🙆”मा”🙅 रिश्तों का व्यवहारिक आंकलन 👧 एक उद्धेषपूर्ण अनुसंधान चर्चा 👼भाग 1

जब भी हम कभी जिंदगी के सन्दर्भ में बात करते है, तो अहसास भर होता है कि जिंदगी को समझने की जरुरत होती है । जिंदगी बहुमूल्य होते हुऐ भी हम इसकी कीमत का शायद ही कभी मूल्यांकन करते है, यह हमारी शायद कोई नीतिगत कमजोरी है और इसका हर्जाना हम काफी बार क्षमता से ऊपर चुकाते है। एक सत्य जीवन का जो हमारे सामने कई प्रश्न खड़ा करता है, वो है आपसी रिश्तों का तालमेल, साधारण स्थिति में भी रिश्तों का निबाहना आजकल काफी चिंतन का विषय कहा जा सकता है। विपरीत परिस्थियों में तो हमारा आपसी सम्बन्ध निम्नतम रक्तचाप से भी नीचे चला जाता है। आखिर ऐसा क्यों है, कि सबसे सक्षम धरती का प्राणी अपनों से ही पराजित हो जाता है ! आज हम रिश्तों के विज्ञान की समीक्षा करेंगे परन्तु उससे पहले यह जानलेना जरूरी है, आखिर रिश्तों से हमारा क्या तातपर्य है ? सम्बंधों की रूपरेखा के अंतर्गत ही हमारा चिंतन होना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि इनपर हम अपना कुछ अधिकार मानते है। हम किसी भी रिश्ते का मूल्यांकन करे उससे पहले यह समझलें कि हर रिश्ता चाहे वो खून का हो या परिस्थितियों से बना हो दोनों में ही आपसी विश्वास की मात्रा बराबर होनी जरुरी होती है। विश्वास के धागों में प्रेम के मोतियों की कीमत अनमोल होती है, इस सत्य से परिचित इंसान हर रिश्ते का सही सम्मान करता है और आजीवन सुख का स्पर्श उसे प्राप्त होता रहता है, ये एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है।

रिश्तों की दुनिया विचित्र और सचित्र होती है, इसमे नये नये रिश्ते जो व्यवस्था और अर्थ अर्जन के अंतर्गत बनते और बिगड़ते है, उनके वजूद की सीमा सीमित होती है, अतः उनसे ज्यादा न सुख मिलता न ही दुःख। परन्तु इंसान को जन्म लेने के बाद जिन दो जीवन पर्यन्त रहने वाले आत्मिक रिश्तों से प्रथम साक्षात्कार होता है, वो दुनिया के सबसे बड़े विश्वास के ग्राहक होते है। जी, हाँ, मैं माता- पिता व सन्तान के अनमोल रिश्ते की बात कर रहा हूँ। शास्त्रों की बात माने तो दोनों ही रिश्तों को भगवान के समकक्ष पूज्य और सम्मानीय माना गया है। चूँकि माता- पिता का रिश्ता प्रेम और भावुकता के अमृत भरे तत्वों से संचालित रहता है अतः दुःख और सुख दोनों को अनुभव जीवन पर्यन्त करता रहता है। इसे जीवन विशेषज्ञ उम्मीद, आशा और भविष्य के तत्वों से पोषक रिश्ता भी बतलाते है, जो काफी हद तक सही मूल्यांकन लगता है। आज हम इसी रिश्ते के सन्दर्भ में अपना चिंतन आगे बढ़ाते है क्योंकि ये जीवन का प्रथम रिश्ता है, जिसे विधाता हमें धरती पर पहला उपहार देता है।

सबसे पहले हम मर्मस्पर्शी, ममतामयी व स्नेह से भर पूर “माँ ” के रिश्ते से अपनी विवेचना से शुरुआत करे तो शायद हम जीवन के इस मधुरमय रिश्ते का सर्वांग आनन्द प्राप्त करने की कोशिश करे। कहते है, “माँ “अगर स्नेह से भरपूर नहीं होती तो प्रेम की परिभाषा में अमृत्व नहीं झलकता अतः उचित हो जाता इस पवित्र रिश्ते के आत्मिक और सात्विक तथ्यों का मानसिक और संसारिक दृष्टि से विश्लेषण करने की चेष्टा करे।

इस पवित्र अनमोल रिश्ते की शुरुआत उसी दिन से शुरु हो जाती है, जब जीव “माँ” के गर्भ में जगह पाता है। हर “माँ” इसका प्रथम अहसास पाते ही स्नेहयुक्त तत्वों से इसकी सुरक्षा के लिए जागरूक हो जाती है। हालांकि “माँ “शब्द की महिमा को हर क्षेत्र से परिभाषित किया गया परन्तु आज तक सभी परिभाषायें सम्पूर्णता से अधूरी ही लगती। महाभारत महाकाव्य के रचयिता महर्षि वेदव्यास ने माँ के बारे में जो लिखा वो काफी सारगर्भित लगता है।

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः ।
नास्ति मातृसंम त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया ।।

( यानी माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है। )

इसे हम तकनीकी रुप से समझना चाहते है, तो ” माँ ” शब्द की गरिमा को समझना होगा। प्रथम सांस के साथ नव प्राण प्राप्त शिशु जब प्रथम स्पर्श का मूल्यांकन सुरक्षित पालन पोषण के लिए करता है, तो “माँ “का दूध उसके आँचल में मचलने लगता है।ये अमूल्य रिश्ता है, जिसको मंत्र के रुप हर दुःख के समय याद किया जाता है। जो, माँ की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाते है, उन्हें अपना शैशव जरूर याद करना चाहिए। एक माँ अपनी सन्तान का पालन पोषण कितना तपस्यामयि हो जाती है, ये जानना भी संक्षिप्त में जरूरी भी है। वो सन्तान को गर्भ धारण कर नौ महीनें तक उसे वहां सब दायित्व निभाते हुए सुरक्षित रखती, प्रसव पीड़ा सहन करती। जन्म देने के बाद स्तन पान करवाती, रात भर जागती, खुद गीले में सो कर बच्चे को सूखे में सुलाती, उसका हर दैनिक कार्य करती, उसे सदा आंचल में छुपा कर रखती और उसकी रक्षा के लिए सब कुछ दाव पर लगा देती। ” माँ ” की महिमा और उसके आंचल की ममता को शब्दों में बयान करना मुश्किल होता है, पर महसूस किया जा सकता है।

