मर्म, सही दृष्टिकोण का…बेहतर जीवन शैली भाग..११..अंश..१..कमल भंसाली

आज हम बेहतर जीवन शैली का सबसे अहम सवाल, जो शायद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका व्यक्तितत्व निर्माण के दौरान निभाता है, कि हमारा नजरिया जिंदगी के प्रति क्या है ? इस पर चर्चा करते है, दोस्तों, इसे हम अपने आपसे यों भी पूछ सकते है, कि अपनी जिंदगी के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है ? तय यही है, की अभी हम जिस तरह से जी रहे, वही सत्य है। जीवन के हजारों दृष्टिकोणों का मूल्यांकन समय समय पर हमारे लिए जरूरी है, परन्तु ऐसा हम नहीं करते। जितना समय हम निर्जीव साधनों की देख रेख में लगाते है, उस से कम समय शायद हम अपना आत्म निरीक्षण में लगाते है। जीवन कोई साधारण बात नहीं है, हमारे शरीर का हर अंग अपनी निश्चित कार्य प्रणाली पर निर्भर है। हम हमारी सारी आत्मिक और शारीरिक अनभूतियों से ही, उसे आनन्द और निराशा के कई रंगों के रस का रस्वादन कराते है।

सत्य है, जीवन एक है, पर दृष्टिकोण अनेक है। यह भी तय है, नजरिया बदलता है, इंसान के जीवन का स्वरुप भी बदल जाता है। एक आम इंसान अपनी सोच और आस्था से कमजोर होते जीवन को मजबूती दिला सकता है। बड़े बड़े अविष्कारों के पीछे हमने वैज्ञानिकों के दृष्टिकोणों को बार बार बदलते सुना है, तब जाकर उन्होंने बार बार उनमे सुधार किये है। हकीकत, यही कहती है, कि हम दूसरों के गुणों और अवगुणों का अवलोकन कर लेते है, पर क्या हमनें कभी समय निकाल खुद का निरीक्षण किया, शायद ज्यादातर उत्तर नहीं में ही होगा। हम विशिष्ठता से स्नेह जरुर रखते है, पर यह नहीं जानते की उत्तमता की तलाश अपने अंदर से शुरु करनी पड़ती है। जीवन के हर एक नजरिया में लचीलापन और गंभीरता का समावेश होना जरूरी है । सिद्धांत और सत्य के लिए जीने वाले सत्यकाम आज की निरर्थक आर्थिक और आधुनिक समाज की देन नहीं हो सकता। सच, यही है, हम व्यवहारिक और राजनीति युक्त सम्बंधित समाज का हिस्सा है। इस बदले हुए परिवेश में नैतिकता की स्थिति काफी कमजोर हैं और उस पर पूर्णतिया निर्भर रहना, सांसारिक शब्दों में असफलता को बुलावा देना है। समाज के ज्ञानी सुधारकों को नैतिकता की चट्टान से फिसलते, हम सब ने देखा है।

बेहतर जीवन शैली सबसे पहले यह सुझाव देगी, कि समय काल के अनुरुप हम जीवन और उसके विचारों में सक्षमता पूर्वक परिवर्तन स्वीकार करते रहेंगे। यह भी समझने कि बात है, रीति रिवाजों के नाम पर प्रदर्शित आधुनिकता से सजे आडम्बरों को हम रोक नहीं सकते, पर वक्त की जरुरत के नाम पर उनको बढ़ावा देने से हम बचे, यही सही है। बात वही है, नजरिया समाज के प्रति बदलना होगा। आज के समाज से पहले के समाज की तुलना वर्तमान से करके जी तो सकते है, पर उस जीने में सार्थकता की कमी रहेगी। आधुनिक युग के साधनों ने जगह की दूरी जरुर कम कर दी, पर मन की दूरियां बढ़ा दी।बाहरी प्यार को इतना सुंदर बना दिया की भीतर की कालिख को देखना मुश्किल हो गया। हमें इसी धरातल पर अगर जीवन को बेहतर बनाना है, तो यथार्थ को स्वीकृति देनी ही होगी। यह भी समझने की बात है, कि सब समय सब बातें सही हो,यह जरुरी नहीं है। कुछ बातें पुराने समय की अच्छाइयाँ हो सकती है, पर आज वो बुराइयों के रुप में जानी जा सकती है।

