उम्र का दर्द

खोयी सी चांदनी
बिखरा सा मन
अधूरी सी अछूती
एक अहसासी चुभन
और वो तम्हारा
सहर्ष स्पर्श का स्पंदन
आज भी ढूंढ़ता
निष्कासित सा जीवन

तह किये हुए पन्ने
उड़ उड़ कर बिखर रहे
यादों की औस से
भिग भिग कर सहम रहे
जो कल तक मेरे थे
आज वो दूर हो रहे
कुछ के तो अक्षर
तक ओझल हो रहे

अनपेक्षित स्मृतियों के अवशेष
हल्की धुंध सी लकीरे
कभी कभी बीते क्षण संवारे
तब तुम्हारे संग बिताये
मानस पटल पर रंगीन
पल को हल्के से उतारे

तीखे नयनों की मकबूलियत
हया से संवरी तुम्हारी सूरत
मकरंद सी मेरी ख्व्वायिसे
जब याद आते प्यार के किस्से
तुम न जानों कितने मुश्किलें देते
फिर से परिभाषित होने वाले
मखमली दिल के कितने हिस्से

उम्र की सीमा रेखा
तनाव देती कितना तीखा
परिधि में बांधते
संस्कारित रास्ते
दर्प का जिया जीवन
कितना झुक जाता
याद करा रही है
उम्र की बची अधूरी
आहत भरी जीवन रेखा

अंत का इंतजार
जानता हूँ न होगा बेकार
मौत का संकित पुंज
तमस में बेठा है साकार
आज नही तो कल
पा जाएगा अपनी मंजिल
दर्द की कई सीमाओं को
लांघ जाएगा, विचलित मन
अलविदा,तुम्हे कह जाएगा
असहाय हुआ, यह तन……

कमल भंसाली