आज युग बदल गया, सब तरह के सम्बन्ध स्वार्थ के धागों में बंध गए परन्तु आज भी “माँ “एक मात्र सम्बन्ध रह गया जिससे कोई नुकसान की कल्पना भी नहीं करता। परन्तु आज हकीकत यह भी है, अर्थ के प्रभाव ने ” माँ ” की भूमिका भी बच्चों के लालन पालन की बदल गई। आज की कुछ शिक्षित माँये बच्चों को आया के सहारा उनका लालन पालन करना पसन्द करती है, इस तरह के और भी कारणों से वर्तमान की कई घटनाये माता के प्रति सन्तान का रवैया कुछ रूखापन महसूस कर रहा है। ये वक्त की मजबूरी कहिये या अर्थ तन्त्र की मेहरवानी की माँ की शुद्ध भूमिका कमजोर हो रही है। पुराने समय से जब तक अर्थ का प्रभाव नहीं बढ़ा तब तक मजाल थी, कोई इस रिश्ते के प्रति नकारत्मक विचार बदलता परन्तु वर्तमान में भूर्ण हत्या ने कुछ संशय को प्रोत्सहान दिया है, फिर भी “माँ “तो “माँ” होती है, अंतस में तो इस पर उसे पश्चाताप जरूर होता होगा। कुछ वक्त के कारणों को छोड़ दे तो आज भी “माँ” बेमिसाल होती है।

कुल मिलाकर, हर धर्म माँ की अपार महिमा को स्वीकार करता है। हर धर्म और संस्कृति माँ की जीवन निर्माण की भूमिका को स्वीकार किया है। हिन्दू धर्म हर देवी को माँ के रुप में माना गया है, मुस्लिम धर्म ने माँ को पवित्र माना है। हजरत मोहम्मद कहते है ” माँ के चरणों के नीचे स्वर्ग है “। ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ ने स्पष्ट माना है ” माँ के बिना जीवन ही नहीं “। कहने का इतना ही सार है, कोई भी देश, कोई भी संस्कृति, कोई भी सभ्यता या किसी भी भाषा में माँ के प्रति असीम प्यार व सम्मान मिलेगा। भाषा परिवर्तन से माँ शब्द की गरिमा कभी अपरिचित नहीं रहती। हिंदी में “माँ”, संस्कृत में “माता”, इंग्लिश में “मदर”, “ममी” या “ममा” फ़ारसी में “मादर” और चीनी में “माकून”शब्द का प्रयोग होता है। भाषायी दृष्टि से “माँ “के चाहे भिन्न भिन्न रुप हो लेकिन ममता और वात्सल्य से हर माँ एक ही तरह की होती है।

अगर हम मनोवैज्ञानिक दृष्टि से “माँ” और सन्तान के सम्बंधों का विश्लेषण करने की कोशिश करे तो प्रथम समझना होगा, हर रिश्ते की बुनियाद भावनाऐं होती है । देश, जाति, धर्म तथा समय काल हर रिश्ते की गहनता को प्रभावित जरुर करते है, पर माँ का रिश्ता अंदर से अप्रभावित ज्यादा रहता है। माँ का रिश्ता बेटे के लिए या बेटी के लिए बिना कोई अलग् धारणा के एक जैसा रहता है यह और बात है, सन्तान गलतफेमियों के कारण इसे कम, ज्यादा में कभी कभी मूल्यांकित कर लेती है। हमारे देश में रिश्तों की नैतिकता बरकार रखने के लिए सदियों से प्रयास किया जाता रहा संस्कार निर्माण द्वारा बच्चों को बचपन से हर रिश्ते की गरिमा से अवगत कराया जाता इस प्रणाली माँ की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। कड़वा सच यह भी है आज माँ की खुद की आस्थायें परिवार के नियमों के प्रति कम हो रहीं है, जो वर्तमान और भविष्य के लिए शायद सही नहीं है।

भावुकता से ओतप्रोत ” माँ” का रिश्ता गीतकार और कवियों को इतना भावुक कर देता कि माँ उनके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन जाती। चरित्र निर्माण में “माँ ” की शिक्षा संतान को वक्त के अनुसार तैयार करने की क्षमता व मार्गदर्शन करती है। इतिहास गवाह है, संसार में बलशाली, बुद्धिमान, चरित्रवान आदि गुण युक्त व्यक्तित्व उभारने में ” माँ ” का सहयोग और मार्गदर्शन गुरुत्व केंद्र होता है।

फ़िल्म दादी माँ (1966 ) के इस गीत में ” माँ “की महिमा को मार्मित ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिसे ह्रदय द्रवित हो जाता है, और आँखों में स्नेहमयी “माँ” की नमन योग्य तस्वीर उभर आती है।

“उसको नहीं देखा हमने कभी
पर इसकी जरूरत क्या होगी
ऐ माँ….ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी ।।”

दोस्तों संसार में सब कुछ मिल सकता सिवाय माँ के, अतः अगर आप के पास आज भी माँ का सौभाग्य है, तो
इस अनमोल रिश्ते का सम्मान सहित आनन्द लीजिये ।माता- पिता को सुखी रखकर नहीं चुकाने वाले कर्ज के ब्याज के रूप में ही सही। माँ- बेटे के रिश्ते की विवशता ही कहिये जिंदगी भर माँ जिस बेटे को समझने की कोशिश करती वो ही बेटा वक्त के साथ क्षीण होती माँ की काया व मन को सुख नहीं दे सकता। कहते है एक माँ कई सन्तानों को संभाल लेती पर सब सन्तान मिल कर भी एक माँ को अच्छी तरह संभालने में ज्यादातर असफल ही रहते है।

आगे बढ़े उससे पहले यही कहना सही होगा:-

“माँ” तेरा नहीं कोई मोल
तूं सदा रही अनमोल
तूं न होती तो
शायद ही बन पाता
जग का ये घूमता भूगोल”

रचियता और लेखक: कमल भंसाली **क्रमश कभी और…..

🏩शायद जिंदगी अब यहां कम रहती🏩कमल भंसाली

हालात कितने बदल गये ?
जिंदगियों के लहजे बदल गये
रिश्तों के निवेदन भी बदल गये
अपनत्व अलसाई सी कली बन गई
मजबूरी हुई तो कभी कभार खिल गई
लक्ष्मी की कृपा जिस पर भी बरस गई
उसे रिश्तों की नई परिभाषा भी समझा गई

इसलिये आज !

