*दोस्त, दोस्त न रहा*😢कमल भंसाली☺

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ऐ मेरे,
तूं, अब दोस्त न रहा
हमारी अजनबी चाहतों
में दिल हमारा
गुम हो रहा
दोस्ती का तो
सिर्फ, दम भर का
नाम ही रहा

कहां मिटती है
तेरे मेरे दिल की दूरियां
न तूं कहे, न कुछ मैं कहूं
है, कुछ, हम दोनों की मजबूरिया
वक्त ने किया, हमें गुमराह
जुदा हो रही, हमारी राह
वक्त का सितम नहीं है, न ही
कोई भाग्य का खेल
सच तो यही है
अब नहीं रहा
तेरे मेरे दिल का मेल

नजरिया जब था, एक
तब तक था, विवेक
दो नजरों की दो कहानी
जब हुई, हम पर दीवानी
तो टूट गई,
वर्षो की दोस्ती पुरानी
ऐसी ही होती है
मेरे दोस्त, जिंदगानी

न हमने की
आपस में बेवफाई
फिर क्यों
दोस्ती की तस्वीर
थोड़ी सी चाहतों के लिए
दुश्मनी के फ्रेम में लगाई
न तुमने कभी
ये बात मुझे समझाई
न ही मेरे अंदर आई

आओं मेरे पास
बैठ कर बताओ
क्यों, हमने पारस को
पत्थर बनाया !
क्यों दोस्ती का
धर्म नहीं निभाया !
क्यों आपस का
दिल दुखाया !
पवित्र, दोस्ती के खेल को
क्यों,शतरंज का खेल बनाया ?….कमल भंसाली
कमल भंसाली