🌷सच और प्यार🌷मुक्तक युक्त कविता✍ कमल भंसाली

सदिया बीती प्यार रहा अमर
पथिक चलना ऐसी ही डगर
प्यार ही हो तेरी असली मंजिल
खुशियों के फूल खिलेंगे हर पल

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खूबसुरती जिस्म की बदलती रहती
अवधि सांसों की भी कम हो जाती
पर प्यार की रंगत एक जैसी रहती
प्यार से रहो, धड़कने भी ये चाहती

💝

पल का प्यार, स्वाति बन कर चमकता जाता
सच्चाई की धवलता से पलमें कीमती हो जाता
रंग बदलता इजहार आरजूये ही करता जाता
इससे प्यार का अहसास कभी नहीं कर पाता

💕

हर रिश्ते में प्यार का ही बन्धन होता
खून से तो सिर्फ इसका सम्पर्क रहता
आपसी समझ बन जाता है जब प्यार
तो जीवन अपनी मंजिल करता तैयार

💑

कहते है जब तक प्यार और सच साथ साथ रहते
जीवन की बगिया में खुशियों के फूल खिलते रहते
झूठ की शराब में जो प्यार को ओतप्रोत कर रखते
एक दिन प्यार की चाहत में तिल तिल कर तरसते

👄

प्यार को जग में भगवान से कभी कम नहीं समझना
जीवन के नभ का इसे सूर्य और चन्द्रमा ही समझना
प्यार को उजियारा,सत्य को आत्म ज्ञान हीसमझना
सच्चे प्रेम को अटूट अनमोल जीवन बन्धन समझना

💟

सभी तपस्याओं का सार है, सत्य, प्यार भरा जीवन
अति चाहत की लालसा में जब भटक जाता इंसान
उसे इस लोक से उस लोक तक नहीं मिलते भगवान
कर्म बन्धन से परेशां कैसे करेगा आत्मा का निर्वाण

🙏🙏🙏 रचियता👉 कमल भंसाली👈

🍀कर्म का मर्म🍀धर्म के मर्म का दूसरा चरण🌷कमल भंसाली

तय है, “धर्म” स्वयं ही परिभाषित होता है, यह कोई मीमांषा का मोहताज भी नहीं होता। जो लोग दैनिक कर्तव्य को धर्म से जोड़कर जीना चाहते, वहां धर्म उनकी आत्मा की पहरेदारी करता नजर आता है। जीवन सभी को सहजता से जीनें के लिए ही मिलता है, पर इन्सान अपने जज्बातों के साथ उदारता बरतने लगता, तो कठिनाइयों को रास्ता मिल जाता और जीवन अविलक्ष्य होकर अवैध मंजिलों की चाह रखने लगता है। आत्मिक अनुसंधान और उससे अर्जित अनुभव ही एकमात्र इस अवस्था का समाधान हो सकता है। अगर हमारे दैनिक कर्म करनें की प्रवृत्ति में नैतिकता समावेश हो, जो साधारण चिंतन में विश्वास रखने वाले के लिए एक असहज क्रिया है क्योंकि चाहतों का चक्रव्यूह में फंसा मन जल्दी से उसे तोड़ नहीं सकता। ऐसी स्थिति में ‘धर्म’ शब्द ही उसे एक संकेतक चेतावनी जरुर देता है कि अति भोग जीवन की मूल्यता नहीं समझ पा रहा अतःउसे नैतिकता से परिचय कराना जरुरी है। प्रलोभ से घिरा इन्सान अपनी इस जगत की असहज महत्वकांक्षाओं के कारण नैतिकता को महज एक बाहरी ही तत्व समझता है, और भूल जाता है, कि नैतिकता और धर्म एक दूसरे के पूरक है, कह सकते है, उनका ‘चोली दामन’ का साथ है। यहां अब जरुरी हो जाता है यह बताने के लिए की धर्म के दस तत्वों का संगम ही ” नैतिकता” है। बिना कर्म नैतिकता की कोई भी परिभाषा नहीं बनती, सही कर्मों को समझ सही ढंग से करना ही ” नैतिकता” है। चूँकि नैतिकता धर्म के साथ हमारे जीवन से जुडी है, अतः संक्षिप्त में नैतिकता की परिभाषा नीति शास्त्र के ज्ञान और उसके अनुरुप किया जानेवाला आचरण होता है। जिसे हम इंग्लिश में morality, moral और ethics जैसे और कई शब्दों के रूप से जानते है।

