👽अंतिम इंतजार 👾मौत👹कमल भंसाली

“मौत”
मेरे लिए पावन
उसका दामन “शिव” सावन
जीवन केअंतिम क्षोर पर
अस्त होते जिस्म का आह्ववान
मौत तो है “महान”

जन्म के बाद का
एकमात्र सत्य
“मौत”
बाकी दुनिया सिर्फ अस्तित्व
पल में समाई अंतिम सांस
बेकरारी से
जिसका करती इंतजार
मानो बिछड़ी प्रेमिका की
आलिंगन के लिए तैयार
उसके बिना जीवन का चलना बेकार
यही मेरा “मौत” से एकमात्र इकरार

समझ मेरी
अक्सर कहती मुझसे
“मौत” से न कभी डर
सही कर्म हो तो बनाती निडर
तय करती आस्थाओं का अगला सफर
मकसद से मिले अगले जीवन की नई डगर

“मौत”
धर्म कर्म के गुलशन की बहार
अपना लेना ही सही जब लेने आये द्वार
जाना तय तो फिर “मौत” की क्या फिकर
रोते आये हंसते ही जाना रखो ऐसा जिगर
“क्या तेरा क्या मेरा” बने रहे दिलखुश हमसफर
जब कहे मौत चल मेरे साथ चलने को रहे तब तैयार
अच्छा ही लगेगा कर्मो का अंतिम ये आत्मिक सफर
दोस्तों, “मौत” मेरे लिए
सुनहरी उज्ज्वल अंतिम डगर
उसका आगमन ही अब “इंतजार”
रचियता: कमल भंसाली

👍घटना👎कमल भंसाली

घटनाओं से संसार बना
बिन घटना के जग सूना
हर घटना की अलग लय
कहीं सृजन और कहीं क्षय

सुदर्शन चक्र की तरह इसकी महिमा
न इसके लिए दुरी, न इसकी कोई सीमा
कहीं प्रहरी, तो कहीं है, जग संहारक
कहीं कर्मो का फल, कहीं भाग्य प्रचारक

हर पल, कुछ घटना तय
कहीं खुशी, कहीं पर भय
इसमे जीवन की हर लय
हर कर्म का फल करें,तय

घटनाओं से ही शुरु होती, जिंदगी
घटना में जीवन का पूरा समाया सार
बिन घटना भी है, एक घटना प्रकार
उसी में रहता , एक लक्ष्य भरा संसार

एक क्षण में बादल बरसते
दूसरे क्षण बिजली चमकाते
उमर घुमड़ सब को डराते
पर कुछ नहीं करते, चले जाते

घटना की हकीकत कोई भी न जाने
न ही कोई इसकी उपलब्धि पहचाने
शुभता का चिंतन ही इसका उपचार
घटना तय है, सदा चिंतन करो साकार

कहते है, घट घट के वासी की है, पत्नी
नाज नखरों में रहती है, उसकी संगिनी
कुछ न कुछ कर, अपना रुप सदा दर्शाती
एक अदा से, संसार का स्वरुप समझाती

आज हम है, कल नहीं, यह भी एक घटना
जीवन, मृत्यु का खेल, दोनों को ही जीतना
इसी कशमकश में, ख़ुशी और गम करते कुश्ती
समझना जरुरी, घटने में ही समायी, हमारी हस्ती
****कमल भंसाली

