सह-अस्तित्व, ही जीवन तत्व..बेहतर जीवन शैली..भाग ११ अंश..२♥कमल भंसाली

कहते है, बहती नदी सुंदर और आकर्षक लगती है, कुछ ऐसा ही अपना जीवन होना चाहिए। शांत नदी गंभीर और सौम्य होते हुए भी उदास और अनाकर्षक दिखती है। ज्ञान जब स्थिर हो जाता है, तो सतह की सारी गन्दगी उसे सक्रिय नहीं होने देती। मानव जीवन का अगर कोई आकर्षक पहलू है तो वो है, “सक्रियता”। बेहतर जीवन शैली में अभी भी हमारा चिंतन का विषय जीवन के प्रति हमारा अपना दृष्टिकोण, जिसको हर समय गतिमय ऊर्जा की जरुरत रहती है, कहना नहीं होगा ऊर्जा हर समय गतिमय ही रहती है। एक बात हम कभी नहीं भूल सकते ,हमारी ऊर्जा को शक्तिपूर्ण होने के लिए विश्राम की जरुरत होती है, नहीं तो दिशा-भ्रमित होने की आंशका बनी रहेगी।

सफलता से असफलता की कोई दुश्मनी नहीं है, असफलता,हमारी चेतना को सोने नहीं देती, एक हद तक सफलता की वो शुभचिन्तक ही है। जीवन की रफ़्तार समय के अनुरुप साधनों के विकास पर भी अब निर्भर करने लगी है। बल की जगह बुद्धि आज राज कर रहीं है, शरीर से ज्यादा आज दिमाग काम करता है। जब हालात बदलते है, तो सफलता का रुप भी बदल जाता है, कार्य के अनुसार सफलता और असफलता की समय सीमा भी आजकल तय है। आज किसी भी के पास इतना समय भी नहीं है, कि पराये दर्द को महसूस कर सके, क्योंकि उनकी स्वयं की जीवन शैली दर्द की निर्माता बन गई।

आखिर हमारी लाचारी हमने खुद स्वीकार की है, स्वतंत्रता के नाम पर, जबकि स्वतंत्रता की सीमा रेखा होती है, इस सीमा रेखा को पार करने का मतलब नैतिकता और प्राकृतिक संस्कारों का उलंघन होता है। सवाल उठ सकता है, प्राकृतिक संस्कारों की परिभाषा क्या है ? इस सन्दर्भ में यही कहा जा सकता है, जन्मतें ही जो तत्वे हर मानव में मौजूद रहते है, जिनकी समझ उसे अपने आप आ जाती है, उसे उन्हें समझने में बाहरी ज्ञान की जरुरत नहीं रहती, उन्हें हम प्राकृतिक संस्कार कहते है, मसलन भूख, ये एक क्रिया है, जो जन्मते ही मानव जान लेता है। भूख के भी संस्कार होते है, वो अपनी सीमा से ज्यादा तृप्त होने से बचती है, वो जानती है, उसकी अति स्वतंत्रता तन को तकलीफ दे सकती है। परन्तु मन उसका विपरीत तत्व है, वो अति स्वतंत्रता को पसन्द करता है। मन का दूसरों की तकलीफ आराम से कोई सरोकार नहीं जब तक वो शिक्षित न हों। बेहतर जीवन ‘स्वतंत्रता’ को पसन्द न करे, यह नही हो सकता परन्तु वो सीमा के अंदर ही रहकर उसका उपयोग करता है। हम सड़कों पर कई जगह यह पढ़ सकते है, कि “सावधानी हटी, दुर्घटना घटी” यही बात बेहतर जीवन शैली स्वतंत्र जीवन पर कहना चाहती है। ज्यादातर देखा जाता है, कभी कोई छोटी सी सफलता आदमी को शालीनता से दूर कर उसे अभिमानी बना देती है, याद रखने की बात है, यहीं से क्षमताओं का दुरुपयोग शुरु हो सकता, अतः किसी भी सफलता को जीवन का माप दण्ड तय नहीं करने देना चाहिए। हमारा व्यवहारिक नजरिया शालीन और शांत हो, यही हमारे व्यक्तित्व को स्थिरता प्रदान करेगा।

