💔नीयत💔मेरी ✍कमल भंसाली

“यकीन कीजिये
‘नीयत’ नहीं बदली मेरी
वक्त का मिजाज बदल गया
सच यह भी समझीये
जिसको भी अपना समझा
वो खाली सपने दिखाकर चला गया
मुझे दुनिया के बाजार में
बिन उसूलों के बेहतर तरीके सीखा गया

प्यार को अब बुखार ही समझता
सच कहूं तो सहूलियत का औजार समझता
काम कितना ही हो टेढ़ा
उसका सीधा सा है रास्ता
वफ़ा का दामन नहीं
दे सिर्फ वादों का वास्ता
धोका ही अब बचा
यही रह गई अब जग की दास्तां
करामात अपनों की
बिन दर्पण के मेरा चेहरा
स्वयं मुझे ही दिख गया

दया की मेरे में कितनी भावना !
बताऊंगा जब होगा कभी सामना
पर जान लीजिये इसके आधुनिक गुण
दया कुछ कीजिये पर ज्यादा लीजिये
बिन लाभ किसी को कुछ मत दीजिये
अपने बिगड़े कामों को कुछ सुधारने का
यह अंतिम प्रयास जरुर कीजिये
सही जाना यह ज्ञान उन्ही से पाया
कुछ भ्रम के बदले ये दृष्टान्त समझ में आया
शुक्रिया उनका
जिन्हें मैं आज भी गैर न कह पाया

अब यकीन कीजिये
मैं आज जैसा भी हूँ
सब छद्म जग की मेहरवानी
इस जग से ही चलता अपना दानापानी
इस तरह ही चलती जिंदगानी
पर मन कभी जब पी लेता पवित्र पानी
तो बोल देता
“सब ऊपर वाले की मेहरवानी”
अपनों का सच्चा प्यार बीते युग की कहानी”
रचियता: कमल भंसाली

👍घटना👎कमल भंसाली

घटनाओं से संसार बना
बिन घटना के जग सूना
हर घटना की अलग लय
कहीं सृजन और कहीं क्षय

सुदर्शन चक्र की तरह इसकी महिमा
न इसके लिए दुरी, न इसकी कोई सीमा
कहीं प्रहरी, तो कहीं है, जग संहारक
कहीं कर्मो का फल, कहीं भाग्य प्रचारक

हर पल, कुछ घटना तय
कहीं खुशी, कहीं पर भय
इसमे जीवन की हर लय
हर कर्म का फल करें,तय

घटनाओं से ही शुरु होती, जिंदगी
घटना में जीवन का पूरा समाया सार
बिन घटना भी है, एक घटना प्रकार
उसी में रहता , एक लक्ष्य भरा संसार

एक क्षण में बादल बरसते
दूसरे क्षण बिजली चमकाते
उमर घुमड़ सब को डराते
पर कुछ नहीं करते, चले जाते

घटना की हकीकत कोई भी न जाने
न ही कोई इसकी उपलब्धि पहचाने
शुभता का चिंतन ही इसका उपचार
घटना तय है, सदा चिंतन करो साकार

कहते है, घट घट के वासी की है, पत्नी
नाज नखरों में रहती है, उसकी संगिनी
कुछ न कुछ कर, अपना रुप सदा दर्शाती
एक अदा से, संसार का स्वरुप समझाती

आज हम है, कल नहीं, यह भी एक घटना
जीवन, मृत्यु का खेल, दोनों को ही जीतना
इसी कशमकश में, ख़ुशी और गम करते कुश्ती
समझना जरुरी, घटने में ही समायी, हमारी हस्ती
****कमल भंसाली

♨उस पार♨ कमल भंसाली

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दस्तूर दुनिया के हजारों बार अपनाये
जब जरुरत पड़ी तो एक काम न आये
पता नहीं वो अपने ही थे या कोई पराये
हालांकि वक्त के धागों से ही फूल पिरोये