👉नये वर्ष के नये संकल्प👈भाग 1👌कमल भंसाली

“दोस्तों” वर्तमान साल या वर्ष हमसे शीघ्र ही विदा लेगा इस समझ के साथ कि हमें भी कभी न कभी धरती के जीवन से विदा होना है, अवधि या आयु के अनुसार। साल के सफर की एक निश्चित अवधि होती परन्तु जीवन अपनी अनिश्चितता के कारण कभी भी विदा हो सकता है। बिता समय अपनी महत्वपूर्णता के कारण भविष्य में भी याद किया जाता है, ठीक वैसे ही महत्वपूर्ण व्यक्तित्व जीवन के बाद भी याद किया जाता है। हर समझदार इंसान अपने जीवन को सुख और समृद्धि के साथ कुछ इस तरह से उपयोगी बनाना चाहता है कि उसका जीवन मिसाल के तौर पर लम्बे समय तक याद किया जाए। अगर हम चाहे तो नया साल आने की आहट से पहले हम अपने बीते साल की अपनी उपलब्धियों और असफलताओं की स्वयं समीक्षा और मूल्यांकन कर आने वाले साल को और बेहतर और प्रभावशाली बना सकते है। इस लेख का कत्तई यह उद्देश्य नहीं की जीवन का मूल्यांकन किसी असफलता को दुःखित मन से याद कर किया जाय, क्योंकि आज के युग की गतिविधिया काफी हद तक पिछली शताब्दियों के वनिस्पत तेजी से बदल रही है और इंसान को वर्तमान के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है, तो कहीं न कहीं असफल परिणाम आ ही जाते। रिश्तों में घटती मधुरता इसका ताजा उदाहरण कह सकते है। मानव स्वभाव से लेकर जीवन सम्बन्धी साधनो और सम्बंधों में भी परिवर्तन दृश्यत् हो रहे है, इसलिए स्वभाविक हो जाता युग परिवर्तन के अनुसार स्वयं को बदलना। चूँकि आज हमारी सफलता और असफलता जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करती है, अतः विदा लेने वाला वर्ष चाहता है कि वो मूल्यांकित हो जिससे उसे किसी न किसी रुप में याद किया जा सके। दोस्तों, पहले की तरह परम्परागत आय के साधन अब बीते युग की बात हो गई, मशीनीकरण के निर्माण की प्रक्रिया में इंसानी हाथ की जगह दिमागी कुशलता मुख्य होती जा रही है। कितना कुछ भी बदल गया परन्तु मृत्यु के हाथों से बचना आज भी मुश्किल है, अतः आनेवाले साल को स्वास्थ्य के अंतर्गत सन्तुलित ढंग से जीना भी जरुरी बन जाता है। अगर हम सच्चाई के साथ बीतते वर्ष पर गौर करेंगे तो अनुभव किया जा सकता है कि हमारा व्यक्तित्व कहीं न कहीं कमजोर रहा है, और आशा के अनुरूप परिणाम नहीं प्राप्त हो रहे है या फिर आर्थिक, पारिवारिक या फिर सामाजिक रुप कोई समस्या जिसका समाधान हम नहीं कर पा रहे है। दोस्तों, आनेवाले साल में आप इन समस्याओं से जरूर निजात पाना चाहेंगे, पर कैसे ? यही हमारी चर्चा का विषय होना चाहिए और हमें ज्यादा समय अब नहीं खो कर अभी से नये वर्ष में भविष्य की उन्नति की तरफ ध्यान देना चाहिए।

सबसे पहले जरूरी हो जाता है कि नये साल की शुरुआत से पिछले महत्वपूर्ण कार्यक्रम जो अधूरे रह गए उन सब को दुबारा क्रमवार स्थापित करने की कोशिश होनी चाहिए। उनके प्रति हमसे क्या लापरवाही हुई ? उस पर गहनतम चिंतन के बाद यह तय करना चाहिए नये साल में उनके लिए स्वयं में क्या क्या तकनीक, मानसिक, शारीरिक सुधार की जरूरत है ? उन समाधानों पर अमल करने के लिये व्यक्तित्व को नकारत्मकता से कैसे बचाव किया जा सकता है,? इस तथ्य पर हमें पूर्ण चेतना से ध्यान रखना होगा। E.H Harriman के इस संदेश से हमें सहमत होना चाहिए ” Much good work is lost for lack of a little more” दोस्तों, जैसे हर सफलता हमें मोहित करती वैसे ही हर असफलता चाहे किसी भी क्षेत्र क्यों न हो, पर हमें भीतर तक तोड़ती है। सबसे प्रथम इस चिंतन को एक मनोवैज्ञानिक दर्शन के माध्यम से तय करना चाहिए की जीवन फूलों से नहीं कड़े उसूलों से जीया जाता है। संसार, देश और सामाजिक दिशा निर्देश के अनुसार ही हमारा नया साल का नया चिंतन स्कारत्मकता, संयम आदी गुणों से युक्त होना चाहिये। मनोवैज्ञानिक मानसिक क्षमता का अद्भुत संगम जब गतिमान होगा तो निश्चित है, नया साल हमें काफी प्रभावकारी और चमत्कारी परिणाम देकर प्रफुलित कर देगा।

