नये वर्ष के नये संकल्प🌺भाग 3🌷आत्मिक अनुसंधान चर्चा🌲कमल भंसाली

जब कभी प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता हमारी नजरों से टकराती है तो निश्चित है उसकी इस सुंदरता से हमें आनन्द और प्रसन्नता का अनुभव होता है। ठीक ऐसे ही जब किसी असाधारण व्यक्तित्व से हम मिलते है, तो हम उस मिलन को अपने जीवन की एक धरोहर समझते है। हमारी विडम्बना भी यही है कि हम उसके दूसरे पहलू पर कभी या तो गौर नहीं करते या हमारे अंदर इस तरह के जज्बातों को समझनें की समझ नहीं है कि व्यक्तित्व किसी का योंही प्रखर और आकर्षक नहीं होता उसके पीछे उसकी दृढ़ स्वयं परिवर्तन की चाह और क्षमता होती है। क्यों नहीं कुछ प्ररेणा उनसे स्वयं के जीवन को मिले ! जीवन सिद्धान्त तो यही कहता है, ऐसे व्यक्तित्व प्रेरणा के स्त्रोत होते है और उनसे हम भी जीवन को आकर्षक और लुभावना बना सकते है। शुरुआती जिंदगी से हर कोई एक साधारण गुण और अवगुणों से युक्त इंसान होता है, यह उस विशिष्ट इंसान की मानसिकता थी, उसने अपने जीवन के कुछ अवगुणों पर गौर किया और अपने जीवन से उन्हें धीरे धीरे स्थानांतरित कर उनकी जगह सही गुणों का विकास कर उन्हें महत्व दिया। इस तरह के परिवर्तन की सोच का सही समय अभी हमारे लिए भी है, जब आनेवाला साल हमें बेहतर ढंग से जीने का आह्वान करता है। पिछली हमारी चर्चाओं में हमने इस बारे में काफी चिंतन और अध्धयन किया अब समय आ गया कि उनके अनुरूप हम स्वयं को कुछ नये संकल्पों से सुधारे, ध्यान इतना ही रहे संकल्प सिर्फ संकल्प बन मर न जाये, उन्हें सदाबहार रख हम उन के द्वारा प्राप्त सकारत्मक परिवर्तन को अपने जीवन तत्वों में समाहित कर ले।

पीछे, हमने जिन तीन क्षेत्रों की चर्चा की हकीकत में उन्हीं से प्रभावित हो हमारा जीवन अपना काफी विस्तार करता है और एक दिन अपनी पूर्णता को प्राप्त भी करता है। कहते है, जीवन के अंतिम पड़ाव पर प्राणी में गंभीरता आ जाती है क्योंकि वो उस समय अपनी सफलताओं से ज्यादा अपनी असफलताओं से पीड़ित रहता है। मनन करता अपनी उन कमजोरियों का जिससे उससे उसका जीवन कठिन हुआ। उसका अपनी प्राप्त सांसारिक उपलब्धियों के प्रति प्रेम भी नगण्य हो जाता है । संसार से विदा लेते समय अपनी आत्मा की गहनता में जाने का मन होता है, जिस पर वो कभी कभार ध्यान देता था या देता भी न था।अगर हम कभी अपने दैनिक जीवन के तौर तरीको का स्वयं अवलोकन करते तो शायद सहज में ही समझ में आ जाता कि छोटी छोटी उपलब्धियों के लिए हमने अपनी बड़ी बड़ी खूबियां दाव पर लगा दी है। यानी अपने किसी नैर्सिगक गुण या गुणों की आहुति इस तरह के यज्ञ में दी है, तत्काल के परिणाम का क्षणिक ख़ुशी में विलीन होते ही हमें सहज महसूस हों जाता है, कहीं न कहीं ये हमारी आत्मा की हार है। अर्थ क्षेत्र की उपलब्धियों पर ही गौर करे तो हमें ऐसे कई एहसास आज भी हो सकते है । ज्यादा अर्थ संचय की चाह के लिये स्वास्थ्य पर किया गया किया गया अत्याचार जीवन की समय सीमा को कमजोर करता है इसलिए दोस्तों, वर्ष की सुंदर व स्वस्थमय शुरुआत से पहलें हम अपने मन व दिल को दुरुस्त कर लेना चाहिए । अपने लिये स्वयं तय किये नये निर्देशों व संकल्पों का पालन कर जीवन को सही व्यक्तित्व का उपहार देने का प्रथम दृढ़ संकल्प स्वीकार कर लेना उचित लगता है।

