🙅तिरंगा प्यारा👏 कमल भंसाली

आजादी का एक चमत्कार
“26” जनवरी का पर्व शानदार
बधाई के हम सब बने हकदार
आओ, झूमे गाये, नाचे शानदार

पर, दोस्तों मौसम देश में प्रेम का, क्यों बिगड़ सा रहा !
स्वाधीनता का असन्तुलन क्यों हर दिल को तड़पा रहा !
भाषा,जाति, धर्म शब्द हर मन में क्यों उलझने भर रहा !
गरुर है, देश पर आज, ये चिंतन हमारा क्यों भटक रहा !

सीमा पर दुश्मन हमें हरदम ललकार रहा
हमें अपने ही झगड़ों में कोई उलझा रहा
प्रगति की ललक को कोई नहीं समझ रहा
संगठित देश की जरुरत, “संयम”, दूर हो रहा

आज देश हमें अपनी हर भाषा में समझा रहा
जब आजाद हुआ, कितना खुश तिरंगा लहरा
आज भी याद आते है, जिन्होंने दी थी कुर्बानी
हम जो भोग रहे है, ये उनकी ही है, मेहरवानी

अपनी आजादी का सम्मान करना है,यह है, सीख लेना
नहीं बनना कभी कायर, शहीदों को जरा याद कर लेना
सीमा पर जो प्रहरी, उनसे शुद्ध देश प्रेम हमे है,सीखना
सिर्फ,अधिकारों को ही नहीं दायित्वों को भी है, जानना

ऐ मेरे वतन के लोगों,भ्रष्टाचार पर मौन न रहो
अपने स्वार्थ से निकल कर,करो देश का चिंतन
जो तिरंगा लहराया, उसको दिल में लहराते रहो
सब मिलकर करे नमन जय जवान, जय किसान

न भूलना जो कह गए,स्वतन्त्रता हमारा है, अधिकार
न ही भूलना उन्हें जो कर रहे हम पर प्राण न्योछावर
देश धर्म को सब से पहले मिले सम्मान पूर्ण अधिकार
न भूलो स्वाधीनता में रहती स्वच्छ शासन की पुकार

भारत भूमि हमारी जन्म माँ, ये बात सदा आत्मा में रहे
दुःख की जब भी घटा छाये, अखण्ड सौभाग्यवती रहे
सर्व हिताय:सर्व सुखाय: सत्यम् जयते की जयकार रहे
तिरंगा प्यारा, शान से यों ही लालकिले पर लहराता रहे

★★★ बन्दे मातरम्★★★जय हिन्द★★★
◆◆कमल भंसाली◆◆

कमल भंसाली

तिरंगे का दर्द….कमल भंसाली

दूर शहर की
छोटी सी
कच्ची तंग गली में
एक छोटे से
स्कूल में
स्वाधीनता दिवस पर
देश का
कोई कर्णधार
तिरंगा झंडा
फहरा रहा
पास में बैठे
कई अधनंगे
बच्चें मुस्करा रहे
ताली बजा रहे
कीचड़ भरी उनकी
आँखों में शायद
उनका उन्नत भविष्य
झंडे की तरह
इधर उधर लहरा रहा
लहराते झंडे ने जब
उस ओर देखा
बिन कपड़ों के
जर्जर तन की
असहाय
मुस्कराहट पर
रोना आया
उसे अपने लहराने पर
लज्जा का साया
नजर आया
सिमट कर
चिपक गया
अस्तित्व के
डंडे से
मानों मुरझा गया
सोच रहा
अब नहीं लहराना
अब नहीं इतराना
इससे अच्छा तो
शहीदों के शरीर पर
लेट जाना
तय किया लाख बार
कोई फहराले
जब तक निरीह आँखिन की
दूर नहीं हो मजबूरी
तब तक स्वाधीनता का
नहीं, मेरा देश अधिकारी
न ही उचित है, मेरा लहराना
हे प्रभु, शहीदों के इस देश
को जरा संभालना
जानता हूँ, अब तक
जो मुझे फहराते
मेरी सफेद पट्टी पर
कालिख लगाते
झूठे वादों के पुलिंदों में
अपने खुद के घर सजातें
इन मासूमों का हिस्सा भी
इन्हें नहीं पंहुचाते
शर्म, मुझे आ रही
देश उन्हें माफ़ कर रहा
करोड़ों के लुटेरे
मुझे फहरा रहे
निरीहता से ताली
बजवा रहें
हद है, उनकी बेशर्मी की
अब भी, गुनगुना रहे
जन गण मण….