👉राम बने रावण नहीं👈✍कमल भंसाली

👌रामायण अमृत तत्व🔼व्यक्तित्व निर्माण में 🚵कमल भंसाली

कभी अगर हमसे कोई कहे, इंसानों में “राम” की तलाश है, तो एकाएक ऐसे महापुरुष की काल्पनिक छवि हमारे नयनों में तैरने लगती है, जो अलौकिकता से भरपूर होती है। जब भी हम “राम” शब्द का उच्चारण करते है, या किसी के सन्दर्भ में उसका प्रयोग करते है, तो उसमें अगर “श्री” शब्द जोड़ देते है, तो हमें ख्याल आ जाता है, कि हम मर्यादा पुरुषोतम राम का उच्चारण कर उन्हें याद कर रहे है। एक बात इससे साफ़ सी हमारे दिमाग में छा जाती है, कि हम किसी ऐसे इंसान के व्यक्तित्व की बात कर रहे है, जो आज के आधुनिक युग में साधारणतय दुर्लभता से नजर आता है। इसका कारण खोजना कहां तक सही होगा ? यह कहा नहीं जा सकता। पर सोचा जा सकता है, व्यक्तित्व निर्माण में “श्रीराम” जैसे गुण ही तो काम आते है। कहनेवाले कह गए, ” शिष्टता में ही विशिष्टता समाहित होती है”। इसके साथ ये बात भी स्पष्ट हो जाती है कि सात्विक व्यक्तित्व की कुछ अलग ही पहचान होती है, जो आकर्षक और लुभावना होती है तथा जिसमें शिष्टता के साथ मर्यादा भरा व्यवहार नजर आता है। तय है, राम देव पुरुष थे, उनमें सर्वगुण थे या नहीं, कह नहीं सकते, पर एक गुण ने उनके व्यक्तित्व की हर कमी को उनका गुण बना दिया, उसे हम संयम कह सकते है। सवाल यह भी किया जा सकता है, उन्हें मर्यादा पुरुषोतम राम के नाम से क्यों याद किया जाता है। इस के उत्तर की तलाश में हमें रामायण की इस चोपाई पर गौर करना होगा, जिसमे राम नाम की महिमा का कारण समाहित है।

बंदउँ नाम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को ।।
बिधि हरि हरमय बेद प्राण सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो ।।

यानी राम नाम की वन्दना करता हूँ, जो कि अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा को प्रकाशित करने वाला है। “राम” नाम ब्रह्मा, विष्णु, महेश और समस्त वेदों का प्राण स्वरुप है, जो कि प्रकृति के तीनों गुणों से परे दिव्य गुणों का भण्डार है।

इस चौपाई का अगर आज के सन्दर्भ से हम विश्लेषण करे तो आज का युग भी काफी कुछ वैसा ही नजर आता है, जहां राम जैसा व्यक्तित्व चमत्कार का नहीं आत्मिक विकास का जीवन केंद्र बिंदु समझा जाता है। फर्क इतना ही है, राम आत्मा से अपनी पवित्रता को अग्नि की तरह अपने विचारों से उज्ज्वल रखते, सूर्य की तरह प्रकाशित करते और चन्द्रमा की तरह शीतलता और मर्यादा से उन विचारों को कर्म में परिवर्तन कर देते, और उस कर्म का फल शीतल चांदनी की तरह जग को निर्मल और सहजता का अहसास करा देता। आज के बदले युग के इंसान के पास इन तीन तत्वों की विरासत की समझ नहीं होने के कारण वो इस व्यक्तित्व के आसपास अपने को नहीं पाता।