हम आगे बढ़े, उससे पहले Harold Sherman की इस नसीहत पर जरा गौर करते है ” Yours life is yours to make of it what you will be; but dare to be yourself at all times; and do not allow any person or force of circumstances to keep you from doing the thing you want most to do- for therein lies your greatest possibility of success.”

आनेवाले साल का स्वागत हमारा इस दृष्टि से करना सही हो सकता है “नया साल, नई राहे, नई मंजिले”। हम इस संकल्प ( Resolve or resolution )के साथ अगर जिंदगी को नियंत्रित कर उसे अगर एक सुहाने सफर की तरफ मोड़ दे तो किसी भी रुप में गलत कदम न होगा। हम अपने स्वास्थ्य को आलस की जगह स्फूर्ति देना तय कर ले तो बाहरी व्यक्तित्व भी मुखर हो सकता है। हम अच्छे परिधान हमारी संस्कृति के अनुसार धारण कर सामजिक क्षेत्रों की तरफ अपना प्रवेश दर्ज करा सकते है। हम नई किताबों से आज के सन्दर्भ का मनोवैज्ञानिक अध्ययन कर परिवार व समाज को नई दिशा की चेतना दे सकते है। हम नये शब्दों को आत्मसात कर अच्छे वक्ता बन दार्शनिक स्वरूप अपने जीवन को प्रदान कर सकते है। दोस्तों अगर यह सब नहीं कर पाये तो कोई बात नहीं परन्तु हम यह संकल्प जरूर ले सकते है, कि हम कोई भी गलत, चिंतन कोई गलत काम नहीं करेंगे, जिससे हमारी वर्तमान जिंदगी प्रभावित हों।

परिवर्तन करना और परिवर्तन की बात करना दोनों में फर्क होता है, संकल्प करना और उसे सक्रिय कर निभाना भी आसान नहीं होता। अतः सबसे पहले जरुरी है, हम अपना स्वयं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करे। चलिए थोड़ी देर के लिए इस पथ की जांच कर लेते है, अपने ही सन्दर्भ में। मनोविज्ञान हमें सिखाता है कि हम अपनी भावनाओं की रुपरेखा को समझे और उनका उपयोग जीवन सुधार में करे। मसलन हमारी कुछ पुरानी आदतें (Habits)जिनसे हमारा आत्मविश्वास को कमजोरी प्राप्त होती है, हम उनमे सुधार का संकल्प कर सकते है। हम कुछ ऐसे काम को दृश्यत् कर सकते है, जिनसे परिवार, दोस्तों, और रिश्तेदारों का विश्वास हम में बढ़ जाये और सुखद सामाजिक जीवन का अनुभव हम करने लगे। “भावना” (Emotions) “रवैया” (Attitude)और “प्रतिक्रिया” इन तीन शब्दों के तहत अगर हम रोज की जिंदगी को जीये तो हम अपना दैनिक कार्य सिल सिलेवार कर सकते है।

बिना किसी टालमटोल के किये कार्य से आंतरिक शक्ति बढ़ती है और इस और जीवन को सुरक्षित वातावरण भी मिल सकता है। इससे हम स्वयं समस्याओं के समाधानों के अविष्कार कर्ता बन सकते है क्योंकि हमें अपनी अक्षमताओं का ज्ञान होता है और उन्हें स्वीकार करने की हिम्मत का भी अंदाजा होता है। इस से अपना व्यक्तिगत जीवन भी अक्षुणता प्राप्त कर सकता है जीवन की विविध समस्याओं की स्थिति अनुसार कभी जरूरत पड़ने पर ऐसे इंसान क्रोध, विरोध कर के भी अपनजनों में प्रिय रह सकते है। अतः हमारे नये वर्ष के सभी संकल्प हमारे व्यक्तित्व के अनुरूप कैसे हो, यह हमें मनोविज्ञान की जानकारी रखने से प्राप्त हो सकते है। –क्रमश–लेखक: कमल भंसाली