कभी कभी हम ऐसी विषम स्थितियों से गुजरते है, जब हमारा कार्य करने में और दृष्टिकोण दोनों का अंतर सामने दिखाई पड़ने लगता है। यह हमारी जीवन शैली की सबसे कमजोर कड़ी होगी, शायद यह व्यक्तित्व निर्माण में विपरीत भूमिका भी निभाये। भारतीय परिवेश की बात करे तो परिवार के प्रति हमारी चिंतन शैली भावुकता से इतनी भर जाती है, कि सही तथ्य को जगह ही नहीं मिलती। इसका एक प्रमुख कारण अपनी भविष्य असुरक्षा को ज्यादा महत्व देना, इससे हमारी वर्तमान की कार्यशैली और स्वास्थ्य दोनों ही प्रभावित होते रहते है। दूसरी बात, पता नहीं, क्यों किसी पारिवारिक सदस्य की उद्दण्डता भी आदमी के चिंतन और नजरिये में प्रभावकारीक विपरीतता को स्वीकार करने को मजबूर कर देती है। तथ्यों पर अगर हमारा विश्वास हो, तो मान कर चलिए, हमारा व्यक्तित्व इस से दबता है, समस्या का कोई उचित समाधान इसमे नजर नहीं आता। बेहतर जीवन शैली की यही सलाह होगी कि परिस्थितयों का मूल्यांकन कर ऐसी स्थिति में ‘पूर्ण सत्य’ का सहारा लेना उचित होगा। एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार संसार, जिसमे हमारे देश भी सम्मलित है, कि कम से कम, दस आदमी में एक और पांच महिलाओं में एक, मानसिक गड़बड़ या मानसिक अव्यस्था (depression) के शिकार होते है, जो उनके दैनिक जीवन को कमजोरी और शरीर को अस्वस्थता देती है, उससे वही नहीं देश, समाज और हम सभी कभी न कभी प्रभावित हो सकते है।

भारतीय सन्दर्भ में मानसिक अव्यवस्था, ज्यादातर परिवारों में बिगड़ती शासन व्यवस्था तथा कमजोर पड़ते संस्कारों और ‘विचारों’ में नई पीढ़ी तथा पुराणी पीढ़ी के आपसी कम तालमेल का नतीजा ज्यादा है। मानसिक अव्यस्था में ज्यादातर देखा जाता है, कि हमारी भूख कम हो जाती है, शरीर में शीतलता का प्रवाह तेजी से होने लगता है। इसके अलावा रात को नींद देर तक नहीं आती तथा सुबह देर तक सोने की आदत पड़ जाती। याददाश्त कमजोर होने लगती है, समय पर काम की बात याद नहीं आती। शरीर का निष्क्रयता बढ़ने लगती है, कार्य में होती कमी इंसान को चारों तरफ से जर्जर, कमजोर और जीवन के प्रति उसकी आस्था को विकृत और निष्क्रिय करने लगती है।

इसी सन्दर्भ में एक ताजा घटना का जिक्र करना उचित होगा, क्योंकि इससे इस तथ्य की पुष्टी होती है कि एक आदमी की गलत मानसिकता का चिंतन कितने आदमियों का अहित कर सकता है, बिना किसी की गलती उसकी करतूत उन्हें मौत का रास्ता दिखा देती है। विश्वास और आस्था के प्रतीक अगर इस तरह दुरूपयोग के लिए प्रयोगित होते रहे, तो निश्चित है, मानवता अपने अंतिम दौर में चल रही है। जर्मन सह चालक एन्ड्रेस लबितज ने अपना एयरप्लेन को जान बुझ कर फ्रेंच एल्प्स में दुर्घटना ग्रस्त करवा दिया, जिससे विभिन्न देशों के १५० नागरिक मर गए। सवाल यह उठता है, उसने ऐसा क्यों किया ? कहते है, उसने अपनी प्रेमिका को ई- मेल द्वारा पुर्व सुचना दी, उसे यह कदम रातों रात प्रसिद्ध बना देगा । प्रश्न उचित ही होता, अगर वो आज ज़िंदा होता और उससे पूछा जाता कि क्या ऐसी प्रसिद्धि जायज है, जिससे बिना किसी गलती के उसके साथ उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। उसका यह नजरिया जिंदगी के प्रति उसकी अशिक्षित मानसकिता के अलावा कुछ भी नहीं लगता। उसका यह कार्य प्रशंसा के लिए कहीं भी जायज नहीं ठहराया जा सकता, अपितु सदा निंदा और घृणा के रुप में याद किया जा सकता है।

