🌞प्रथम किरण🌞कमल भंसाली

क्षितिज से निकला भास्कर
उसमे से निकली
एक भोली सी किरण
कूदती, फुदती
कर खिड़की पार
आई मेरे पास
तलुओं को स्पर्श कर
गुनगुनाई कई बार
आओ उठो
जागो इस बार
आओ एक खेल खेलते
आशा निराशा के
गहने जंगल में
मंजिल के
धवल चाँद को ढूंढते

मूंदे से मेरे नयन
हो गये गहन
कुछ कहता
उस से पहले
उसने कहा
जाग गया सारा जहां
तुम अभी भी सो रहे यहां
उठो, खेल बड़ा रोचक
शाम तक का समय
इसमें निश्चित मंजिल
न बनना बुजदिल
नहीं रखना मन में भय
न ही दिल में संशय
जो जीत गया वो रह गया
जो हारा
वो मंजिल से दूर हो गया
समझो
सफलता के नभ से
विलीन हो गया

बोली किरण
प्रिय बन्धु
जरा ध्यान से खेलना
कठिन राह से गुजरना
आसान नहीं
दिन में चाँद को ढूंढना
पथ के तीखे
बे आबरु पत्थरों से बचना
निराशा के बादल जब छाये
आशंका की काली घटा मण्डराये
हताश न होना
एक कदम आगे बढ़
पथ की गरिमा बढ़ाना
इस खेल में होता
सिर्फ बढ़ना
यही इसकी शान
समय कम
चुनौतिया चाहेगी जल्द समाधान
कदम न डगमगाना
रखना जरा ध्यान
खेल कि विशेषता
मंजिल की पहचान

देखो
खेल बड़ा चंचल
बड़ा विचित्र संसारिक जंगल
यहां हर किस्म के फूल खिलते
पर काँटों से गले मिलकर
लुब्ध हो झाड़ियो से लिपटे रहते
ध्यान रहे
नकारत्मक्ता के इन बन्धनों में
तुम्हारे पाँव न उलझे
कई नये सम्बंध उभरेंगे
संसारिक नाले के प्रेमित कीड़े
इधर उधर दौड़ेंगे
इनसे बचना ही तुम्हारा लक्ष्य
बच गए
तो
आधी राह से ज्यादा तय

ध्यान रहे
हर चोराहा मंजिल नहीं होता
मनमोहक पथ सदा लुभाता
आकर्षण ही सदा भटकाता
इनकी रंगीनी में जो उलझता
वो रास्ता भूल पथ भटक जाता

वासना रंगीनी की दासी
देह अति प्रेम की प्यासी
खेल यह भी कई खेलती
मरीचिका ही सबको उलझाती

दूर दृष्टि का खेल हमारा
पास में है, छलावा का डेरा
अज्ञान का जहां है अंधेरा
समझ की टिमटिमाती रोशनी
का ही सिर्फ एकमात्र सहारा

अंहकार के पेड़ जब दिखे
उन्हें न ताकना, न ही चढ़ना
इनसे लिपटे घृणा के सर्पों
से हो सकता है, सामना
हो सके तो स्वयं को थामना

पास नहीं पर नजदीक
यहीं कहीं
बहता आत्म प्रेम का दरिया
तपस्या की जहां सुंदर वादिया
देह को नहला देना
तब संयम से आगे बढ़ना
देखो सामने का एक अदृश्यत् सा पहाड़
वो है, जीवन के उतार चढ़ाव
नमन करना
आगे बढ़ जाना

पाँव तुम्हारे
जितने रहे पवित्र
उतनी दूर ही चढ़ना
भोर की किरण हूँ
कहती अब
अलविदा
शाम सुनहरी छाई
देखो
ह्रदय के जंगल में
धवल चाँद मुस्करा रहा
जीवन के आकाश में
आत्माओं को
सदगुणी चांदनी से नहा रहा
खेल है जीवन
यह बता रहा…..रचियता कमल भंसाली

