आशा….

कहां भटक गई मेरी आशा की नैया
कहीं वो पथ हार तो नहीं गई
कहां गये मैरे ख्वैय्या
कहीं मंझदार में तो नहीं छोड़ गये
छोटी छोटी औस की बूंदों सी
चाह थी मेरी सफेद सच के मोती सी
माया की धूप ने न होने दी मन की
चाह थी इन्द्रधनुषी रंग बनने की
कलुषित लालसा ने सुनी तन की
चाह थी शीतल बयार का झोंका बन जाऊं
क्रौध के काले बादलों ने रास्ता रोक दिया
चाह थी कस्तूरी की महक बन जाऊं
दबी कायरता ने उसे कभी बाहर न आने दिया
चाह थी संजीवनी बूंटी बन पर्वत पर उग जाऊं
पर लालच के बंदरों से कैसे बच पाऊं
चाह चाह में ही डूबी होगी मेरी आशा की नैया
नही तो जरुर आते वापस मेरे भगवान,मेरे ख्वैय्या
अब तो इतनी सी ही है अंतिम चाह
मुझे मिल जाए वापस मेरी डूबी नैया
अब पार लगा देंगे मेरे सत्कर्म, मैरे भैया……

~~~कमल भंसाली~~~

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