🍀कर्म का मर्म🍀धर्म के मर्म का दूसरा चरण🌷कमल भंसाली

तय है, “धर्म” स्वयं ही परिभाषित होता है, यह कोई मीमांषा का मोहताज भी नहीं होता। जो लोग दैनिक कर्तव्य को धर्म से जोड़कर जीना चाहते, वहां धर्म उनकी आत्मा की पहरेदारी करता नजर आता है। जीवन सभी को सहजता से जीनें के लिए ही मिलता है, पर इन्सान अपने जज्बातों के साथ उदारता बरतने लगता, तो कठिनाइयों को रास्ता मिल जाता और जीवन अविलक्ष्य होकर अवैध मंजिलों की चाह रखने लगता है। आत्मिक अनुसंधान और उससे अर्जित अनुभव ही एकमात्र इस अवस्था का समाधान हो सकता है। अगर हमारे दैनिक कर्म करनें की प्रवृत्ति में नैतिकता समावेश हो, जो साधारण चिंतन में विश्वास रखने वाले के लिए एक असहज क्रिया है क्योंकि चाहतों का चक्रव्यूह में फंसा मन जल्दी से उसे तोड़ नहीं सकता। ऐसी स्थिति में ‘धर्म’ शब्द ही उसे एक संकेतक चेतावनी जरुर देता है कि अति भोग जीवन की मूल्यता नहीं समझ पा रहा अतःउसे नैतिकता से परिचय कराना जरुरी है। प्रलोभ से घिरा इन्सान अपनी इस जगत की असहज महत्वकांक्षाओं के कारण नैतिकता को महज एक बाहरी ही तत्व समझता है, और भूल जाता है, कि नैतिकता और धर्म एक दूसरे के पूरक है, कह सकते है, उनका ‘चोली दामन’ का साथ है। यहां अब जरुरी हो जाता है यह बताने के लिए की धर्म के दस तत्वों का संगम ही ” नैतिकता” है। बिना कर्म नैतिकता की कोई भी परिभाषा नहीं बनती, सही कर्मों को समझ सही ढंग से करना ही ” नैतिकता” है। चूँकि नैतिकता धर्म के साथ हमारे जीवन से जुडी है, अतः संक्षिप्त में नैतिकता की परिभाषा नीति शास्त्र के ज्ञान और उसके अनुरुप किया जानेवाला आचरण होता है। जिसे हम इंग्लिश में morality, moral और ethics जैसे और कई शब्दों के रूप से जानते है।

ध्यान देने की बात है, अतः गंभीरता के साथ हमें यह स्वीकार कर लेना होगा हर जीवन की एक सीमा रेखा होती है, उन सीमाओं के अंतर्गत हर कर्म की अपनी गुणवत्ता होती है, इस गुणवत्ता के विरुद्ध किया हर कर्म अनैतिक और अधार्मिक गिना जा सकता है। जीवन की सत्यता वो ही समझ सकता है, जो सत्य की सत्ता स्वीकार करनें में संकोच नहीं करता। जिसने संसार या इस सृष्टि की सरंचना की उसने बहुत सोच समझकर मानव की भूमिका तय की है। प्रकृति को हम किसी भी दृष्टि से निहारे, अच्छी लगती इसका एक ही कारण है, सत्य सुंदरता का मालिक है, और संसार में सत्य की चाहत हर किसी को होती है। सत्यता की मजबूती कभी कोई भी झूठ कम नहीं कर सकता, यह बात और है, कुछ समय के लिए वो सत्य से इंसान को दूर कर देता परन्तु सत्य से सामना होते ही वो स्वयं अदृश्य हो जाता पर अपने नुकसान कारी प्रभाव से मानव जीवन की मुश्किलें बढ़ा जाता। कहते है, “झूठ के पाँव नहीं होते” पर दिमाग तेज होता है क्योंकि हर अवगुणों का नेता होता है, अतः उसके चालाक होने पर कोई आश्चर्य भी नहीं होता।

अगर देखा जाय तो हर नैतिकता की कसौटी ‘सत्यता’ ही होती है, आदमी द्वारा कि हर धार्मिक क्रिया अस्तित्वहिन ही रहती है, जब तक वो आत्मा में स्वर्ण शुद्ध “सत्य “को जगह देने के लिए “पूर्ण ईमानदारी” से स्वयं को तैयार नहीं कर लेता। जैसे शरीर अपनी दैनिक क्षुधा शांत करने के लिए भोगवादी बन नाना प्रकार की इच्छायें जागृत करता है, ठीक वैसे आत्मा अपनी पवित्रता की महत्वकांक्षा के लिए हर दैनिक कर्म में एक निष्कलंक सत्य की कामना करती है। हालांकि दैनिक जीवन की परिस्थितया इन्सान को मजबूर और कमजोर बना देती है, और वो आत्मा की कामना पूर्ण करने में अपने आप को ज्यादातर अक्षम ही पाता है। अतः साधारण इन्सान की उपलब्धिया अगर साधारण रहती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये, क्योंकि साधारण और असाधारण का असमान्य फर्क ही तो उसे इस संसार में मान सम्मान का अधिकारी बनाता है।