कुछ संकल्पों की एक सूची तैयार करे उससे पहले हमें इस सोच पर ध्यान देना होगा कि गुजरा समय कभी वापस नहीं आता पर हर क्षण के प्रभाव से हमारे जीवन को प्रभावित कर जाता। एक क्षण का उच्चतम चिंतन आदमी को पुरस्कार का हक दिला देता और एक क्षण का निच्चतम चिंतन जेल का दरवाजा भी दिखा देता। नैतिकता की कितनी भी हम अवहेलना अपने जीवन में करे पर जब स्वयं की चाही नैतिक जिम्मेदारी हमें दूसरों से नहीं मिलती तो कभी यह क्यों नहीं सोचते कि इसका तिरस्कार तो हमारा भी किया हुआ है। धर्म शास्त्रों ने तो सदा इंगित किया ” जैसी करनी वैसी भरणी” । अतः हमारे संकल्प जीवन सुधारक ज्यादा हो, तो निश्चित है समाज से प्राप्त होने वाले सुख से हम कभी वंचित नहीं रहेंगे।

सच और झूठ:-

जीवन कैसा भी हम जीये, सच और झूठ से वंचित रहना नामुमकिन होता है। इसकी मात्रा के उपयोग से ही सुख दुःख का स्वरूप भी बनता है। तय है किसी भी तरह के झूठ का बाहरी चेहरा कृत्रिमता के कारण आकर्षक और सुंदर होता है परन्तु सच की पवित्रता के सामने सदा ही फीका लगता है। सच में नैतिकता का तप समाहित होता और शुद्ध सच तो किसी भी तरह के आवरण से परेहज भी करता है। हम अगर अर्थ के नफे, नुकसान के सिद्धांत की जरूरत के अनुसार भी अगर झूठ का अति प्रयोग कर रहें है तो हमें किसी के बताये इस तथ्य पर भी ध्यान देना सही होगा ” सच वह दौलत है जिसे पहले खर्च करों और जिंदगी भर आनन्द करों, झूठ वह कर्ज है जिससे क्षणिक सुख या राहत पाओं पर जिंदगी भर चुकाते रहो” । चूंकि, हम संसारिक जीवन जीते है और सब तरह की परिस्थितियों से जीवन को गुजरना पड़ता है अतः आज के युग अनुसार झूठ के प्रयोग को पूरा बन्द नहीं किया जा सकता क्योंकि कभी कभी ये भी सोचना पड़ता है “लोहा को लोहा” काटता है। विपरीत परिस्थितयों में रिश्तेदार व सम्बंधियों का रुख भी अविश्वासकारी व असहयोगी हो जाता है, और सच यहां खतरनाक स्थिति पैदा कर देता है, ऐसी स्थिति में सब जगह सत्य का प्रभाव इन्सान को कमजोर करता है। चाणक्य सिद्धांत कठिन परिस्थितियों में प्रयोग योग्य कहा जा सकता है, कि “प्रेम और युद्ध” में सब जायज है। अतः दोस्तों आज की जिंदगी में सच और झूठ का प्रयोग बहुत ही समझदारी से करना चाहिए पर हर जगह झूठ को पहल देना आत्मिक कमजोरी ला सकता है और यह गलती ज्यादा न हों यह ध्यान नये वर्ष में हमें जरुर रखना चाहिए, सत्य को मन के पास रखकर। कोशिश करे नये साल में झूठ से ज्यादा सत्य वचन कहे।