आज आधुनिक युग का दौर है, कुछ लोग इसे कलयुग भी कहते है। पूछा जा सकता है, आखिर राम के व्यक्तित्व को आज क्यों टटोला जा रहा है ? सवाल के जबाब में इतना ही कहना पर्याप्त हो सकता है, युग कोई भी है, या रहा है, इंसान में सबको राम की ही तलाश होती है, रावण की नहीं। हालांकि रावण के भी पास ज्ञान, भक्ति, शक्ति, वैभव पराक्रम सब कुछ था, फिर भी उसे कहीं सम्मान और इज्जत नहीं मिली, किस कारण ? यही प्रश्न आज हमारे सामने खड़ा है, इस युग के पास किसी भी चीज की कमी नहीं है, फिर भी इंसानियत को हम क्यों ढूंढ रहे है, क्यों आंतकवाद से हम ग्रसित हो रहे है। हमारा व्यक्तित्व को वो प्रखरता क्यों नहीं नसीब हो रही है, जिसकी हमें चाहना ही नहीं जरुरत भी है। आज विश्वास, सत्य, दैनिक जीवन से क्यों पलायन कर रहे है, मर्यादा ,संस्कार , प्रेम जीवन से विमुख हो रहे है। राम भी इंसान थे, बिना साधनों के अति शक्ति शाली राक्षसों व उनके राजा रावण का वध किया, जब उनके सामने कोई विकल्प नहीं रहा। रावण को उन्होंनें शत्रु नहीं, ज्ञान होते हुए भी भटका हुआ दिशा गुम समझा। अंतिम समय में जब रावण को अपनी बिछड़ती चेतना में जब जीवन की गलतियों का पश्चाताप होना शुरु हुआ, तो लक्ष्मण से उन्होंने कुछ इस तरह कहा:

” जाओं, इस संसार में नीति, राजनीति और शक्ति का महान ज्ञानी विदा ले रहा है,उसके पास जाओं और कुछ शिक्षा लों, लक्ष्मण गए, रावण ने आँख खोली देखा भी, पर कुछ नहीं कहा, लक्ष्मण वापस आ गए। तब मर्यादा पुरुषोतम ने कहा, ज्ञान प्राप्त करने के लिए चरणों के पास खड़ा होना चाहिए, न की सिर की ओर” ।”आज के सन्दर्भ इस बात की पुष्टि इतनी ही हो सकती है, कि खतरनाक आंतकवाद को बढ़ाने वाले अति शिक्षित भ्रमित लोग ही है। जिन्होंने शिक्षा की उच्चतम श्रेणी तो हासिल की, पर आत्मिक ज्ञान में शून्य ही रहें। दहशत फैलाने वाले खुद ही दहशत के शिकार होकर अमूल्य जीवन की सारी सार्थकता से अनजान रह जाते है।

लक्ष्मण दुबारा विनम्रता से सरोवर होकर रावण के पास पँहुचे, तो महाज्ञानी ने कहा, जीवन में तीन बातों का सदा ध्यान रखना।

1. शुभस्य शीघ्रम…कोई भी शुभ कार्य को करने में देरी नहीं करनी चाहिए, पता नहीं कब जीवन डोर टूट जाए।

2. शत्रु को कभी कमजोर न समझो….मैंने भूल की बिना साधनों की सेना मेरा क्या बिगाड़ सकती, आलस्य से आपकी क्षमताओं को नहीं समझ सका।

3. अपना राज किसी को भी नहीं बताना चाहिए….अगर जीवन में कोई रहस्य हो तो उसे यथासंभव गुप्त ही रखना उचित होगा। अगर विभीषण मेरे रहस्य उदगार् नहीं करता, तो शायद पराजय का सामना इतनी जल्दी नहीं होता।

तथ्य की बात यह भी है, श्री राम को ज्यादा इंसानी सहायता की जगह दूसरे प्राणियों का सहयोग मिला, यानी आत्मा की पवित्रता कम क्षमताओं वालों के पास क्षय कम होती है । तय है, राम का चरित्र चाहे काल्पनिक हो या वास्तविक हमारे लिए क्यों न हों, पर जीवन मीमांसा के लिए उत्तम है। आज हम भी अपने व्यक्तित्व को उसी सन्दर्भ में अगर तलाशते है, शायद कोई ऐसा तत्व हमारे सामने आ जाए और जिससे हमार जीवन की सार्थकता बढ़ जाए।