निराशिष पतझड़…..कमल भंसाली

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अगर उम्मीदें, मैं रखता, हौसले, वो, दे देता
जीवन, शायद सही, दिशा कि ओर मुड़ जाता
जीत हों या हार, कर रहा, आज सब है, स्वीकार
जान गया, भाग्य, सही कर्म से ही होता तैयार

डरता ही रहा, चाह के जंगल में न भटक जाऊ
मंजिल सामने हो, अर्द्ध ज्ञान से पहचान न पाऊ
यथार्थ की दहलीज पर, कहीं लड़खड़ा न जाऊ
सत्य की शक्ति न मिले, तो शायद संभल न पाऊ

कल को सही समझता, तो आज वीराना न होता
पल की कीमत की पहचान होती, तो महान होता
समस्याओं के रेगिस्तान में, ऊंट की तरह चलता
तो, आज खुशियों के गुलशन के आसपास होता

वो, अगर अपनी हंसी में मेरे आंसू को थोड़ी जगह देते
जीवन पथ पर कोमलता के, महकते फूल बिखर जाते
उस पथ का राही बनता, जहां अमृत ही बरसता रहता
देह का अनुयायी, मन, बून्द बून्द लेकर, हर रोज पीता

पर, ऐसा हो न सका, जीवन गली में रही रात अंधियारी
दिल की उदासियों को, आज भी सवेरे की तलाश है, जारी
कल वक्त बदल जायेगा, सोच, दिलाशों की करता सवारी
पर,आशा की एक बून्द पर, निराशा का पतझड़ लगता भारी

आज जहां खड़ा हूं, वहां कोई राह ही नहीं दिखती
हकीकत यही है, पीछे पर्वत जैसी दुर्लभता दिखती
सामने देखू, तो बिन आरपार पीड़ा की खाई दिखती
दायें, बायें की बात न करो, वहां मुस्कराती मौत हंसती ….कमल भंसाली

उम्र का दर्द

खोयी सी चांदनी
बिखरा सा मन
अधूरी सी अछूती
एक अहसासी चुभन
और वो तम्हारा
सहर्ष स्पर्श का स्पंदन
आज भी ढूंढ़ता
निष्कासित सा जीवन

तह किये हुए पन्ने
उड़ उड़ कर बिखर रहे
यादों की औस से
भिग भिग कर सहम रहे
जो कल तक मेरे थे
आज वो दूर हो रहे
कुछ के तो अक्षर
तक ओझल हो रहे

अनपेक्षित स्मृतियों के अवशेष
हल्की धुंध सी लकीरे
कभी कभी बीते क्षण संवारे
तब तुम्हारे संग बिताये
मानस पटल पर रंगीन
पल को हल्के से उतारे

तीखे नयनों की मकबूलियत
हया से संवरी तुम्हारी सूरत
मकरंद सी मेरी ख्व्वायिसे
जब याद आते प्यार के किस्से
तुम न जानों कितने मुश्किलें देते
फिर से परिभाषित होने वाले
मखमली दिल के कितने हिस्से

उम्र की सीमा रेखा
तनाव देती कितना तीखा
परिधि में बांधते
संस्कारित रास्ते
दर्प का जिया जीवन
कितना झुक जाता
याद करा रही है
उम्र की बची अधूरी
आहत भरी जीवन रेखा

अंत का इंतजार
जानता हूँ न होगा बेकार
मौत का संकित पुंज
तमस में बेठा है साकार
आज नही तो कल
पा जाएगा अपनी मंजिल
दर्द की कई सीमाओं को
लांघ जाएगा, विचलित मन
अलविदा,तुम्हे कह जाएगा
असहाय हुआ, यह तन……

कमल भंसाली