घर तो सजे है,शानदार
निर्जीवता का कर श्रृंगार
पर, सुने से रहते इनके द्वार
जैसे रह रहे, सब इनमें बिन प्यार
इंसानी साये नजर आते, कभी कभार
मन्द अंधेरों में हर तस्वीर धुंधली सी लगती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती

दीवारों के हर रंग फीके लगते
घरवालों के सपने बिके लगते
गुलदस्ते के रंग गहन गहरे लगते
सजे फूलो. के चेहरे सब्ज बदरंग लगते
घर का सूनापन ख़ामोशी बयान करते
अपने अब यहां कम दिखते
रिश्ते भी अब कम ही निभते
मेहमान भगवान नहीं लगते
जज्बातों में अहसास नहीं डूबते
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती

बिन जिंदगी, हर सजावट अधूरी
बिन इंसान, नहीं जीवन की धूरी
घर सजाया, जीवन भगाया
कौन सा बड़ा काम किया ?
अपने ही आशियाने को
सुंदरसा श्मशान बनाया
चाहत के गलियारों में,धूप नहीं दिखती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती

सुबह, अलसायी सी कटती
दोपहर, भाग दौड़ में गुम हो जाती
शाम, सुस्ती का फूल थमा जाती
बन्द कमरों से, सिर्फ टीवी की आवाज आती
खाने की टेबल पर, अलग अलग प्लेट सजती
बाहर के खाने से जीभ गुराती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती

बेटे का फोन, माँ मुस्कराती
प्रणाम पर, आशीर्वाद देती
बहु का हाल सास पूछती
पोते का ख्याल रखने का कहती
बहु मायके में सब कुछ बताती
सिर्फ ससुराल से कतराती
सैंया भये कोतवाल गुलछरे उड़ाती
न आने के बहाने करती
हतास निराशा से बत्ती गुल हो जाती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती
हकीकत अब यही कहती
घर, सिर्फ सजते,
देखने में, शानदार लगते
आँगन में कोई परछाई
नजर नहीं आती
हल्की सी आहट पर
बिल्ली भी दीवार फांद जाती
शायद, जिंदगी, अब यहां कम रहती■■◆
रचियता ( कमल भंसाली )

👦”वाह” बचपन 👿कमल भंसाली

” वाह” बचपन प्यारा बचपन लहराता बचपन
भूल कैसे जाऊं नादानियों का सुनहरा उपवन
चंचल शैतान मन और वों मिट्टी से लिपटा तन
बहकते ख्याल, चंचल इधर उधर भागते नयन
वाह बचपन…..

सरसराती पवन और वो बिखरा निखरा नील गगन
उठते गिरते रंग बिरंगे पतंगों में दिल होता तलबी मगन
देख उनकी अठखेलियों खाली जेब भी जरा शर्माती
झूठ बुलवाती,माँ से डाट, पिता से थप्पड़ लगवाती
वाह बचपन…

शैतानियों से भरा जिस्म जब कभी दीवारों से टकराता
नाना नानी याद आते गीत देश भक्ति के ही गुनगुनाते
झंडा ऊँचा रहे हमारा आओ फुटबाल खेले तुम्हारा
ऐसा था बचपन प्यारा हमारा उमंग उत्साह से भरा
वाह बचपन…

फ़िक्र सिर्फ थी ” परीक्षा “जीरो हमारा हीरो
“किताबे” खलनायिका, नकल से मत डरो
चांदनी रातों में अंताक्षरी से शुरु होती बाते
कहानी किस्सो में बीत जाती ठंडी ठंडी राते
वाह बचपन ……

रजाई में सिसकते सपने, भुत प्रेत सब साथआते
हनुमान चालीशा गवाते दोस्त राक्षस बन कर डराते
कभी राम कृष्ण कभी रावण बन अपना डर भगाते
माँ के दुलारे बन उनकी गोदी में निश्चिन्त हों सो जाते
वाह बचपन….

बचपन के रंग प्यारे आज भी रहते रुलाते हंसाते
बचपन के बिछडे दोस्त आज याद बन मुस्कराते
समय के खण्डरों मेंअब भी हम बचपन तलाशते
जीवन के सूखे फूल कभी कभी ऐसे भी महक जाते
वाह बचपन….
रचियता: कमल भंसाली

🌒चन्द्रग्रहण🌓 कमल भंसाली🌕

लाल, मेरे

हाँ, तुम्हीं तो थे
मेरे जीवन नभ् के चन्दा
थे, तुम राज दुलारे
जब मुस्कराते तो
छितरा जाते
मेरे अरमां के सितारे
एक प्यारा शब्द
“माँ” तुम्हारा
खोल देते
खुशियों के बन्धन सारे

मेरे दिल की हर सांस
तुम्हारी धड़कन के साथ चलती
मेरे चेहरे से
तुम्हारी निगाहे नहीं उठती
आज, सच कहती बेटा
अब उनमें
यह “माँ” नहीं रहती
उम्र की दहलीज पर
आँखे झुकी रहती
टूटी कमर
बहुत कुछ सहती
मैं पुकारती
तुम नहीं आते
जब तुम्हें जरुरत होती
तो पुकार लेते
“माँ” कहकर
कोई बिना चूका
कर्ज समझ
सहन कर लेते
इस बन्धन की
कीमत कितनी जल्दी
आंक लेते
तुम समझदार हो गए
माँ बाप को
ढोने का दस्तूर
बेखुबी निभा रहे
हमें ही
बुढ़ापे में
जीने का ढंग
समझा रहे

भोली थी
कीमत अगर
कोख की जानती
तो सच कहती
नौं महीने के कष्ट को
इस तरह नहीं पालती
जिंदगी की शाम
इस तरह नहीं गुजारती
माँ होने की
बेबसी इस तरह
नहीं पहचान ती
परवरिश की कोई भूल
इस तरह सामने नही आती
नहीं जानती
तुम बदले
या वक्त बदल गया
पर कह सकती
मेरा चाँद
बादलों में खो गया
उसके फर्ज को
कोई ग्रहण लग गया
“माँ” होने का दर्द
अंत तक ठहर गया
चन्द्र ग्रहण बन
आँखों को धुंधला गया……..