सबसे पहले हम शुरु करते है, उनके जीवन का वो प्रथम मर्यादित कदम से, जो उन्होंने अपने पिता के वचन को निभाने के लिए उठाया। घटनाकर्म का उल्लेख यहां नहीं करना ही सही होगा, क्योंकि रामयण से हम अनजान नहीं है। आज इस तरह की सन्तान कल्पना मात्र तो नहीं कही जा सकती, पर दुर्लभता के अंतर्गत ही रखी जा सकती। राम ने पितृ तत्व को समझा, और अपने अस्तित्व के ऋण को चुकाना कर्तव्य माना, यही उनका अग्निमय चिंतन ने उनको महानता की और अग्रसर कर दिया। क्योंकि इसी चिंतन के बदौलत उनकी समझ में आ गया, त्याग में जो सुख है, वो भोग में नहीं। हम यही गलती कर रहे है, हम भोग को ही आनन्द समझ रहे, त्याग को तो दूर से प्रणाम करते है। आखिर ऐसा क्यों ? राम भी इन्सान थे, हम भी इन्सान है, इसे हम इंसानी भटकाव नहीं मान सकते , हा चिंतन का भटकाव कहना ही सही होगा, और चिंतन का भटकाव आत्मा की पवित्रता, मन की शुद्धता, और संयमित मर्यादित कर्म से नियंत्रण में आ सकता है।

आखिर इसकी क्या वजह हो सकती है, कि हम राम के व्यक्तित्व से लगाव रखते है, पर जब बनने की बात आती है, तो राम की जगह रावण बन जाते है।

नेताओं को ही लीजिये, कितनी सहजता से वो चुनाव से पहले वो रामराज्य की बात करते है, मानों वो आज के युग के राम है। चुनाव जीतने के बाद पता नहीं क्यों उनका कार्य और रुप रावण को भी शर्मिंदा कर देता है ? सीधी सी बात है, राम बनने के लिए पहली शर्त ही वो नहीं निभाते, अपने वचनों के प्रति उनकी वो भावना लुप्त हो जाती है, जो रामायण के प्रमुख तत्व “प्राण जाय, पर वचन न जाय” में समाहित है। व्यक्तित्व की पहचान में आज इस तत्व को चाहे हम कसौटी न माने, पर बात जब राम जैसे व्यक्तित्व की करेंगे तो निसन्देह हमें अपने शब्दों, वचनों, और शपथ की गरिमा तो रखनी चाहिए। कहते है, शिक्षा जीवन को सही परिभाषित करती है, परन्तु देखा गया ज्यादा पढ़े लिखे ही अपनी कर्तव्य शपथ को भूलकर भ्रष्टाचार के दलदल में फंस जाते है।

भारतवर्ष को यह सदा गर्व रहा है, वो मर्यादा पुरुषोतम राम का जन्म स्थान है, यहां आज भी हम हर एक में राम तलाशते है,… पर तलाश करते पता नहीं हर समय रावण का ख़ौफ़ सही “राम तत्व” को क्यों नहीं सामने आने देता, जबकि श्रीराम हमारे अंदर ही रचे बसे है ..जय श्री राम की वन्दना सहित…क्रमश……लेखक “कमल भंसाली”

♨ जय हनुमान ♨ कमल भंसाली

“हनुमान” है, नाम तुम्हारा

बजरंग बली भी लगता प्यारा
जो भी बोले जय बजरंग बली
समझो उसकी सब विपता टली

सुना है, राम की तुम करते भक्ति
तुम्हारे ह्रदय में बस्ती उनकी मूर्ति
चीर के तुमने दिखला दिया
भक्ति का “कमल” जग में खिला दिया

जिसने भी सच्चे मन से
ध्यान तुम्हारा किया
उस पर रहती तेरी मेहरवानी
जिसने राम नाम भी लिया
उसका भी कल्याण किया

अनूठी है, तुम्हारी भक्ति
अजेय है, तुम्हारी शक्ति
शिव, विष्णु के तुम प्यारे
जग के हर काज, तुमने संवारे

है, प्रभु
जन्म दिन आज तुम्हारा
प्रणाम स्वीकार करो, मेरा
करो कृपा
दो आत्म ज्ञान
करो भक्त का कल्याण
जग में हो
एक मेरी भी
सुंदर सी पहचान
जैसे आपका नाम है
जग कल्याण
राम भक्त हनुमान

जय बोलो..बजरंग बली की….कमल भंसाली

⭐एक और वनवास🌟 कमल भंसाली🔥

चमन को क्या हो गया
अपनी ही आस्थाओं से रुठ गया
विश्वास के नाम पर
कहीं और खो गया
शायद अपने ही आशियाना
में नजरबन्द हो गया
जो खिलखिलाता बचपन लाता
मासूमियत के अंदाज सीखाता
वो अपनी ही
आग में जल रहा
जीने के गलत मकसद
बता रहा
भटकी राह को
आजादी बता रहा
चमन….