हम पर्दा प्रथा को ही ले, कुछ समय पहले इसे संस्कारों में गिना जाता था, आज इसकी बुराइयों में पहचान करायी जाती है। समय बदलता है, तो जीवन बदलता है, परन्तु रीति रिवाजों और सामाजिक नियमों में उस अनुपात में बदलाव आने में समय लगता है। आज भारतीय समाज का बदलाव बाहर से जितना आकर्षक दीखता है, वाकई क्या ऐसा है ? यह एक अनुत्तरित जिज्ञासा ही होगी, अगर हम क्षेत्र के अनुसार इसका अनुसंधान नहीं करते। किसी भी समाज का विश्लेषण उसकी आर्थिक उन्नति की भूमिका में ही अगर किया जाय, यह एक अर्द्धसत्य हीं होगा। जीवन में अर्थ (धन)के महत्व को बेहतर जीवन शैली कभी नहीं नकारती, परन्तु उससे होने वाले नकारत्मक व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया जरुर कर सकती है, क्योंकि बिना व्यवहार कोई शैली तैयार नहीं हो सकती। अर्थ के बढ़ने से अगर जीवन को सकारत्मक चिंतन नहीं मिलता तो अर्थ बिना अर्थ ही जीवन को समाप्त कर देगा। अर्थ को अगर कर्म के साक्षेप देखा जाय तो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार चार पुरुषार्थों में एक माना गया है, बाकी तीन धर्म, काम और मोक्ष है। सही कामों से हम सीमित धन प्राप्त करते है, तो उसका मानसिक स्वास्थ्य पर स्वच्छ और सकारत्मक प्रभाव पड़ता है, जो जीवन को सही गति देता है। हमे यह चिंतन जरुर करना चाहिए की धन के प्रति हमारा नजरिया अति लालसा से तो प्रभावित तो नहीं है, ना। अगर हम कहें हां, तो शायद हम ऊपर से भव्य, भीतर से खोखला जीवन जी रहे है। इससे न तो अपना भला होगा, न ही परिवार और समाज का। जिंदगी से अगर कभी अगर हम बात करे तो शायद वो सबसे पहले यहीं कहेगी की ” हां, मैं शांत और सही ढंग से जीना चाहूंगी, क्योंकि मैं बार बार धरा पर विभिन्न रुप में वापस नहीं आना चाहूंगी”।

समय आ गया है, चिंतन को बदलने का, अति साधनों के प्रयोग से शरीर और मन की अवस्था और आयु दोनों ही कम होती है, अतः हम धन अर्जन के साथ प्रेम की भावनाओं में थोड़ी पवित्रता अपना ले। कभी कभी लोग कहते है की पैसा प्रेम का दुश्मन है, बेहतर जीवन जीने वाले शायद ही कभी इस तथ्य को स्वीकार करेंगे। आज हकीकत यहीं है, पैसा है, तो प्यार है, नहीं तो आदमी बेकार है। अतः हम अगर अपने व्यक्तित्व के उच्चतम विकास में विश्वास रखते है, तो हमे सहर्ष कर्म पथ पर सही और नेक आय अर्जित अपनी संयमित जरूरतों के लिए जरुर करनी चाहिए, पर दूसरे आत्मिक विकास गुणों की बढ़ोतरी का प्रयास भी कम नहीं करना चाहिए। इस तरह जीवन दृष्टिकोणों को सही आयाम के अनुसार बदलते रहना चाहिए,।सिद्धान्तों के नाम पर हमारा अपना अड़ियल रुख जीवन को गलत दिशा नहीं दे, यह ध्यान रखकर अपने सही सिद्धांतों को भी आदर हम दे।

हमारा चिंतन बहुत सारी धारणाये जगह जगह से ग्रहण करता है, लाजमी है, सब चिंतन सही परिस्थितिया निर्मण नहीं करे। परन्तु, यह भी तय है, बहुत में से ही कुछ का सही उपयोग किया जा सकता। C.S. LEWIS ने तभी तो अपनी पुस्तक ..That Hideouts Strength में लिखते है, ” There are a dozen views about everything until you know the answer. Then there’s never more than one.”

सच तो यह भी है, कि संघर्ष में हमे अपने सही दृष्टिकोण को कभी भी घबराकर नहीं छोड़ना चाहिए कुछ ऐसा Christian D Larson कहते है कि ” so long as the man with ambition is a failure, the world will tell him to tell him to let go of his ideal, but when his ambition is realized, the world will praise him for the persistence and the determination that he manifested during his dark hours, and everybody will point to his life as an example for coming generation. This is invariably the rule.Therefore pay no attention to what the world says when you are down.Be determined to get up, to reach the highest goal you have in view, and you will.”

ध्यान देने और मनन करे हम, की धैर्य सही दृष्टिकोण की उच्चित और न्याय संगत परीक्षा है, प्रकृति का नियम यही है, जो सही है, वो ही बहुमूल्य है।…..क्रमश ……कमल भंसाली

कमल भंसाली

प्रेम और वासना.. बेहतर जीवन शैली भाग….९ अंश ३….कमल भंसाली

प्रेम की सबसे बड़ी विशेषता, अगर कोई है, तो यह कि यह भावनाओं के सभी रंगों से परिपूर्ण रहकर भी सदा सफेद और स्वच्छ सत्य के अंदर ही अपना परमोत्कृष्ट ढूंढता है, पर ऐसा तत्व भक्ति स्वरुप के अलावा कहींऔर मिलना असंभव ही लगता है। प्रायः, यह ही दृष्टिगोचर होता है, कि मानव अपनी गलत आदतों की दास्तवता से स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहता है, पर अति लगाव या असंयत प्रेम के कारण ऐसा नहीं कर पाता, इसे मन की कमजोरी भी कह सकते है। बेहतर जीवन शैली प्रेम का तीन प्रकार से विशलेषण करना चाहेगी.

