प्राणों की दासी ■■ जिंदगी■■ कमल भंसाली


संभावनाओं के चबूतरे पर बैठकर
“जिंदगी” कितनी बतियाती
कभी खिलखिलाती
कभी मुस्कराती
सखी सहेलियों की सूरत में
गम से छुटकारा पाने के
आयाम गुपचुप तलाशती
अपने दर्द को पी
उन्हें कुछ समझाती
बुदबुदाती
रही मैं, प्यासी की प्यासी
आखिर हूँ, प्राणों की दासी

प्रियत्तम बड़े
मनमौजी रसिया
छेड़ते रहते
कभी प्यार सब दे देते
कभी अवसाद से झिड़क देते
अपनी बिछड़ी गलती का
इल्जाम लगा देते
खोई कामयाबी पर
जश्न मनाते, बेरुखी बाहों में
मैं, कितना कसमसाती
पल पल में, पिघल बह जाती
कैसी है, यह उदासी
आखिर…

फुर्सत के क्षण
करते रहते बैचेन
सामने खड़ी हो दर्पण के
स्वयं को निहारती
नंगी हो अस्तित्व तलाशती
जिसके लिए श्रृंगार करती
उसकी ही व्यर्थता में
निरर्थक होकर
क्यों समर्थता को तलाशती ?
ये, सवाल अक्सर
जब खुद से करती
तो, बन्धन में स्वतन्त्रता तलाशती
कैसी यह मेरी खामोशी ?
आखिर…….
कमल भंसाली

आधुनिकता का श्रृंगार

आधुनिकता खड़ी बाजार में
अवलोकन कर रही
अपने ही श्रृंगार का
मुस्करा के जीवन को
ललचा रही
असत्य के दलालों से
गलत इशारे करवा रही
इन्सान को भौतिकता
के मदिरालय में
कामनाओं के जाम में
हवश की शराब
पीला रही
अपनी ही जीत का
जलसा मानव द्वारा
मनवा रही

कल का नैतिकवाद
बन्धनों में बंध
भूल गया
अपने सत्य के
सारे छंद
कितना अव्यवहारिक
हो गया प्रियवंद
कल तक खुद मुस्कराता
आज जर्जरता से
होकर परेशान
अपने से ही भागता
ठोकर खाकर भी
नहीं संभलता
नशा है, जिंदगी
कहकर “चिल्लाता”

आधुनिकता का दल्ला
पहना रहा सब को
झूठ और लालच का
जादू भरा छल्ला
वासना की रानी
नैनों से नृत्य कर
जंगल में मंगल
मना रही
इंसानी जज्बातों को
पाषाण की मूर्ति
बनाकर
बीच चौराहे पर
लगा रही

शर्म “जिंदगी”को नहीं
“चिंतन”को आ रही
मकसद नहीं हो रहा पूर्ण
समस्याए बढ़ रही
नहीं कोई है, निवारण
क्या ऐसे ही जलालत
देती रहेगी “आधुनिकरण”
कर “मानव”
थोड़ा सा तो मनन…..

कमल भंसाली