” प्यार और वासना” ….एक चिंतन भरी चर्चा..भाग 2 अंश 2 ★★कमल भंसाली ★★

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“वासना” शब्द कि विडम्बना यही है, एक जायज क्रिया के साथ नाजायज की तरह व्यवहार किया जाता है। अंदर से सबका इससे आंतरिक रिश्ता होते हुए भी, इस के प्रति अवहेलना और तिरस्कार पूर्ण नजरिया रखते है। आखिर, वासना से इतनी घृणा क्यों ? क्या वासना प्रेम की एक जरूरत नहीं, क्या वासना आकांक्षाओं का सुंदर स्वरुप नहीं है ? ऐसे और भी सवाल है, जिनके उत्तर हम यहां तलाशने की कोशिश करते है, पर उससे पहले हमें वासना का सही परिचय प्राप्त करना होगा। वात्सायन ऋषि थे, उन्होंने वासना एक स्वरूप कामवासना के बारे में बहुत कुछ लिखा, उन्होंने भी स्वीकार किया, बिना वासना प्रेम का अस्तित्व नहीं है, हकीकत में बिना वासना प्राणी जीवन धरती पर आ नहीं सकता। ये संसार बनानेवाले की महत्व पूर्ण चिंतन का वास्तविक कारण है, अतः वासना शब्द से नफरत करना कहीं भी जायज नहीं लगता। यहां यह बताना जरुरी है, अभी, हम यहां कामवासना नहीं, सिर्फ वासना के बारे में बात कर रहे है। दोनों में बुनियादी फर्क इतना ही है, काम का शरीर से, और वासना का मन से सम्बन्ध है। अतः कामवासना का मतलब हुआ, मन की दैहिक या शारीरिक वासना। जब की वासना का इंगित रुख सिर्फ मन और आत्मा से जुड़ा है, जिसे इंग्लिश में हम “Lust” के नाम परिचित है, हालांकि दोनों जीवन साथी है।

वासना का शाब्दिक अर्थ पर बिना गौर किये, उसके बारे में सही मूल्यांकन प्राप्त करना असंभव है, वासना का सही अर्थ है, कामना, इच्छा ( जैसे मन की वासना ), भावना ( जैसे काम वासना ), अज्ञान, ( जैसे वासना का तिरोहित होना )। गौर कीजिये, कौन सा प्रेम है, जिसमे कामना, भावना और अज्ञान का समावेश न हों। किसी भी रिश्ते के प्रेम में इसके किसी एक तत्व का समावेश तो रहेगा। माँ के रिश्ते पर गौर करे, तो इसमे भविष्य की सुरक्षा तिरोहित है। हमारी विडम्बना है, हम सत्य से दूर भागते रहते है, उसका सामना करना, हमारे वश कि बात नहीं है। हम प्रेम की बात करते है, पर जब वासना से सम्बंधित कोई चर्चा आती है, तो मानों हम असभ्य लोगों के प्रदेश का सफर कर रहे है। समझने की बात है, शरीर प्रेम से बना है, और जिंदगी भर प्रेम पाने में अपना अस्तित्व खो देता है, ज्यादातर असफल होकर इस संसार से विदा भी हो जाते है। असफलता का एक ही कारण है, उसने प्रेम में तो वासना को ढूंढा, पर वासना में प्रेम ढूंढने से वो कतराता रहा। मूल के प्रति उसका लगाव कम होता, ब्याज के आकर्षण में ही फंसता है, यह मानव स्वभाव है।

वासना शारीरक और मानसिक क्षमता को पूर्ण करने वाला महत्वपूर्ण सूत्र है, इसकी अवहेलना करना, अपने अस्तित्व को नकारना जैसा है। शरीर सम्बन्धी वासना एक दैहिक क्रिया है, इसके अलग अलग स्वरुप है। भारतीय संस्कृति इसके एक ही स्वरुप को मान्यता देती है, वो है, पति-पत्नी के रिश्तों में, जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त हो गई है। पर, वास्तिवकता यहीं है, अब यह एक विश्वास का प्रश्न है, जिसका उत्तर भी शायद सही न हो, पर यह सही है, आज रिश्तों के दूसरे दायरों में भी इसे स्वीकार किया जाता है। दैहिक वासना का स्वरूप आधुनिकता ने इतना बिगाड़ दिया, की समलैंगिता के सम्बंधों की मान्यता के लिए आंदोलन होने लगे है, कई देशो में जिनमे हमारा देश भी शामिल है, उन्हें मान्यता देने के करीब पँहुच रहे है। हकीकत यही कहती है, जो भी कर लो, अपने स्वार्थी आयाम बदल लो, पर प्रकृति अपने उद्धेश्य से कभी नहीं भटकती है, मानव भटकता है, और अपना नाश वो खुद ही अपनी हरकतों से खुद ही कर लेता है। चूँकि हमारा यह विषय यहां नहीं है, अतः हम इसे वक्त के ऊपर ही छोड़ देते है। बाकी हम को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए, कि वासना से हम भी वंचित नहीं रह सकते, परन्तु उचित और अनुचित के दायरे में रहे, तो जीवन निर्णायक पथ का हकदार बन जाता हैं।