सम्बन्ध :-
रहीम के दो दोहों पर गौर करते है ।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय ।
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय ।।
(रहीम कहते है कि प्रेम का नाता नाजुक होता है, इसे झटका देकर तोडना उचित नहीं होता। यदि यह प्रेम का धागा एक बार टूट जाता है तो फिर इसे मिलाना कठिन होता है और यदि मिल भी जाए तो टूटे हुए धागे के बीच में गाँठ पड़ जाती है।
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रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सो बार।
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टुटा मुक्ता हार।।
( यदि आपका प्रिय सौ बार भी रूठे, तो भी रूठे हुए प्रिय को मनाना चाहिए, क्यों कि यदि मोतियों की माला टूट जाए तो उन मोतियों को बार बार धागे में पीरो लेना चाहिए।

रहीम दास जी कि इस सीख का हम अपने जीवन में कितना महत्व दे ये आज के वातावरण में कहना कठिन लगता है पर ये तय है हर सम्बन्ध की गरिमा प्रेम के तत्व पर ही निर्भर की करती है। प्रेम आत्मा से निकल कर आता है और हर सम्बन्ध को गरिमा से मान सम्मान देता है, हमें इसे स्वस्थ और स्वच्छ रखना भी चाहिए।सब के साथ प्रेम से रहने का संकल्प जीवन को भरपूर ऊर्जा की संपन्नता प्रदान कर सकता है। परन्तु, दुनिया सब लहजे से बदल रही है, सम्बन्धी, रिश्ते- नाते, समाज के आपसी सम्बन्ध कल तक जो दुनियादारी के हिस्से थे, आज वो सब व्यक्तिगत हो गए। यहां तक की एक ही छत के निचे रहनेवाले पति-पत्नी के सम्बन्ध में कुछ हिस्सा ही आपसी रह गया है। दिल की बाते अब दिल में ही रहती है, अपनों के वनिस्पत बाहरवालों के सहारे ही जिंदगी की समस्याओं का हल ढूंढना सही लगता है। व्यवहारिक दुनिया में आर्थिक क्षमता का भीतरी मूल्यांकन ही रिश्तों की प्रगाढ़ता तय करती है। आप किसी भी रिश्ते का खून का सम्बन्ध होनें पर भी उस पर प्यार और स्नेह का दावा नहीं कर सकते। समय आ गया है, आपसी खून से सम्बंधित रिश्तेनातों के प्रति हमें कुछ बदलाव अपनी सोच में करना पड़े जिससे कम से कम हमारा बाहरी प्रेम बना रहें। इनके बारे में ज्यादा सोचने से इंसान खुद ही तनाव भोगता है, जिससे जीवन को अप्रसन्नता ही मिलती है। कार्यकालि रिश्ते को हम अगर मधुर व्यवहार और कुछ आत्मिक प्रेम से संजो कर रखे तो वो हमारे लिए काफी सहयोगी हो सकते है। बाकी जिन घरों में आज भी प्यार और मान सम्मान का महत्व है, वहां किसी भीं नये संकल्प की जरूरत नहीं होती। समय अनुसार स्वयं को बदलने का संकल्प ही उचित है।

आत्मिक संकल्प:-

वर्ष जैसे विदा हो रहा है वैसे एक दिन हमें भी विदा होना है। हम में और उसमें एक ही सबसे बड़ा फर्क है, उसको हमने बनाया और हमें किसी अनजान शक्ति ने। हमनें वर्ष को सिर्फ गिनती तक ही मान्यता दी पर हमें तो नियति ने हजारों गुण – अवगुणों से युक्त होनें का मौका दिया है, जिससे हम अपने आने का उद्देश्य स्वयं में ही ढूंढ कर उस शक्ति को दुनिया से जाकर निराश न करे। हमारी रचना में दो पहलू पर शायद उसने ज्यादा ध्यान दिया और आत्मिक तथा संसारिक प्राणी हमें बनाया। धर्म और अधर्म की तराजू पर ही हमारी अगली गति तय होती है ऐसा हर धर्म शास्त्र बताता है और हमारा विश्वास भी यही है। हमारे सारे संकल्पों में सारे धार्मिक तत्व न हों पर नीति शास्त्रों पर विश्वास कर हमें हर संकल्प में अगर नैतिकता, संयम, प्रेम, धर्म, विश्वास जैसे तत्वों का विकल्प रखे तो निश्चित है, साल मधुरमय, ज्ञानोदय और आत्मिक हो सकता है। सभी के लिए नव वर्ष शुभता से सजकर आये, ये ही कामना लेखक करता है। गुजारिस भी है, इस लेख को उपदेश पाठ न समझे अपितु इसे जीवन सुधार विवेचना के रुप में ही परखे क्योंकि “To be beautiful means to be yourself. You don’t need to be accepted by others.You need to accept yourself”.-Thich Nhat Hanth.
**लेखक: कमल भंसाली**