💛 पिपासु 💜 कमल भंसाली

यौवन के गगन से
निष्ठुर उम्र का भास्कर
चला गया अति दूर
पर छोड़ गया
हर यादों के साये तले
तपिस भरी
हल्की हल्की धूप
पलक बन्द करता तो
समय आँगन की प्राचीर पर
लटके नजर आते
स्मृतियों के नीस्तरंग हजार
शेष विशेष हो कर
कुछ रंग
आज भी मेरे आत्मानंद को
अपने नाखूनों से खरोंचते
कुछ सहज पल
जिनमें
अनभूति और तृप्ति
के संचयन संगमन को
भी नही बख्शते
*****
कल के इंद्रधनुषी रंग
जिन गलियारों से झांकते
उनकी परिणमन दीवारे
अपने प्रस्तर फिकेपन की कसम देकर
परिभाषा
तुम्हारे मेरे अटूट प्यार की
आज भी
शंकित दृष्टि से देखती
और पूछती
क्या ?
निष्पर्यत प्यार के कण
चंचलाती बहार में
इस तरह भी बिखरते
कि
गर्दिश में दब कर
प्रस्तर बन
अपनी ही पहचान को तलाशते
*****
दो जिस्म
एक जान
एक कसम
एक चाहत
यही बातें
टूटे रोशनदानों की
रात की तन्हाई में
सुनाई देती
बन सुगबुगाहट
जब निशब्द शब्द
शीशों से टकराते
यादों के हजारों क्षण
निष्ठुर हवा में तैर जाते
फिर तुम्हारी
आवरणहिण आकृति बन
नयनों में
निर्विर्ज अहसास छोड़ जाते
*****

तन्हाई
दिल को देती बैचेनिया
याद आती
तेरी मेरी नाजायज नादानियां
नस्तर चुभाते
नशीले यादों के साये
शाम का
मधुरतम हो कर
धुंधलाना
सजकर तुम्हारा
मेरे पास आना
फिर बदरंग होती दीवारों को
छूकर ये कहना
देखो रँगविहीन हो रही
इन्हे फिर से रंगा देना
रोमांचित हो
गले से लगना
आलिंगन बन्ध हो
अपनी चूड़िया का रंग देखना
नहीं जानता
क्या था
तुम्हारा ?
प्रेम,
पतन,
दस्तूरी स्पंदन का संगम
या फिर धृष्ट रिश्तों का प्रतिष्टंभ
या फिर
हमारे दिलों के
स्पर्शना रिश्तों का सौकुमार्य स्खलन
*****

जिन पर्यक चदरों की सलवटों पर
हमारी जवानी पसरती
वो सब
एक कोने में
अब हर रात सिसकती
सोचती
पता नहीं क्यों ?
दिल की अंजुमन
अब क्यों नही सजती !
क्या यही हमारी हसरतों का हश्र
जो हमें
हर दिन बदल दी जाती
आखिर आशिकी के चेहरों में
प्रेम की ये कौन सी
बदनसीबी रेखा खींची जाती ?

*****

कैसे समझाऊ
अनाद्दन्त कोलाहल कब शांत होते
कब शांत होती
अतृप्त सतरंगी आस्थाये
कामनाओं की गहरी घाटी में
गिरने से
चोट अहसासित नहीं होती
जिंदगी
हर रुप में परिभाषित नहीं होती

*****

पता नहीं
फूल सी चन्दन चित्रित
तुम्हारी काया में क्या समाया
कौन से प्रेम पुष्प से
किस हिस्से को
मैंने कब छुआ
याद नहीं
भटकन देह की होगी
मन तो
तुम में ही था समाया
प्यासी धरती की
अतृप्त चाह
की गहराई
कौन आज तक नाप पाया
बोझिल जिस्म
सही प्यार का सही मर्म
कब समझ पाया !
पर कहते
चाहत में बहुत कुछ
अनचाहा समाया
इसलिए
प्यार की हकीकत को
कोई नहीं
आज तक पहचान पाया

*****

हर दिन
मन गुलमोहर उगाता
सभ्य संस्कृत तन का
निर्लिंग आवरण
पैशाचिक प्यास जगाता
प्रणय मिलन
नारी भी कब शर्माती
जब पास तुम आती
अपने नयनों की झील में
एक पंखुड़ी “कमल” की
कितनी खुशबू दे जाती
कहकर
ठण्डी साँसों में उन्हें सम्माहित कर
मन ही मन मुस्कराती
प्रेम परिभूषित हो पूछती
जिंदगी क्यों
स्पर्शों की सौगात होती ?
छूने से
आंच तेज क्यों होती ?