दावा किया था कभी हाथ उठाकर हमने
सच होंगे एक दिन देखे हुए संजोये सपने
हकीकत आज यह है, नहीं वो अबअपने
ख्याल दुनिया का क्यों देखे बहुरंगी सपने

मुरझा गए फूल सारे, रह गए धागों के किनारे
एक छोर पकड़ के दूसरे को ही तलाशते रहे
जीवन का बदला रुप, कभी छावं कभी धूप
समझ गए हर दिन बदलता दुनिया का स्वरुप

अब पांव जमी पर ही रखते, उड़ने से डरते
बेदर्द ख्याल जब भी आते, सिर्फ मुस्कराते
गैरो की परवाह नहीं, सिर्फ अपनों से डरते
जख्म जितने खाये सब दिल में संभाले रखते

चाह नहीं रही अब दिल को और तड़पाऊ
जिऊ तब तक मर्म जिंदगी का समझ जाऊ
जो शुकुन इस पार न पाया शायद उस पार पाऊ
माफ़ करना, अगर जल्दी में अलविदा न कह पाऊ

**रचियता**कमल भंसाली

🕟 वक्त का जैविक “अर्थ”💰कमल भंसाली✒

दोस्तों, “वक्त” या “समय ” शायद संसार का पहला आश्चर्य है, जो अपनी एक ही लय में चलता है, फिर भी, संसार में हर परिवर्तन का जिम्मेदार माना जाता है। वक्त की यह जादूगिरि काफी कुछ सोचने पर मजबूर करती है, आखिर वक्त कि इस कलाकारी का मानव जीवन पर इतना गहरा प्रभाव क्यों है। मानव आखिर वक्त से डरता क्यों है, ? खराब वक्त के नाम से सहम क्यों जाता है ? क्यों वो आखिर अपने कार्यो कलापों के परिणामों के लिए वक्त पर निर्भर रहता है ?, सवाल और भी कई हो सकते है पर जबाब एक ही दिया जा सकता है, कि हम माने या नही, वक्त संसार का राजा है, एक छत्र इस सृष्टि पर राज कर रहा है, और अंत तक करता रहेगा, बिना किसी विरोध के । सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में शायद वक्त का निर्माण प्रथम हुआ, ऐसा माना जा सकता है, क्योंकि हर तत्व की उपयोगिता का निर्णय वक्त के द्वारा कराया जाता है। सृष्टि के निर्माण में वक्त की भूमिका को दो तत्वों के अंतर्गत स्वीकार किया जा सकता है। दोनों ही तत्वों को हम साकारत्मक्ता और नकारत्मक्ता के नाम से पहचानते है, इन के अंतर्गत ही कर्मफल का निर्माण किया गया, यह एक विश्लेषण के अंतर्गत ही समझना होगा, क्योंकि किसी भी जीवन सम्बन्धी तत्व निर्माण को जानना हमारे वश में नहीं है। इसका एक ही कारण है, सृष्टि निर्माण हमारी देन नहीं, अपितु हम उसका एक अंश मात्र है। कोई हमारी भी भूमिका होगी, जिसके कारण अभी हम यहां है। पर यह तय किया जा सकता है, हम अपने जीवन में वक्त से बंधे है, और उसकी आज्ञा अनुसार ही चलने में समझदारी होगी। वक्त को हम यहां जीवन निर्माण और आत्मिक निर्माण के तहत ही समझने की कोशिश करे, तो शायद हमारा जीवन कुछ मूल्यांकित हो, विशिष्ठ नहीं, तो कम से कम सार्थकता प्रदान करने लायक हो जाए। इन्हीं सन्दर्भों में हम वक्त से प्रभावित अपने जीवन को एक सही दिशा की ओर मोड़ने की चेस्टा कर सकते है, अगर हम किसी दिशा से भ्रमित जीवन जी रहे है। चलिए आगे बढ़कर वक्त की गुणवत्ता की हल्की तलाश करते है, पूर्ण तलाश की शायद हमारी क्षमता न हों।