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रवि: ।
सत्येन वायवो वान्ति सर्व सत्ये प्रतिष्ठतम्।।

( सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है , सब सत्य पर आधारित है )

अगर उपरोक्त श्लोक के अर्थ पर गौर करे तो यही कहना सही होगा की “सत्य ही जीवन” है। झूठ का जंगल कितना ही विस्तृत क्यों न हो जाये, सत्य की समर्थता को वो कभी भी नहीं छू सकता।

हम बात नैतिकता के सन्दर्भ में आगे बढ़ाये तो स्वभाविक है, एक सवाल हमें परेशान कर सकता है, लालच, मोह, क्रोध, स्वार्थ और कई क्षणिक गलत अवस्थाओं में नैतिक तत्वों की क्यों कमी हो जाती है ? यहां हमें कंफ्यूश के उस कथन को प्राथमिकता देनी होगी जब उन्होंने इसी तरह के एक सवाल में जबाब दिया,” Wisdom, compassion and courage are the three universally recognized quality of men.” यानी एक श्रेष्ठ इंसान हमेशा नैतिकता के बारे में सोचता है, साधारण इंसान केवल सुविधा के बारे में सोचता है। तो क्या सुविधाओं को नैतिकता का शत्रु समझा जाय। शायद कदापि नहीं क्योंकि जरुरी सुविधाये इंसानी जीवन के लिए जरुरी है। कहते है ‘अति’ हर साधन की सही नहीं होती क्योंकि उसकी चाह में नकारत्मक तत्व अपना अस्तित्व बोध इंसान को नैतिक चिंतन से दूर करने की कोशिश करते है और देखा गया भी है अति साधनों की भूख कभी तृप्त नहीं होती।

मानव और उसका व्यक्तित्व काफी हद तक एक ही तलाश के मालिक है, जिनकी चाह होती है उन्हें सही उद्धेश्य प्रेरित, आनन्दित जीवन की प्राप्ति हों, और उसके लिए उन्हें संसारिक जीवन धारा की गतिविधि में नैतिक तत्वों का उचित समावेश रखना होगा। चूँकि नैतिकता हर कर्म में लिप्त रहती है, और उसका अदृश्य भाग दैनिक जीवन का मूल्यांकन, देश, समाज, जाती, भाषा, धर्म आपसी मानव सम्बन्धो के दिशा निर्देश के अनुसार तय करता रहता है। नैतिकता का मतलब मानवता की मर्यादा को आत्मिक सुरक्षा प्रदान करना होता है, क्योंकि सृष्टि की रचना करने वाले ने सजीव प्राणियों में सिर्फ मानव को असीमित अधिकारों से साथ सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमता का वरदान दिया है। अतः सृष्टिकर्ता कभी नहीं चाहेगा उसकी गलत धारणाओं का अंजाम बाकी की मानवता को भोगना पड़े।

हमारे सांसारिक साधारण जीवन के सम्बंध में नैतिकता की जो सही परिभाषा Potter Stewart के अनुसार दी जो सकती, वो ” “Ethics is knowing the difference between what you have right to do and what is right to do” है।
क्रमश…..लेखक: कमल भंसाली