*****

मर्म के पन्नों पर
तुम कितना कुछ लिख देती
पता नहीं कितने हासिये
बिन मेहँदी के हाथों से खिंचती
वक्त की खामोशियों में अपनी मासूमियत का
अधजला दीपक हथेलियों से ढक देती
प्रेम ज्योति की व्यथा से
अंधेरों की गहराई नाप कर कहती
नाकामियों भरा है मेरा असहज स्पंदन
जगत के पुलिंदो का अधलिखा कागज लगता
कहकर तुम मेरी बाहों में
आलिंगनों के नस्तर चुभाती
अनचाहे शब्दों को होठों में छुपाती
आखिर तुम
कितनी बार मुस्कराती
तुम एक स्वप्निल साया
कब तुम्हें समझ पाया
जाना है, तुम्हें कहीं
ये कहकर लिपट गई
अलविदा का कोई होगा
यह नायाब नुस्खा
जिसका उपहार तुम दे गई
कुछ मधुरतम क्षण
उनमे बिखरे प्यार के सूक्ष्म कण
आज भी बन्द खिड़कियों
के उस पार
का, आम का निषक़्त दरख्त
जो अपने रसीले होनें पर गर्व करता
दागदार हो
अपनी हर डाल से
दरवाजों के बन्द पट सहलाता
एक अजनबी से स्पर्श
खोयी बैचेनियों को तलाशता

*****

मुद्दत से बन्द
यादो की खिड़की
अब निशब्द
जिंदगी स्तब्ध
“प्यार” निःस्त्राव
तन निःस्पृह
मन पावस
भूल रहा
अब दिल का पिछला हर दिवस
धूप अब नही दिखती
मन्द होती रौशनी में
बिगड़ी यादें
पावस बन
सिर्फ हल्की टीस देती
गौण होनें का अंतिम अहसास देती…..

✍रचियता 💚💙❤कमल भंसाली💜💟💗

प्रथम किरण……कमल भंसाली

क्षितिज से निकला भास्करउसमें से निकली, एक भोली किरण नाचती, कूदती, कर खिड़की पार आई, मेरे पास, प्रथम बार मेरे तलुओं को, छू कर कह रहीं आओ, एक खेल खेलते आशा, निराशा के घने जंगल में, चाँद को ढूढंते शाम तक का है, समय न रखना मन में कोई भय न ही कोई दिल में संशय जो जीत गया, वो रह गया जो हारा, समझो, विलीन हो गया खेल बड़ा रोचक है, जरा, तुम ध्यान से खेलना पथ के तीखे, बेआबरु पत्थरों से बचकर रहना निराशा के बादल जब छाये, कभी हताश न होना एक कदम आगे बढ़, पथ की गरिमा जरुर बढ़ाना इस खेल की कुछ अपनी अलग ही है, शान समय कम, चुनौतियां चाहेगी, जल्द समाधान न डगमगाए कदम तुम्हारा, रखना जरा ध्यान खेल की विशेषता, जीवन पथ की सही पहचान जंगल बड़ा है, विचित्र, हर किस्म के फूल मिलेंगे कँटीली झाड़ियों में उलझे, कई नये सम्बन्ध उभरेंगे मोह के नाले से, छोटे मोटे अनगिनित कीड़े निकलेंगे इनसे तुमको है बचना, तबआगे बढ़ने के रास्ते मिलेंगे ध्यान रहे, हर चौराह मंजिल तक नहीं पंहुचाता मनमोहक से दूर रहना, आकर्षण ही भटकाता याद रहे, हर रंगीनी में, छलावा भी खेल खेलता अज्ञान के अँधेरे में, समझ को नहीं मिलता रास्ता दूर से ही देखना,अंहकार के पेड़ों पर न चढ़ना इनपर हो सकता, तुम्हें घृणा के साँपों से सामना दूर जो प्रेम की नदी लहलहा रही, कर लो स्नान “प्रेम” ही पवित्रता और शक्ति का देता, वरदान जब तनमन हो जाए शुद्ध, संयम से आगे बढ़ना अब आत्मा के विशाल पहाड़ पर तुम्हें है, चढ़ना भोर की किरण हूं, अलविदा, शाम सुनहरी छाईं अपने ह्रदय के जंगल में देखो, प्रथम चन्द्र किरण मुस्कराई…कमल भंसाली