सबसे पहले हम अपने ही जीवन के बारे में थोड़ी सी चर्चा कर लेते है। आखिर जीवन क्या है ? सवाल सीधा है, सही उत्तर देना शायद कठिन हो पर इतना जरुर समझते है, “स्पंदन” जीवन की कसौटी है। इसके अंतर्गत वो हर वस्तु आ जाती है, जिसमे जीवन है, मानव, पशु, प्रकृति सभी वो शामिल है, जिनमे स्पंदन हो। जिसमे स्पंदन हो उसे जीवित माना जाता है, स्पंदन अगर चला जाता है, या नहीं है, तो उसे निर्जीव के नाम से पुकारा जाता है। सृष्टि का निर्माण सजीव तत्व से किया गया, इसलिए स्पंदन का होना न होना सजीव, निर्जीव को परिभाषित करता है।

सभी प्राणी अपना जीवन जीते है, और वक्त के अनुरुप जीवन जीना शायद उनकी समझदारी है। हम यहां मानव जीवन में वक्त की भूमिका तलाश रहे, अतः हमारा सारा ध्यान अपने जीवन को वक्त के अनुसार खुशमय बनाना हीं होना चाहिए। सबसे पहले हम इस बात को स्वीकार कर लेते है, कि वक्त की लय साँसों के साथ ही चलना होता है। इसलिए वक्त का साथ हमारे लिए अमृतमय है, अतः वक्त को मान सम्मान देना हमारी जिम्मेदारी बन सकती है। वक्त के समय, क्षण, पल कुछ इसके अतिरिक्त सुनहरे नाम है, इन्हीं नामों के साथ हम जीवन की सफलताओं और असफलताओं में इसकी भूमिका की चर्चा करते रहते है। इंग्लिश में लोग TIME के नाम से ज्यादातर इसे परिभाषित करते है।

चूँकि, वक्त से जीवन अपनी पूर्णता की सीमा रेखा तैयार करवाता है, अतः हमारी ख़ुशी और उम्मीदों के लिए उसके प्रति हमारा पूर्ण समर्पण होना आवश्यक हो जाता है। सही होगा, उसका सही उपयोग हम जीवन को मान्यता दिलाने के लिए बड़ी बुद्धिमानी से करे। इसकी ऊर्जा आशा और निराशा दोनों का निर्माण कर सकती है। पल पल से बना समय अपनी गुणवत्ता के प्रति अति जागरुक होता है। किसी एक खेल को ही उदाहरण के तौर पर लीजिये, उसमे हर क्षण वो अपनी ऊर्जा का दान करता है, और खेल अपने नियमों के अनुसार परिणाम सहित तय सीमा के अंतर्गत मंजिल प्राप्त कर लेता है। यहां वक्त की भूमिका पूर्णता तक है। कुछ इस तरह भी हमारा जीवन अनगनित घटनाओं से अपना विस्तृत रुप धारण करता है। यहां शेक्सपियर के उन शब्दों को याद करना सही होगा जिसमें उन्होंने वक्त के साथ मानव भूमिका को परिभाषित करने की सही कौशिश की, वो कहते है ” हम सभी प्राणी संसार रूपी रंग मच के कलाकार है, उसमे हमें एक निश्चित समय के लिए कई प्रकार की भूमिकाएं करनी होती है, इनके के लिए हमें आना और जाना पड़ता है।” कुछ ऐसे ही विचार मार्क्स ओरेलियस प्रकट करते है, जब वो कहते ” Time is a sort of river of passing events, and strong is its current; no sooner is a thing brought to sight than it is swept by and another takes its place, and this too will be swept away.”

