आधुनिकता का पेड़……कमल भंसाली


आधुनिकता का पेड़ लगता, बहुत ही लुभावना
पर तय है, तन, मन को ठंडी छांव तो नहीं देता
बातें, कितनी ही सुंदर कर ले हर दिल अजीज
पर, अंजाम तो मन से हर कोई कभी नहीं देता

सुहानी सुबह में मांगे, तन प्रकृति की सैर
यहां भी मखमली गद्दे निभाते, अपना बैर
अधखुली, आँखों में छाया रात का नशा
न जीवन बदलने देता, न ही तन की दशा

असत्य की चौखट पर बैठकर, सत्य का इंतजार
दीपक के तले प्रकाश खोजना है, गलत प्रकार
सूरज कि रश्मियों में कितने रंग, पर चलती संग
विस्तृतता की गलियों में, मानव मन ही हुआ तंग

अस्तित्व को स्वीकारता, पर स्वयं को नहीं पहचानता
शर्म की लक्ष्मण रेखा लांघने को ही, स्वतंत्रता समझता
अभिमान के सारे प्रसाधनों में ही, सुंदरता को तलाशता
परन्तु, नैतिकता की कसौटी पर, कभी खरा नहीं उतरता

मूल्यांकित करे जीवन, जब आधुनिकता का निकंदन
चंद खुशियों के लिए, कृत्रिमता का ही क्यों हो अभिनंदन
वर्तमान में जीना सही, पर प्रकृति के भी होते कुछ उसूल
कभी देखा है धरती ने उगाये हो जागृत कागज के फूल

आधुनिकता सही वो ही है, जो जीवन सुंदर बनाये
शिक्षा वो ही सही, जो पर्यावरण को स्वच्छ बनायेे
साधन वो ही सही जिससे तन मन सदा स्वस्थ रहे
पेड़ वही, जो फल, छाया से सबके लिए झुक जाए…..

कमल भंसाली