मेहमान हूँ……..कमल भंसाली

मेहमान हूँ, जग तेरा
बहुत रहा,
अब इजाजत मांग
रहा, दिल मेरा
आया था, तब था सवेरा
चारों तरफ था
आलोक सुनहरा
अब हुई संध्या
अँधेरी रात होने,
से पहले
चला जाऊँ
सही समय, सही जगह
पहुंच जाऊं

मन मैला मत करना
मेहमान को तो
पड़ता एक दिन जाना
बहुत मिला मान सम्मान
सच कहता, जग
तुम तो हो अनुपम मेजबान
न समझना भूल जाऊँगा
सभी, तेरे एहसान

कृष्ण सुदामा सा होगा
अपना नाता
भेजने से पहले
ऐसा ही कह रहे थे
जग विधाता
सच ही बोल रहे थे
अपनत्व के हो दाता
सब कुछ तुमसे पाया
दामन ही मेरा
नही संभाल पाया
जो छिटक कर गिरा
उनमें फूल उग आये
उन्होंने ही मुझे भरमाया
इसलिए विधाता ने
मुझे वापस भुलाया

झूठ नही बोलूंगा, जग
जाने की चाह नहीं
पर रहने की भी
अब कोई वजह भी नहीं
शौक न करना
आना जाना तो
फिर से मिलने का
एक है, बहाना
खुश रहना
जरा, मुस्करा कर
अलविदा कर देना…..

कमल भंसाली