हम हमारी विडम्बना ही कह सकते है, कि यह जानते हुए भी कि समय या वक्त हमारे जीवन को हर तरह से पल पल प्रभावित करता है, हम उसका सही उपयोग करने में अक्षम है। सन्दर्भों की बात करे तो हमारी हर चीज समय से प्रभावित होती है, चाहे, विचार हो, योजना, कार्य , आलोचना या और कुछ। पल के अनुसार फल का अनुमान भी बनता बिगड़ता नजर आता है। हम कई तरह से समय की चाल को बदलने की चेस्टा भी करते है, पर हकीकत में हम ही उसके अनुकूल अपना व्यवहार बदलते रहते है। सही माने तो यह हमारी विवशता है, दूसरे शब्दों में कहे तो हम “वक्त के दास” है, उसकी हर आज्ञा ही हमारा जीवन स्पंदन है। सच्चाई यही है, जो समय की लय को समझ कर वर्तमान का निर्माण करना चाहता है, वो वक्त का कभी दुरुपयोग नहीं कर सकता । कुछ लोग समय का अपमान गलत कार्य से करते है, और, कुछ देर तक उसका परिणाम अपनी ओर कर लेते है, पर वक्त का पलटा वार उनको एक ही सीख दे कर समझा देता है, मुझे बदलते देर नहीं लगती, तुमने जो महसूस किया वो यह फल या परिणाम नहीं था, परिणाम तो तुम अब भोगोगे। समय की निरन्तरता तभी तक सही रहती है, जब तक उसका ध्रुविकर्ण नहीं किया जाता। Stanford University के सेवा मुक्त प्रोफेसर फिलिप जिम्बारडो ने समय को परिदृश्य करने की चेस्टा की, अपने दस साल के अनुसन्धान के बाद उन्होंने कहा कि “समय को हम अपने व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार ही समझने की कोशिश करते है, इसलिए हमारा हर आचरण उसी रुप से प्रभावित होता है”।

चूँकि वर्तमान में हम जी रहे है, तो समय की कीमत का मूल्यांकन आज आर्थिक भाषा में करे तो समय बहुमूल्य है, एक एक पल कीमती हो गया है, परन्तु इसकी कीमत बढ़ने के साथ जीवन के बाजार में सुख, चैन, शांति, प्रेम, सत्य, भाईचारा, मान,सम्मान , इज्जत आदि तत्वों के मूल्यों में भारी गिरावट आ गई, और लेने वाले नगण्य रह गए। ये एक चिंता की बात है। जीवन की विवशता देखिये, वो साधनों की अधिकता से थका और निराश हो रहा है, उसकी प्राणदायी और प्रेमदायी जीवन जीने की क्षमता कमजोर पड़ रही है, क्योंकि साधनों के अनुरुप वक्त की अवधि नहीं बढ़ रही। सवाल उठ रहे है, आखिर हम क्या करे ? उत्तर संक्षिप्त में इतना ही हो सकता है, वक्त की पवित्रता को समझे, जिन उद्धेश्यों के लिए हमें जीवन मिला, उनमे सकारत्मक ऊर्जा की बहुतायत रहे, इसकी कोशिश होनी चाहिए। हमारी जरुरतें वक्त के अनुसार संयमित रहे, पर्यावरण की शुद्धता को वक्त के सन्दर्भ में जाने, अपनी हर अति से वक्त की लय न बिगाड़े, तो वक्त को जरुर लगेगा, कि मानवता को उसकी आज भी जरुरत है।इसका सबसे बड़ा असर ये हो सकता है, कि हम प्राकृतिक आपदाओं से जीवन को सुरक्षित रख सकते और शायद एक अच्छे भविष्य का गुलदस्ता लेकर वक्त हमारा अभिनन्दन करे। याद रखिये, Everyday is a bank account and time is our currency. No one is rich, no one is poor, we’ ve got 24 hours each—Christopher Rice……लेखक **कमल भंसाली**

₹₹** पहचान**₹₹ कमल भंसाली

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वक्त न बदला, मैं ही बदल गया
कल तक सब के साथ ही चला
आज अकेला ही राही रह गया
पथ मेरा, कितना खुदगर्ज हो गया

कल तक जो अपनेपन का दंभ भरते
मेरे साथ ही अपने हर कदम बढ़ाते
नाज था उन्हें मुझपर , हमराही कहते
आज वही चेहरे, मुझे भीड़ समझते