ध्यान देने की बात है, अतः गंभीरता के साथ हमें यह स्वीकार कर लेना होगा हर जीवन की एक सीमा रेखा होती है, उन सीमाओं के अंतर्गत हर कर्म की अपनी गुणवत्ता होती है, इस गुणवत्ता के विरुद्ध किया हर कर्म अनैतिक और अधार्मिक गिना जा सकता है। जीवन की सत्यता वो ही समझ सकता है, जो सत्य की सत्ता स्वीकार करनें में संकोच नहीं करता। जिसने संसार या इस सृष्टि की सरंचना की उसने बहुत सोच समझकर मानव की भूमिका तय की है। प्रकृति को हम किसी भी दृष्टि से निहारे, अच्छी लगती इसका एक ही कारण है, सत्य सुंदरता का मालिक है, और संसार में सत्य की चाहत हर किसी को होती है। सत्यता की मजबूती कभी कोई भी झूठ कम नहीं कर सकता, यह बात और है, कुछ समय के लिए वो सत्य से इंसान को दूर कर देता परन्तु सत्य से सामना होते ही वो स्वयं अदृश्य हो जाता पर अपने नुकसान कारी प्रभाव से मानव जीवन की मुश्किलें बढ़ा जाता। कहते है, “झूठ के पाँव नहीं होते” पर दिमाग तेज होता है क्योंकि हर अवगुणों का नेता होता है, अतः उसके चालाक होने पर कोई आश्चर्य भी नहीं होता।

अगर देखा जाय तो हर नैतिकता की कसौटी ‘सत्यता’ ही होती है, आदमी द्वारा कि हर धार्मिक क्रिया अस्तित्वहिन ही रहती है, जब तक वो आत्मा में स्वर्ण शुद्ध “सत्य “को जगह देने के लिए “पूर्ण ईमानदारी” से स्वयं को तैयार नहीं कर लेता। जैसे शरीर अपनी दैनिक क्षुधा शांत करने के लिए भोगवादी बन नाना प्रकार की इच्छायें जागृत करता है, ठीक वैसे आत्मा अपनी पवित्रता की महत्वकांक्षा के लिए हर दैनिक कर्म में एक निष्कलंक सत्य की कामना करती है। हालांकि दैनिक जीवन की परिस्थितया इन्सान को मजबूर और कमजोर बना देती है, और वो आत्मा की कामना पूर्ण करने में अपने आप को ज्यादातर अक्षम ही पाता है। अतः साधारण इन्सान की उपलब्धिया अगर साधारण रहती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये, क्योंकि साधारण और असाधारण का असमान्य फर्क ही तो उसे इस संसार में मान सम्मान का अधिकारी बनाता है।

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रवि: ।
सत्येन वायवो वान्ति सर्व सत्ये प्रतिष्ठतम्।।

( सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलता है , सब सत्य पर आधारित है )

अगर उपरोक्त श्लोक के अर्थ पर गौर करे तो यही कहना सही होगा की “सत्य ही जीवन” है। झूठ का जंगल कितना ही विस्तृत क्यों न हो जाये, सत्य की समर्थता को वो कभी भी नहीं छू सकता।

हम बात नैतिकता के सन्दर्भ में आगे बढ़ाये तो स्वभाविक है, एक सवाल हमें परेशान कर सकता है, लालच, मोह, क्रोध, स्वार्थ और कई क्षणिक गलत अवस्थाओं में नैतिक तत्वों की क्यों कमी हो जाती है ? यहां हमें कंफ्यूश के उस कथन को प्राथमिकता देनी होगी जब उन्होंने इसी तरह के एक सवाल में जबाब दिया,” Wisdom, compassion and courage are the three universally recognized quality of men.” यानी एक श्रेष्ठ इंसान हमेशा नैतिकता के बारे में सोचता है, साधारण इंसान केवल सुविधा के बारे में सोचता है। तो क्या सुविधाओं को नैतिकता का शत्रु समझा जाय। शायद कदापि नहीं क्योंकि जरुरी सुविधाये इंसानी जीवन के लिए जरुरी है। कहते है ‘अति’ हर साधन की सही नहीं होती क्योंकि उसकी चाह में नकारत्मक तत्व अपना अस्तित्व बोध इंसान को नैतिक चिंतन से दूर करने की कोशिश करते है और देखा गया भी है अति साधनों की भूख कभी तृप्त नहीं होती।