कर्णधारों की हथेलियों से
भाग्य सहला रहा
सत्य के स्तंभ पर
असत्य का झण्डा लहरा रहा
जो उसे लूट रहे
उन्हें ही मसीहा बता रहा
सीमा के सिपाही को
चुप रहने का
संकेत समझा रहा
एक साइन बोर्ड
से कह रहा
देश प्रगति पथ पर
जा रहा
दूसरा बतला रहा
अफवाहों पर ध्यान
न दो
हमारा जहां
अभी नफरत की
फसल उगा रहा
चमन…..

नफरत के सोने से
तैयार हो रही लंका
चारों तरफ
नजर आ रही
शंका ही शंका
हर कोई रावण बन
राम की बात कर रहा
हनुमान बिचारा
एक कोने में बैठ
मूर्छित लक्ष्मण को
निहार रहा
जो बेहोशी में भी
राम की जगह
रावण रावण
बुदबुदा रहा
राम का भाई
रावण के गुण गा रहा
राम हताश हों
फिर, कहीं
एक और वनवास
रहा तलाश ……रचियता कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली भाग ५ अंतिम अंश…..कमल भंसाली

“परिवार”..इन्सान की सबसे सुंदर व्यवस्था, कई प्रकार के संक्रमणकारी रोगों से ग्रस्त हो गया है, अपनी कमजोरी के कारण बुलन्द आवाज में नहीं धीमे आवाज में अपनी अंतिम स्थिति का आगाज सभी को दे रहा है । आज “बेहतर जीवन शैली”के इस भाग में, हम अंतिम बार यह चर्चा करें कि आखिर क्या परिवार का अस्तित्त्व बचाया जा सकता है ? परन्तु उस से पहले जानते है, कि आखिर परिवार की प्रभाव शालीनता पर कौन से घातक हथियारों ने आक्रमण किया ?
इतिहास के पन्नों में एक उदाहरण प्रभावशाली परिवार का हम याद करें, जिसमे भगवान राम ने पिता के आदेशों का पालन कर परिवार की गरिमा को एक नया मजबूत स्थान दिया. जबकि वो स्वयं भगवान थे । युग परिवर्तन के आज के दौर से थोड़े समय पहले तक परिवार अपनी लय में चल रहा था, परन्तु आदमी को जैसे जैसे अति स्वतंत्रता का चस्का लगा, वैसे वैसे परिवार नवीन रोगों से ग्रसित होने लगा। इसी सन्दर्भ में हम दो प्रमुख कारणों का अवलोकन करते है ।

1.. विचार धाराओं की टकराहट….एक आदमी अपने जीवन काल में कम से कम तीन पीढ़ियों का सामना करता है, एक जिस से आया, दूसरी खुद की, तीसरी अपनी सन्तान की । प्रथम से वो सीखता, दूसरा यानी,खुद पालन या संशोधन करता, तीसरी को वो जो विरासत में आगे दे जाता। हर पीढ़ी के अपने कुछ परिवर्तन होते है, जो समय, काल और जगह के कारण जरूरी बन जाते है, उनकी अवेहलना करने से आपसी टकराहट की संभावनाये परिवार में बढ़ जाती है । बड़े बुजर्ग के पास अनुभव और संयम होते हुए आजकल तटस्थ की भूमिका में रहते, क्योंकि यह राम का युग नहीं, कलियुग है, जहां आदेश पालन कराना,मुश्किल ही होता है। यह बात नहीं की पहले भी विरोध नहीं होता था, परन्तु नीति गत और विधि गत विरोध को समर्थन सामाजिक मूल्यों पर ही मिलता। समाज की पृष्ठभूमि आज से ज्यादा सशक्त उस समय थी। उस समय खान पान और पहनावे सब तय थे, उनमे संस्कारों के कारण विद्रोह कम था, शिक्षा से ज्यादा आत्मा का प्रयोग चिंतन में किया जाता था। सर्व हिताय: सर्व सुखाय: को ध्यान में रख कर ही इंसानी चिंतन रहता था।
देश स्वतंत्र हुआ, कई परिवारों का पलायन अपने निश्चित स्थानों से देश विभाजन के कारण करना पड़ा। आर्थिक तंगी का दौर था, फिर भी परिवार अपनी गरिमा नहीं भूला। परन्तु मानव मन अब अपना संयम अब खो चूका है। वो भोगवादी और लालसा वादी पाश्चात्य संस्कृति का दीवाना बन गया। दीवानगी में विचारों का महत्व नगण्य ही होता है।अतः यह रोग लाइलाज है, क्योंकि इसमे परिवार के सभी तंतु विपरीतता में काम करते है.