रचियता : कमल भंसाली

जीवन चिंतन, भाग 1…सही समय, सही चिंतन….कमल भंसाली

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कहते है, “मन” तन का मन्दिर है, आस्थाओं से बनी ही मूर्ति इस में स्थापित की जाती है। कहना न होगा कि मन्दिर की प्रसिद्धि इसकी पवित्रता पर निर्भर करती है। मूर्ति के प्रति पूर्णआस्था से मानव स्वयं को विशेष बना सकता है, यह अनुभव पूर्ण आस्तिक को ही हो सकता है, और, इस पर तर्क वितर्क की कोई गुंजाइस नहीं होनी चाहिए। आस्तिक परिवर्तन में विश्वास रखता है, तथा अपनी विचारधारा में लचीला पन आवश्यकता अनुसार ला सकता है। इससे इस बात पर भी सहमत हो सकते है, कि आशावादी होना आस्तिक के लिए सहज होता है, वनिस्पत नास्तिक के। परन्तु पूर्ण नास्तिक में भी परिवर्तन की थोड़ी संभावना हो सकती है, जब उसके विचारों की सार्थकता कमजोर हो। परन्तु, हमारी आत्मा का केंद्रबिंदु “मन” शरीर की विभिन्न अवस्थाओं से काफी प्रभावित भी होता है, यह एक सहज साक्ष्य है। इसकी पुष्टि हमारे बचपन, यौवन, अधेड़ और बुढ़ापे की अवस्था के विचारों से की जा सकती है।

जीवन तो जीवन है, उसे किसी भी प्रयास से जीने के लायक तो हर प्राणी को बनाना पड़ता है, पर बात उन्हीं की दूर तक की जाती है, जो उसे विशेष ढंग से जीने की कौशिश करते है। मानव को छोड़ कर शायद ही दूसरा प्राणी सामाजिक दबाब में अपना जीवन जीता हो, अतः उनमें मानव से ज्यादा निर्भीकता और हिंसा का भाव देखा जा सकता है। इसलिए मानव मन का विश्लेषण करने के लिए मनोविज्ञान का अविष्कार किया गया। आज दुनिया जितनी बदली वो मानव मन का ही चमत्कार है। यह बात अलग हो सकती है, आखिर दुनिया आज कितनी सहज है ? ऋषि,मुनियों व जीवन विशेषज्ञ गुरुओं ने जीवन के सात्विक पक्ष पर ज्यादा ध्यान इसलिए दिया की मन की चंचलता से इंसान किसी भी प्राणी को नुकसान न पहुंचाने वाले कर्म करे, पर इस चिंतन की पूर्ण सफलता धीरे धीरे कमजोर हो रही है। अति साधनों के विकास ने मानव मन के हर क्षेत्र में अपना कब्जा करना शुरु कर दिया, और आत्मचिंतन की सारी प्रक्रियाओं से उसे उदासीन कर दिया। आज संसार का जो स्वरूप है, आकर्षक है, साधनों से, परन्तु पूर्णतया असुरक्षित सा महसूस कर रहा है। आज हम “आत्मचिंतन” की भूमिका हमारे जीवन के सन्दर्भ में करे, तो क्या हर्ज है, क्योंकि जीवन की संक्षिप्ता से इंकार करना हमारे लिए अंसभव है। जो, जीने वाले क्षणों की श्रेष्ठता तलाश लेते है, उनके लिये आत्मचिंतन की बात साधारण है।

किसी ने कहा ” जीवन क्षण भंगुर है” , ये कितना सही, कितना गलत , हमारा यहां इसको जांचने का कोई इरादा नहीं है, हम इसका भावार्थः अपनी जीवन शैली में अगर खोजे तो शायद हमे महसूस करने में सहायता होगी की “पल” “पल”से शासित जीवन ही हम जीते है। अतः हर पल जीवन अपना नया रुप प्रस्तुत करता है, हमारे विचारो और कर्म के अनुरुप, अतः कोई कहे “जीवन क्षण भंगुर है” तो काफी हद तक सही लगता है। सवाल यह भी हो सकता है, जीवन पल पल से क्यों शासित रहता है ? तो समझने की कोशिश के अंतर्गत हमें यह ध्यान में लाना होगा, शरीर जीवन के लिए जरुर बना है, परन्तु संचालन तो कोई और कर रहा है, जिसे प्रत्यक्ष में हम नहीं जानते वो कौन है, कैसा है, परन्तु उसने हर चेतन में एक ऊर्जा स्त्रोत अवधि अनुसार सबके तन में स्थापित कर दिया, उसी स्त्रोत से शरीर को स्पंदन मिलता है, उसी से चेतना। स्पंदन अपनी दैनिक जरुरत को व्यवस्था निर्देश देता है, तो चेतना कर्म करने की गति, जिससे हमारे जीवन को सार्थकता मिलती है।

प्रश्न किया जा सकता है, जीवन को इतना महत्व क्यों दिया जाय ? तो उसका उत्तर में इतना ही समझना चाहिए, जो चीज बार बार मिलनी शंकित है, उसका मूल्यांकन साधारण स्तर पर करना बुद्धिमानी की बात नहीं होगी। इस सन्दर्भ में मुझे किसी इन्सान की बनाई ये चार पंक्तिया काफी समझदार लगती है।

रोने से किसी को पाया नहीं जाता
खोने से किसी को भुलाया नही जाता
वक्त सबको मिलता है जिंदगी बदलने के लिए,
पर जिंदगी नहीं मिलती वक्त बदलने के लिए !

लिखनेवाले ने किसी भी एवज में इन पंक्तियों का सहारा लिया हो, पर जीवन की उपयोगिता की सही जानकारी का अनुभव हमें कराता है। हकीकत में जीवन में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, “वक्त”यानी “समय” यानी वही “पल”जिसका जिक्र हमने ऊपर किया। कहा भी गया है, जिसने समय को नहीं समझा, वो जीवन क्या समझेगा ? इसलिए पहला चिंतन हमारा “समय” के लिए होना चाहिए। हमारा दैनिक जीवन ही हमें हर दिन एक आयाम की तरफ अग्रसर कराता है, वो आयाम हर इंसान अपने विवेक से करता है। आयाम का सही और गलत होना, उसीके चिंतन पर निर्भर करता है। एक आयाम के कई पहलू हो सकते है, परन्तु उनमे आपसी तालमेल नहीं हो तो चिंतन उपयुक्त्त हो सकता है, चिंतन में विरोधभ्यास न हों तो उसकी निर्थकता ही सामने आती है, हम अपने अंदर के किसी भी तत्व का गलत सही का मूल्यांकन स्थापित नहीं कर सकते । समय का दुरुपयोग सही चिंतन में अपरिवक्ता के अंतर्गत ही माना जाता है। चिंतन समयनुसार समस्याओं के अनुरुप तभी सार्थकता प्रदान करता है, जब अच्छाइयों और बुराईयों की तुलना प्राणी कर सके। गलती करना उतना नुकसान नहीं करता, जितना गलत होना।