💅कर्म का मर्म “धर्म” ✍कमल भंसाली✍ प्रथम चरण

“धर्म” मानव के लिए सिर्फ एक शब्द नहीं अपितु एक सुखद आत्मिक स्पर्श है, साथ में मानव कर्म की सात्विकता के अंश की मीमांसा भी है। सीधा साधा धर्म किसी भी भव्यता का भी मोहताज नहीं है, न ही वो आडम्बरों और पंथो की डोर से बंध कर कोई नीतिगत सिद्धांत तय करता है। इंसानी फितरत धर्म की लाखों परिभाषाएं बना ले , पर सच यही है, “धर्म कभी भी प्रदर्शित नहीं होना चाहता”, वो हमारे दैनिक कर्मो द्वारा अर्जित परिणामों के फल से स्वयं ही दृष्टिगत हो जाता है। धर्म का सम्बंध हर जीवित प्राणी से है, धर्म का शरीर और आत्मा दोनों से ही सम्बंध रहता है। कुछ आधात्यमक शास्त्रों के अधीन होकर हम यह भी कह सकते है कि हर आत्मा की एक ही चाहत होती है, वो अक्षुण रहें कहीं से भी खण्डित न हों जिससे उसके वापसी सफर में कम कष्ट हों या न हो । धर्म इसमें उसको सहयोग करता है। आत्मा एक चीज से बहुत घबराती वो है मन की चंचलता। मन की चंचलता सांसारिक सुख और दुःख दोनों का निर्माण करने की क्षमता रखती है। हम जीवन के धार्मिक पहलू पर दृष्टिकोण तय करे, उससे पहले हमें एक नजर इस श्लोक पर जरुर डालनी चाहिए, शायद जिससे हम कुछ हद तक धर्म कि परिभाषा के आसपास के माहौल से परिचित हो सकते है।

अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेयन्द्रिय संयमा ।
दानमिज्या तपो ध्यानं दशक धर्म साधनम् ।।

( अंहिसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप, और ध्यान धर्म के साधन है।)

सवाल यह भी किया जा सकता है, क्या इनके अलावा बचे कर्मों में अधर्म समाया है, नहीं, सच्चे आत्मिक चिंतकों के अनुसार चेतनामयी आत्मा जिस कर्म की अच्छाई को पुष्टि कर दे और उस से दूसरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे तो वो कर्म भी धर्म की सांकेतिक परिभाषा के अंतर्गत ही आता है।धर्म कि हम सब बातें और चर्चा करते है, पर हम उससे कितने प्रभावित है और हमारे जीवन में उसकी क्या भागदारी है ! ये एक सत्य सवाल है, जो हर एक की आत्मा जीवन के अंधेरों में स्वयं से पूछती है। हालांकि सन्तोषजनक उत्तर कर्म से ही जाना जा सकता है, पर यह पूर्ण सत्य की कमी की वजह से जान पाना जटिल है।अति संपन्न धर्म शालीनता चाहता है, उसे अपने नाम की चर्चा में जरा भी उग्रवाद या प्रशंसा की चाहना पसन्द नहीं है। माना जाता है, मानव जाति के उदय के साथ धर्म और कर्म का भी उदय हो गया था। हालांकि कर्म ने पहले जीव विज्ञान के तहत अपना वजूद मानव को स्वीकार करा दिया। कर्म मानव की पहली जरुरत थी, अपने आपके अस्तित्व को बचाने के लिए। कुछ कर्मो के नकारत्मक फल पाने के बाद मानव ने कर्म की नैतिकता पुष्टि के लिए आत्मिक तराजू पर उसे तोलना शुरु कर दिया तब ” धर्म” की शालीनता हर प्राणी तक को समझ में आने लगी। अब हम “धर्म” शब्द को भारतीय परिवेश में बतलायी परिभाषा के अंतर्गत समझने की कोशिश करते है। वास्तव में धर्म एक संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ बहुत व्यापक है। ध + र + म = धर्म । ध देवनागरी वर्णमाला का 19 वा अक्षर और तवर्ग का चौथा व्यंजन है। भाषाविज्ञान के दृष्टि से यह दन्त्य, स्पर्श, घोष, तथा महाप्राण ध्वनि है। संस्कृत के अनुसार धा ( धातु ) + ड विशेषण- धारण करने वाला, पकड़ने वाला होता है। यानी जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म कभी विभक्त नहीं हुआ, न ही गलत परिभाषित होता है, पंथों के आडम्बरों में कितना धर्म सही है, यह एक तर्क का विषय भले ही हो पर धर्म की परिपक्वता सत्य से पोषित होने कारण उसकी अखण्ड पवित्रता आज भी बरकरार है। इसलिए ये हमें सदा सुनने को मिलता रहेगा कि” धर्म की जड़ हरी होती है”। ये प्रकृति का धर्म के प्रति अपना विशिष्ट अनुराग है।