1. शारीरक प्रेम
2. मन का प्रेम
3. आत्मा का प्रेम

शारीरिक प्रेम…………

संसार में मानव शरीर को अपनी अनुपम सरंचना के कारण एक वरदान के रुप में देखा जाता है। बनानेवाले ने बड़ी कुशलता दिखाई और उसने शक्ति और कमजोरी का अनुपम मिश्रण का सन्तुलन बरकरार रखने के लिए बीमारी और मृत्यु का सहारा लिया। मानव मन में कमजोरी के रुप में कई अवगुण एक साथ निवास करते हैं। और वे काफी स्थान पर अपना वर्चस्व रखने की कोशिश करते है। जोअच्छे गुण होते है, उन्हें कम जगह प्राप्त होती है । जो,मानव सयंम और धैर्य को आत्मा में पूर्ण स्थान देते है, उनके जीवन में प्रेम की कमी शायद ही रहती है। आवेश, क्रोध, लालच, स्वार्थ प्रेम के सबसे बड़े दुश्मन है, उनसे आत्मा जितनी दूरी रखेगी, उसे प्रेम की कमी कभी नहीं महसूस होगी।

यह बात ध्यान में रखने की है, कि अति शारीरिक प्रेम को वासना के रुप में जाना जाता है, बिना प्रेम का यह मिलन शरीर की अतिरेक इच्छाओं की पूर्ति जरुर कर देता है।परन्तु, हर शुद्ध आत्मा इस शर्मिन्दिगी को सहज नहीं लेती, क्योंकि जो पवित्र विचारों के निर्मल जल से जो रोज नहाती, उसके लिए क्षणिक गन्दगी सहन करना सहज नहीं होता।आज नैतिकता के आँचल में अनैतिकता शरण लेकर् जो उत्पात कर रही है, वो प्रेम के रिश्तों को अविश्वासनिय बना कर जीवन को असहजता की आग में झोंकने की चेष्टा कर रही हैं। यह तय है, प्रेम की अनुभति चाह से शुरु होकर मिलन की गंगा में विलीन होती है। जब दो शरीर आत्मिक एक होकर मिलते तो उनका सुमधुर मिलन प्रकृति का विकास करते है, जिसमे कोई ख़ौफ़ नहीं होता, कहना न होगा, यह मिलन दाम्पत्य जीवन में हीं हो सकता है। हालांकि आजका आधुनिक जीवन शरीर मिलन ज्यादा चाहता हैं, चाहे आंतरिक प्रेम उसमे नहीं के बराबर हो। आज का परिवार स्वतंत्रता के नाम पर कई समस्याओं से इसी लिए ज्यादा जूझ रहा है।

प्रेम के हजारों पवित्र रुप होने के बावजूद मानव वासना के चंगुल में जल्दी फंस जाता है, यह कमजोर मानसिकता का संकेत है। आइये, जानते है प्रेम और वासना अलग क्यों है। सबसे पहले वासना को परिभाषित करने की चेष्टा करते है।
ये तो तय है, वासना प्रेम का ही एक रुप है, परन्तु प्रेम में यह रुप कई सीढ़ियों चढ़ने के बाद आता है। वासना शरीर और मन की जुड़ी मिलिभगति से कभी भी किसी रुप में तन में आ सकती है, इसका आत्मा से कोई लेना देना नहीं होता।
जबकि प्रेम भावनात्मक सम्बंधों के साथ शुरु होता है, काम और वासना शारीरिक स्पर्श से। कवि दिनकरजी ने “उर्वशी” में लिखा है,” कामजन्य प्रेरणाओं की व्यापित्यां सभ्यता और संस्कृति के भीतर बहुत दूर तक पहुंची है। यदि कोई युवक किसी युवती को प्रशंसा की आँखों से देख ले, तो दूसरे ही दिन से उस युवती का हाव-भाव बदलने लगते है”। दिनकर जी के कथन की सच्चाई पर कोई सवाल नहीं किया जाना चाहिए। अततः यह तो सच ही है कि स्त्री और पुरुष का प्रथम आकर्षण ही प्रेम का प्रारभ्भ हैं। यह अलग बात है, भारतीय दर्शन में प्रेम को शारीरक और मानसिक दो अलग तत्वों में बाँट दिया। अवांछित शारीरिक सम्बंधों को वासना की परिधि में रखा गया और आपसी रिश्तों में पत्नी के अलावा सभी रिश्तों में शारीरिक प्रेम को निषेध किया गया। कई मायनों में यह व्यस्था स्वस्थ और सही लगती है। हम शायद यह तो स्वीकार करेंगे की अंतरंग प्रेम लेने में नहीं देने में विश्वास करता है, जब की वासना सब कुछ लेना चाहती है। प्रेम की उम्र लम्बी होती है, वासना की कोई उम्र नहीं होती।

आचार्य रजनीश ने संसार को ही वासना माना है। वो कहते है “संसार का अर्थ है, भीतर फैली वासनाओं का जाल। संसार का अर्थ है, मैं जैसा हूं, वैसे से ही तृप्ति नहीं, कुछ और होऊं, तब तृप्ति होगी। जितना धन है,उससे ज्यादा हो। कितना सौंदर्य है, उससे ज्यादा हो, जितनी प्रतिष्ठा है, उससे ज्यादा हो। जो भी मेरे पास है,वो कम है। ऐसा कांटा गड़ रहा है, वही संसार है। और ज्यादा हो जाए, तो मैं सुखी हो सकूँगा। जो मैं हूँ, उससे अन्यथा होने की आकांक्षा संसार है”। यानी अति ही वासना है।

यह गौर करने की बात है, कि जीवन में नवरंग ,नवरस, या नव भाव प्रमुख है, उनसे उपेक्षित सन्यासी का जीवन भी नहीं रहता, परन्तु आत्मिक सयंम से हर भाव पर उनका शरीर से, मन से और आत्मा पर सयंमित शासन रहता है। जानने के लिए जरुरी है, नव रस के यह नौ प्रकार भरत मुनि के अनुसार क्या है? उनके अनुसार…