वासना का मनोज्ञान करना है, तो “आत्मा” शब्द पर आस्था जरुरी है, जो इस सरंचना के पक्ष को नहीं पहचाने की कोशिश करते, उनके लिए वासना दरिंदगी से ज्यादा कुछ नहीं हो सकती, हकीकत में वो सामाजिक सुरक्षा पर आक्रमण करने वाले दानव बन जाते है। काम, शरीर की स्वभाविक और प्राकृतिक क्रिया है, सुंदरता से काम विचलित होता है। काम जब संयमित नहीं रहता, तो उसका सौंदर्य बोध अपराधिक आकार में बदल जाता है, और अत्याचार और दुराचार की सारी सीमाये लांघने की कोशिश करता है। आत्मा की पवित्रता इसे रोकने की जबरदस्त कोशिश करती है, धर्म के प्रति आस्था की बातें समझाती है, इसके बावजूद भी अगर वासना का रुप नहीं बदलता, तो मानवता को अनिष्टता झेलनी पड़ती है। आज साधनों की अतिरिक्तता ने हमारी चाहतों पर तेज गति के पंख लगा दिए है, हमारी इच्छायें अनियमित हो रही है, काया को सुखी करने माया की जरुरत बढ़ रही है, तब हमें समय कहां, ये चिंतन करने का कि नैतिकता हमारी आत्मा में किधर सो रही है।

जेस सी स्कॉट के अनुसार “मानव कला का बेहतरीन नमूना है”। कुछ मानको में ऐसा ही लगता है, बनाने वाले ने उसमे हर तरह के रंग का प्रयोग किया है। जब चित्र सुंदर हो तो निश्चित है, उसकी चाहत सभी को होती है, नारी-पुरुष का शरीर जब कलाकार की उत्तम कृति हो, तो चाहत को वासना के सन्दर्भ ही मूल्यांकित करना ठीक होगा, प्रेम तो भीतरी तत्व है, उस में चाहत को तलाशना, सही नहीं कहा जा सकता। नो रस से बना प्राणी, किसी भी रस से अछूता कैसे रह सकता है ? ज्ञानी से ज्ञानी आदमी कह नहीं सकता, उसके पास एक भी चाहत नहीं है। जयशंकर प्रसाद का एक काव्य ग्रन्थ ” कामायनी” है, उनकी इस रचना की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है, हमें अहसास दिलाता कि मानव मन का दर्पण गुण और अवगुण नहीं दिखाता, वो तो उसकी सही मानसिकता की पहचान कराता है, समयनुसार वो उनसे अपनी बुद्धि और विवेक से उनसे अपना श्रृंगार करता है। फ्रायड ने वासना को दैहिक जरूरत माना, और उसने इसकी सीमित स्वतंत्रता को उचित ठहराने में कई परीक्षणों का उदाहरण दिया। कार्ल जुंग स्विट्जरलैंड के एक प्रतिभाशाली मनोवैज्ञानिक और धर्म शास्त्रों के जानकार थे, शुरुवाती दौर में वो फ्रायड के मनोविज्ञान के ज्ञान से प्रभावित थे, परन्तु वो उनकी इस बात से कभी सहमत नहीं हुए कि मानव वासना एवं अन्य इच्छाओं का दास है। 1937, में जुंग भारत आये, और महर्षि रमन के सानिध्य से समझ गए कि ” मानव के भीतर असीमित शक्तियां है, यदि वासनाओं एवं इच्छाओं का रूपांतरण कर दिया जाय तो मानव जीवन एक अनमोल वरदान साबित हो सकता है”।

प्रेम और वासना दोनों को समझना आसान नहीं होता, ऊपरी सतह पर हम इनका विश्लेषण आत्मा और शरीर की प्रक्रिया के रुप में ही करते है, पर जब कभी हमें प्रेम को कसौटी पर कसना पड़ता है, तो हमें लगाव रुपी वासना का सामना करना ही पड़ेगा। वासना मानव मन की सबसे बड़ी दुर्बलता है, क्योंकि जिन तीन तृष्णाओं से मन बंधा दासत्व भोगता है, उसमें कामतृष्णा, भव तृष्णा और विभव तृष्णा
तीनों का संगम होता है। समझने की बात है, संसार पुरुष और नारी द्वारा बना है, उनका आपसी आकर्षण असामान्य नहीं हो सकता क्योंकि दोनों के लिए रुप, शब्द, गंध, रस और स्पर्श से बढ़करअन्य कोई आलंबन नहीं होता । ओशो यानि आचार्य रजनीश के अनुसार “निषेध” मन के लिए निमंत्रण है, विरोध मन के लिए बुलावा है, और मनुष्य जाति इस मन को बिना समझे आज तक जीने की कौशिश करती रही है। सारांश यहीं है, प्रेम निराकार होता है, ह्र्दय से अहसास किया जा सकता है, पर वासना आकारित होती है, अतः चेहरे की रुप रेखा में सम्माहित होती है, किस रुप में, कब पैदा होगी, कहा नहीं जा सकता।….क्रमश…कमल भंसाली

