दिल कुछ कह रहा …कमल भंसाली

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मुसाफिर, दिल, मेरा
कब, कहां, रुकता
इस को चलना, ही आता
भागने से डरता
कदम, कदम पर
सांस भरता

संभाले रखता, जीवन डोर
काली रात हो, या सुरमई भोर
मोतियों जैसा, धवल
तन का यह, “कमल”
खिलना ही जानता
खुशियों में ही, हंसता
बाकी, सारा जीवन, रोता
कभी तो, कह भी देता
बिना, तनाव जी लों
नहीं तो, मेरा
सन्तुलन बिगड़ जाता
मै गिर गया, अगर
तो, तुम्हारी बिगड़ जायेगी
तबियत,की डगर

दुखी जब, होता
तो, तन्हा गाता
मुझे बनाया, गया
तुम्हारे लिए
तुम जियों
मेरे लिए
मै, जीता
तुम्हारे,हर पल के लिए

एक दिन की बात
शायद थी,
दर्दीली रात
हर पहलू में
दर्द समाया
मन घबराया
तब दिल निकल
सामने आया
कहने लगा
मुझे, समझाने लगा

नाम दिए, मुझे
वो भी कोमल
ह्रदय और दिल
सब अंग का
करना मुझे ख्याल
थोड़ी, मेरी
जिम्मेदारी समझो
अच्छी सी करो
मेरी देख भाल
दिमाग को कहो,
बुरी आदतों को संभाल
हाथों को कहो
गलत हरकत न करे
पैरों को कहो
आलस से न पसरे
पेट को कहो
तामसी भोजन से डरे
जिह्हा को कहो
संयमन करे
आँखों को कहो
निर्भीकता भरे
होठों से कहो
मधुरता झरे
कानो से कहो
शुद्ध श्रवण करे
हर अंग
तुम्हारे तन का हिस्सा
उन्हें, सही समझाना
तुम्हारा धर्म
सही संभालना
मेरा कर्म
दोनों का संगम ही
दर्द को दूर, रखेगा
आएगा, तो
दस्तक देके, चला जाएगा…..कमल भंसाली

वाणी..मधुरता की रानी

“वाणी”, तुम तो मधुर हो
“मैं” ही, कभी कर्कश हो जाता
तुम तो ह्रदय वीणा हो
मन ही, कभी नगाड़ा बन जाता

तुम दृश्य को नयनभिराम
की ऊर्जा प्रदान करती
कभी क्रोध में आँखे ही
उसमें काला रंग डाल देती

उदर के संग रहकर भी
तुम, अमृत संचय करती
स्वाद वशीभूत हो, जीभ
अपच जहर, उगल देती

तुम “पवित्रआत्मा” से “सत्य”
का सदा आश्रीवाद लेती
भ्रमित आत्मा, प्रदूषण कहकर
झूठ के आवरण से बाँध देती

सन्तों और ज्ञानियों ने तुम्हें
सदा माना प्रभु की रानी
कुछ “स्वार्थों” ने बना दिया
तुम्हें काया की नौकरानी

क्या कहूं, आत्मा का “अंहकार”
अंधकार ही पसन्द करता
बाकी तुम्हारी चमक से तो, सारा विश्व्
आत्म विश्ववास से,” मुस्कराता”

भूले दिमाग कि, सदा अनजान रही
तुम तो साथ, रोज निभाती रही
फिर भी, जीवन पथ को संभाल
“आलोक”का दर्शन, कराती रही

जब सरस्वती बन निकलती हो
ह्रदय को सरगम बना देती हो
न समझे अंतरात्मा, तुम्हारी मृदुलता
तब सहम कर, तुम चुप हो जाती हो

तय है, तुम सदा रहोगी महान
मैं ही यहां का, “अजनबी मेहमान”
तुम्हारी चर्चा करेगा, सारा जहां
आज “मैं”यहां, पता नही कल कहां…..

कमल भंसाली