💘फिक्र👀 जीवन चिंतन मुक्तक कविता✍️कमल भंसाली

बची जिंदगी की क्या फिक्र
बीत गई अब उसका क्या जिक्र
कमजोर सांसों के धागे में बंधा
अद्भुत जीवन का चलता चक्र
🕴🚶🏃️
चमड़ी की काया में
क्या क्या नहीं समाया
हसरतों ने कितना कहर ढाया
रुकती साँसों ने ही समझाया
💆💇🚶
जिस जिस्म पर इतराया
अपना नहीं, था पराया
जितना भाड़ा चुकाया
उतना ही उसमें रह पाया
👨‍❤️‍💋‍👨💏👩‍❤️‍💋‍👩
जरा यह समझ लेता इंसान
कुछ उधार के क्षणों का वो मेहमान
समय सीमा का ख्याल रखता
हर मेहरवां, हर मेजबान
कुछ भी तुम उसे कह लो
मै तो यही कहता,यही विधि का विधान
👯👯👯🕴️
अब भी सच नितझर बहता कहता
कर्म के सिवाय कुछ नहीं रहता
जिनको हम अपना कहते
वो जग की अंतिम सीमा तक साथ रहते
💃💃💃💃
जिस्म पर न गौर करे
किसी को दुःख न हो
उसी धर्म का पालन करे
जीवन की सार्थकता का सम्मान करें
🕺🕺👯👯
इसे पैगाम नहीं कहना
सफर है जीवन, मंजिल है मरना
ये सोच है, तो सही है हमारा चलना
सच है, अपनी नश्वरता को समझना
🙏🙏🙏🙏🙏
रचियता✍️कमल भंसाली

वाणी..मधुरता की रानी

“वाणी”, तुम तो मधुर हो
“मैं” ही, कभी कर्कश हो जाता
तुम तो ह्रदय वीणा हो
मन ही, कभी नगाड़ा बन जाता

तुम दृश्य को नयनभिराम
की ऊर्जा प्रदान करती
कभी क्रोध में आँखे ही
उसमें काला रंग डाल देती

उदर के संग रहकर भी
तुम, अमृत संचय करती
स्वाद वशीभूत हो, जीभ
अपच जहर, उगल देती

तुम “पवित्रआत्मा” से “सत्य”
का सदा आश्रीवाद लेती
भ्रमित आत्मा, प्रदूषण कहकर
झूठ के आवरण से बाँध देती

सन्तों और ज्ञानियों ने तुम्हें
सदा माना प्रभु की रानी
कुछ “स्वार्थों” ने बना दिया
तुम्हें काया की नौकरानी

क्या कहूं, आत्मा का “अंहकार”
अंधकार ही पसन्द करता
बाकी तुम्हारी चमक से तो, सारा विश्व्
आत्म विश्ववास से,” मुस्कराता”

भूले दिमाग कि, सदा अनजान रही
तुम तो साथ, रोज निभाती रही
फिर भी, जीवन पथ को संभाल
“आलोक”का दर्शन, कराती रही

जब सरस्वती बन निकलती हो
ह्रदय को सरगम बना देती हो
न समझे अंतरात्मा, तुम्हारी मृदुलता
तब सहम कर, तुम चुप हो जाती हो

तय है, तुम सदा रहोगी महान
मैं ही यहां का, “अजनबी मेहमान”
तुम्हारी चर्चा करेगा, सारा जहां
आज “मैं”यहां, पता नही कल कहां…..

कमल भंसाली

मेहमान हूँ……..कमल भंसाली

मेहमान हूँ, जग तेरा
बहुत रहा,
अब इजाजत मांग
रहा, दिल मेरा
आया था, तब था सवेरा
चारों तरफ था
आलोक सुनहरा
अब हुई संध्या
अँधेरी रात होने,
से पहले
चला जाऊँ
सही समय, सही जगह
पहुंच जाऊं

मन मैला मत करना
मेहमान को तो
पड़ता एक दिन जाना
बहुत मिला मान सम्मान
सच कहता, जग
तुम तो हो अनुपम मेजबान
न समझना भूल जाऊँगा
सभी, तेरे एहसान

कृष्ण सुदामा सा होगा
अपना नाता
भेजने से पहले
ऐसा ही कह रहे थे
जग विधाता
सच ही बोल रहे थे
अपनत्व के हो दाता
सब कुछ तुमसे पाया
दामन ही मेरा
नही संभाल पाया
जो छिटक कर गिरा
उनमें फूल उग आये
उन्होंने ही मुझे भरमाया
इसलिए विधाता ने
मुझे वापस भुलाया

झूठ नही बोलूंगा, जग
जाने की चाह नहीं
पर रहने की भी
अब कोई वजह भी नहीं
शौक न करना
आना जाना तो
फिर से मिलने का
एक है, बहाना
खुश रहना
जरा, मुस्करा कर
अलविदा कर देना…..

कमल भंसाली