“रतिहासश्च शोकश्चक्रोधत्साहौ भय तथा ।
जुगुप्सा विस्मयश्चैति स्थायिभावा: पर्कीर्तिता:” ।

(अर्थात रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा,विस्मय तथा निर्वेद, ये नौ स्थायी भाव माने गये है।)

बेहतर जीवन शैली प्रेम को ही आधार मानती है, यह भी मानती कि वासना से जीवन कभी अपनी श्रेष्ठता नहीं पा सकता। आज के आधुनिक युग में मन की कमजोरियों के कारण बिना उचित कारण, अनुचित शारीरिक सम्बन्ध कई तरह की बीमारियां और समस्याओं का निर्माण करता रहता हैं। वासना का निदान धर्म शास्त्रों में सयंम और आत्मिक चिंतन ही बताया गया है। जीवन में अगर कभी ऐसी परिस्थिति का निर्माण हो, तो उससे बचना ही उचित होगा। …..क्रमश….कमल भंसाली

कमल भंसाली

मन मगन मुठ्ठी में गगन…बेहतर जीवन शैली भाग १० अंश ३


मन मगन, मुठ्ठी में गगन…बेहतर जीवन शैली में हमने मन की जरूरतें और उसका हमारे व्यक्तित्व निर्माण में योगदान पर चर्चा की। मन की हर अवस्था प्रेरणात्मक नहीं हो सकती, परन्तु इसके लिए पछतावा करना उचित नहीं कहा जा सकता । मन की अंतरंगता भावनाओं से जुड़ी है, भावुकता का समावेश अगर भावनाओं में ज्यादा होता है, तो मन में कमजोरी का आना लाजमी है, और यही वो तत्व है, जो हमारी कामयाबी और नाकामी को परिणाम देते है। हमें अपनी हर असफलता को कभी भी इतनी वजह नहीं देनी चाहिए कि मन दूसरे प्रयास के चिंतन की हिम्मत छोड़ दे। आखिर, हमारा संबल हमारा अपना मन हीं है।

Harry Emerson Fosdick का मानना है, हर आदमी का चिंतन ही उसके व्यक्तित्व का धरातल है। जितनी मजबूत मन की नीवं उतना ही मजबूत उसका व्यक्तित्व हो सकता है। तभी वो कहते है “The more one studies the biographies of men like Washington. or women like Florence Nightingale, the more one feels that they might conceivably have been lost in the crowd. What most of all gives them distinction is that they identified themselves with a cause greater than themselves so that when you think of it you think of them”

हर हार पर खुद की आलोचना मत कीजिये, संक्षिप्त चिंतन सहज है, परन्तु मन आघातिक चिंतन उचित नहीं कह सकते। हम अच्छी तरह समझते है, समस्याओं का समाधान ही जीवन है, बिना संघर्ष से प्राप्त उपहार क्षणिक खुशी का मालिक होता है, थोड़ा समय बीत जाने के बाद उसकी ख़ुशी कपूर की तरह उड़ जाती है। संघर्ष और मेहनत से हासिल ख़ुशी जीवन धरोहर होती है, क्योंकि उसमे मन की कस्तूरी छिपी रहती है। इस लिए मन कभी भी खराब न करे, विपरीत क्षणों में भी।मन को सुंदर विचारों से सजाने से हमारा मन सदा स्वस्थ रहेगा, नकारत्मक प्रतिरोध की क्षमता उसकी बनी रहेगी। निश्चित है, वो स्वस्थ तो हम स्वस्थ।

आइये हम मन को स्वस्थ और सार्थक गहनों से सजाने की बात करते है।….
1. मन को हर परिस्थिति की सच्चाई बेहिचक स्वीकार करने की स्वतंत्रता
2. विनय पूर्वक बुद्धिमानी व्यवहार
3. क्रोध और आवेश से दुरी बनाये रखने कि कौशिश
4. निर्णय पर कायम रखने की शक्ति
5. कर्म ही धर्म है, कर्म से लगाव ही जीवन सार
6. ईष्या, द्वेष, अति लालच, हिंसा, आदि हानिकारक तत्वों से बचाव
7. प्रेम, स्नेह, सेवा, सदाचार, अहिंसा आदि शक्तिवर्द्धक गुणों युक्त दैनिक जीवन
8. दान, सेवा, आदर, मान सम्मान के प्रति जागरूकता
9. देश, परिवार और समाज के प्रति स्वस्थ मानसिकता
10.धर्म ग्रन्थ और अच्छे साहित्य का अध्ययन
11. अन्याय करना नहीं, अन्याय सहन कभी नहीं करना

जीवन सहज और सरल नहीं है, सब समय सब गहनों को पहन कर चलना साधारण आदमी के बस की बात नहीं है, परन्तु समय का मूल्यांकन कर अगर हम निर्भीकता से जीवन पथ पर अग्रसर हो तो बहुत सी उपरोक्त बातें हमें अपने जीवन को बेहतर और सफल बनाने में सहयोग कर सकती है। जीवन के लिए कोई समय सीमा तय नहीं होती, जब जागो तभी सवेरा, ये न आपका, न ही मेरा..अमानत है, बाकी अपना चिंतन और मन…..
चलते चलते….
Don’t run away from adventures of the mind which you find hard to understand. Keep an open mind for the things “practical” people say won’t work. Perhaps we have more “senses” than we think. For thousands of years electricity was all around us and we could not use it. How can we be sure there aren’t powers of the mind which we understand as little but could as well if we knew how ?……..Ardis Whiteman…

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली भाग ..९..अंश…२..अमृतमय प्रेम…..

