बेहतर जीवन शैली भाग ..९..अंश…२..अमृतमय प्रेम…..

भारतीय अध्यात्मक शास्त्रों के अनुसार प्रेम भीतर की चीज है, जब तक अंदर में रहता है, स्वच्छ, सरल, पवित्र और अमृतमय रहता है परन्तु जब यह बाहर आता है, तो प्रायः इसका स्वरुप् बदल जाता है, क्योंकि इसकी जरुरतें इसे स्वार्थी और समझदार बनने पर मजबूर कर देती हैं।
मानव जीवन का पूरा अस्तित्व प्रेम और व्यवहार की धुरी पर घूमते हुए कई तरह के कीर्तिमान स्थापित करता है। प्रेम के तत्व से जन्मा इन्सान आज हर क्षेत्र में विशिष्ठ है, अगर कहीं कमजोर हुआ है, तो सिर्फ नैतिकता के क्षेत्र में, और उसकी कीमत भी वो अपने दैनिक जीवन में चूका रहा है, असुरक्षा की भावना में रहकर ही जी रहा है। अपनी व्यापारिक और आर्थिक प्रगति के नाम पर लोभ में गिरा मानव पता नहीं कभी इस दलदल से निकलेगा या नहीं, अभी यह हम इसे समय के ऊपर छोड़ देते है। ओशो आज के मानव व्यवहार के सन्दर्भ में प्रेम के बारे में कुछ इस तरह की बात करते थे, वो कहते है, ” प्रेम गुलाब के फूल की तरह होता है,जब तक होता है, इतना जींवत, हवाओं में, बारिश में, सूरज की रौशनी में नाचता हुआ, अपने सौंदर्य की घोषणा करता हुआ, लेकिन शाम होते-होते वह मुरझा जायेगा; उसे रोकने के लिऐ तुम कुछ नहीं कर सकते। ह्रदय का गहरा प्रेम हवा की तरह होता है जो तुम्हारे कमरे में आती है, और बाद में विदा हो जाती है। तुम उसे मुठी में बाँध नहीं सकते”। कुछ इस तरह की बात भी निकोलस स्पार्क कहते है, ” Love is like the wind, you can’t see it but you can feel it”। तत्व की बात यह है, प्रेम अस्थायी होते हुए भी जरुरत तक स्थायी है, इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता।
आइये, हम प्रयास करते है, यह जानने का क्या प्रेम को पूर्ण शुद्धता के साथ जीवन की ग्रहण करने की और देने की क्षमता है, हकीकत यहीं कहती है, शुद्ध सोने को भी आकार देने के लिए खाद की जरुरत होती है, तो प्रेम को आकार देने के लिए रिश्तों की खाद दी जाती है। धर्मगुरु कहते है, कि हम कलयुग में जी रहे, और सत्य की कमी के कारण प्रेम की गुणवता और शुद्धता पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वभाविक है। आज के माहौल में प्रेम सफलता के औजार के रुप में ज्यादा प्रयोग करने की जरुरत बन गया, जो आंतरिक नही सिर्फ दीखता है, जब तक उसकी जरूरत हो। आज के असार्थिक युग में सच्चा और सही प्रेम अस्तित्व विहीन होकर लुप्तप्रायः सा हो गया है। परन्तु इससे प्रेम की गरिमा को कम नहीं आँका जा सकता।
प्रेम सबसे ज्यादा रिश्तों में तलाशा जाता है, ये रिश्ते होते तो अनेक है, परन्तु इनमे माँ-पिता, बेटा-बेटी, दादा-दादी,
भाई-बहन आदि प्रारंभिक रिश्ते है, सर्वप्रथम इन्हीं में गुजरता है, और वहीं वो इसे तलाशता है। कहना न होगा संसार में आने के बाद सबसे पहले मनुष्य आश्वस्त प्रेम इन्हीं में ढूंढता है तथा तथ्य की बात यह भी है, कि वो इसको कभी चुकाने वाला ऋण नहीं मानता,कर्तव्य बोध हो तो अलग बात है। इसके बाद का प्रेम दोस्तों, प्रेयसि, पत्नी और अपनी सन्तान में अपने प्रेम के अनुपात में तलाशता है। शारीरक, मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक विषमताएं, और अन्य तरह की समस्याएं आने पर उसका दार्शनिक प्रेम आस्था के रुप में धर्म और भगवान में ढूंढता है। प्रेम का कोई भी रुप या स्वरूप हो, पर सशक्त प्रेम को चाहिए सच्चाई, आस्था, विश्वास, निस्वार्थता, तथा सबसे जरूरी सयंम, इनकी कमी हो तो प्रेम अपनी कमजोरी से
ज्यादा प्रभावकारी नहीं हो सकता।

तभी तो रहीम दास जी ने कहा..
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय”

कितना सही और कितने अनुपम भाव से रहीमदास जी ने हमे सचेत किया, क्योंकि वो जानते थे कि बिना प्रेम इन्सान बेहतर जीवन नहीं जी सकता। इसी सन्दर्भ में आइये उनके एक दूसरे दोहे पर गौर करते है…

“बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय”

( “मनुष्य को सोचसमझ कर व्यवहार करना चाहिए, क्यों कि किसी कारणवश यदि बात बिगड़ जाती है, तो फिर उसे बनाना कठिन होता है,जैसे यदि एक बार दूध फट गया तो लाख कोशिश करने पर भी उसे मथ कर मक्खन नहीं निकाला जा सकता”)

प्रेम व्यवहार के रास्ते का यात्री है, जीवन की गतिशीलता में वो अपनी भूमिका संयम और धैर्य के साथ निभाना चाहता है। परन्तु आवेश, क्रोध, ईष्या,लोभ और हिंसा हस्तक्षेप तो कतई स्वीकार नहीं करता, बाकी नकारत्मक तत्व से भी घायल होता है। प्रेम को सकारत्मक ऊर्जा बहुत पसन्द है,और जीवन को हंसते हंसते बेहतर बनाता है। प्रेम की एक खासविशेषता यह भी है, कि यह न रंग, जाति, वर्ण, अमीर-गरीब, निर्बल-सबल, समय और परिस्थिति का मोहताज है। यह एक सहज सरल प्रकाश पुंज है, जो एक की आत्मा से निकल कर दूसरे की आत्मा में रम जाता है। प्रेम ही एक ऐसा तत्व है, जिसकी शोभा विस्तृता में है। धर्म मोह को तो नकार सकता है, पर प्रेम में अपना अस्तित्व जरुर तलाशता है। कहने की बात नहीं बेहतर जीवन शैली बिन प्रेम के असंभव ही लगती है।
ध्यान रखे.. गीता में कहा..
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः” ।।

“ज्ञानी अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और स्वयं को नीचे न गिराये; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही तो अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है।”……….क्रमशः …

कमल भंसाली