चूँकि धर्म जीवन का एक हिस्सा है, अतः आत्मबोध से उसकी अपनी अनुबन्धनता है। यही आत्मबोध हर इंसान की कमजोरी और मजबूती का निर्माणिक तत्व है। अगर धर्म के वैज्ञानिक पहलू पर एक नजर से चिंतन करे तो हमें धर्म को जाती, पंथ, समुदाय, देश और काल से विच्छिन करना जरुरी होगा क्योंकि ये इंसानी जरुरत की इजाद की हुई धाराणायें है, जिनमें ऐसी कोई भी गारन्टी नहीं मिलती कि ऐसा करने से हमें देवत्व या आत्मा को निर्वाण मिल जाएगा। इस कथन को सहजता से स्वीकार करने में स्वामी विवेकानन्द यह सन्देश शायद सहयोग करे जिसमे उन्होंने कहा है ” तुम्हे अंदर से बाहर की तरफ विकसित होना है। कोई तुम्हे पढ़ा नहीं सकता, कोई तुम्हे आध्यात्मिक नहीं बना सकता, तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई गुरु नहीं है”। वास्तिवकता भी इस बात को स्वीकार ही करेगी की धर्म सात्विक रसात्मक तत्व है, सदा अप्रभावित रहता है, न यह किसी से कलंकित किया जा सकता न ही ये किसी से आलोचित हो सकता। दस सहः तत्व से निर्मित धर्म जीवन को अखण्डता, विशालता, आत्मिक सम्पन्नता, उसकी अपनी नैसर्गिक का सही अनुभव कराना चाहता है। हर मानव, धर्म के इस सूक्ष्म चिंतन को नकारता भी नहीं पर पूर्णता से भी इसे स्वीकारता भी नहीं, दुःख या उसकी मजबूरी कह लीजिये सीधे सरल समुज्ज्वल सत्य पर उसका विश्वास जीवन की कई अँधेरी टेडी मेड़ी पगडंडियों पर अक्सर डगमगा जाता है। मानव कि इस कमजोरी ने “माध्यम” को जन्म दिया, जिसकी शायद ही कोई जरुरत नहीं थी। पर वक्त की अपनी करामत होती है, उसका आनन्द वो कई तरह से लेता है। मानव वक्त का एक हिस्सा है, अतः “धर्म” का बाहरी स्वरुप भी प्रभावित होना लाजमी हो गया और क्षेत्रीय स्थल के अनुसार समझा जाने लगा। हम अपने देश के सन्दर्भ में इस पर ज्यादा चिंतन नहीं कर सकते, क्योंकि हर सकारत्मक और नकारत्मक क्षेत्र में लोग अपनी सुविधा अनुसार इस का सिर्फ शाब्दिक उपयोग करते है, जिसकी परवाह अमृतमय धर्म कभी नहीं करता। धर्म सिर्फ उस विशेष मानव से ही सम्बंध रखता है जो उसके अस्तित्व को स्वीकारता है, सामूहिकता से उसका कोई सम्बंध शायद ही हो। आर्थिक युग में धर्म को सामूहिक रूप देकर पुण्यता की खरीद समझना सिर्फ एक मानसिक क्रिया का ही स्वरुप है। निज- धर्म की शुद्धता की कसौटी स्वयं इन्सान का अर्जित आत्मिक सन्तोष ही होता है। जब कोई आडम्बरो से सजा समुदाय, जाति, पंथ या देश जब धर्म निर्देशक होने का दावा करता तो कहने में संकोच नहीं हो सकता उनका उद्धेश्य धर्म को समझने में संकुचित ही है, या फिर, किसी अस्वीकृत छवि को प्रचलित और प्रसारित करने का प्रयास मात्र है ।

कहते है, राजा हरिश्चंद्र ने सत्य से बंध कर ही धर्म को अपना जीवन आधार बनाया और कभी भी कर्तव्य के प्रति अपनी आस्था को मोह, स्वार्थ, झूठ, फरेब, लालसा, असंयमन आदि नकारत्मक चिंतन का शिकार नहीं होने दिया। जिंदगी सभी के पास एकल रुप में सीमित अवधि लेकर आती है, अपूर्णता के जंगल में सही राह भूल जाती है और स्वयं निभने वाले धर्म से दूर होकर जब उसे अपनी विपरीत दिशा में होने का अनुभव शुरू होता है, तो धर्म को पाने के लिए छटपट करने लगती है। संसार की विचित्रता को देखिये, जो धर्म अपने हम में स्वयं समाहित हो एकान्तिय होना चाहता है, अपने प्रत्येक तत्व के साथ मसलन सच, संयम, धैर्य, सेवा, स्नेह, प्रेम,साधना, अहिंसा और तप उन्हें हम अनदेखा कर झूठ, भोग, अधैर्य, तिरस्कार, घृणा, हिंसा, अंहकार आदि संसारिक मंजिल प्राप्ति के साधनो को अधिक महत्व देते है। अफ़सोस इतना ही है जन्म से जीवन के अंतिम क्षण तक की सवेंदनशील स्थितियों में जहां इन्सान का हमराही प्राकृतिक धर्म होना चाहिए, वहां व्यवहारिक आडम्बर कितनी शान से खड़ा मुस्करा रहा होता है। हमारे परिमार्जनीय कर्मों में ही शायद संभावित धर्म माखन के रुप में सम्माहित है, हमें इसलिए अपने हर कर्म का आत्ममंथन नियमानुसार करने की जरुरत है। वैसे भी उपदेश से ज्यादा धर्म को साथ साथ रखने की कोशिश में स्वयं का स्वयं ही आत्म मूल्यांकन करने का प्रयास सर्वश्रेष्ठ होता है, ये मेरी नहीं जीवन सुधारक विशेषज्ञों की राय है …..क्रमश …लेखक *** कमल भंसाली***