प्यार और वासना…एक चिंतन, भरी चर्चा…भाग 2 अंश 1 *****कमल भंसाली

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दोस्तों, हमने प्रेम के रिश्तों के सन्दर्भ में कुछ पारिवारिक रिश्तों की चर्चा की, परन्तु कुछ रिश्तें जो आज के जीवन में काफी उभर कर पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों पर भारी पड़ रहे है, उनमे कुछ को समझना बहुत जरुरी है। “दोस्ती” और “प्रेयसी” का सम्बन्ध आज के आधुनिक युग में काफी महत्वपूर्ण बनते जा रहे है। दोस्ती का रिश्ता आपसी सहमति से बनने के कारण जीवन को काफी प्रभावित करता है । कुछ इस तरह के रिश्तें जब दैहिक सीमा रेखा को पार करने लगते है, तो काफी संवेदनशील होने का डर रहता है। कहना न होगा, इनके लिये संयम, धैर्य और सही चिंतन की बहुत जरुरत होती है। सबसे पहले हम दोस्ती के रिश्ते की तरफ नजर करते है । इस रिश्ते में एक खूबसूरती है, यह परम्परागत बन्धनों से आजाद होता है । सबसे बड़ी सावधानी दोस्ती के रिश्तें में यही है, कि इसमे वित्तीय लेनदेन से बचना चाहिए, परन्तु आज अर्थ तन्त्र का युग है, अतः इसमे जब वित्तीय लेनदेन होना ,कभी कभी जरुरी हो सकता है। ज्यादातर दोस्ती इस कारण प्रभावित होती है, अतः इसकी सावधानी रखी जाए, तो जीवन के क्षेत्र में दोस्ती चमत्कारी साबित हो सकती है। अमेरिका में एक कहावत का प्रचलन है कि ” जब आप किसी दोस्त से रुपया मांगों तो पहले आपको निश्चित कर लेना चाहिए की आपके लिए दोस्त और रुपये में कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है “। दूसरे कारणों में आपसी प्रतिस्पर्धा होती है, यह एक ही क्षेत्र विशेष में दोनों के होने के कारण हो सकती है। हालांकि ज्यादातर दोस्ती स्वभाव, और व्यवहार के आकर्षण से की जाती है, पर धीरे धीरे इसमे परिपक्वता आती रहती है,और समझदार आदमी उसकी सीमा रेखा को पहचान कर दायरे के अंतर्गत दोस्ती निभाता है। इसमे बिना रिश्ते के प्रेम के बावजूद काफी अंतरंगता होती है, यह अनमोल हो, तो कृष्ण सुदामा जैसी दोस्ती समझी जाती है।

प्रेयसी और प्रेमी के सम्बन्ध में यह चिंतन काम नहीं कर सकता, क्योंकि उसमे प्रत्यक्ष वासना ज्यादा होती है, प्रेम की जगह आकर्षण ही ज्यादातर होता है। इसकी बुनियाद में अगर सच्चा प्यार हो तो अलग बात है, नहीं तो आजकल स्वार्थ का भरपूर प्रयोग दोनों पक्ष करते है। प्रेयसी या प्रेमी दोनों ही विस्फोटक स्थिति में रहते है, क्योंकि इस तरह के सम्बंधों को ज्यादातर गुप्त ही रखा जाता है, जब तक यह किसी कारण से उजगार नहीं होते या दोनों इसे कानूनी मान्यता नहीं देते। ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने है, जो अनैतिक और कानून के विरुद्ध है, फिर भी, ऐसे रिश्ते को परिवार और समाज की मान्यता मिल जाती है, अतः आजकल विरोध भी नगण्य नजर आता है, शायद, यह कोई नई सोच का नया चमत्कार है, जहां समाज शांत रहता है।

