों तो पहले आपको निश्चित कर लेना चाहिए की आपके लिए दोस्त और रुपये में कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है “। दूसरे कारणों में आपसी प्रतिस्पर्धा होती है, यह एक ही क्षेत्र विशेष में दोनों के होने के कारण हो सकती है। हालांकि ज्यादातर दोस्ती स्वभाव, और व्यवहार के आकर्षण से की जाती है, पर धीरे धीरे इसमे परिपक्वता आती रहती है,और समझदार आदमी उसकी सीमा रेखा को पहचान कर दायरे के अंतर्गत दोस्ती निभाता है। इसमे बिना रिश्ते के प्रेम के बावजूद काफी अंतरंगता होती है, यह अनमोल हो, तो कृष्ण सुदामा जैसी दोस्ती समझी जाती है।

प्रेयसी और प्रेमी के सम्बन्ध में यह चिंतन काम नहीं कर सकता, क्योंकि उसमे प्रत्यक्ष वासना ज्यादा होती है, प्रेम की जगह आकर्षण ही ज्यादातर होता है। इसकी बुनियाद में अगर सच्चा प्यार हो तो अलग बात है, नहीं तो आजकल स्वार्थ का भरपूर प्रयोग दोनों पक्ष करते है। प्रेयसी या प्रेमी दोनों ही विस्फोटक स्थिति में रहते है, क्योंकि इस तरह के सम्बंधों को ज्यादातर गुप्त ही रखा जाता है, जब तक यह किसी कारण से उजगार नहीं होते या दोनों इसे कानूनी मान्यता नहीं देते। ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने है, जो अनैतिक और कानून के विरुद्ध है, फिर भी, ऐसे रिश्ते को परिवार और समाज की मान्यता मिल जाती है, अतः आजकल विरोध भी नगण्य नजर आता है, शायद, यह कोई नई सोच का नया चमत्कार है, जहां समाज शांत रहता है।

भारतीय संस्कृति की एक विशेषता है, यह युग के अनुसार बदलती है, परन्तु गति धीमी होती है, अतः संघर्ष भी हर बदलाव को झेलना पड़ता है। आज रिश्तों के सन्दर्भ में कुछ ख़ास परिवर्तन की बात हम यहां करना चाहेंगे, जैसे आज के दौर में लड़का लड़की का बिना शादी साथ रहना। आज से कुछ वर्षो पहले किसी लड़के का किसी लड़की से बात करना मामूली बात नहीं होती थी, यहां तक की पति पत्नी दिन में मिलना मुश्किल होता था। प्यार का इजहार करने में कई तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ता था। समय बदला, तरीके बदले, प्रेम पत्र का विकास हुआ। कहते है, इंतजार के साथ प्राप्त हुई वस्तु का एक अलग ही रोमांच होता है, सच भी है, प्रेम जाने अनजाने कई कसौटियों पर परखा जाताऔर पूर्ण सम्पूर्णता प्राप्त करता। स्थानीय आय के साधन कम होनें के कारण लोग दूसरे राज्यों या देश उपार्जन करने के लिए जाते थे, इस जाने को “परदेश” जाना कहते थे। दूरिया प्रेम करने वालों को असहनीय विरह देती है, अतः वेदना को कम करने के लिए प्रेम पत्रों का अविष्कार हुआ। निश्चित तौर पर यह कहना मुश्किल होगा कि पत्रों का आदान प्रदान कब शुरु हुआ, परन्तु प्रेम पत्र इंसानी भावनाओं को प्रकट करने का एक अनुपम साधन है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता, जिसमे प्रेम के प्रति शालीनता, स्वस्थता, और संस्कारित चाहत का समावेश किया जाता है। इन पत्रों में कस्तूरी की तरह सुंदर शब्दों से ही प्रेम या प्रणय प्रकट किया जाता, भाषा का काव्यमय हो जाना इन पत्रों में मामूली बात होती है। हालांकि आज के युग में फेसबुक और वाट्सअप पर ज्यादातर फूहड़ सन्देशों की भरमार ही नजर आती है।

जरा गौर कीजिये नेपोलियन के इस पत्र के अंश पर जो उसने अपनी प्रेमिका जोशफिन को लिखा था । ” जब से, मैं तुमसे बिछड़ा, मैं बहुत उदास हूं । लगता है, मेरी सारी खुशिया तुम्हारें पास रह गई, मैंने सारे समय तुम्हारी यादों की बाहों में, तुम्हारे आंसुओ में, तुम्हारे स्नेहपूर्ण प्रेम में रहता हूं। जोशफिन, तुम्हारी अपरुव खूबसूरती मेरे दिल को लगातार जलाने वाली मशाल बन गई। तुम्हारा एक महीने का प्यार, जब से अलग हुआ, मुझे अहसास कराता है, मैं तुम्हे उससे हजार गुना प्यार ज्यादा करने लगा हूं। हर दिन यह प्यार तुम्हारे लिए बढ़ता ही जाता है”।
सच्चा प्यार जीवन को कितना खूबसूरत बना देता है ? है, ना दोस्तों। क्रमश*****कमल भंसाली

उलझन मन की सुलझें ना…..बेहतर जीवन शैली.. भाग..१०..अंश २…कमल भंसाली..


