अछूता जीवन…..कमल भंसाली

जीवन कब रहता,अछूता
हर कोई इस को छूता
सरे राह, चलते, चलते
ये, सब कुछ भूल जाता

एक जीवन, कितना कुछ सहता
अपनेपन के द्वार पर बैठ जाता
भीख स्नेह की जब भी माँगता
कंगला, कमजोर समझा जाता

भाषा का अनुरागी बन पछताता
कडुवा सत्य बोल नहीं पाता
झूठ बिना कुछ तौल नहीं पाता
सत्य हिसाब कभी रख नहीं पाता

गुमां था, जिंदगी योंही चलेगी
सदा खुशियों की नदी बहेगी
गम की तरकश का एक, तीर
कितना बहा देता, नयनों से नीर

फूलों सा जीवन जब काँटों पर सोयेगा
तभी तो फूलों का अहसास कर पायेगा
बाती जब जलेगी, तो तैल साथ निभाएगा
पराये दर्द देख, अपना दर्द कम ही पायेगा

अंहकार का दरवाजा, खोलने से पहले
साँसों को तो पूछलो, कब तक आएगी
अभिमान किसका करना, ये तो जानलो
काया की माया, आत्म दर्पण में निहारलो

दूर रोशनदान से आती, किरणों से जानना
जीवन हकीकत है, कितने क्षण की, पूछना
अपनी नश्वरता को समझना, यहीं है, प्रार्थना
एक सांस के बाद, दूसरी की कीमत आंकना……..कमल भंसाली