मानव और उसका व्यक्तित्व काफी हद तक एक ही तलाश के मालिक है, जिनकी चाह होती है उन्हें सही उद्धेश्य प्रेरित, आनन्दित जीवन की प्राप्ति हों, और उसके लिए उन्हें संसारिक जीवन धारा की गतिविधि में नैतिक तत्वों का उचित समावेश रखना होगा। चूँकि नैतिकता हर कर्म में लिप्त रहती है, और उसका अदृश्य भाग दैनिक जीवन का मूल्यांकन, देश, समाज, जाती, भाषा, धर्म आपसी मानव सम्बन्धो के दिशा निर्देश के अनुसार तय करता रहता है। नैतिकता का मतलब मानवता की मर्यादा को आत्मिक सुरक्षा प्रदान करना होता है, क्योंकि सृष्टि की रचना करने वाले ने सजीव प्राणियों में सिर्फ मानव को असीमित अधिकारों से साथ सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमता का वरदान दिया है। अतः सृष्टिकर्ता कभी नहीं चाहेगा उसकी गलत धारणाओं का अंजाम बाकी की मानवता को भोगना पड़े।

हमारे सांसारिक साधारण जीवन के सम्बंध में नैतिकता की जो सही परिभाषा Potter Stewart के अनुसार दी जो सकती, वो ” “Ethics is knowing the difference between what you have right to do and what is right to do” है।
क्रमश…..लेखक: कमल भंसाली

🔔🔔सुन रे इंसान🔔🔔कमल भंसाली

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“सुन रे, इन्सान
क्या कह रहे, भगवान”

झुके झुके से नयन तुम्हारे
करते है, स्वीकार
इस दुनिया को तुमने समझा
सिर्फ एक, व्यापार
मन तेरा मोही
हुआ रे, इंसान
कैसे होगा
बोल तेरा कल्याण !

छद्म तुमने
अपनी परिभाषा बनाई
सूरत तेरी
किसी को न समझ आई
अभिनय से ही
रिश्तों की बुनियाद बनाई
दिन में
आत्मा की बात करता
अंधेरों में
स्व धर्म बेचता
व्यापार तेरा, निराला
छीन लेता
दूसरे के मुंह का
अध् खाया, निवाला
दिल तेरा निर्मोही
हुआ रे, इंसान
कैसे होगा
बोल तेरा कल्याण !

ईष्या, द्वेष, जलन की तराजू में
झूठ, फरेब
की रस्सी से बाँध
जीवन पलड़ा रखा भारी
सत्य कम तौलना
लाइलाज बीमारी
अंतर्मन की चीखों से
त्रस्त आत्मा तुम्हारी
जिनकी चिंता में
रहता तेरा मन भारी
वो तेरे अपने ही है, कर्म
समझ उन्हें
ऊपर से
कर रहा
तेरी ही निगरानी
देख रहा
तूने अभी तक
मेरी दी
चन्द, साँसों की
सही कीमत नहीं पहचानी
मन तेरा निर्दयी
हुआ रे, इंसान
कैसे होगा
बोल, तेरा कल्याण !

****रचियता****कमल भंसाली

नकारत्मकता से सकारत्मक्ता का सफर.एक दृष्टिकोण ..बेहतर जीवन शैली भाग ११ अंश २

सच ही कहा है, किसी ने नजरअंदाज कर देने से कोई भी अदृश्य नहीं होता, यह रवैया जिंदगी के कर्म क्षेत्र में शायद ही हमें कोई सफलता का सूत्र दे , अपितु हमारा एक कदम असफलता की तरफ मोड़ सकता है। नकारत्मक्ता जिंदगी की से पैदा हुई समस्याओं का कोई भी उपचार सरल नहीं होता, सामने कोई कठिन समस्या हमें आती दिख रही हो, और हम उस पर गौर नहीं करे, यह हमारी सकारत्मक सोच तो नहीं कह जा सकती। बेहतर जीवन शैली एक यात्रा ही है
नकारत्मकता से सकारत्मक्ता की, क्यों नहीं आज हम इसी यात्रा सम्बंधित चर्चा करे।