भारतीय अध्यात्मक शास्त्रों के अनुसार प्रेम भीतर की चीज है, जब तक अंदर में रहता है, स्वच्छ, सरल, पवित्र और अमृतमय रहता है परन्तु जब यह बाहर आता है, तो प्रायः इसका स्वरुप् बदल जाता है, क्योंकि इसकी जरुरतें इसे स्वार्थी और समझदार बनने पर मजबूर कर देती हैं।
मानव जीवन का पूरा अस्तित्व प्रेम और व्यवहार की धुरी पर घूमते हुए कई तरह के कीर्तिमान स्थापित करता है। प्रेम के तत्व से जन्मा इन्सान आज हर क्षेत्र में विशिष्ठ है, अगर कहीं कमजोर हुआ है, तो सिर्फ नैतिकता के क्षेत्र में, और उसकी कीमत भी वो अपने दैनिक जीवन में चूका रहा है, असुरक्षा की भावना में रहकर ही जी रहा है। अपनी व्यापारिक और आर्थिक प्रगति के नाम पर लोभ में गिरा मानव पता नहीं कभी इस दलदल से निकलेगा या नहीं, अभी यह हम इसे समय के ऊपर छोड़ देते है। ओशो आज के मानव व्यवहार के सन्दर्भ में प्रेम के बारे में कुछ इस तरह की बात करते थे, वो कहते है, ” प्रेम गुलाब के फूल की तरह होता है,जब तक होता है, इतना जींवत, हवाओं में, बारिश में, सूरज की रौशनी में नाचता हुआ, अपने सौंदर्य की घोषणा करता हुआ, लेकिन शाम होते-होते वह मुरझा जायेगा; उसे रोकने के लिऐ तुम कुछ नहीं कर सकते। ह्रदय का गहरा प्रेम हवा की तरह होता है जो तुम्हारे कमरे में आती है, और बाद में विदा हो जाती है। तुम उसे मुठी में बाँध नहीं सकते”। कुछ इस तरह की बात भी निकोलस स्पार्क कहते है, ” Love is like the wind, you can’t see it but you can feel it”। तत्व की बात यह है, प्रेम अस्थायी होते हुए भी जरुरत तक स्थायी है, इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता।
आइये, हम प्रयास करते है, यह जानने का क्या प्रेम को पूर्ण शुद्धता के साथ जीवन की ग्रहण करने की और देने की क्षमता है, हकीकत यहीं कहती है, शुद्ध सोने को भी आकार देने के लिए खाद की जरुरत होती है, तो प्रेम को आकार देने के लिए रिश्तों की खाद दी जाती है। धर्मगुरु कहते है, कि हम कलयुग में जी रहे, और सत्य की कमी के कारण प्रेम की गुणवता और शुद्धता पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वभाविक है। आज के माहौल में प्रेम सफलता के औजार के रुप में ज्यादा प्रयोग करने की जरुरत बन गया, जो आंतरिक नही सिर्फ दीखता है, जब तक उसकी जरूरत हो। आज के असार्थिक युग में सच्चा और सही प्रेम अस्तित्व विहीन होकर लुप्तप्रायः सा हो गया है। परन्तु इससे प्रेम की गरिमा को कम नहीं आँका जा सकता।
प्रेम सबसे ज्यादा रिश्तों में तलाशा जाता है, ये रिश्ते होते तो अनेक है, परन्तु इनमे माँ-पिता, बेटा-बेटी, दादा-दादी,
भाई-बहन आदि प्रारंभिक रिश्ते है, सर्वप्रथम इन्हीं में गुजरता है, और वहीं वो इसे तलाशता है। कहना न होगा संसार में आने के बाद सबसे पहले मनुष्य आश्वस्त प्रेम इन्हीं में ढूंढता है तथा तथ्य की बात यह भी है, कि वो इसको कभी चुकाने वाला ऋण नहीं मानता,कर्तव्य बोध हो तो अलग बात है। इसके बाद का प्रेम दोस्तों, प्रेयसि, पत्नी और अपनी सन्तान में अपने प्रेम के अनुपात में तलाशता है। शारीरक, मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक विषमताएं, और अन्य तरह की समस्याएं आने पर उसका दार्शनिक प्रेम आस्था के रुप में धर्म और भगवान में ढूंढता है। प्रेम का कोई भी रुप या स्वरूप हो, पर सशक्त प्रेम को चाहिए सच्चाई, आस्था, विश्वास, निस्वार्थता, तथा सबसे जरूरी सयंम, इनकी कमी हो तो प्रेम अपनी कमजोरी से
ज्यादा प्रभावकारी नहीं हो सकता।

तभी तो रहीम दास जी ने कहा..
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय”

कितना सही और कितने अनुपम भाव से रहीमदास जी ने हमे सचेत किया, क्योंकि वो जानते थे कि बिना प्रेम इन्सान बेहतर जीवन नहीं जी सकता। इसी सन्दर्भ में आइये उनके एक दूसरे दोहे पर गौर करते है…

“बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय”