🌴आत्मिक आधार🌴कुछ विचार🌿कमल भंसाली🌿

जीवन एक आस्था है
एक आत्मिक विश्वास है
निरन्तरता से भरा प्रयास है
समझ मे आ जाये
तो सार्थक हो जाये
न आये तो एक भटकाव है।
💑
जन्म के बाद एक ही निर्विवाद सत्य
“मृत्यु” ही है, जो स्थायित्व कि सरंक्षता में
अनिश्चित होते हुए भी निश्चित है।
👆
नियति के अनुसार ही बुद्धि का महत्व है, बुरे समय मे श्रेष्ठ बुद्धि भी अपना असर खो देती है, अच्छे समय मे निम्नतम बुद्धि वाला भी सर्वेश्रेष्ठ प्रयास कर जाता है।
मापदण्ड जीवन का यही है, कोई भी अपने आप को कभी सर्वेश्रेष्ठता के अंहकार से सुशोभित करने की चेष्टा न करे, नहीं तो इतिहास गवाह है, पतन का रास्ता भी पास से गुजरता है।वैसे जीवन के हश्र का जिक्र भी क्षण के दुःख का निर्माण करता है।
🙏
सही यही है, जीवन अद्भुत उपहार है, प्रकृति का और सब प्राणी का अपना समर्पित अधिकार उस पर है, अतः भगवान महावीर के इस कथन में अपना जीवन समर्पण कर देना उचित होगा, 👉 स्वयं भी जियों और दूसरों को भी जीने दो 👈 👉 Live & Let Live☝
🍀🐞
किसी भी तरह के नहीं खत्म होनेवाले मतभेद या संधर्ष का एक मात्र अचूक निदान “क्षमा” ही है, जिसका उपयोग आत्मिक पवित्र व्यक्तित्व वाला ही कर सकता है, क्योंकि क्षमा “वीरस्य भूषणम” है। साधारण व्यक्तित्व वाला तो सिर्फ उसकी बातें ही कर सकता है, तभी तो सांसारिक और पारिवारिक असहनशीलता बढ़ रही है, और आंतकवादी और अलगाव वादी शक्तियां इसका भरपूर प्रयोग कर असुरक्षा का माहौल तैयार करने में सफल हो जाती है।
🌸
स्वास्थ्य जीवन की सबसे मुख्य जरुरत है, साधन उसकी आंकाक्षाओं की पूर्ति मात्र है, पर देखा गया है, मानव स्वभाव साध्य से ज्यादा साधनों को महत्व देकर अपने ही बनाये जाल में मकड़ी की तरह उलझ जाता है। जिसमें से निकलना उसके लिए अंतिम समय तक कठिन हो जाता है। इस तरह की लापरवाही जब ज्यादातर उच्च शिक्षित लोगों से होती है, तो खेद होता है कि आखिर शिक्षा की बुनियाद में जीवन के प्रति इस लापरवाही का अंजाम सही ढंग से क्यों नहीं बताया जाता।🌷 🌸कमल भंसाली🌸

🐙मंगलमय सहयोग 🐙 जीवन सूत्र भाग 2 अंश 1 🐙 🌺कमल भंसाली🌺

इंसानी जीवन की सबसे खूबसूरत जरुरत होती है, “सहयोग”, इस शब्द को अगर परिभाषित किया जाय तो शब्द की सार्थकता अपने आप झलकने लगती है। हकीकत यह है, कि इसके बिना जीवन का कोई भी सूक्ष्म सा सूत्र नहीं तैयार किया जा सकता। सहयोग एक वो तत्व है, जो सहारे को तलाशता है, पर, इसकी मजबूरियां भी बड़ी विलक्षण होती है, सबसे पहले इसकी जरुरत को ही लीजिये, इसको किसी का साथ जरुर चाहिए, अकेले से इसका वजूद तैयार नहीं होता। जीवन के लिये सहयोग प्राणदायक तत्व है, भावनाओं से ही इस का निर्माण होता है।