भारतीय संस्कृति की एक विशेषता है, यह युग के अनुसार बदलती है, परन्तु गति धीमी होती है, अतः संघर्ष भी हर बदलाव को झेलना पड़ता है। आज रिश्तों के सन्दर्भ में कुछ ख़ास परिवर्तन की बात हम यहां करना चाहेंगे, जैसे आज के दौर में लड़का लड़की का बिना शादी साथ रहना। आज से कुछ वर्षो पहले किसी लड़के का किसी लड़की से बात करना मामूली बात नहीं होती थी, यहां तक की पति पत्नी दिन में मिलना मुश्किल होता था। प्यार का इजहार करने में कई तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ता था। समय बदला, तरीके बदले, प्रेम पत्र का विकास हुआ। कहते है, इंतजार के साथ प्राप्त हुई वस्तु का एक अलग ही रोमांच होता है, सच भी है, प्रेम जाने अनजाने कई कसौटियों पर परखा जाताऔर पूर्ण सम्पूर्णता प्राप्त करता। स्थानीय आय के साधन कम होनें के कारण लोग दूसरे राज्यों या देश उपार्जन करने के लिए जाते थे, इस जाने को “परदेश” जाना कहते थे। दूरिया प्रेम करने वालों को असहनीय विरह देती है, अतः वेदना को कम करने के लिए प्रेम पत्रों का अविष्कार हुआ। निश्चित तौर पर यह कहना मुश्किल होगा कि पत्रों का आदान प्रदान कब शुरु हुआ, परन्तु प्रेम पत्र इंसानी भावनाओं को प्रकट करने का एक अनुपम साधन है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता, जिसमे प्रेम के प्रति शालीनता, स्वस्थता, और संस्कारित चाहत का समावेश किया जाता है। इन पत्रों में कस्तूरी की तरह सुंदर शब्दों से ही प्रेम या प्रणय प्रकट किया जाता, भाषा का काव्यमय हो जाना इन पत्रों में मामूली बात होती है। हालांकि आज के युग में फेसबुक और वाट्सअप पर ज्यादातर फूहड़ सन्देशों की भरमार ही नजर आती है।

जरा गौर कीजिये नेपोलियन के इस पत्र के अंश पर जो उसने अपनी प्रेमिका जोशफिन को लिखा था । ” जब से, मैं तुमसे बिछड़ा, मैं बहुत उदास हूं । लगता है, मेरी सारी खुशिया तुम्हारें पास रह गई, मैंने सारे समय तुम्हारी यादों की बाहों में, तुम्हारे आंसुओ में, तुम्हारे स्नेहपूर्ण प्रेम में रहता हूं। जोशफिन, तुम्हारी अपरुव खूबसूरती मेरे दिल को लगातार जलाने वाली मशाल बन गई। तुम्हारा एक महीने का प्यार, जब से अलग हुआ, मुझे अहसास कराता है, मैं तुम्हे उससे हजार गुना प्यार ज्यादा करने लगा हूं। हर दिन यह प्यार तुम्हारे लिए बढ़ता ही जाता है”।
सच्चा प्यार जीवन को कितना खूबसूरत बना देता है ? है, ना दोस्तों। क्रमश*****कमल भंसाली

प्रेम और वासना.. एक चिंतन, भरी चर्चा…कमल भंसाली

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प्रेम और वासना इंसानी जीवन के वो दो पहलू है, जिनके बिना जिंदगी को लय मिलना मुश्किल होता है। प्रेम को अगर वासना से अलग कर दिया जाय, तो प्रेम की परिभाषा को समझना, जरा मुश्किल ही होता है।जहां शुद्ध प्रेम का केंद्र बिंदु आत्मा को ही माना गया, वहां वासना युक्त प्रेम का केंद्र बिंदु, दिमाग और ह्रदय बताया जाता है। आत्मिक प्रेम निस्वार्थ और निराकार बताया गया, वहां वासना को कई आकार से पहचाना जा सकता है।शुरुआती जिंदगी में दोनों का ही समावेश होता हैं। कुछ विशिष्ट आदमी ही वासना की भूमिका को जीवन से अलग कर पाते है, परन्तु काफी कठिनता से।

प्रेम बिना जीवन नहीं चल सकता, पर बिना वासना के जीवन को संयम से चलाया जा सकता है। पूरी यथा स्थिति को समझने के लिये हमें सबसे पहले प्रेम की परिभाषा को समझना होगा।

प्रेम की शाब्दिक परिभाषा जान ने से पहले यह महशूस करना जरूरी होगा, की प्रेम ज्यादातर आभासीत होकर ही अभिव्यक्ति करता है, और अपनी चरम अनुभूति में स्पर्शमय भी हो सकता है। शुद्ध प्रेम त्यागदायी होता है,उसमे स्वार्थ का निम्नतम अंश ही पाया जाता है। स्वार्थ और वासना की बढ़ती मात्रा प्रेम के स्वास्थ्य के लिए घातक माना जाता है।

प्रेम की उत्तम परिभाषा यही है, इसमे कहीं “मैं” का समावेश नहीं रहता, इसके लिए “हम” ही उत्तम माना गया है। दूसरी बात प्रेम में पवित्रता का आभास होता है, परन्तु वासना के बारे में ऐसा कहने से संकोच का अनुभव होता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है, कि प्रेम सत्यता के आसपास ज्यादा रहना चाहता।