छोटी सी “अर्थ” की एक हल्की बून्द
रिश्तों की परिभाषा का सच समझाती
भ्रमित नीर से निपजी सम्बंधों की खेती
क्यों जिंदगी, बेवजह अपनी पीठ पर ढ़ोती

कल के लिए, नभ् को मैंने कितना संवारा
फिर भी आज, डूब गया मेरा हर सितारा
देखो, भाग्य का खेल होता कितना गहरा
अपनों से ही मन को नहीं मिलता सहारा

कहने को सब है, आज भी मेरे अपने
पर दिल नहीं देखता, अब उनके सपने
उनकी निगाहों में शक ही झिलमिलाता
प्यार तो अब उनके बहानों में बह जाता

सच तो यह है, कोई किसी का नहीं होता
कपड़े उतारों, तो हर इंसान नंगा ही होता
जीवन एक रंग का सदाबहार सपना नहीं
दूसरों की मजबूरी पर हंसना गुनाह नहीं

मेरी यह कविता, नहीं एक स्वस्थ सन्देश ही समझो
जीवन में अर्थ के अनर्थ की जहरीली संभावना समझो
कल तक जिस “कमल” के फूल ने सबको महकाया
आज, मुरझा गया, तो उसका उपयोग कम नहीं समझो

रिश्तों की कमजोर दीवारे जब गिरती
जीवन के प्रांगण में जगह बढ़ जाती
शिकायत नहीं, अब ख़ुशी ही मिलती
खुद को पहचान, अब, खुद से ही मिलती……..कमल भंसाली

दोस्त बनो, पर दिल से……कमल भंसाली

कहने को, दोस्ती हजारों से की जाती
नगण्य, ही सच्चे दिल से निभाई जाती
दुश्मनी एक से भी हो, जिंदगी भर रहती
न ऐसी दुश्मनी अच्छी, न ही ऐसी दोस्ती

करो आरजू जिंदगी से, दोस्ती सलामत रहे
तहे दिल से कहो, दोस्त आस पास ही रहे
हम राही मंजिल के हो चाहे, अलग अलग
दिल हमारा सहज धड़कता रहे , संग संग

भूले भी होगी, जीवन पथ में अनेक
पर, न रहे गलतफहमी की बूंद, एक
मन सजा रहे, स्नेह दोस्ती में, सदा रहे
दिल के पट पर दोस्ताना का चिन्ह रहे

दोस्ती “दिवसो” की मोहताज न समझो
उसे सदा अपने जिगर का, अंश समझो
फूल दोस्ती है, जरा संभाल कर ही रखना
अर्थ के जंगल में, इसे निस्वार्थ बन समझो

कहो दोस्त से, आज भी हूँ दोस्त तुम्हारा
विपरीत स्थिति में, हाथ न छिटके हमारा
बन्धन प्यार के विश्वास का, बंधे ही रहना
तस्वीर बदल दे वक्त, पर दोस्त न बदलना……कमल भंसाली

मंथन का दर्पण ……..कमल भंसाली…..

वक्त कहां मिलता
जीने के लिए
दौड़ ही रहा हूँ, अभीतक
अस्तित्व, बचाने के लिए

मंथन था, कभी
जीवन नवरंग
रस बरसायेगा
मधु, जैसे
दिन रात का
मधुपान करायेगा
मदहोश होकर
रंगीनी के
राग सुनाएगा
दिल थोड़ा
बहल जाएगा
शायद वक्त का
नजरिया बदल जाएगा

वक्त कहां बदलता
मैं ही बदल गया
दौड़ते दौड़ते
थक गया
सर्वात का सत्य
मिल गया
सर्वेशवर ने
वक्त को यमदूत
पहले ही
बनाकर भेज दिया

सौलक्षण्य जीवन
का हुआ लक्ष्य एक
मानसरोवर का हंस
कब तक तैरेगा
आज नहीं तो कल
जीवन से भी डरेगा
मोह के बन्धन
की खोली डोरी
समझ गया, धरा नहीं, मेरी
जाना है, अनन्त की ओर
अधूरी इच्छायें
अतृप्त आत्मा
असत्य की
अंतिम बुलन्दी
चाहे, कितना ही
मचाये शोर