भगवान बुद्ध ने कहा जिसने मरण को समझ लिया, उसने जीवन को समझ लिया। उन्होंने जिस भी सन्दर्भ में कहा हो,
पर इसमे एक संकेत है, जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते, यही की हर प्रारंभ्भ का अंत जरुर है। हमारी दैनिक दिनचर्या की जब हम शुरुआत करते है, तो कई कार्यों में कुछ अनसुलझी समस्याएं भी रहती है। हमें उन समस्याओं का समाधान अगर करना है, तो उनका सही विश्लेषण ही कारगर उपाय सूझा सकता है। अगर हम सही परिणाम के विरुद्ध जाते है तो शक्ति क्षय ही होना है। ऐसी समस्याओं में उनके विपरीत परिणाम को मानने से क्षति भी सीमित होगी। एक बात यहां स्पष्ट करनी जरुरी है, कि जहां सही सिद्धान्तों की रक्षा करनी जरुरी हों, वहा संघर्ष जारी रखना उचित होगा। हमारा देश आज भी नैतिकता के मामले में कमजोर हो रहा है, जबकि शिक्षा का विस्तार तेजी से हो रहा है। धर्म, कर्म के महत्व पूर्ण ज्ञान की यहां नदियां बहती है, परन्तु उसका सदुपयोग कम होता है। आडम्बरों से दूषित होने वाली ज्ञान गंगा को सब साफ़ रखने की हिदायत तो जरुर देते है, पर जरुरत पड़ने पर वहीं उसको मैली करने में संकोच नहीं करते है। इसे हम हमारी कमजोरी ही माने, यह ही सही होगा।

भगवान बुद्ध ने मरण को समझने की बात कहकर बहुत से दृष्टिकोणों की तरफ इशारा किया, मरण यानी मृत्यु या फिर मौत हम इसे किसी भी नाम से पुकारे, हकीकत यही है, कि यह जीवन रेखा का अंतिम किनारा है। यह रेखा सिर्फ प्राणियों के लिए ही नहीं, अपितु संसार की सभी संचालित पद्धतियों पर भी लागू होती है। दूसरे रुप में इसका स्वरुप बदल जाए, पर सीमा यह तय ही रखती है। हम किसी भी समस्या को ले ले, उसका भी अंत तो तय है, स्वरुप और परिणाम चाहे हमारे पक्ष में नहीं भी हो। वास्तिवकता यही कहती है, हम अगर यह समझ जाते है, तो कोई भी परिणाम हमे झकझोर नहीं सकता और शायद न ही जर्जर और कमजोर कर सकता।

कहते है, बहुत सारी मानवीय समस्याएं परिस्थितियों से नहीं मानव के व्यवहार से पैदा होती है, और उनका निदान प्राकृतिक गुणों से ही सही ढंग से किया जाता। यह भी हमें बताया गया कि ‘क्रोध’ और ‘असंयम’ दो ऐसे जीवाणु है, जो अगर जीवन में लग गए तो विनाश का प्रथम चरण शुरु कर देते है, प्रारम्भ में ही अगर इनका इलाज “प्रेम” से कर दिया जाय, तो कैंसर की तरह फैलने की कम संभावना रहती है। सवाल उठ सकता है, “प्रेम” ही क्यों ? इसका सबसे बड़ा कारण मनोवैज्ञानिकों ने बताया प्रेम में शीतलता और विश्वाश दोनों का समावेश रहता है, जो पीड़ित को सकारत्मक ऊर्जा प्रदान करता है। किसी भी इलाज की पहली जरुरत है, कि हम अपने दिमाग को व्यवहार सिखाये, उसे सही के लिये सहमत होना जरूरी है। महान चिंतक अलफ्रेड नार्थ के अनुसार ” We cannot think first and act afterward”। अलेक्स. फ. ओसबोर्न ने अपनी पुस्तक “Applied Imagination” में किसी भी समस्या का समाधान करने के लिए कुछ सुझाव दिए है, उस मे सबसे महत्व्पूर्ण पहला कदम किसी भी समस्या के समाधान की शुरुआत उसका सही विश्लेषण बताया। उनके अनुसार समस्या की कोई न उम्र होती है और न ही उसकी सीमारेखा। सही और सटीक एक कदम किसी भी समस्या का निदान करने की क्षमता रखता है। वहीं बुर्क बार्टन के अनुसार ” जो अपने में विश्वास नहीं करते, वो कोई भी समस्या को नहीं सुलझा सकते”।भारतीय चिंतकों की अगर बात करे तो वो ज्यादातर भगवान का सहारा लेने की बात करते है। परन्तु हकीकत के पन्ने यही कहते है, जिसने बिना फल की आशा किये, कर्म को महत्व दिया, वो अपनी कई समस्याओं का समाधान स्वतः ही पा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म का सही संदेश दिया है, यही काफी सही समाधान हमारी समस्याओं का कर सकता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोsस्त्वकर्मणि ।।
(कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर नहीं। कर्म को फल की इच्छा से कभी मत करो, तथा कर्म ना करने में भी कोई आशक्ति न हो।)