🌸नये वर्ष के नये संकल्प🌸 भाग 2 🌲संकल्प अनुसन्धान🌲 ✍कमल भंसाली

दोस्तों, नये साल की दस्तक हमारे जीवन में नई ऊर्जा की चाह पैदा करती है। हमें कुछ पुरानी गलत आदतों से दूर होने को प्रेरित करती है । तीन मुख्य संकल्प क्षेत्र पर हम यहां चर्चा अवश्य करेंगे जो आज के आर्थिक, सामाजिक और व्यवहारिक युग के वातावरण में हमें सक्षम बनाते है। हमारे दैनिक जीवन हम में जितने भी छोटे छोटे संकल्प करते है, उनकी धुरी इन तीन क्षेत्रों के अंतर्गत ही ज्यादा घूमती है। आइये, जाने उनके बारे में विस्तार से।

1. स्वास्थय:-

समय का सदपुयोग करना आज की सबसे बड़ी समस्या हमारे जीवन चिंतन की है, आज साधनों के अति प्रयोग से जीवन काफी निराश हो रहा है। पिछले कुछ दसक से आपसी मानवीय सम्बंधों में भावुकता भरे प्रेम के अदृश्य होने से जीवन की अनुरुदनि घुटन बढ़ रही है। मोबाइल और डिजिटल क्रान्ति की तेजी से जीवन को इतना भी समय नहीं मिल रहा कि वो जिस्म और दिमाग की व्यथा भरी समस्याओं पर सही चेतना से अवलोकन कर सके। इसका सबसे बड़ा प्रभाव इन्सान के दिमाग पर पड़ रहा और जीवन गलत आदतों का शिकार हो रहा है। पुराने समय में जहां शारीरिक श्रम जीवन को स्वस्थ रखता, आज दिमागी और मानसिक मेहनत से आँखों को सबसे ज्यादा कृत्रिम रोशनी सहन करनी पड़ती है । स्वास्थ्य तनाव तथा थकावट का अनुभव हमारा दैनिक जीवन ज्यादा कर रहा है। नये साल में हमें स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है। हम चाहेंगे, नया साल हमारे स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ ऊर्जात्मक सवेरा लाये और वो तभी संभव हो सकता है जब हम सिर्फ “Early Riser” ही न बने अपितु कुछ समय सुबह की अनुपम सैर, योग और सेवा कार्य आदि में लगाये। हमार सारे संकल्प इस सिद्धांत के तहत होना चाहिए ” पहला सुख निरोगी काया” । जीवन तभी सब चाहित साधन भोग सकता है, जब वो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सम्पन्न रहे। हम आज मिलावट के युग में तो रह ही रहे है, पर साथ में विदेशी और शीघ्र बनने वाले व्यंजनों के शौकीन भी हो गये है, जो हमारी पाचनशक्ति के लिए एक खतरनाक नई चूनोती है। स्वास्थ्य और स्वाद दोनों का सन्तुलन बनाये रखने का अगर नये साल में सही प्रयास हो तो साल भर की स्वास्थ्य चिंताए काफी कम हो सकती है।
अतः नया साल का प्रथम संकल्प स्वास्थ्य के लिए स्वास्थ्य कारी हो यह चाहत किसी और की नहीं हमारे प्रिय जीवन की है, समझने की बात है। बाकी जीवन को जब तक सांस सही मिलती रही तब तक वो मजबूरी से भी जी लेगा, अपना यह कर्तव्य अच्छी तरह से समझता है। हम न समझे, तो क्या ?