( “मनुष्य को सोचसमझ कर व्यवहार करना चाहिए, क्यों कि किसी कारणवश यदि बात बिगड़ जाती है, तो फिर उसे बनाना कठिन होता है,जैसे यदि एक बार दूध फट गया तो लाख कोशिश करने पर भी उसे मथ कर मक्खन नहीं निकाला जा सकता”)

प्रेम व्यवहार के रास्ते का यात्री है, जीवन की गतिशीलता में वो अपनी भूमिका संयम और धैर्य के साथ निभाना चाहता है। परन्तु आवेश, क्रोध, ईष्या,लोभ और हिंसा हस्तक्षेप तो कतई स्वीकार नहीं करता, बाकी नकारत्मक तत्व से भी घायल होता है। प्रेम को सकारत्मक ऊर्जा बहुत पसन्द है,और जीवन को हंसते हंसते बेहतर बनाता है। प्रेम की एक खासविशेषता यह भी है, कि यह न रंग, जाति, वर्ण, अमीर-गरीब, निर्बल-सबल, समय और परिस्थिति का मोहताज है। यह एक सहज सरल प्रकाश पुंज है, जो एक की आत्मा से निकल कर दूसरे की आत्मा में रम जाता है। प्रेम ही एक ऐसा तत्व है, जिसकी शोभा विस्तृता में है। धर्म मोह को तो नकार सकता है, पर प्रेम में अपना अस्तित्व जरुर तलाशता है। कहने की बात नहीं बेहतर जीवन शैली बिन प्रेम के असंभव ही लगती है।
ध्यान रखे.. गीता में कहा..
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः” ।।

“ज्ञानी अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और स्वयं को नीचे न गिराये; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही तो अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है।”……….क्रमशः …

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली…भाग ९..अंश १..प्रेम..अमृत बेहतर जीवन का..कमल भंसाली

माना, हमारी आजकी जीवन शैली में “प्रेम” शब्द बड़ा भ्रमित करता है, परन्तु इसके बराबर अमृतमय शब्द शायद ही दूसरा होगा। इसकी सही परिभाषा को मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है जितना इसका प्रयोग दैनिक जीवन में दूसरों को आश्वस्त करने में किया जाता है । हालांकि कबीर दास जी इसे अढ़ाई अक्षरों का महत्व्पूर्ण जीवनसूत्र बताते है, परन्तु उनकी यह मीमांसा आज के दौर में कितनी सार्थकता रखती है, कह नहीं सकते। गौर करते है, जरा कबीर दास जी की इस परिभाषा पर जो उन्होंने दोहें के रुप में इस तरह सुनाया।
‘ पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोई
ढ़ाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होई’
कबीर दास जी के अनुसार सिर्फ ग्रन्थ पढ़नें से कोई ज्ञानी नहीं होता, अगर कोई इन्सान अढ़ाई अक्षर वाले प्रेम को जान ले, तो उनके अनुसार उससे बड़ा ज्ञानी इस संसार में कोई नहीं है । सही भी है, क्यों की बिन प्रेम जीवन अधूरा ही लगता है ? चाहे हम अपने आपको कितना ही ज्ञानी और सफल इन्सान मानें, प्रेम बिना सेवा और भक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।

कहते है, युग बदलता है, जीवन उद्धेश्य बदलते है और उनके साथ परिभाषाऐं भी बदल जाती है। संत कबीरदास ने जिस प्रेम को समझने का जिक्र किया, वो उनके युग के अनुसार सहज था। शायद उस समय प्रेम प्रदर्शित नहीं होते हुए भी अहसासिस्त था। अनुभूति का विकास प्रेम तत्व के अनुसार ही मन में जगह बना लेता था । प्रेम की प्राप्ति से मनुष्य आत्म ज्ञानी हो जाता था क्यों कि अर्थ और विज्ञान का संक्षिप्त प्रभाव आदमी की जीवन शैली पर था, नैतिकता और संस्कार को जीवन शैली में मुख्य दर्जा प्राप्त था। प्रेम को परिभाषित करने से पूर्व उसे आंतरिकता की शुद्ध तराजू पर अहसास के बाटो से तोलना जरुरी है। मन में हजारों तत्व का समावेश होता है, उसमे प्रेम और शक की भूमिका से जीवन को अछूता नहीं रखा जा सकता। क्योंकि आज का प्रेम अवधि के धरातल पर अपनी सही जगह तलाशने में असमर्थ सा है ? प्रेम का महत्व जीवन में हर उम्र के लिए अति जरुरी है। मनुष्य जिस क्षण धरती पर आता है, उसी क्षण से प्रेम को समझने की कोशिश करता है, सच तो यही है कि मनुष्य प्रेम की क्रिया का ही उत्पादन है। बच्चा बन कर वो प्रेम के अहसास से अपने को पहचाने की कौशिश करता है, उम्र ज्यों ज्यों आगे बढ़ती है, वो प्रेम के अनुसार ही अपने जीवन को सजाने में लगा रहता है। आज हम बेहतर जीवन शैली में प्रेम के अनुदान पर विस्तृत चर्चा करना चाहेंगे, आइये, उस से पहले प्रेम शब्द की परिभाषा पर नजर डालते है।

प्रेम का शाब्दिक अर्थ होता है, प्रीति, प्यार, माया, लोभ और लगाव आदि, परन्तु इसमे कई उपसर्ग जोड़कर कई साहित्यिक परिभाषा तैयार की गई । इन परिभाषाओ के अलावा ऐसे कई शब्द भी है, जिनमे प्रेम का भरपूर अनुदान रहता है, जैसे ममता,आशक्ति और भक्ति।