ख़ैर, हम पहले प्रेम का शाब्दिक अर्थ की तरफ ध्यान करते है। प्रेम को कभी कभी प्यार शब्द से भी
सम्बोधित किया जाता है। हिंदी शब्दकोश के अनुसार
प्रेम का मतलब प्रीति, माया, लोभ, और लगाव भी होता है। परन्तु, प्रेम को शब्दों से नहीं अहसास और भाव से ज्यादा अनुभव किया जाता है। प्रेम और प्यार दो शब्दों की एक ही व्याख्या है, दोनों ही अढ़ाई अक्षर से संस्कारित है। दोनों को जोड़ने वाला आधा शब्द सदा अधूरा रहेगा, क्योंकि सच्चा प्यार कभी समाप्त नहीं होता। इतिहास की बात करे तो इसका प्रमाण बहुत सारे प्रेम किस्सों में मिलेगा जहां प्रेम के लिए प्रेमियों ने शुद्ध प्रेम के कारण मौत को गले लगा लिया। आज के दौर में भी ऐसी कई घटनाये, हमारे सामने आती है,परन्तु ऐसे प्यार को नासमझ प्रेम की श्रेणी में ही समझा जाता है।

प्रेम शब्द, जीवन का आधार, सिर्फ मानव के लिए ही नहीं अपितु सभी सजीव प्राणी मात्र के लिए है। हालांकि इसके लिए कोई निश्चित आधार स्थापित नहीं किया जा सकता कि प्रेम का सिद्धांत क्या है। जो इस विषय पर शोध कर रहे है, उनका कहना की इसके बारे में एकमत होना असंभव है। कुछ लोग इसे भगवान की कृपा, कुछ रहस्मय, कुछ आत्मिक, मानते है, पर स्पष्टता कहीं नहीं है। मनोवैज्ञानिक जीक रुबिन के अनुसार शुद्ध प्रेम में तीन तत्वों का होना, अति आवश्यक है, वो है,
1• लगाव (attachment)
2• ख्याल (caring)
3• अंतरंगता (intimacy)
उनका मानना है, इन तीनके के कारण ही, एक आदमी दूसरे से प्रेम चाहता है।

जब की भारतीय दर्शन शास्त्र कुछ और ही बात करता है, उसके अनुसार प्रेम हर एक की आत्मा में रहता है, उसे अहसास कराया नहीं जाता, उसे समझना पड़ता है, उसमे शरीर की उन क्रियाओं को गौण महत्व दिया है, जिनमे स्पर्श की जरुरत होती है, उनके लिए देखने भर से प्रेम प्रकाशित हो जाता है। हमारे यहां कुछ रिश्तों में प्रेम को अवश्यंभावी माना गया है, जिसका नहीं होना लोगो में कुछ अचरज पैदा करता है, जैसे की माता, पिता, बेटा, बेटी और पत्नी, ये कुछ ख़ास रिश्ते है, जिनका प्रेम को शुद्धता के रुप में ही मिलने को, स्वीकार किया गया है, हालांकि सच्चाई यही है, ये ही रिश्ते ज्यादा तकलीफ में होते है।

प्रेम की सबसे बड़ी कमजोरी चाहत होती है, जब किसी से कोई अपेक्षा की आशा करे, और किन्ही कारणों से वैसा न हो, तो जिंदगी निराशमय हो सकती है। विश्वास और सत्य प्रेम के दो बुनियादी तत्व है, जिससे प्रेम सहज ही अपनी शक्ति का संदेश मन में प्रकाशित कर सकता है।

आइये, इस शृंखला में आगे बढ़ने से पहले कुछ जन्मातिक पारिवारिक सम्बन्धों की संक्षिप्त परिभाषा का अनुसंधान करने की चेष्टा करते है। परिभाषाओं के विश्लेषण में जरुरी नहीं कि लेखक की परिभाषा, आपके अनुसार हो, क्योंकि प्रेम का महत्व सबके लिए अपने अनुभव के आधार पर होता है, परन्तु तय यहीं है, सब रिश्तों में प्रेम की उपस्थिति से इंकार करना मुश्किल है।

पति और पत्नी के रिश्ते को काफी संवेदनशील माना गया है, जिसमे आसक्ति और प्रेम दोनों की जगह तय की गई है, चूँकि यह रिश्ता संस्कारो के निर्माण में सहयोग करता है, अतः इस रिश्ते में वासना का उचित गरिमामय प्रवेश की अनुमति स्वीकार की गईं है। सामाजिक दर्शन ऐसे सम्बंधों में हिंसा को छोड़ कर इसे अवैध करार नहीं करता।