2. आर्थिक मजबूती:-

आज अर्थ का दर्द ही संसार में ज्यादा फैला है, यह दर्द भी विचित्र होता है, कहीं इसकी बढ़ोतरी से लोग परेशान है तो कहीं इसकी कमी से । आज साधन इजाद करने वाला इंसान उसका गुलाम हो चूका है। कृत्रिम शारीरिक सुख के अधीन हो मानव अर्थ का दास बन चूका है। इसका जाल भी इतना मजबूत है कि साधारण व्यक्तित्व वाला इन्सान जिंदगी भर असन्तुष्टि के कारण तनाव ग्रस्त हो जाता है। हर नये वर्ष मे इसके प्रति हमारी चेतना एक सन्तुलित नीति तय करने का अनुरोध करती है। इस नीति में प्रमुख तत्व सिर्फ संयम ही रहे तो जीवन जरूरतमय अर्थ की ही कामना करेगा तथा इसके अनुसार अनुपालन से मितव्यता का महत्व हमारे जीवन को सदाबाहर स्वस्थ महक से प्रफुलित रखेगा। दोस्तों, गुजारिस है, आप अपने आनेवाले साल को बेहतर बनाना चाहते है तो इस सिद्धांत पर गौर कीजियेगा ” Money saved is money earned” । आज क्रेडिट कार्ड, बैंक व आपसी ऋण एक बिमारी बन कर हमें गलत पथ का दावेदार बनाने की निरन्तर कोशिश करे उससे पहले हमें इनके प्रति एक संयमित दिशा निर्देश तालिका बना लेनी चाहिए। जीवन को सुख और शांतिमय बनाना है तो ये स्वीकार करना सही होगा, ” जितनी बड़ी चदर उतना ही पैर फैलाना”। समझने की बात है, ज्यादा चिंताए हमें शीघ्र ही चिता का रास्ता दिखा सकती है । आनेवाले साल से पहले संयमित जीवन और बचत के महत्व के संकल्प अपना कर हम जीवन को सार्थकता और मजबूती दे सकते है। यह बात भी हमें ध्यान रखनी होगी कि हमारे नये संकल्पों में जरूरी अर्थ उपार्जन के प्रति नकारत्मक्ता कभी नहीं होनी चाहिये, संयम और मितव्यता कभी ऐसी सलाह नहीं देती। आज का आर्थिक दौर में कमाने के साधनों की कोई कमी नहीं है, वैसे ही अर्थ खोने के खतरे भी बढ़ रहें है, दोनों ही परिस्थितयों के प्रति जागरूक रहना सही होगा। लालच, जुआ, सट्टा, अति विश्वास, झूठी विलासिता और भी नुकसान के तत्वों से बचना हमारे लिए बेहतर होगा। शेयर बाजार के अच्छे निवेशक बने पर नकली सौदो के जुआरी नहीं। अपनी मासिक बजट योजना को उचित मॉर्गदर्शन दीजिये। आजकल बचत के सुरक्षित हजारों तरह के उत्पादन बाजार में आ रहे है, अध्ययन कर, ज्ञान बढ़ा कर, जानकारों के साथ विचार विमर्श कर हम अपनी तनाव रहित पूंजी का निवेश इनमें कर बढ़ोतरी करे तो शायद नया साल हमें एक सुनहरे भविष्य से सज कर हमारे जीवन को सुख और सम्पन्नता का अहसास दे सके।

3. समय और कर्म :