यह सच है, हर प्राणी अकेला संसार आता है, पर उसके आने में भी सहयोग की जबरदस्त भूमिका होती है। प्राणी मात्र का जन्मबीज पांच तत्वों ( क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा यानी धरती, पानी, अग्नि, आकाश एवं वायु ) के आपसी सहयोग से ही तैयार होता है, यानी, सहयोग का धरातल आपसी सम्बंध होते है, सम्बंधों की सहजता से सहयोग की बुनियाद बनती है।

चूँकि हम मानव जीवन के सूत्र तलाश रहे है, अतः हम यहां सिर्फ उन्हीं बिंदुओं पर चर्चा करना पसन्द करेंगे, जिनको जानने से मानव जीवन का उपकार हो सकता है। यह तय है, असंख्य मानव का सभी के साथ सम्बंध नहीं हो सकता परन्तु सहयोग आपस में किया जा सकता है, इसे हम सामूहिक सहयोग कह कर प्राप्त करते है, या खुद दे सकते है। ऐसे सहयोग पवित्र और सुंदर कामों में अब तक ज्यादा दिखाई दे सकते है, परन्तु विधि और वक्त का कमाल समझिये गलत कामों में भी आजकल सामूहिक सहयोग का उपयोग लोग कर लेते है। इसका कारण कमजोर मानसिकता तो है ही, पर गलत लोलुपता के कारण सामूहिक हिंसा में इसका प्रयोग बढ़ना निसन्देह चिंता की बात है। कहते है, बिना स्वार्थ का सहयोग मिलना कठिन है, ऐसा चिंतन करने से पहले इस तथ्य पर भी गौर करना लाजमी होगा, जैसे बिना कारण कोई काम नहीं होता, वैसे ही बिना कोई आकांक्षा का सहयोग आदान प्रदान करने लायक नहीं होता। संक्षिप्त में यह ही कहा जा सकता है, इस सूत्र के बिना जीवन सहस्त्र मुखी नहीं बनाया जा सकता क्योंकि हमारा जीवन सजीव, निर्जीव दोनों तत्वों के सहयोग पर पूर्णतयः निर्भर रहकर कर ही गतिशील बना रह सकता है। सहयोग के बारे में हमें यह जरुर ध्यान रखना होगा की इसके लिए अपने दैनिक रवैये में इस तत्व से हम विमुख नहीं रहे, कहा भी गया है, ” Self help is best help.” जब हमें अपने आपका सहयोग जरुरी है, तो फिर दूसरों द्वारा चाहे सहयोग पर उचित शंका ही रहनी चाहिए।

“सहयोग” जीवन का महत्व पूर्ण सूत्र तत्व होते हुए भी इसकी सही समझ तब तक मानव को समझ में नहीं आती, जब तक वो सम्बंधों का महत्व नहीं समझता। इसलिए गुणी लोगों ने सम्बंधों की परिभाषा को विस्तृत आयाम देते हुए, मानव को सामाजिक प्राणी की पदवी दी, तथा समाज में उसके सहयोग को उसकी जिम्मेदारी बताई गयी। सच भी है, अकेला इंसान आखिर क्या करता ? चूँकि समाज शब्द में विस्तृता ज्यादा थी, अतः उसको मुख्य अंश से बाँध कर परिवार, जातियों , रिश्तों आदि का निर्माण किया गया, जिससे मानव अपनी भूमिका में प्रभावकारी बन जाए। गौर कीजिये, आज तक की हमारी उपलब्धियों पर तो स्वयं ही समझ में आ जाएगा, सहयोग से हमनें कितनी सक्षमता हासिल की। परन्तु सहयोग को जब लज्जित होना पड़ता है, तब कुछ गलत प्राणी अपनी तुच्छ महत्वकांक्षाओं के लिए इसका दुरुपयोग करने लगते है। ध्यान यही रखना है, कि हमें हमारा विवेक कभी गलत सहयोग के लिए विवश न करे।