सारी दुनिया का अस्तित्व आस्था, विश्वास और मानवीय प्रेम पर टिका है, इनकी होती कमी चिंतनीय है। आज सभी के दिमाग में असुरक्षा की भावना हर समय रहने लगी है, कौन जिम्मेदार है ? हम अपने अंदर से एक प्रश्न का उत्तर ढूंढना होगा की हम अपने दायित्वों के प्रति कितने ईमानदार है ? क्या ” Honesty is best policy of life ” के अनुसार हमें अपना कार्य सामाजिक हित को ध्यान करते हुए, नहीं करना चाहिए ? बेहतर जीवन तभी होगा, जब हम खुद बेहतर बने।

हमारा नजरिया सत्यपूर्ण और विवेक शील होना अत्यंत जरुरी है…. गौर करे…..”सहअस्तित्व का सम्मान” बेहतर जीवन शैली है”।

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा,मैं रौंदूगी तोय ।।….कबीर……क्रमश…….♥♥ कमल भंसाली♥♥

कमल भंसाली

मर्म, सही दृष्टिकोण का…बेहतर जीवन शैली भाग..११..अंश..१..कमल भंसाली

आज हम बेहतर जीवन शैली का सबसे अहम सवाल, जो शायद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका व्यक्तितत्व निर्माण के दौरान निभाता है, कि हमारा नजरिया जिंदगी के प्रति क्या है ? इस पर चर्चा करते है, दोस्तों, इसे हम अपने आपसे यों भी पूछ सकते है, कि अपनी जिंदगी के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है ? तय यही है, की अभी हम जिस तरह से जी रहे, वही सत्य है। जीवन के हजारों दृष्टिकोणों का मूल्यांकन समय समय पर हमारे लिए जरूरी है, परन्तु ऐसा हम नहीं करते। जितना समय हम निर्जीव साधनों की देख रेख में लगाते है, उस से कम समय शायद हम अपना आत्म निरीक्षण में लगाते है। जीवन कोई साधारण बात नहीं है, हमारे शरीर का हर अंग अपनी निश्चित कार्य प्रणाली पर निर्भर है। हम हमारी सारी आत्मिक और शारीरिक अनभूतियों से ही, उसे आनन्द और निराशा के कई रंगों के रस का रस्वादन कराते है।

सत्य है, जीवन एक है, पर दृष्टिकोण अनेक है। यह भी तय है, नजरिया बदलता है, इंसान के जीवन का स्वरुप भी बदल जाता है। एक आम इंसान अपनी सोच और आस्था से कमजोर होते जीवन को मजबूती दिला सकता है। बड़े बड़े अविष्कारों के पीछे हमने वैज्ञानिकों के दृष्टिकोणों को बार बार बदलते सुना है, तब जाकर उन्होंने बार बार उनमे सुधार किये है। हकीकत, यही कहती है, कि हम दूसरों के गुणों और अवगुणों का अवलोकन कर लेते है, पर क्या हमनें कभी समय निकाल खुद का निरीक्षण किया, शायद ज्यादातर उत्तर नहीं में ही होगा। हम विशिष्ठता से स्नेह जरुर रखते है, पर यह नहीं जानते की उत्तमता की तलाश अपने अंदर से शुरु करनी पड़ती है। जीवन के हर एक नजरिया में लचीलापन और गंभीरता का समावेश होना जरूरी है । सिद्धांत और सत्य के लिए जीने वाले सत्यकाम आज की निरर्थक आर्थिक और आधुनिक समाज की देन नहीं हो सकता। सच, यही है, हम व्यवहारिक और राजनीति युक्त सम्बंधित समाज का हिस्सा है। इस बदले हुए परिवेश में नैतिकता की स्थिति काफी कमजोर हैं और उस पर पूर्णतिया निर्भर रहना, सांसारिक शब्दों में असफलता को बुलावा देना है। समाज के ज्ञानी सुधारकों को नैतिकता की चट्टान से फिसलते, हम सब ने देखा है।