समय जीवन को गति और अवधि दोनों का बोध बड़ी मृदुलता से कराता है, और हमारे कर्म को परिणाम भी मुहैया कराता है। देखा जाय तो एक माँ की तरह व्यवहार करता है, जिससे हम समझ के साथ जीवन जीये। जब साधनों का विकास धीमा था, उस समय जीवन चिंतन करता था, झूठ क्यों बोलू ! आज जीवन चिंतन कम करता, सुविधानुसार झूठ का प्रयोग करते संकोच भी नहीं करता ? क्या समय की गति बदल गई, शायद नहीं, जिंदगी अति शिक्षित हो गई, साधनों के मामले में। साधनों की भूख से इंसान लालच के घोर अँधेरे में चिंतन के नैनों पर पटी बाँध अर्थ की दौलत खोजने में लग गया। परिणाम मानवता जीवन की ऊंचाइयों से फिसल रही है, पता नहीं किस गति से जल्द ही गर्त से गहरी खाई में समा जाए। हम समझते है, कुछ अविष्कारों से जीवन को बदल सकते है, काफी सही है, परन्तु यह भी सही है, प्रकृति सब अविष्कारों के दुष्परिणाम सहन कर लेती है, परन्तु जब वो अपना विरोध किसी भी रुप में दर्ज कराती है, तो हम दहल जाते है। भूंकप को ही लीजिये, एक सेकेंड का हमारा अनुभव हमसे क्या नहीं करा देता ? समय और प्रकृति का रिश्ता माँ- बेटा का है, माँ अपने बेटे का ज्यादा दुरुपयोग एक सीमा तक ही सहन करती है, ये समझने और चिंतन की बात है।

जीवन को सत्य से ही समझना पड़ता है, झूठ हमें छलावा ही देता है। जब तक हम उसको नहीं समझते, जिसके कारण हम इस धरती पर है, तो हम जब गौण होंगे, तो शायद कहीं और उसकी कीमत चुकानी ही है, आखिर अर्थ शास्त्र को तो हम सही ही समझते है, ना….आइये चिंतन करते है, फिर एक बार अपने जीवन को सही पथ पर वापस कैसे मोड़े ?, अगर हमने अपनी किसी कमजोरी के अंतर्गत गलत कदम किसी गलत राह की तरफ रख दिये हो, तो। सुबह का भुला शाम को अगर घर वापस आ जाये, तो उसे भूला कहां कहते है ? आखिर, हम अनूह तो नहीं है। ….क्रमश …..कमल भंसाली

चलते चलते …पढ़ लेते है, Richard Aedon का यह सन्देश… “All photos are accurate. None of them is truth”.

“आशीर्वाद ” अमृतमय ऊर्जा प्रदाता■■■कमल भंसाली■■■

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“आशीर्वाद” एक ऐसा अमृतमय शब्द है, जिसकी चाहत हर कोई इंसान अपने जीवन की शुभता के लिए करता है। इस शब्द की सबसे प्रमुख विशेषता है, कि ये किसी भी मानवीय सीमा रेखा से बंधा नहीं रहता। इस शब्द को मानो कोई अमृतमय वरदान मिला है, इसका विरोध कोई भी जाति, धर्म, परिवेश, क्षेत्र, समाज और भूमिमण्डल का कोई देश नहीं करता है। ऐसा क्या है, आशीर्वाद में और क्यों इसे हम इसे जीवन पूरक तत्व के अंतर्गत लेते है, जरा इसका अध्ययन करने की कोशिश करते है। इसकी सम्पूर्ण विवेचना करना किसी के भी वश की बात नहीं है, अगर आपके पास इस लेख के अलावा भी कोई जानकारी है, तो उसे इसमे सम्मलित समझ कर ही इसे पढ़ने की चेष्टा करे।

आशीर्वाद शब्द की अगर हम सबसे पहले विवेचना करे, तो शायद हमारी सही शुरुआत हो, इसलिए हम यहीं से प्रारम्भ करते है। आशीर्वाद यानी आशीष या असीस, ये तो हुआ इसका शाब्दिक अर्थ, परन्तु ये उन शुभ विचारा से जुड़ा है, जिनसे हम दूसरों से कुछ आत्मिक प्रोहत्सान लेते है, या किसी को देते है। इसकी विवेचना भी हम जरुर करेंगे, पर धीरे धीरे। सबसे पहले हमें ये जानकार आश्चर्य हो सकता है, कि ” आशीर्वाद” एक अकेला शब्द है, इसके समकक्ष कई और शब्द हो सकते है। परन्तु यह जान कर जरा हैरानी हो सकती है कि इसका कोई पर्यायवाची और विलोम शब्द नहीं होता है। अतः इसकी शुभता पर हमारी कभी कोई शंका नहीं होनी चाहिये। चूँकि इस शब्द की पवित्रता पर कोई सवाल नहीं है, अतः आशीर्वाद हर देश में प्रयोग दैनिक जीवन में कई बार किया जाता है। हालांकि हमारा मोह अंग्रेजी भाषा से, अपनी धरोहर भाषा से ज्यादा है, परन्तु “आशीर्वाद ” हम ज्यादातर अपनी ही भाषा में देते है।