अंग्रेजी में LOVE, AFFECTION आदि शब्दों द्वारा प्रेम को व्यक्त या उसका इजहार किया जाता है। बड़ी विडम्बना है कि हम अपनी भाषा के शब्दों की जगह विदेशी भाषा का सहारा अपने अहसास को जताने में करने लगे है। कई ज्ञानी गुरुओं का मानना है, “प्रेम शब्द जितना खुड़दरा है उतना ही शुद्ध है, इसको जितना शब्दों की पोलिश से चमकाया जायेगा
उतनी इसकी कीमत प्रेम के बाजार में बढ़ती जायेगी”। परन्तु प्रेम हीरे की तरह स्थूल नहीं है अत: इसकी चमक की अवधि अस्थायी ही मानी जाती है । प्रेम को परिभाषित करके कबीरदास जी ने प्रेम की अवधि और सार्थकता के बारे में कुछ इस तरह बताया..
‘घड़ी चढे, घड़ी उतरे , वो तो प्रेम न हो
अघट प्रेम ही ह्रदय बसे, प्रेम कहिये सोय’
कबीरजी इस दोहें के द्वारा यह समझाना चाहते हैं कि हर क्षण बदलने वाला स्वभाव प्रेम को आत्मसात नहीं कर सकता अतः उसे प्रेम नहीं कहा जा सकता, जिसमे कुछ रूपांतर नहीं बदलता और स्थिरता रहती वो ही प्रेम कहला सकता हैं।

आइये, हम आगे बढ़ते है, और यह जाननें की बेहतर कोशिश करते है कि शारीरिक संरचना में प्रेम क्या भूमिका मानव जीवन में और संसार के अन्य प्राणियों में निभाता है ? यह तो तय हैं की प्रेम एक तत्व है, जिसके बिना किसी भी सजीव जीव का प्रसार होना नामुमकिन है । सृष्टि की संरचना करने वाले को इसका सहारा लेना पड़ा क्योंकि इसके बिना सृष्टि का विकास होना मुश्किल था। पर क्या अकेला प्रेम इसमे सक्षम था, नहीं, अतः उसने इंसानी शरीर को दो स्वरुप् में बनाया। एक पुरुषत्व युक्त दूसरा नारीत्व युक्त, दोनों में कुछ अंतर शारीरिक और मानसिक स्तर पर रखकर दुनिया में उनकी भूमिका तय कर दी, दोनों ने ही सृष्टिकर्ता को निराश नहीं किया। कई विपरीत तत्वों का समावेश दोनों में होते हुए भी उनका प्रेम के मामले में एकागार होना आश्चर्यजनक और अभूतपुर्व ही कहा जाएगा।

प्रेम अदृश्य तत्व होकर भी काफी महत्व पूर्ण भूमिका संसार संचालन में निभा रहा है, प्रेम बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती उसी तरह हमारी दैनिक जीवन शैली इसके बिना बेहतर नहीं हो सकती। हमारा अब तक चिंतन प्रेम की रुपरेखा समझने तक ही सीमित था, जिससें हम प्रेम के महत्व को समझ सके।

आइये, हम जानने की कोशिश करते है, मनोवैज्ञानिक प्रेम के बारे में क्या विचार रखते है।…..
एरिक फ्रॉम में प्रेम की परिचित मान्यताओं का मूल्यांकन कर अपनी पुस्तक ” The art of loving “में कबीर दास जी के सूत्र को सम्बल दिया कि प्रेम को ज्ञान की जरुरत होती है। उनका यह भी मानना था, कि जो खुद से प्रेम कर सकता है, वही दूसरों से भी प्रेम कर सकता है। हकीकत में, फ्रॉम ने स्त्री-पुरुष के प्रेम को साक्ष्य मानकर ही नहीं दूसरे कई पहलुओं पर गौर कर प्रेम के सभी स्वरूपों का विस्तार से विश्लेषण किया। फ्रॉम ने फ्रायड के ‘लिबिडों’ सिद्धान्त को नकार दिया जिसमे उनके मुताबिक़ प्रेम सिर्फ यौन संवेगों की अभिव्यक्ति है। फ्रॉम ने माना प्रेम का मतलब मातृत्व प्रेम, बन्धुवत प्रेम, रागात्मक प्रेम, इश्वरीय प्रेम और आत्म-प्रेम।
भारतीय दार्शनिक गुरु रजनीश कहतें है कि ” अततः देह और दिमाग की सारी बाधाओं को पार कर जो व्यक्ति प्रेम में स्थित हो जाता है, सच मानों वही सचमुच का प्रेम करता है। उसका प्रेम आपसे कुछ ले नहीं सकता, आपकों सब कुछ दे सकता है। तब ऐसे प्रेम का परिणाम करुणा ही माना जाना चाहिए”।
क्रमश……

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली …..भाग ३…”मितव्ययता”