2. असंस्कारित आजादी…पहले परिवार में सीमित आजादी होती थी, परिवार एक अपने ही संविधान से बंधा होता था। राजनीति के चतुर खिलाड़ीआचार्य चाणक्य की उस समय की सर्वश्रेष्ठ परिवार की परिभाषा का आज नगण्य अस्तित्व ही नजर आता है, फिर भी एक बार गौर करते है, उन्होंने क्या कहा,
“जहां सदा आनंद की तरंगे उठती हैं, पुत्र और पुत्रिया बुद्धिमान और बुद्धिमती, पत्नी मधुरभाषिणि, परिश्रम से कमाया विपुल धन, उत्तम मित्र, पत्नी से अनुराग, नौकर से अच्छी सेवा मिलती हों। अतिथि का आदर, परमात्मा की उपासना, श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग होता रहे- ऐसा घर धन्य और प्रशंसनीय है”
आचार्य चाणक्य का बताया पूर्ण ऐसा परिवार अब कल्पना की सीमा रेखाओं से दूर होकर एक सुहावनी कल्पना ही रह गया, परन्तु सत्य यह भी है की ऐसे परिवारों का पहले अस्तित्व था । आज जीवन पूर्ण निजी हो गया, अतः परिवार भी स्वार्थी हो गया और भीतरी राजनीति का शिकार हो गया। परिवार और देश का अस्तित्व का आंकलन तभी किया जा सकता है, जब उनमे कुछ झलक सार्वजनकिता की हों।

उपरोक्त दो कारणों के अलावा परिवार और भी कई छोटी छोटी बीमारियों से ग्रसित है, जब तक उसकी उम्र है, परिवार बेहतर जीवन शैली का एक पहलू सदा रहेगा । देवलोक और नर्क का अगर अस्तित्व हम नहीं नकारते तो परिवार बिना कैसे बेहतर जीवन शैली की कल्पना की जा सकती है।

दोस्तों बेहतर जीवन शैली के इस भाग में परिवार के बारे में हमने काफी अंतरंगता से चिंतन किया, आप अपने विचार और अनुभव अगर लिखना चाहते है, तो अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।भारतीय समाज और संस्कृति परिवार का सुख सदा लेती रही हैं, आज भी परिवार ये सुख देने के लिए तैयार खड़ा है, हम ही अपनी नादानी और नासमझी से इस सुख से धीरे धीरे विमुख हो रहे है । नई पीढ़ी को इस पर कुछ समय निकाल कर मनन करना चाहिये कि परिवार का अस्तित्व ही उनके लिए सुरक्षित भविष्य की रुपरेखा तैयार कर सकता है।जवानी के सारे भ्रम बुढ़ापा और बीमारी इन्सान को दर्द की प्रस्तर मूर्ति बना देता है।

समय अब भी है, परन्तु बागडोर नई पीढी के स्वयं के हाथों में है, उन्हें ही तय करना है, अपना भविष्य !
ये जरूर याद रखे… परिवार से अच्छी सौगात इस संसार में दूसरी हमें मिलनी आसान नहीं होगी, क्योंकि “सुखी परिवार ही सच्चा जीवन आधार”।

चलते चलते…..

जवानी रम है, तो बुढ़ापा गम
परिवार है तो नशा भी कम
दर्द और गम दोनों भी खत्म
परिवार यानी जीवन का संगम..

कमल भंसाली