कर्म इंसान की सकारत्मक ऊर्जा तैयारी करता है और समय का सदुपयोग जीवन के प्रति स्वस्थ आस्था प्रदान करता है, ऐसा जीवन शास्त्र से सम्बंधित जानकारी रखनेवाले लोग अच्छी तरह से जानते है। आज आदमी की कीमत उसका कार्य तय करता है। कर्मशील इंसान जीवन में इसकी भूमिका को भूलता नहीं और शारीरिक स्वास्थ्य की अनुकूलता तक अपने चुने हुए व्यवसाय, नौकरी या अन्य तरह के कामों में जीवन को उलझाये रखता है, इसका कारण समय के साथ तालमेल बढ़ाना । जीवन में निराश के आगमन का प्रथम कारण ही है, समय का उपयोग न कर, खाली रहकर वक्त नष्ट करना। इंतजार ही एक ऐसा तत्व है जिसको ज्यादा सहन करना असहज होता है, निराश जीवन इसका जल्दी शिकार होता है। नये साल के लिए तय किये संकल्पों को योजनामय करने के लिए समय और कर्म दोनों ही महत्व रखते है ।हमें यह जानकर ही आगे बढ़ना होगा कि शारीरिक श्रम और दिमागी काम का आपसी संतुलन रहने से समय की भी कीमत बढ़ जाती है। हम जीवन के अच्छे और खराब क्षेत्रों पर अपना प्रभुत्व व सन्तुलन कायम रख सकने में सफल भी हो सकते है। सवाल उठता है, कैसे जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए हम समय का प्रयोग करे ? इस सन्दर्भ में दो तथ्य हमारा साथ निभा सकते है वो है शारीरिक चेतना और आत्मिक ज्ञान, फर्ज बन जाता है हमारा हम आलस्य और झूठ से इनको दूर रखे।

हर दिन की उपयोगिता को समझकर जीवन समर्थित कार्य को समय देने के बाद भी कुछ समय जो बचे, उसमें सुबह की शुद्ध वातावरण की प्रकृतिमय सैर, योग, ध्यान को उचित स्थान देना सही होगा। साप्ताहिक समय में अच्छा साहित्य अध्ययन, अपने पसन्दीदा मन को खुश रखने वाले कार्य मसलन दोस्तों और अपनों के साथ मनोरंजन देने वाले प्रोग्रामों में सम्मलित होना, जिससे दैनिक तनावों से राहत मिले। साल में एक बार अपने पसन्दीदा पर्यटन के लिए सोचना अच्छा संकल्प कहा जा सकता है। आशावादी परिणाम प्राप्त करने के लिए हमें सी.बी.एडवर्ड के इस कथन को ध्यान से पढ़ना होगा, ” Insight on getting the very best out of what you have to do. Be positive in your attitude. Merely negative cricism never got anyone anywhere. Moaning (कराहना) groaning (दुःखी होकर कराहना) makes work ten time harder. It is not only job you are doing makes life good. It is the spirit you put in it. ध्यान देकर अगर हम सोचे हम स्वयं के लिए भी नहीं दूसरों के लिये भी उतने ही महत्वपूर्ण बन सकते है, जब तक हम कर्म की सही मीमांसा समझते है। वैसे भी गीता के इस श्लोक से भी जीवन में कर्म का महत्व स्वयं ही समझ में आ जाता है।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि ”

सीधे शब्दों में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संसार के हर प्राणी को ये ज्ञान प्रदान किया है ” तेरा कर्म में ही अधिकार है ज्ञान निष्ठा में नहीं । कर्ममार्ग में कर्म करते तेरा किसी भी अवस्था में कर्मफल की इच्छा नहीं होनी चाहिये न ही तू कर्मफल का हेतु बन और तेरी अकर्म में भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये”।

समय के अनुसार किये अच्छे कर्म सफलता और असफलता दोनों ही अवस्था में सन्तोष दायक जीवन को गतिमय रखते है। आनेवाले साल की सुगमता भी परिवर्तन पर निर्भर होती है, तय हमें करना होगा परिवर्तन की शुरुआत कब और उसकी दिशा किस और होगी ! *** क्रमश…..