आशीर्वाद की कई विशेषताओं में एक विशेषता यह भी है, कि यह सिर्फ हमें उम्र से बड़ों से मिलता है, सिर्फ गुरु ही एक इसका अपवाद है, जो हमसे ज्ञान में बड़े होते है, इसे हम उनसे भी ले सकते है,। आशीर्वाद है, ही ऐसा है, जिसकी शुद्धता पर हम कोई प्रश्न नहीं कर सकते। आशीर्वाद सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं है, इसमे देनेवाले की आत्मा की पवित्र ऊर्जा भी होती है, जो लेनेवाले के भाग्य के नवनिर्माण में सहयोग करती है। आशीर्वाद का भारतीय संस्कृति में सबसे उच्च स्थान हासिल है, इसलिये जन्म से ही बच्चे को आशीर्वाद देना शुरु हो जाता है और बचपन से उसे प्रणाम करने की आदत डाली जाती है, जिससे उसे आशीर्वाद मिलता रहे और उसका जीवनपथ आसान हो जाए। हमारे यहां बड़े बुजर्गो और गुरु के आशीर्वाद का बहुत महत्व है। भगवान को हम सब किसी ने किसी रुप में अपना जीवन ईष्ट मानते है, और उनके आशीर्वाद के लिए लम्बी लाईनो में खड़े होते है। परन्तु हमारी संस्कृति में गुरु महिमा को अम्परम्पार माना गया है, क्योंकि वो ही उस तक के वापसी सफर का सही रास्ता दिखाने की कोशिश करते है,अतः गुरु का दर्जा काफी उच्चस्थान पर है। हकीकत में सही भी लगता है, क्योंकि बिन गुरु ज्ञान पाना आसान नहीं होता और बिना ज्ञान का जीवन, “जीवन” नहीं कहलाता। इस सन्दर्भ में महान संत कबीरदास का जिक्र करना सही होगा, उन्होंने कहा ” गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पॉय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय”। पर क्या आज के युग में गुरु के प्रति इस दृष्टिकोण से विचार किया जा सकता है ? यह एक चिंतन की बात है, जिसका जबाब आज के आर्थिक युग में तलाशना व्यर्थ होगा। आज हमलोगों को ज्ञान की नहीं जीवन तकनीक की जरुरत ज्यादा है, और तकनीक खरीदी जाती है। अतः जिसकी कीमत तय हो, वो कीमती जरुर कहला सकती है, पर वह विशिष्ट नहीं हो सकती, यह भी तय है। विशिष्ट बिना “श्रद्धा” का पैदा होना, वो भी आत्मा में, कठिन काम है।

आशीर्वाद को अंग्रेजी में BENEDICTION कहते है, इसे इंग्लिश में और भी कई शब्दों में लोग व्यक्त करते है, उसमे bless (noun), Wish ( Verb), Valedictory (Adjective) परन्तु ये सहयोगी शब्द है, पर्याय नहीं। हिंदी में आशीर्वाद का संक्षिप्त अर्थ किसी की मंगलकामनाओं के लिये बडों की ओर से कहे हुए शुभ वचन समझना ही सही होगा। चूँकि हमारा लक्ष्य इसके महत्व को जानना ज्यादा है, और आशीर्वाद का अर्थ हमारे दिमाग में बचपन से सही समाया हुआ है। हम अब जरा आगे बढ़ने की सोचते है।

हमारे जीवन को जो सबसे पहला आशीर्वाद मिलता है, “वो” ही देता है, जिसने इस धरा के लिए हमें निर्माण कर भेजा है। हमें भी उसका तहदिल से शुक्रगुजार होना चाहिए, और उसकी पवित्रता का आभास करने के लिए रोज उसका नमन करना चाहिए। माँ ही वो देवी है, जो हमें पनपने के लिए नौ महीने अपनी देह में जगह ही नहीं प्यार भरा आशीर्वाद, “स्वयं” बिन मांगे देती रहती और सभी से हमारे कोख में सलामती, और सही जन्म के लिए दूसरों से आशीर्वाद लेती। जिस घर में प्रेम का आँगन होता है, वहा परिवार का हर सदस्य जैसे दादा, दादी, बड़े बुजर्ग सदस्य हमें जन्मते ही आशीर्वाद देना शुरु कर देते है, हकीकत यहीं है, इस प्यार से ही हमारी जीवन समझ शुरु होती है। ध्यान देने की बात है, जन्म तक हमे कितने बिन मांगे आशीर्वाद हमे मिलते है, पता नही हम बड़े होकर उनका मूल्य क्यों नही समझ पाते। पिता और गुरु का आशीर्वाद सहजता से प्राप्त होना थोड़ा मुश्किल होता है, क्योंकि ये जीवन संस्थापक की भूमिका करते है, और इनसे कटु अनुभव प्राप्त होते है,,जो जीवन को आगे सहज और सरल करने में श्रेष्ठ होते है। इनके प्रति अगर आस्था हमारी नहीं हो तो निश्चित है, यह व्यवहारिक आशीर्वाद दे देंगे, परन्तु आत्मिक नहीं और उसके बिना सही ज्ञान मिलना मुश्किल काम है। इन दोनों रिश्तों को चाहिए, नम्रता और आज्ञा पालन और दोनों जरुरी है, सही, सुंदर और समृद्धिमय जीवन के लिए। जिनको आशीर्वाद की कीमत में आस्था नहीं होती उनके लिए यह सम्बन्ध कमजोर होते है, और उनको कोई विशेष उन्नतमय जीवन हासिल भी नहीं होता, यह तथ्य है, स्वीकार या अस्वीकार की इसमे कोई भूमिका नहीं है।

आशीर्वाद एक ऊर्जा है, इसका संचालित अनुभव हमारी आत्मा करती है। तथ्य यही कहते है, अगर हमारी आस्था इससे जुडी होती है, तो सुखद परिणामों की प्रतीक्षा ज्यादा दिन नहीं करनी पड़ती। किसी विशेष प्रयोजन या उद्धेश्य के लिए चाहा गया आशीर्वाद प्रयास में मृदुलता जरुर करता है, हालांकि परिणाम तो वक्त की मेहरवानी और अपनी सक्षमता पर निर्भर होता है। आशीर्वाद को कभी भी प्राप्त वरदान नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये मनुष्य की क्षमता के बाहर है। फिर भी , राजा महाराजा क्या देवताओं तक इसकी महिमा है। आशीर्वाद के परिणाम गौण जरुर रहते है, पर शुभता में इसका होना तय है। नम्रता से अगर दुश्मन से भी आशीर्वाद लिया जाय तो वो भी इंकार नहीं करते। इसका उदाहरण महाभारत के उस प्रकरण में हमें नजर आ सकता है, जब अर्जुन भीष्म पिता से आशीर्वाद उसी युद्ध की विजय के लिए मांगते है, जिसमे वो अर्जुन के विरुद्ध युद्ध करनेवाली सेना के सेनापति थे। परन्तु आज हम यह नहीं कह सकते कि ऐसी परिस्थितयों में ऐसा आशीर्वाद मिलेगा, इसका एक ही कारण है, हमारे जीवन से नैतिकता का गायब हो जाना।

आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए हमें नम्र बनकर प्रणाम और प्रार्थना दोनों की जरुरत होती है। जब हम अपने इष्ट से आशीर्वाद लेना हो तो आत्मा की पवित्रता जरुरी होती है, उसी पवित्रता से हमको प्रार्थना और प्रणाम के स्वरुप जो आशीर्वाद मिलेगा, वो हमें सकारत्मक बनाकर किसी भी क्षेत्र की सफलता की तरफ निश्चिंत आयाम जरुर प्रदान कर देगा। बड़ों से आशीर्वाद पाने के लिए हमेंअभिमान को दरकिनार करना होगा,और सम्मान सहित उनके चरणों को छूना होगा। कई वार हमारे हाथ उनके चरणों तक नहीं पहुंचते आधी दूर ही रहते, किसी भी कारण से, तब शायद इससे वो परिणाम नहीं प्राप्त हो सकते, जिनका पाना हमारा लक्ष्य था।

अंततः यह जानना भी उचित ही होगा, कि शुभकामना, मंगलकामना, भी जीवन उपयोगी है, अगर किसी की आत्मा की गहराई से आती हो पर ऐसा होना हर समय संभव नहीं होता क्यों कि ज्यादातर हम इनका व्यवहारिक प्रयोग ही करते है। मजबूरी है, मिलती है, तो कह देते है, अर्थ की दुनिया में आखिर दिखावटी सम्बंध भी तो कोई चीज है।…….कमल भंसाली

●●●नया साल, तलाशते आयाम●●● 【कमल भंसाली 】

आज, हर पल को हम नव पल्लवित करेंगे
नये साल में इनको ही, चारों ओर उन्नत करेंगे
नई आशाओं से जीवन को नया आयाम देंगे
ह्र्दय से देश को सुख, शान्ति का पैगाम देंगे

देश है हमारा, इस जीवन का आशियाना प्यारा
अपने ही घर में हमसे ही न उछले कोई चिंगारी
स्वस्थ माहौल में रहकर हम यह विचार करेंगे
सुखी रहे हम देशवासी, इसका इंतजाम करेंगे

छोटी छोटी बातों से न हो दिल हमारा, ह्र्दयघाती
न ही करेंगे ऐसे कर्म जिससे दुनिया कहे,जज्बाती
देशप्रेमी बन, इसकी सुखी समृद्धि की बात करेंगे
किसी भी बात पर मतभेद हो हजारों, पर न बटेंगे

माँ भारती की हम सन्तान, संस्कारो का दूध पीया
तब खून खराबे क्यों करे, अहिंसा का अमृत पिये
मेहरवानी उसकी, देश को हर संसाधन से सजाया
मन से इसको समझ, गरीबी का भूत दिल से भगाये

साल जितने भी आये, अब इस पल में सम्मलित हो जाए
इस पल की खेती करे, जीवन हमारा महक महक जाए
हम इस देश के वासी, आओं, आज प्रण एक एक कर जाए
वतन हमारा पल पल में निखर, एक सत्य शिखर बन जाए

★★★★■

कामना भी एक, मनोकामना भी है, एक
जन्मों जन्मों रहे, देश हमारा, यही एक
★★★★★
हर जन्म में राष्ट्र गीत गाये, तिरंगा को सदा लहराये
देश प्रेम का धर्म ही, कर्म बन चारों और बिखर जाए

( आनेवाले नये साल की मंगलकामनाओं सहित…..कमल भंसाली )

मूल्यांकन स्वयं का…सम्बंधों के सन्दर्भ में…भाग 1 ★★कमल भंसाली ★★

स्वयं को चिन्हित कर, स्वयं का मूल्यांकन करने वाले विरले ही महापुरुष होते है। दूसरों के व्यक्तित्व और उनके कार्य पर नजर रखने वाले सब जगह नजर आते है, हो सकता है, हम भी उनमें से एक हो ? अगर ऐसा है, तो निश्चित है, हम एक कमजोर व्यक्तित्व के मालिक है। हमारा जीवन बिना किसी सार और उद्धेश के चल रहा है। क्यों नहीं हम आज विचार करे, हम अपने व्यक्तित्व को सही और शुद्ध कसौटी पर परखे। समय रहते, अगर हम अपनी कमियों को समझले, और उन्हें दूर करने की चेष्टा करे, तो हो सकता हम अपने जीवन को एक सही पहचान दे सके।

हमें मानने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, कि हम इस धरती के साधारण से इंसान है, और हर आती जाती सांस के मोहताज है। परन्तु जब जीवन मिला है, तो कोई उद्धेश्य इसमे भेजने वाले का जरुर है, नहीं तो हमें वो और किसी दूसरे रूप में भी भेज सकता था। इंसानी जीवन मिलना कोई साधारण बात तो है, नही, यह हमारा प्रथम चिंतन हमें प्रेरित करता है, कि हम अपना स्वयं मूल्यांकन समय समय पर करते रहे, पर हम करते नहीं, क्योंकि हम अपने को इसका दावेदार नहीं समझते। इस भूल का सुधार हम जितना जल्दी करेंगे, उतना जल्दी ही हमारा जीवन आत्मिक आनन्द प्राप्त करना शुरु कर देगा। किसी एक क्षेत्र की सीमित सफलता चाहे हमें महान न बनाये, पर गरुर और अभिमान कि परत हमारे व्यवहार पर लगा देती है। इस से बचने वाला इंसान बहुत दूर तक की यात्रा सहजता से करता है। अभिमान जिस मानवीय व्यवहार को प्रभावित करता है, उन्हें हम सम्बंध या रिश्ते भी कहते है। आज हम इसी बाबत कुछ चिंतनमयी चर्चा संक्षिप्त में करे, तो क्या हर्ज है ?

