वाणी..मधुरता की रानी

“वाणी”, तुम तो मधुर हो
“मैं” ही, कभी कर्कश हो जाता
तुम तो ह्रदय वीणा हो
मन ही, कभी नगाड़ा बन जाता

तुम दृश्य को नयनभिराम
की ऊर्जा प्रदान करती
कभी क्रोध में आँखे ही
उसमें काला रंग डाल देती

उदर के संग रहकर भी
तुम, अमृत संचय करती
स्वाद वशीभूत हो, जीभ
अपच जहर, उगल देती

तुम “पवित्रआत्मा” से “सत्य”
का सदा आश्रीवाद लेती
भ्रमित आत्मा, प्रदूषण कहकर
झूठ के आवरण से बाँध देती

सन्तों और ज्ञानियों ने तुम्हें
सदा माना प्रभु की रानी
कुछ “स्वार्थों” ने बना दिया
तुम्हें काया की नौकरानी

क्या कहूं, आत्मा का “अंहकार”
अंधकार ही पसन्द करता
बाकी तुम्हारी चमक से तो, सारा विश्व्
आत्म विश्ववास से,” मुस्कराता”

भूले दिमाग कि, सदा अनजान रही
तुम तो साथ, रोज निभाती रही
फिर भी, जीवन पथ को संभाल
“आलोक”का दर्शन, कराती रही

जब सरस्वती बन निकलती हो
ह्रदय को सरगम बना देती हो
न समझे अंतरात्मा, तुम्हारी मृदुलता
तब सहम कर, तुम चुप हो जाती हो

तय है, तुम सदा रहोगी महान
मैं ही यहां का, “अजनबी मेहमान”
तुम्हारी चर्चा करेगा, सारा जहां
आज “मैं”यहां, पता नही कल कहां…..

कमल भंसाली