लेखक: कमल भंसाली

👉नये वर्ष के नये संकल्प👈भाग 1👌कमल भंसाली

“दोस्तों” वर्तमान साल या वर्ष हमसे शीघ्र ही विदा लेगा इस समझ के साथ कि हमें भी कभी न कभी धरती के जीवन से विदा होना है, अवधि या आयु के अनुसार। साल के सफर की एक निश्चित अवधि होती परन्तु जीवन अपनी अनिश्चितता के कारण कभी भी विदा हो सकता है। बिता समय अपनी महत्वपूर्णता के कारण भविष्य में भी याद किया जाता है, ठीक वैसे ही महत्वपूर्ण व्यक्तित्व जीवन के बाद भी याद किया जाता है। हर समझदार इंसान अपने जीवन को सुख और समृद्धि के साथ कुछ इस तरह से उपयोगी बनाना चाहता है कि उसका जीवन मिसाल के तौर पर लम्बे समय तक याद किया जाए। अगर हम चाहे तो नया साल आने की आहट से पहले हम अपने बीते साल की अपनी उपलब्धियों और असफलताओं की स्वयं समीक्षा और मूल्यांकन कर आने वाले साल को और बेहतर और प्रभावशाली बना सकते है। इस लेख का कत्तई यह उद्देश्य नहीं की जीवन का मूल्यांकन किसी असफलता को दुःखित मन से याद कर किया जाय, क्योंकि आज के युग की गतिविधिया काफी हद तक पिछली शताब्दियों के वनिस्पत तेजी से बदल रही है और इंसान को वर्तमान के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है, तो कहीं न कहीं असफल परिणाम आ ही जाते। रिश्तों में घटती मधुरता इसका ताजा उदाहरण कह सकते है। मानव स्वभाव से लेकर जीवन सम्बन्धी साधनो और सम्बंधों में भी परिवर्तन दृश्यत् हो रहे है, इसलिए स्वभाविक हो जाता युग परिवर्तन के अनुसार स्वयं को बदलना। चूँकि आज हमारी सफलता और असफलता जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करती है, अतः विदा लेने वाला वर्ष चाहता है कि वो मूल्यांकित हो जिससे उसे किसी न किसी रुप में याद किया जा सके। दोस्तों, पहले की तरह परम्परागत आय के साधन अब बीते युग की बात हो गई, मशीनीकरण के निर्माण की प्रक्रिया में इंसानी हाथ की जगह दिमागी कुशलता मुख्य होती जा रही है। कितना कुछ भी बदल गया परन्तु मृत्यु के हाथों से बचना आज भी मुश्किल है, अतः आनेवाले साल को स्वास्थ्य के अंतर्गत सन्तुलित ढंग से जीना भी जरुरी बन जाता है। अगर हम सच्चाई के साथ बीतते वर्ष पर गौर करेंगे तो अनुभव किया जा सकता है कि हमारा व्यक्तित्व कहीं न कहीं कमजोर रहा है, और आशा के अनुरूप परिणाम नहीं प्राप्त हो रहे है या फिर आर्थिक, पारिवारिक या फिर सामाजिक रुप कोई समस्या जिसका समाधान हम नहीं कर पा रहे है। दोस्तों, आनेवाले साल में आप इन समस्याओं से जरूर निजात पाना चाहेंगे, पर कैसे ? यही हमारी चर्चा का विषय होना चाहिए और हमें ज्यादा समय अब नहीं खो कर अभी से नये वर्ष में भविष्य की उन्नति की तरफ ध्यान देना चाहिए।

सबसे पहले जरूरी हो जाता है कि नये साल की शुरुआत से पिछले महत्वपूर्ण कार्यक्रम जो अधूरे रह गए उन सब को दुबारा क्रमवार स्थापित करने की कोशिश होनी चाहिए। उनके प्रति हमसे क्या लापरवाही हुई ? उस पर गहनतम चिंतन के बाद यह तय करना चाहिए नये साल में उनके लिए स्वयं में क्या क्या तकनीक, मानसिक, शारीरिक सुधार की जरूरत है ? उन समाधानों पर अमल करने के लिये व्यक्तित्व को नकारत्मकता से कैसे बचाव किया जा सकता है,? इस तथ्य पर हमें पूर्ण चेतना से ध्यान रखना होगा। E.H Harriman के इस संदेश से हमें सहमत होना चाहिए ” Much good work is lost for lack of a little more” दोस्तों, जैसे हर सफलता हमें मोहित करती वैसे ही हर असफलता चाहे किसी भी क्षेत्र क्यों न हो, पर हमें भीतर तक तोड़ती है। सबसे प्रथम इस चिंतन को एक मनोवैज्ञानिक दर्शन के माध्यम से तय करना चाहिए की जीवन फूलों से नहीं कड़े उसूलों से जीया जाता है। संसार, देश और सामाजिक दिशा निर्देश के अनुसार ही हमारा नया साल का नया चिंतन स्कारत्मकता, संयम आदी गुणों से युक्त होना चाहिये। मनोवैज्ञानिक मानसिक क्षमता का अद्भुत संगम जब गतिमान होगा तो निश्चित है, नया साल हमें काफी प्रभावकारी और चमत्कारी परिणाम देकर प्रफुलित कर देगा।

हम आगे बढ़े, उससे पहले Harold Sherman की इस नसीहत पर जरा गौर करते है ” Yours life is yours to make of it what you will be; but dare to be yourself at all times; and do not allow any person or force of circumstances to keep you from doing the thing you want most to do- for therein lies your greatest possibility of success.”