सबसे आदर्श रिश्ता माँ का होता है, जिसमे एक ही तरह का शुभता भरा प्रेम अविरल बहता ही रहता है।
इस प्रेम की विशेषता यह होती है, कि इस प्रेम की पहचान से ही इंसान की जिंदगी शुरु होती है, और उत्तरोत्तर आदमी इसके प्रेम के अलग अलग रंगों की पहचान रिश्तों के सन्दर्भ से करने लगता है। माँ का प्रेम जीवन स्पंदन से शुरु होकर अंत तक बिना किसी शर्त अपना दायित्व निभाता रहता है। इस प्रेम में वात्सल्य और स्नेह का अद्भुत समावेश देखा जा सकता है।

पिता का रिश्ता जीवन को सम्बलता और दृढ़ता प्रदान करता है, यह रिश्ता कुछ दायित्यों से मजबूर होने के कारण स्पष्ट प्रेम नहीं प्रकाशित कर पाता, परन्तु आंतरिक होते हुए भी अनिष्ट से बचाता है। इस रिश्तें के प्रति सन्तान की समझ ज्यादातर कमजोर और भ्रामक होती है। सब प्रेम की किस्मों में उत्तम होते हुए भी पिता के प्रति प्रेम सहमा सा रहता है। माता पिता दोनों के प्रेम को समझने वाला आदमी सही जीवन दर्शन का ज्ञान कर सकता है। माता का प्रेम जहां शांत और शीतल और सहज बहने वाली धारा है, वहां पिता का प्रेम जीवन में आने वाली कठोर चट्टानों के प्रति सक्षमता प्रदान करता है। समझने वाली बात है कि “भगवान न दिखने वाले माता पिता होते है, परन्तु माता पिता दिखने वाले भगवान है।”

सबसे सुखद अनुभूति और दोस्ती जैसा रिश्ता भाई- बहन का होता है, इस में अहसास आत्मिक होता है,
माँ के बाद इंसान सात्विक स्नेह, प्रेम, और विश्वास इसी बन्धन में ढूंढता है। बहन पिता के बाद अपनी सुरक्षा का अनुभव इसी रिश्तें में करतीं है, शादी के बाद भी, इस बन्धन का अपना महत्व है।….क्रमश..कमल भंसाली

मंजिल का राही…♥♥कमल भंसाली♥♥

पथ विहीन, हो, मंजिल का राही
आकांक्षा के जंगलों में मत भटक
ख्बाबों के जुगनू का टिमटिमाना
दृष्टि भ्रम ही तेरा, न जाना अटक

कहते है, राही, इस जंगल का, न आर है, न है पार
चन्दन के पेड़ों से लिपटे, लालचाह के सर्प बेशुमार
असत्य की कटीली चट्टानों पर न करना अति विश्राम
उन पर रेंगती गलत कर्मो की लाल चींटियां अपार

संभल करना चलना, सत्य की पगडण्डी करेगी उद्धार
चलते ही रहना, राही, आगे है, ज्ञान का विरुध वृतिकार
उसके पास ही मिलेगा संयम के नीर से भरा अमृत सरोवर
पावन हो तुम्हारीआत्मा, डुबकी उसमें लगाना जरुर, एकबार

लोभ की चुड़ैले, वासना के सियार, छितराये मिलेंगे चारों ओर
प्रार्थनामय शूरवीर हो, रखना साथ क्षमा का प्रमुख हथियार
ध्यान रहे हार न जाना, अभिमान के दानव करे जब विष प्रहार
भक्ति की शक्ति है, तेरे पास, राही, आजमाना जरुरत अनुसार

राही, समय के नक्शे पर देख, हो निग्रह, उस पर कर जरा गौर
एक पल में नवजीवन, दूसरे पल में अंत अनन्त का अलबेला शोर
कहीं धूप, कहीं छांव, कहीं सुरमई शाम, कहीं नि:स्पृह सुनहरी भोर
कहीं तन नोचती चीलें, तो कहीं दृष्टि मोह के प्रेमोन्मत्त मोर, चकोर

कर्म ही तेरा है, बल, मिलेगी मंजिल तुम्हें, कर एतवार
आत्म धर्म के देवता, बनेगें मार्ग दर्शक जरुर, इस बार
भटके राही, आकांक्षाओं का जंगल करेगा, अकेला ही पार
तेरा निश्चय ही बताएगा, तू है इस पार या जाएगा उस पार

राही रे, भटकना तेरा संसारिक अरण्य में है, लाजमी
सत्य है, तू त्रिदेव नहीं, है साधारण सा तन्हा आदमी
कहते है, सुबह का भटका, शाम को वापिस आये
वो, जीवन को जीने का सही दर्शन पा, मंजिल पाये……