हर जीवन यात्रा, माता के गर्भ से शुरु होती है, हर प्राणी की, पिछले जन्मों का लेखा जोखा का भी उसमे असर होता होगा। परन्तु, बिना प्रमाण उस पर बहस करने से अच्छा है, हम इस जन्म को सार्थकता प्रदान करे, और जीवन उद्धेश्य को समझने की कोशिश करते रहे। कहते है, प्रथम कदम से ही इंसान को समझ मिलनी शुरु हो जाती है। उसेअपनी शारीरिक पूर्णता और क्षमता का अहसास हो जाता है, वो अपनी भूख की पहली ललक से समझ जाता है, उसे इतने दिन कहां आश्रय मिला था, और दुनिया के प्रथम, स्नेहशील, विशुद्ध प्रेम का अनुभव, वो माँ के आँचल के अंदर पाकर, इस जीवन के प्रति आशस्वत हो जाता है, और वो अपनी दैहिक और कुछ हद तक मानसिक प्रगति की तरफ अग्रसर होने लगता है। माँ के स्नेह भर प्यार का अहसास के बाद उसे जो पूर्ण सुरक्षा का अनुभव होता है, वो होती है, पिता की बांहे, जहां उसे दैनिक अनुभव से अहसास हो जाता कि माँ और पिता के अनुबन्ध का वो एक उपहार है, जिसमें वो अपना भविष्य अवलोकन करता है, और उसे अपनी प्रगति और सुरक्षा के आश्वासन का अहसास हो जाता है l चूँकि उसे संसार में अपनी भूमिका को स्वयं ही ढूंढना है, वो उसकी तलाश में समझदार होकर अपने जीवन की मकसद यात्रा शुरु कर देता है, धीरे धीरे प्रकृति उसकी सारी प्रारम्भिक बाहरी सुरक्षा सुविधा वापस लेनी शुरु कर देती है। यहीं से वो अपने संस्कार, ज्ञान, बुद्धि, विवेक से अपनी स्वयं की जीवन यात्रा प्रारम्भ कर देता है। जैसे कोई भी यात्रा में असुरक्षा का खतरा रहता है, वैसे सही जीवन यात्रा भी काफी कठिन होती है, खतरों से भरपूर होती है। इसे सुलभ और सुखद बनाने में एक रक्षा कवच की तरह काम करता है ” सम्बंध “।

सम्बंध की परिभाषा जीवन के हिसाब से इतनी ही बनती है, जब हम विपरीत परिस्थितयों में गिरने लगते है, तो सहीं सम्बन्ध दीवार बन गिरने नहीं देता। बाकी सम्बन्ध या तो रिश्ते होते है, या व्यवहारिक कार्य क्षेत्र से बनते है, कुछ सम्बंध शरीर के लिए कुछ आत्मा के लिए, कुछ दिल के होते है। हर सम्बंध का अपना क्षेत्र होता है, उसी के अनुरुप ही हमारे जीवन की उनकी जरुरत होती है। सारे सम्बंधों की कड़ी आपसी व्यवहार से जुड़ी होती है, सम्बंध का बनना और बिगड़ना इसी पर निर्भर करता है। सम्बंध का स्वास्थ्य भावना और वाणी पर ज्यादा निर्भर करता है। हमें सम्पन्न और स्वस्थ जीवन के लिए सम्बंधों की भूमिका पर सदा ही गौर करना चाहिए। सम्बंधों की मजबूरी भी होती है, प्रेम के धागे के दो क्षोर होते है, प्रेम पर जब जरा सा आघात दोनों में से कोई भी करता है, तो सम्बंधों की डोर कमजोर होती है। ये तो, हम सभी जानते है, संवेदनशील कई धागों से कोई डोरी या डोर बनती है। इन धागों की विश्वस्ता पर ही उसकी मजबूती निर्भर करती है। इसलिए हर सम्बन्ध का जीवन के सन्दर्भ में समय समय पर मूल्यांकन जरुरी होता है। हर सम्बंध की आस्था को टटोल कर ही कोई नजदीकी सम्बंध बनाना चाहिए। सावधानी बरतना भी उतना ही जरुरी है, जितना सम्बंधों को मधुरता देना। एक गलत सम्बंध जीवन को भी खतरा दे सकता है। सब मिठास भरे सम्बंध असली नहीं होते, समय समय पर कसौटी पर कसने से ऐसा अनुभव भी किया जा सकता है। कुछ सम्बंध कडुवे भी कभी लगते है, जैसे पिता, गुरु या सही दोस्त या शुभचिंतक का, उन पर हमें विश्वास करने का कारण ढूंढना चाहिए क्योंकि किसी समझदार ने कहीं लिखा है, ” रिश्तों की बगियां में एक रिश्ता, नीम के पेड़ जैसा भी रखना, जो सीख भले ही कड़वी देता हो पर तकलीफ में मरहम भी बनाता है”।

सम्बंधों का मनोविज्ञान जाने बिना सम्बंधों की सही विवेचना करना मुश्किल होता है, आइये संक्षिप्त में उसको भी जानने की कोशिश कर लेते है। हर वो रिश्ता खरा है, जो विपरीत स्थिति में हमारा साथ बिना किसी शर्त के निभाता है, ऐसे रिश्ते का अहसान और गरिमा को कभी भी खण्डित नहीं करने की सोच ही, सही सोच है। समय कठिन दौर में चल रहा हो, रास्ता नहीं दिख रहा, सत्य के साथ ऐसे सम्बंधों से राय लेने में कोई हर्ज नहीं है, और अगर वो सहयोग कर रहे है, तो उस सहयोग का सही उपयोग करना चाहिए, स्थिति सही हो जाये तो तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हुए, उन्हें उनका सहयोग वापस कर देना उचित होगा। कहना न होगा, आज के आर्थिक युग में अर्थ की कमी के सन्दर्भ में ही उपरोक्त कथ्य सही है।

सम्बंध शब्द सम और बन्ध दोनों का संयुक्त उद्बोधन है, जिसका मतलब ही होता है, समान सम्बंध इसी दृष्टि से हर सम्बंध को निभाया जाना चाहिए, गरिमा अनुसार। अर्थ की कसौटी पर किसी भी सम्बंध या रिश्ते को परखा जाता है, तो उसमे प्रेम की मात्रा ढूंढने का साहस कम ही लोगों में होता है, और निश्चित है, उनके पास भरपूर ज्ञान है, क्योंकि वो जानते है, अर्थ का वक्त कभी भी बदल सकता है।

हालांकि रिश्तों की तासीर में नजदीकी ही मुख्य है, परन्तु कुछ दुरी का पर्याय होना भी आवश्यक है। सत्य को पूर्ण नंगा देखना मुश्किल काम होता है, क्योंकि आँखे सहन नहीं कर सकती। कुछ आवरण हर सम्बंध की जरुरत है, अतः गरिमानुसार ही व्यवहार ही उचित होता है, इसमें वाणी और शब्द ही सम्बंधों की इज्जत अपने रुत्बों के अनुसार तय करते है, अतः सबंधों को अमृतमय बनाने है, तो अभिमान को दूर रखकर उचित भाषा का प्रयोग श्रेयस्कर होता है। …..क्रमश…..कमल भंसाली