‘गीता’ ही नहीं प्रा:य सभी धर्मो के ग्रन्थों ने कर्म और परिश्रम को ही जीवन बदलने वाला शस्त्र माना है। परन्तु कर्म में जब तक आस्था का समावेश न हो, तो परिणाम अनचाहे ही मिलेंगे। जीवन सब दिन परिवर्तन के अनुरुप अपनी क्षमता का विकास तभी करता है, जब हम अपने जीवन को स्वच्छ और साफ़ रखे। सहनशीलता, धैर्य, प्रेम, धर्म, सच्चाई ये पांच तत्व है, जो जीवन को बेहतर जीवन शैली प्रदान करते है। दैनिक जीवन में आधुनिकीकरण से नकारत्मकता की जड़े काफी मजबूत हो गई, इसका कारण उपरोक्त पांच तत्वों का समावेश दैनिक जीवन में काफी कम हो गया। अब अनुसन्धान करने वाले भी मान रहे है कि कई विपदाये तो मनुष्य से ही निर्मित ही होती है। प्रकृति ने प्राणियों को सुख के साधन देने में कभी कोताही नहीं बरती पर मानव ने सदा उसका दुरुपयोग ज्यादा किया, निश्चिन्त है, कीमत तो चुकानी ही होगी। इसलिए हमारा सुधार होना जरुरी है, हमे अपनी आदते, चिंतन,कर्म का तरीका सभी को प्रकृति अनुकूल बनाना शुरु कर देना चाहिए।

नकारत्मक चिंतन अगर हमारे जीवन को धुंधला कर रहा है, हमें असमाजिक दृष्टि से देखा जाता है, और हम ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे और हमारा व्यक्तित्व दबा दबा रहता है। मनोविज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करने से कुछ दिशा निर्देश हमें मिल सकते है। कुछ संकेत उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है। उनसे हम अपने दृष्टिकोणों का समय समय पर मूल्यांकन करे, तो जीवन को सही राह की तरफ ले जाया जा सकता है।

1. हमारी आयु अनिश्चित है।
2. जितना उपयोग हम साधनों का करते है, उससे स्वास्थ्य और दिमाग का सन्तुलन न बिगड़े।
3. नैतिकता पर ही हमारी स्वतन्त्रता इतराती है, नैतिकता का अवमूल्यंन न हो, यही सही दृष्टिकोण है।
4. सही कर्म से ही जीवन को आनन्द मिलता है।
5. गुनाह कितना ही छोटा क्यों न हो, हानिकारक ही होता है। सांप का बच्चे का क्या छोटा ,क्या बड़ा होना ?
6. एक असत्य आदमी को कई तरह से बीमार करता है, संभव हो तो बचना चाहिए।
7. आधी से ज्यादा समस्याएं एक सत्य के द्वारा सुलझाई जा सकती है।
8. अनुशासन जीवन को बांधता नहीं, उसे बहुमूल्य बनाता है।
9. प्रेम में विश्वास की विशेष भूमिका होती है।
10. आस्था ही धर्म का पहला चिंतन है।
11. रिश्तों की गरिमा ही उत्सव प्रदान करता है
12. मानवता के प्रति हमारी गंभीर जिम्मेदारी होती है।
13. प्रकृति का सही उपयोग ही हमें स्वस्थ रख सकता है।
14. इज्जत और सम्मान की जितनी चाह हमारी, उतनी ही सबकी।
15. माता, पिता और परिवार से खुशियों का आभाश हो सकता है।

ऐसे और भी कई जीवन उपयोगी चिंतन हम साहित्य और धार्मिक गर्न्थो से प्राप्त कर जीवन को बेहतर शैली से सुंदर बना सकते है।

माँ पूर्णानन्द ने अपने किसी प्रवचन में कहा ” जो मैं अपनी इच्छा से करता हूं, वो मेरे दिमाग की अपनी दासता है। जो मुझे करना चाहिए,वो करता हूं, सफलता पाने के लिए। परन्तु जो कुदरत के अनुसार घटित होता है,उसे सच्चे दिल से स्वीकार करता हूं, वो भगवान की कृपा है” घटनाकर्मो से युक्त संसार में अगर हम धैर्य से सब सुख-दुःख सहजता से सहन कर लेते है, तो यकीन मानिए हम जीवन बेहतर जीवन शैली के अनुसार ही जी रहे है। एक सन्तोषपूर्ण जीवन आनन्द का अनुपम स्त्रोत होता है। हमें नहीं भूलना चाहिए आखिर इस संसार में हम कुछ समय के यात्री है, हमारा उद्धेश्य यहां की व्यवस्था को प्रेम, भक्ति, संयम, धैर्य, और कर्म के द्वारा समझ आनन्द सहित निष्कलंक वापस लौट जाना है।…….कमल भंसाली

कमल भंसाली