कमल भंसाली

प्रेम और वासना.. बेहतर जीवन शैली भाग….९ अंश ३….कमल भंसाली

प्रेम की सबसे बड़ी विशेषता, अगर कोई है, तो यह कि यह भावनाओं के सभी रंगों से परिपूर्ण रहकर भी सदा सफेद और स्वच्छ सत्य के अंदर ही अपना परमोत्कृष्ट ढूंढता है, पर ऐसा तत्व भक्ति स्वरुप के अलावा कहींऔर मिलना असंभव ही लगता है। प्रायः, यह ही दृष्टिगोचर होता है, कि मानव अपनी गलत आदतों की दास्तवता से स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहता है, पर अति लगाव या असंयत प्रेम के कारण ऐसा नहीं कर पाता, इसे मन की कमजोरी भी कह सकते है। बेहतर जीवन शैली प्रेम का तीन प्रकार से विशलेषण करना चाहेगी.

1. शारीरक प्रेम
2. मन का प्रेम
3. आत्मा का प्रेम

शारीरिक प्रेम…………

संसार में मानव शरीर को अपनी अनुपम सरंचना के कारण एक वरदान के रुप में देखा जाता है। बनानेवाले ने बड़ी कुशलता दिखाई और उसने शक्ति और कमजोरी का अनुपम मिश्रण का सन्तुलन बरकरार रखने के लिए बीमारी और मृत्यु का सहारा लिया। मानव मन में कमजोरी के रुप में कई अवगुण एक साथ निवास करते हैं। और वे काफी स्थान पर अपना वर्चस्व रखने की कोशिश करते है। जोअच्छे गुण होते है, उन्हें कम जगह प्राप्त होती है । जो,मानव सयंम और धैर्य को आत्मा में पूर्ण स्थान देते है, उनके जीवन में प्रेम की कमी शायद ही रहती है। आवेश, क्रोध, लालच, स्वार्थ प्रेम के सबसे बड़े दुश्मन है, उनसे आत्मा जितनी दूरी रखेगी, उसे प्रेम की कमी कभी नहीं महसूस होगी।

यह बात ध्यान में रखने की है, कि अति शारीरिक प्रेम को वासना के रुप में जाना जाता है, बिना प्रेम का यह मिलन शरीर की अतिरेक इच्छाओं की पूर्ति जरुर कर देता है।परन्तु, हर शुद्ध आत्मा इस शर्मिन्दिगी को सहज नहीं लेती, क्योंकि जो पवित्र विचारों के निर्मल जल से जो रोज नहाती, उसके लिए क्षणिक गन्दगी सहन करना सहज नहीं होता।आज नैतिकता के आँचल में अनैतिकता शरण लेकर् जो उत्पात कर रही है, वो प्रेम के रिश्तों को अविश्वासनिय बना कर जीवन को असहजता की आग में झोंकने की चेष्टा कर रही हैं। यह तय है, प्रेम की अनुभति चाह से शुरु होकर मिलन की गंगा में विलीन होती है। जब दो शरीर आत्मिक एक होकर मिलते तो उनका सुमधुर मिलन प्रकृति का विकास करते है, जिसमे कोई ख़ौफ़ नहीं होता, कहना न होगा, यह मिलन दाम्पत्य जीवन में हीं हो सकता है। हालांकि आजका आधुनिक जीवन शरीर मिलन ज्यादा चाहता हैं, चाहे आंतरिक प्रेम उसमे नहीं के बराबर हो। आज का परिवार स्वतंत्रता के नाम पर कई समस्याओं से इसी लिए ज्यादा जूझ रहा है।

प्रेम के हजारों पवित्र रुप होने के बावजूद मानव वासना के चंगुल में जल्दी फंस जाता है, यह कमजोर मानसिकता का संकेत है। आइये, जानते है प्रेम और वासना अलग क्यों है। सबसे पहले वासना को परिभाषित करने की चेष्टा करते है।
ये तो तय है, वासना प्रेम का ही एक रुप है, परन्तु प्रेम में यह रुप कई सीढ़ियों चढ़ने के बाद आता है। वासना शरीर और मन की जुड़ी मिलिभगति से कभी भी किसी रुप में तन में आ सकती है, इसका आत्मा से कोई लेना देना नहीं होता।
जबकि प्रेम भावनात्मक सम्बंधों के साथ शुरु होता है, काम और वासना शारीरिक स्पर्श से। कवि दिनकरजी ने “उर्वशी” में लिखा है,” कामजन्य प्रेरणाओं की व्यापित्यां सभ्यता और संस्कृति के भीतर बहुत दूर तक पहुंची है। यदि कोई युवक किसी युवती को प्रशंसा की आँखों से देख ले, तो दूसरे ही दिन से उस युवती का हाव-भाव बदलने लगते है”। दिनकर जी के कथन की सच्चाई पर कोई सवाल नहीं किया जाना चाहिए। अततः यह तो सच ही है कि स्त्री और पुरुष का प्रथम आकर्षण ही प्रेम का प्रारभ्भ हैं। यह अलग बात है, भारतीय दर्शन में प्रेम को शारीरक और मानसिक दो अलग तत्वों में बाँट दिया। अवांछित शारीरिक सम्बंधों को वासना की परिधि में रखा गया और आपसी रिश्तों में पत्नी के अलावा सभी रिश्तों में शारीरिक प्रेम को निषेध किया गया। कई मायनों में यह व्यस्था स्वस्थ और सही लगती है। हम शायद यह तो स्वीकार करेंगे की अंतरंग प्रेम लेने में नहीं देने में विश्वास करता है, जब की वासना सब कुछ लेना चाहती है। प्रेम की उम्र लम्बी होती है, वासना की कोई उम्र नहीं होती।