दोस्तों, हमने अपने पिछले भाग में बेहतर जीवन शैली के बारे में काफी कुछ विस्तृत रूप से चिंतन किया । जीवन जितना मधुर होगा, उतना ही विशिष्ठ होता रहेगा ।परन्तु सत्य हैं, दैनिक जीवन में हर दिन मधुर तो नहीं हो सकता, क्योंकि इंसान बाहरी दुनिया से भी अपने सम्बन्ध रखता हैं । लाजमी भी है, पारिवारिक, सामाजिक, प्राकृतिक प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता । हाँ, यह तय है, विपरीत परिस्थितियों में संयम और धैर्य से ऐसे दिन को सन्तुलित ढंग से गुजारा जा सकता हैं । जब कभी मैं जब काफी निराश महसूुस करता हूँ, तो एक गाना जरूर गुनगुनाता ” मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया” । यकीन मानिए, अपने आपको काफी सन्तुलित रखने में संगीत से ज्यादा कोई शुभचिंतक नहीं हो सकता । अपना दर्द दिल ही समझता और सहन करता है ।

चलिए, आज हम विशिष्ठ जीवन शैली के निर्माण में जिसकी निर्णायक भूमिका होती है, उसीकी चर्चा अभी करते है। पर उससे पहले हम सबको अपने आप से पूरी ईमानदारी से इस सवाल का जबाब देना होगा । “क्या हम मितव्ययी हैं” ?
आप भी सोचते होंगे की यह कैसा सवाल है ? विश्वास कीजिये, अर्थतन्त्र के युग में इन्सान इसके कारण बहुत कमजोर और कद्रहीन हो जाता है । आज की दुनिया में अगर विशिष्ठ जीवन का महत्व्पूर्ण पायदान अगर कोईं है, तो वह है, “रुपया” जिसे अंग्रेजी में हम “Money”और अलग अलग जगह वहां के प्रचलित नाम से जाना जाते है । भारत में क्या विश्व् के सभी देश सबसे धनाढ्य लोगों की सूची निकालते है, पर क्या हमने कभी ऐसी सूची देखी, जिसमे सबसे गरीब आदमी की तालिका दी हों । यही सत्य है, विशिष्ठता में “अर्थ ” का असीमित होना कोई जरूरी नहीं परन्तु उसके अस्तित्व से भी इन्कार नहीं किया जा सकता ।

किसी लेखक ने कहा भी है ” मानता हूं, धन खुशियां नहीं खरीद सकता परन्तु दुःख के समय कुछ सुख का अनुभव जरूर करा सकता है” । आज साधनों की दुनिया है, संसार में एक नया आंदोलन सा छा गया, कि हम कितनी तेजी से
एक दूसरे से आगे जा सकते है । यह अनुचित चिंतन, आदमी को जूनून की हद से भी आगे ले जा रहा है । इससे मानव व्यवहार में प्रतिकूल असर हो रहा है । अगर हम विशिष्ठ जीवन में अब भी विश्वास रखते है, तो सन्तुलित जीवन जीना होगा, वो तभी संभव होगा जब साधनों के प्रति हमारा लगाव कम होगा। पुराने समय में एक कहावत थी, जो आज के समय पर भी लागू होती है, की खर्च की कोई सीमा नहीं होती परन्तु आय की होती है । मानता हूँ, आज आय के साधनों का विस्तार हुआ है, पर खर्च के रास्ते भी कम नहीं निकले है ।

मित्वय्यता को समझदार आदमी ह्रदय से स्वीकार करेगा क्योंकि जब वो उम्र के अंतिम पड़ाव में होगा तो आज के सामाजिक सन्दर्भ में उसे हर पड़ाव पर अर्थ की जरूरत रहेगी । अर्थ सब समय अर्जित एक जैसा नहीं होता, कभी कम हो सकता है या एकदम अर्जित ही न हों । उस समय संचय किया ही काम आता है, और मितव्ययिता ही वो साधन,जिसके द्वारा यह काम किया जा सकता हैं । कहते है, भारतीय चलचित्र के दिंवगत कलाकार और संसद् सदस्य सुनील दत्त ने जब “रेशमाऔर शेरा” फ़िल्म बनाई तो वो दर्शकों में चली नहीं। फ़िल्म की असफलता ने सुनील दत्त के आर्थिक
हालात गंभीर बना दिए, उस समय उनकी पत्नी नर्गिस की गुल्लक बहुत काम आई । उसमे उनके बचाई पचास हजार की चिल्लर ने उन्हें काफी राहत दी, ध्यान रहे, उस समय पचास हजार काफी बड़ी रकम होती थी ।

आप कदापि यह न सोचे मैं कंजूसी की कोई तरफदारी कर रहा हूं, हकीकत में कंजूसी को पसन्द नहीं करता। पर यह जान लेना जरूरी है, की कंजूसी और मितव्यता में काफी अंतर है, हमे इस अंतर को सदा ही बनाये रखना जरूरी है। क्योंकि कंजूसी जीवन को सार्थकता नहीं, अभाव देती है परन्तु मितव्यता बचत के बारे में जागरूकता प्रदान करती है ।
सही होगा हम समझ कर चले । अगर बचत के प्रति हम कमजोर पड़ते है, तो मार्क ट्वैन के ये शब्द काफी सहायता कर सकते ” पैसे की कमी, सब बुराइयों की जड़ है”

ध्यान रखेंगे, की छोटी छोटी बचत बड़ी राहत देती और हम आज से ही, नहीं, अभी से मितव्य की राह पर चलेंगे ।

चलते चलते ****

“Many good qualities are not sufficient to balance a single want–the want of money.”

(” कई सारे अच्छे गुण आपकी एक चाहत को सन्तुलित करने के लिये काफी नहीं होते…पैसो की चाहत”)

……..Johann George Zimmerman कह रहे….

कमल भंसाली