बेहतर जीवन शैली सबसे पहले यह सुझाव देगी, कि समय काल के अनुरुप हम जीवन और उसके विचारों में सक्षमता पूर्वक परिवर्तन स्वीकार करते रहेंगे। यह भी समझने कि बात है, रीति रिवाजों के नाम पर प्रदर्शित आधुनिकता से सजे आडम्बरों को हम रोक नहीं सकते, पर वक्त की जरुरत के नाम पर उनको बढ़ावा देने से हम बचे, यही सही है। बात वही है, नजरिया समाज के प्रति बदलना होगा। आज के समाज से पहले के समाज की तुलना वर्तमान से करके जी तो सकते है, पर उस जीने में सार्थकता की कमी रहेगी। आधुनिक युग के साधनों ने जगह की दूरी जरुर कम कर दी, पर मन की दूरियां बढ़ा दी।बाहरी प्यार को इतना सुंदर बना दिया की भीतर की कालिख को देखना मुश्किल हो गया। हमें इसी धरातल पर अगर जीवन को बेहतर बनाना है, तो यथार्थ को स्वीकृति देनी ही होगी। यह भी समझने की बात है, कि सब समय सब बातें सही हो,यह जरुरी नहीं है। कुछ बातें पुराने समय की अच्छाइयाँ हो सकती है, पर आज वो बुराइयों के रुप में जानी जा सकती है।

हम पर्दा प्रथा को ही ले, कुछ समय पहले इसे संस्कारों में गिना जाता था, आज इसकी बुराइयों में पहचान करायी जाती है। समय बदलता है, तो जीवन बदलता है, परन्तु रीति रिवाजों और सामाजिक नियमों में उस अनुपात में बदलाव आने में समय लगता है। आज भारतीय समाज का बदलाव बाहर से जितना आकर्षक दीखता है, वाकई क्या ऐसा है ? यह एक अनुत्तरित जिज्ञासा ही होगी, अगर हम क्षेत्र के अनुसार इसका अनुसंधान नहीं करते। किसी भी समाज का विश्लेषण उसकी आर्थिक उन्नति की भूमिका में ही अगर किया जाय, यह एक अर्द्धसत्य हीं होगा। जीवन में अर्थ (धन)के महत्व को बेहतर जीवन शैली कभी नहीं नकारती, परन्तु उससे होने वाले नकारत्मक व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया जरुर कर सकती है, क्योंकि बिना व्यवहार कोई शैली तैयार नहीं हो सकती। अर्थ के बढ़ने से अगर जीवन को सकारत्मक चिंतन नहीं मिलता तो अर्थ बिना अर्थ ही जीवन को समाप्त कर देगा। अर्थ को अगर कर्म के साक्षेप देखा जाय तो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार चार पुरुषार्थों में एक माना गया है, बाकी तीन धर्म, काम और मोक्ष है। सही कामों से हम सीमित धन प्राप्त करते है, तो उसका मानसिक स्वास्थ्य पर स्वच्छ और सकारत्मक प्रभाव पड़ता है, जो जीवन को सही गति देता है। हमे यह चिंतन जरुर करना चाहिए की धन के प्रति हमारा नजरिया अति लालसा से तो प्रभावित तो नहीं है, ना। अगर हम कहें हां, तो शायद हम ऊपर से भव्य, भीतर से खोखला जीवन जी रहे है। इससे न तो अपना भला होगा, न ही परिवार और समाज का। जिंदगी से अगर कभी अगर हम बात करे तो शायद वो सबसे पहले यहीं कहेगी की ” हां, मैं शांत और सही ढंग से जीना चाहूंगी, क्योंकि मैं बार बार धरा पर विभिन्न रुप में वापस नहीं आना चाहूंगी”।