आचार्य रजनीश ने संसार को ही वासना माना है। वो कहते है “संसार का अर्थ है, भीतर फैली वासनाओं का जाल। संसार का अर्थ है, मैं जैसा हूं, वैसे से ही तृप्ति नहीं, कुछ और होऊं, तब तृप्ति होगी। जितना धन है,उससे ज्यादा हो। कितना सौंदर्य है, उससे ज्यादा हो, जितनी प्रतिष्ठा है, उससे ज्यादा हो। जो भी मेरे पास है,वो कम है। ऐसा कांटा गड़ रहा है, वही संसार है। और ज्यादा हो जाए, तो मैं सुखी हो सकूँगा। जो मैं हूँ, उससे अन्यथा होने की आकांक्षा संसार है”। यानी अति ही वासना है।

यह गौर करने की बात है, कि जीवन में नवरंग ,नवरस, या नव भाव प्रमुख है, उनसे उपेक्षित सन्यासी का जीवन भी नहीं रहता, परन्तु आत्मिक सयंम से हर भाव पर उनका शरीर से, मन से और आत्मा पर सयंमित शासन रहता है। जानने के लिए जरुरी है, नव रस के यह नौ प्रकार भरत मुनि के अनुसार क्या है? उनके अनुसार…

“रतिहासश्च शोकश्चक्रोधत्साहौ भय तथा ।
जुगुप्सा विस्मयश्चैति स्थायिभावा: पर्कीर्तिता:” ।

(अर्थात रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा,विस्मय तथा निर्वेद, ये नौ स्थायी भाव माने गये है।)

बेहतर जीवन शैली प्रेम को ही आधार मानती है, यह भी मानती कि वासना से जीवन कभी अपनी श्रेष्ठता नहीं पा सकता। आज के आधुनिक युग में मन की कमजोरियों के कारण बिना उचित कारण, अनुचित शारीरिक सम्बन्ध कई तरह की बीमारियां और समस्याओं का निर्माण करता रहता हैं। वासना का निदान धर्म शास्त्रों में सयंम और आत्मिक चिंतन ही बताया गया है। जीवन में अगर कभी ऐसी परिस्थिति का निर्माण हो, तो उससे बचना ही उचित होगा। …..क्रमश….कमल भंसाली

कमल भंसाली

अपरिभाषित प्रेम…….कमल भंसाली

पर्यश्रु नैन
जाने दिल का भेद
परिहित मन
रहे सदा बैचेन
दिल की नादानी
अब भी कहती
प्रेम ही जिंदगानी
न जाने बहता दरिया
किसी का नहीं हुआ
बिना दिल प्रेम कब हुआ

शैलाब ही उमड़ा
चारो ओर
मुखड़ा दिखा, सुहाना
सब कहते
यही, प्यार
नहीं, ये है कोई
नया व्यापार
जिसमे है
कामनाओं का नशा
पर नहीं प्यार
जिस्म का इकरार
मन का इंकार
कभी नहीं हुआ
न ही होगा प्यार

प्रेम जाने सब
पर न जाने
सच्चे पक्के रंग
विरही वेदना
रहती प्रेम संग
परिभाषित होती
सिर्फ आशिकी
प्रेम का स्पंदन
है, जीवन बन्धन
बन्ध गया
समझो उसे
प्रेम रोग लग गया
प्रथम अक्षर
प्रेम का पढ़ गया

पाठ अभी अधूरे
बिन आत्मा के
न जाने सब पुरे
मिलन की चाह
कैसी उपासना
कलुषित मन की
है, कंलकित वासना

विहंगम दृष्टि
प्रेम की तरुणाई
मुखर मौन
अधूरेपन की भरपाई
संचित कामना
वासना की चारपाई
आत्मा ने पवित्रता
अंत तक छिपाई
न समझी बात
कब समझ में आई

अंतर्मन साधना
पवित्र भावना
दैहिक संयमन
सृजन का चयन
मृदुल स्पर्श
हो लुब्ध सहर्ष
तो प्रेम है, उपासित
युग ही करेगा विस्मृत
“परिभाषित”……

कमल भंसाली