आनेवाले साल का स्वागत हमारा इस दृष्टि से करना सही हो सकता है “नया साल, नई राहे, नई मंजिले”। हम इस संकल्प ( Resolve or resolution )के साथ अगर जिंदगी को नियंत्रित कर उसे अगर एक सुहाने सफर की तरफ मोड़ दे तो किसी भी रुप में गलत कदम न होगा। हम अपने स्वास्थ्य को आलस की जगह स्फूर्ति देना तय कर ले तो बाहरी व्यक्तित्व भी मुखर हो सकता है। हम अच्छे परिधान हमारी संस्कृति के अनुसार धारण कर सामजिक क्षेत्रों की तरफ अपना प्रवेश दर्ज करा सकते है। हम नई किताबों से आज के सन्दर्भ का मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर परिवार व समाज को नई दिशा की चेतना दे सकते है। हम नये शब्दों को आत्मसात कर अच्छे वक्ता बन दार्शनिक स्वरूप अपने जीवन को प्रदान कर सकते है। दोस्तों अगर यह सब नहीं कर पाये तो कोई बात नहीं परन्तु हम यह संकल्प जरूर ले सकते है, कि हम कोई भी गलत, चिंतन कोई गलत काम नहीं करेंगे, जिससे हमारी वर्तमान जिंदगी प्रभावित हों।

परिवर्तन करना और परिवर्तन की बात करना दोनों में फर्क होता है, संकल्प करना और उसे सक्रिय कर निभाना भी आसान नहीं होता। अतः सबसे पहले जरुरी है, हम अपना स्वयं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करे। चलिए थोड़ी देर के लिए इस पथ की जांच कर लेते है, अपने ही सन्दर्भ में। मनोविज्ञान हमें सिखाता है कि हम अपनी भावनाओं की रुपरेखा को समझे और उनका उपयोग जीवन सुधार में करे। मसलन हमारी कुछ पुरानी आदतें (Habits)जिनसे हमारा आत्मविश्वास को कमजोरी प्राप्त होती है, हम उनमे सुधार का संकल्प कर सकते है। हम कुछ ऐसे काम को दृश्यत् कर सकते है, जिनसे परिवार, दोस्तों, और रिश्तेदारों का विश्वास हम में बढ़ जाये और सुखद सामाजिक जीवन का अनुभव हम करने लगे। “भावना” (Emotions) “रवैया” (Attitude)और “प्रतिक्रिया” इन तीन शब्दों के तहत अगर हम रोज की जिंदगी को जीये तो हम अपना दैनिक कार्य सिल सिलेवार कर सकते है।

बिना किसी टालमटोल के किये कार्य से आंतरिक शक्ति बढ़ती है और इस और जीवन को सुरक्षित वातावरण भी मिल सकता है। इससे हम स्वयं समस्याओं के समाधानों के अविष्कार कर्ता बन सकते है क्योंकि हमें अपनी अक्षमताओं का ज्ञान होता है और उन्हें स्वीकार करने की हिम्मत का भी अंदाजा होता है। इस से अपना व्यक्तिगत जीवन भी अक्षुणता प्राप्त कर सकता है जीवन की विविध समस्याओं की स्थिति अनुसार कभी जरूरत पड़ने पर ऐसे इंसान क्रोध, विरोध कर के भी अपनजनों में प्रिय रह सकते है। अतः हमारे नये वर्ष के सभी संकल्प हमारे व्यक्तित्व के अनुरूप कैसे हो, यह हमें मनोविज्ञान की जानकारी रखने से प्राप्त हो सकते है। –क्रमश–लेखक: कमल भंसाली