उलझन सुलझें ना
रास्ता सूझे ना
जाऊं कहां मैं
जाऊं कहां….. फ़िल्म धुंध का यह गीत बड़ी खूबसूरती से जीवन में मन की कमजोरी को दर्शाता हैं, इस गीत में मन की लाचारी का सुंदर चित्रण किया गया है। मन की सबसे बड़ी खूबी भी यही है, कि हार को सहजता से सहन नहीं कर सकता। अगर शास्त्रों की माने, तो मन ही वर्तमान है, हर क्षण में इसकी भूमिका रहती है। कहते है,बिना मन के तो वो भी नहीं थे, जिन्होनें हमें इस संसार में भेजा, हकीकत में तो यह दुनियां भी उनके मन की देन है। खाली मन की सुनने वाले इन्सान को जिंदगी ज्यादा राहत नहीं दे सकती, क्योंकि दुनियां सिर्फ हमारे एक मन पर नहीं चलती। इस दुनियां में अगर हमें सार्थकता से जीना है, तो तय करना होगा की मन के अनुरूप संयम भी रखेगें और इस चिंतन के बाद ही कोई मह्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे । प्रतिकूल परिणाम की अवस्था को सहजता से सहन भी करेंगे।

कर्म ही धर्म….. जीवन को बेहतर तभी हम बना सकते है, जब हमारा मन किसी भी कार्य में अपनी पूर्णता को उसमें लगा दे। मन और उम्र इनकी आपसी समझ ही हमें सही कर्म करने का बोध करा सकते है। मनुष्य एक विचित्र प्राणी है, वो, अपने मन की सबसे ज्यादा तो सुनता ही है, पर कभी कभी उसके कारण अपनी नैतिकता भरी आत्मा का भी समर्पण अनैतिकता के सामने करवा देता है,और ऐसे कार्यो का परिणाम जीवन के लिए सुखद नहीं हो सकते। जो भी संसार में सफल हुए, उनका मन पर पूर्ण सन्तुलन रहा, तभी तो साधारण तरह से जी कर वो अपने कर्म से असाधारण बन गए। कर्म में लगा मन असफलता से कभी नही घबराता, उलटे उसको सफलता का कारण बना देता है।
स्टीफन डोली ने तभी तो कहा ” अगर आदमी कुछ करना चाहता, तो वो रास्ता निकाल लेता है, और जो नहीं कुछ करना चाहते वो मन का बहाना बना लेते है”।

इस लिये बेहतर जीवन शैली यही सलाह देती है कि मन की जरुर सुनिए पर उससे कर्म क्षेत्र को कभी प्रभावित मत होने दीजिये, क्योंकि कर्म ही धर्म है, बिना कर्म का जीवन शर्म है, हताशा है।

सयंम ही जीवन ..जैसे, बिना ब्रेक की गाड़ी का दुर्घटनाग्रस्त होना एक बार नहीं कई बार तय है, वैसे ही, बिना सयंम का जीवन सदा मुसीबतों को आमन्त्रित करता रहेगा। हम आखिर इन्सान है, कितनी मुसीबतों का मुकाबला एक साथ करते रहेंगे। Reverend Jesse Jackson लिखतें है कि ” storms come, and they are so personal, they seem to know your address and have the key to your house” कहना न होगा, अप्रत्यक्ष रुप में वो मन की ही बात कर रहे है, तूफानों को निमंत्रण असंयत मन ही दे सकता है। परन्तु, यहां कहना यह भूल नहीं होगी की मन आत्मा का पावर हाउस है, उसके बिना जीवन में अन्धकार ही रहता है, अत: मन को समझना जितना जरूरी है, उतना ही उसे अनुशासन में रहने का प्रशिक्षण देना। आत्मविश्लेषण मन को पवित्र करता है, और ध्यान उसे अमृत पान करा, उसे देवता बना देता है। अत: बेहतर जीवन शैली हम सबकों यह याद दिलाती है:-

“खुदी को कर बुलंद इतना
कि हर खता से पहले
खुदा, खुद बन्दे से पूछे
की बता, तेरी रजा क्या है”

कहने की बात यही है, की समझदार इंसान अपने मन से ही सारे सवाल कर उसे समझदार बनाता है, और मन को ऐसे संभाल कर रखता है, जैसे अपनी दौलत को। मन को नकारिये भी मत, समझदारी से उसे अपना बनाना हमें ही सीखना होगा। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम आर्थिक युग में रह रहे, हम आपसी समझदारी को भूल जीवन के हर नैतिक क्षेत्र की अवहेलना अर्थ प्राप्त करने के लिए करते है।अपने किसी भी जीवन मूल्य सिद्धांत को अर्थ के लिए दाव पर लगाना जितना सहज होता है,उतना ही असहज हो जाता है, उसका दूरगामी परिणाम सहन करना। संयम से अगर मन को हम यहां न समझाते है, तो निश्चित है, हम अपनी आत्मा को लालच के दलदल में फंसा रहे और कह नहीं सकते उसका इस दलदल से कब उद्धार होगा ?

बेहतर जीवन शैली कभी भी अर्थ उर्पाजन का विरोध नहीं करती, खाली हमें यह बताना चाहती है, कि आखिर नैतिकता भी तो जीवन में मायना रखती है, जीने का मकसद खाली शान शौकत भी नहीं होना चाहिए। कोई हमे यह आश्वासन भी नहीं दे रहा कि इस जन्म की सारी सुविधाएं हम अगले जन्म के लिए, स्थांतरण कर सकते है। हजारों उदाहरण शास्त्रों और इतिहास में मिलेंगे, जब राजा महाराजाओं ने अपनी विलासिता छोड़ सन्यासी बन गए और जीवन को नये आयाम देकर अपने ही लिए नहीं पूरी मानवता का मार्ग दर्शन किया। आधुनिक युग में भी बहुत कम उदाहरण ऐसे मिलते है, जिन्होंने सब कुछ सुलभ होते हुए भी संयम और कम साधनों से जीवन को आंतरिक सुंदरता का उपहार दिया। कहना न होगा की इस सन्दर्भ में गांधीजी और शास्त्रीजी का जीवन प्रेरणा लेने लायक रहा।…….क्रमश…

कमल भंसाली