चित्ताकर्षक, संसारिक दीवारें
धुंधली, धुंए की लकीरें
चित्रणी की त्रिवेणी
असहज संगिनी
न स्वर्ण, न सुनहरी धूप
न शीतल चांदनी
पर होगी
गंगा की लहरें
वक्त को समर्पण
कर देगी
अतृप्त रुह मेरी

दूर खड़ा
निहारुंगा, अपना सत्य
बेजान, काया का
नंगा, अस्तित्व
क्षीर सागर की माया
“कर्म गागर”
विसर्जन, करेगी
विषाक्त, तत्व
एक बूंद, चन्दन की
तलाश बन जायेगी, आत्मा की
फिर कोई प्रश्न, गहरायेगा
अनुत्तरित उत्तर
आत्मभिव्यंजन होकर
फिर एक नई
दिशा तरफ, मुड़ जाएगा
वक्त का करिश्मा
शायद ही कोई “इन्सान”
समझ पायेगा……..

कमल भंसाली

वक्त के सितम……कमल भंसाली

वक्त ने की बेवफाई
गम ने भी नहीं दिखाई, हमदर्दी
फिर भी, दोनों नहीं नाप सके
इस टूटते दिल की गहराई
वो गम देते रहे
मैं, सहता रहा
दिल, बिखरता रहा
मैं, उसे संभालता रहा

वक्त, लाख सितम कर ले
हर सितम को समझा दे
भले ही तुम, मुझे बर्बाद कर देे
मंजिल का हूँ, दीवाना
एक झलक, उसकी मिल जाए
चाहे हजारों लौ में
यह परवाना जल जाए

वक्त, राही हूँ, मंजिल का
“प्यार”, उसी से ही करता
तुमसे, मैं अब कहां डरता
दिल में जब तूफ़ान है, हजारों
“वक्त”, तेरी परवाह कौन करता
जान जरा, मेरे प्यार को
समझ, मेरे इकरार को
बदल जा, छोड़ झूठे अभिमान कों
दुनिया, में आया हूं
कुछ हासिल कर ही जाना
मौत ही तेरा है, आखरी सितम्
उसे भी भेज जरा
देख तो सही, इस दीवाने दिल में
कितना, साहस है, भरा

जाना है, चले जायेंगे
पर अहसास, अपने इरादों का
दुनिया को बता जाएंगे
यह, उनको भी समझा जाएंगे
“वक्त” से न करे, कोई अति प्यार
क्षण में बदल देता जीवन, यार
वक्त की तासीर है, बेवफाई
नासमझ भी, और हरजाई
एक ही जगह नहीं
उसका,अपना जोर
जब प्रभु, खोलते
भक्त के लिए, अपने द्वार………

कमल भंसाली

फटी एडिया

रहनुमा थे, वो मेरे
अपने थे, वो मेरे
कहते थे, जब
कंधे तक आ जायेंगे
एक चमन बना देंगे
जिन रास्तों से गुजरूं
उन पर गुल बिछा देंगे
जग में रौशनी
मेरे नाम की फेला देंगे

कितना खुश रहता
आँखों में कुछ सपने
आकर सजने लगे
वक्त बीतता गया
इंतजार भी खत्म हुआ
उनके कंधे चौड़े होने लगे
मेरे सिकुड़ने लगे
उनके दिल में
अब कोई और रहने लगे

वो भूल गये
मैं उन्हें याद करने लगा
आज चमन उनके पास
मेंरे पास तो जिस्मे खाक
गुल की जगह फटी एडिया
चुभती है ऊंचाई की वो सीढ़िया
शुक्र है, अब उनपे चढ़ता नहीं जाता
अब अपने कंधे ही सहला कर, रह जाता
देखते ही देखते, वक्त कितना बदल जाता…
【कमल भंसाली】

कमल भंसाली