👽दर्दीली जीवन संध्या👽कमल भंसाली

दोस्तों,
नमस्कार,
हम मनुष्य है, जीवन का यह स्वरूप जब तक मोहक रहता तब तक जिंदगी खुशनुमा गुलिस्तान कि सैर करती, अपने होने पर गर्व करती। पर कहते है, ना, अति हर का अंत होती है। बनाने वाले ने मनुष्य में मनुष्यता नष्ट न हो, इसलिए समझदारी से उसके जीवन को अवधि प्राण देकर सीमितता का अनुभव करने का संदेश अपनी तरफ से दे दिया। भारतीय जीवन शैली ने इसे बड़ी समझदारी से स्वीकार किया और पारिवारिक सम्बन्धों को विनम्रता भरे संस्कारों के हाथों में सौंप दिया। पर, बदलते समय की तेजी से मनुष्य का दिमाग संस्कारों को छोड़ ” पूर्ण स्वतंत्रता” की तरफ भाग रहा है, कहना न होगा ये दौड़ उन्हें मानवीय संवेदना से दूर कर सकती है और एकाकी जीवन के सारे दर्द उनकी झोली में डाल सकती है।परन्तु कहते है ना, दौड़ में इसकी परवाह कौन करे ?
प्रस्तुत कविता आज की तरफ़ प्रस्तर होती इन्ही समस्याओं का समाधान तो नहीं पर संकेत जरूर देती है, जीवन सन्ध्या सिर्फ आधुनिक साधनों के सहारे बिताई नहीं जा सकती । आप कभी किसी वृद्ध आश्रम कदम रखिये, आपको समझ में आ जायेगा कि संसार का स्वरूप और स्वभाव कितनी तेजी से बदल जाता है। ये भी शायद आपको समझ में आ जाये कि आज की मंजिल आधुनिक भले ही हो, पर बिन संस्कार भरे अहसास की दौड़ है, जिस में सिर्फ तन्हाई और पश्चाताप है। माफ कीजियेगा, अगर कहीं आप इससे सहमत नहीं तो निश्चित है, ये कविता आपके पढ़ने के लिए उपयोगी नहीं है, इसका मुझे खेद है।✍ कमल भंसाली✍

कभी, उम्र के अंतिम पड़ाव पर
खड़ा होकर
जीवन संध्या के क्षितिज को निहारता
तो, अवनी पर
लड़खड़ाते कदमों के लिए
सहारा तलाशता
दीवारों के भी कान होते
कभी दे देती
पर जिन पर करता गरुर
“वो”
मेरे इसे बुढ़ापे का दर्द कहते
क्योंकि वो अभी बेदर्द रहते
कुछ भी कहे “वो”
मेरे अपने बीते सपने है
कहना उनका हक
सुनना मेरी मजबूरी
समझता ज्यों उम्र बढ़ती
अपनेपन की खुशबू घटती
पर मैं तो यही मानता
जीना मुझे नहीं आता
हकीकत तो यही है
दोस्त
कुछ सांसे
आज भी मेरे साथ
वरना
अब कोई वजह भी
साथ नहीं निभाती
बिन वजह
जिंदगी
हर दम उदासी की छांव तलें
अंतिम क्षण की
नगण्य भूमिका निभाती….

गीत जिंदगी
जिनके आज तक गाती
वो सब सुर
अब पराये लगते
गले लगकर रोने के साधन
अब बेजान लगते
जितने पन्ने आज तक लिखे
उनके अक्षर धुंधले
गहरे मटमैले
स्वाह जीभ के नीचे
दबे बुदबुदाते
क्षीण होती काया को कंपकपाते
अपनेपन की स्याही
सूख जाने से
शायद अपने लिखे सुंदर शब्दों
के रंग भी बदल जाते
दस्तूर है, शायद
जो वो भी निभाते….

दुखः न समझना
इसे सिर्फ मेरा
कल की बुनियाद
में छिपा है, आज का अंधेरा
कठपुतली का खेल
संसार के मंच पर अव्यावृत
हार इसमें परिमित
मै तो खेल हारा
दुआ करूंगा
बचा रहे सब का
अपना सुरमई सवेरा
रिश्तों को अतिरेक प्यार
अदृश्य हो रहे सदा तैयार
ऐसा अनुबन्धन मन का हो
“मुझसे ज्यादा जग होशियार”
ये ही जीवन जंग का सही हथियार
आखिर मानते हो ना
मरिचिकाओं का जंगल है, संसार
“दोस्त” फिर एक बार कहता
“हार न करना कभी स्वीकार”
आखिर, इस पथ के एक दिन है, सब दावेदार….
रचियता 👉कमल भंसाली👈