हम अपनी ही दिनचर्या पर जरा सी नजर डाले तो समझ में आ जाएगा, हमारा अस्तित्व को कायम रखने के लिए हमें हर कदम पर एक दूजे का सहयोग जरुरी होता है, परन्तु इंसानी फितरत है, कब मन बदल जाए, इस चंचलता को भी लगाम देने के लिए हर सहयोग को मूल्य आधारित करना जरुरी हो गया तो अर्थ को अपनाना लाजमी था, और बहुत सारे शारीरिक सहयोग के लिए अर्थ समर्थित व्यव्यस्था का निर्माण किया गया, जिसे हम अर्थ व्यवस्था के नाम से पहचान लेते है। हॉलंकि आत्मिक और नैतिक सहयोग में अर्थ को सीमित दायरे में जरुरत के अनुसार आज भी रखा जाता है। सहयोग को कई तरह से वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे शारीरिक, मानसिक, और आत्मिक, शारीरिक सहयोग की भूमिका का अवलोकन किया जा सकता है, बाकी दो सहयोग का अनुभव वंदन किया जाता है। सहयोग को कभी कभी वापस लेकर भी कुछ परिणामों को बदलने की चेष्टा भी की जाती है, उसे हम “असहयोग” के नाम से जानते है। इसका सही और सटीक उदाहरण महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन के रुप से जग जाहिर है, उनका यह परीक्षण हमारे सर्व हित में था, अतः सफल रहा और विश्व में नेल्शन मण्डेला जैसे नेताओं ने अपने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपनाया। चूँकि काफी भावुकता से सम्बंधित होता है इस प्रकार का सहयोग भरा असहयोग अतः मानव कल्याण सम्बंधित उद्देश्यों में ही इसका प्रयोग उचित लगता है।

सहयोग की खासियत इस बात से भी समझनी सही होगी की इसमे त्याग की भूमिका अहम रहती है, चाहे वो शारीरिक, मानसिक परिश्रम, समय या फिर अर्थ और वस्तु या फिर कोई और, देने वाले को अपना हिस्सा इसमे लगाना ही पड़ता है, अतः गुणवत्ता के आधार पर इसका लेन देन किया जाय, तभी सहयोग की सार्थकता सफल हो सकती है। जीवन को चमत्कारिक बनाने के लिए यह जीवन सूत्र काफी सक्षमता प्रदान करता है, इस पर हमें सूक्ष्मता और गंभीरता से समझना चाहिये।

सहयोग की भावना में पवित्रता जितनी होगी उतना ही इसे प्रभावकारी बनाया जा सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार “संदेह करने वाले व्यक्ति के लिए प्रसन्नता ना इस लोक में है, ना ही कहीं और, अतः हैलन केलर का कथन ” Alone we can do so little ; together we can do so much.” हमारे व्यक्तित्व विकास के लिए, काफी प्रेरक हो सकता है, ध्यान रखना सही होगा।… क्रमश….

लेखक**कमल भंसाली**

पपीहा……कमल भंसाली

अंतर्मन का एक सवाल
है, बिन समाधान
मरने के बाद
वापस, मानव जीवन
है, कितना आसान ?
आत्मा में इतना गहराया
एक रात सपना बन
मेरे, नयनों में छाया

मरघट कि सुनहरी
शांत चांदनी रात
पास पयसिव्नी
बहती, निर्मुक्त
बरगद का एक
विस्तृत पेड़
उसकी, एक टहनी
पर, बैठा,
पपीहा चिहुका
जब, मरकर
मेरा पार्थिव शरीर
वहां पंहुचा
देख, निर्जीव
तन का हर हिस्सा
मन ही मन मुस्कराया
उसे, अपना
पिछ्ला जन्म
एक क्षण के लिए
मानों, याद हो आया
कभी, मैं
भी था, इन्सान
आज, हूं, पपीहा

अब यह है, मेरी तरह
कल की
दुनियादारी का किस्सा
आएं हैं,
इसे जो लेकर
कल तक था
उन्हीं का हिस्सा
हर रिश्ता टूट गया
जग पीछे छूट गया
सारे बन्धन, तोड़ गया
धरा का धन
धरा पर रह गया
इसकी,आत्म परीक्षण
का समय आ गया

मानव तन
जिसने, जब पाया
विधाता ने
मकसद समझाया
भूल गया
जब धरती पर आया
रंग रँगीली काया
ने, हर पल उकसाया
सांसारिक जाल ने
आत्मा को मछली बना
वासना का
दाना चुगाया
देर हुई
जब तक
समझ पाया
सामने खड़ा
यमराज को पाया
पपिहया बन
मैं, धरती पर
वापस आया

मेरी तरह,
यह भी
सब भुला, याद कर लेगा
सही, गलत
सब कुछ अर्पित कर देगा
सत्य की वेदी पर
निरहि, निस्सहाय
पसरा, मरघट के आँगन पर
अपने, कर्मो का
करता रहेगा, मूल्यांकन
देह करेगी
सम्पर्क जब तक अग्निकण
हर चिंगारी में
अपने सब कर्मो का
हिसाब देगा
बताएगा, कैसे बिताया
हर क्षण
पर न जान पायेगा
कौन कर रहा
उसका आत्म-परीक्षण
देह, धर्म दुनिया निभाएगी
पंच तत्व की
सुंदर काया का
होगा, दाहन
था, मेरी तरह
यह कोई, पाहन

मेरी, अपनी
देह, सजनी
अधूरी अतृप्ता ने
आत्मा को बिसराया
रेशमी मोह के उन्माद ने
जन्म भर तरसाया
रूप रंग रस भरी
छिनाल, कामनाओं ने
निगर-निघट बनाया
वासना के कीचड़
से सदा नहाया
सद्, विचारों ने
पपीहा को
चक्षु पथ दिखाया
निर्जीव हो
देह त्याग किया
उसी को मैंने अपनाया
मैं, पपीहा बन
पी कहाँ, पी कहाँ, चिल्लाया
खुली आँख
अपने को बिस्तर पर पाया

निष्कर्ष, इस सपने
का इतना ही
समझ पाया
मानव जीवन है, अमूल्य
जो जी रहा
वह नहीं, वापस तूल्य
जो बीत गया
वापस नहीं आएगा
जो बच गया
समेटने में लग जाएगा….कमल भंसाली

आधुनिकता का श्रृंगार

आधुनिकता खड़ी बाजार में
अवलोकन कर रही
अपने ही श्रृंगार का
मुस्करा के जीवन को
ललचा रही
असत्य के दलालों से
गलत इशारे करवा रही
इन्सान को भौतिकता
के मदिरालय में
कामनाओं के जाम में
हवश की शराब
पीला रही
अपनी ही जीत का
जलसा मानव द्वारा
मनवा रही

कल का नैतिकवाद
बन्धनों में बंध
भूल गया
अपने सत्य के
सारे छंद
कितना अव्यवहारिक
हो गया प्रियवंद
कल तक खुद मुस्कराता
आज जर्जरता से
होकर परेशान
अपने से ही भागता
ठोकर खाकर भी
नहीं संभलता
नशा है, जिंदगी
कहकर “चिल्लाता”

आधुनिकता का दल्ला
पहना रहा सब को
झूठ और लालच का
जादू भरा छल्ला
वासना की रानी
नैनों से नृत्य कर
जंगल में मंगल
मना रही
इंसानी जज्बातों को
पाषाण की मूर्ति
बनाकर
बीच चौराहे पर
लगा रही

शर्म “जिंदगी”को नहीं
“चिंतन”को आ रही
मकसद नहीं हो रहा पूर्ण
समस्याए बढ़ रही
नहीं कोई है, निवारण
क्या ऐसे ही जलालत
देती रहेगी “आधुनिकरण”
कर “मानव”
थोड़ा सा तो मनन…..

कमल भंसाली

मानव मन जरा संभल…

गुरु कहते , जिन्दगी तो साफ सुथरी ही आती
कर्म की प्रतिरूपता सुंदर या कलुषित बनाती
भटकाव की प्रथम सीढ़ी,असंयत उम्र दिखाती
अज्ञानी को ही,सिर्फ यह बात समझ न आती
मानव मन जरा संभल, आगे तेरी अपनी नियति

यौवन रस भरी जिन्दगी, करे जब द्रवण
दौलत को आये जब मादक, अंगड़ाई
द्वैध हो जाए आत्मा, बिन स्वस्थ प्राण
चेतन मन की बढती जाये, आंतरिक रुलाई
मानव मन जरा संभल….

आस्था के नरगिसी प्रसून, बन जाते शूल
जीव क्यों हो गया, कामनाओं में मशगुल
अतृप्त का बोध बन गया, जहर का जंगल
ढह जायेगा जल्द,अनधिकृत देह का महल
मानव मन जरा संभल…

अनबुझ अनंग आत्मा कर, अब तो कर प्रतिकार
सोच समझ आगे बढ़, नहीं तो यह जन्म बेकार
ग्रसित तन को दे सदा स्वस्थ और स्वच्छ विचार
अर्थ का न हो अब अनर्थ, अपना ले, अमृतमय सदाचर
मानव मन जरा संभल……

यौवन के दिन चार, भोग इसे जरा हो कर समझदार
जीवन की कीमत तय करता, सत्कर्म का बाजार
पतन के सिंहासन पर बैठ, न कर शूली का इंतजार
बहु कोशिश के बाद ही मिलता,मानव जीवन एक बार
मानव मन जरा संभल…..

कमल भंसाली