समय आ गया है, चिंतन को बदलने का, अति साधनों के प्रयोग से शरीर और मन की अवस्था और आयु दोनों ही कम होती है, अतः हम धन अर्जन के साथ प्रेम की भावनाओं में थोड़ी पवित्रता अपना ले। कभी कभी लोग कहते है की पैसा प्रेम का दुश्मन है, बेहतर जीवन जीने वाले शायद ही कभी इस तथ्य को स्वीकार करेंगे। आज हकीकत यहीं है, पैसा है, तो प्यार है, नहीं तो आदमी बेकार है। अतः हम अगर अपने व्यक्तित्व के उच्चतम विकास में विश्वास रखते है, तो हमे सहर्ष कर्म पथ पर सही और नेक आय अर्जित अपनी संयमित जरूरतों के लिए जरुर करनी चाहिए, पर दूसरे आत्मिक विकास गुणों की बढ़ोतरी का प्रयास भी कम नहीं करना चाहिए। इस तरह जीवन दृष्टिकोणों को सही आयाम के अनुसार बदलते रहना चाहिए,।सिद्धान्तों के नाम पर हमारा अपना अड़ियल रुख जीवन को गलत दिशा नहीं दे, यह ध्यान रखकर अपने सही सिद्धांतों को भी आदर हम दे।

हमारा चिंतन बहुत सारी धारणाये जगह जगह से ग्रहण करता है, लाजमी है, सब चिंतन सही परिस्थितिया निर्मण नहीं करे। परन्तु, यह भी तय है, बहुत में से ही कुछ का सही उपयोग किया जा सकता। C.S. LEWIS ने तभी तो अपनी पुस्तक ..That Hideouts Strength में लिखते है, ” There are a dozen views about everything until you know the answer. Then there’s never more than one.”

सच तो यह भी है, कि संघर्ष में हमे अपने सही दृष्टिकोण को कभी भी घबराकर नहीं छोड़ना चाहिए कुछ ऐसा Christian D Larson कहते है कि ” so long as the man with ambition is a failure, the world will tell him to tell him to let go of his ideal, but when his ambition is realized, the world will praise him for the persistence and the determination that he manifested during his dark hours, and everybody will point to his life as an example for coming generation. This is invariably the rule.Therefore pay no attention to what the world says when you are down.Be determined to get up, to reach the highest goal you have in view, and you will.”

ध्यान देने और मनन करे हम, की धैर्य सही दृष्टिकोण की उच्चित और न्याय संगत परीक्षा है, प्रकृति का नियम यही है, जो सही है, वो ही बहुमूल्य है।…..क्रमश ……कमल भंसाली

कमल भंसाली

प्रेम और वासना.. बेहतर जीवन शैली भाग….९ अंश ३….कमल भंसाली

प्रेम की सबसे बड़ी विशेषता, अगर कोई है, तो यह कि यह भावनाओं के सभी रंगों से परिपूर्ण रहकर भी सदा सफेद और स्वच्छ सत्य के अंदर ही अपना परमोत्कृष्ट ढूंढता है, पर ऐसा तत्व भक्ति स्वरुप के अलावा कहींऔर मिलना असंभव ही लगता है। प्रायः, यह ही दृष्टिगोचर होता है, कि मानव अपनी गलत आदतों की दास्तवता से स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहता है, पर अति लगाव या असंयत प्रेम के कारण ऐसा नहीं कर पाता, इसे मन की कमजोरी भी कह सकते है। बेहतर जीवन शैली प्रेम का तीन प्रकार से विशलेषण करना चाहेगी.

1. शारीरक प्रेम
2. मन का प्रेम
3. आत्मा का प्रेम

शारीरिक प्रेम…………

संसार में मानव शरीर को अपनी अनुपम सरंचना के कारण एक वरदान के रुप में देखा जाता है। बनानेवाले ने बड़ी कुशलता दिखाई और उसने शक्ति और कमजोरी का अनुपम मिश्रण का सन्तुलन बरकरार रखने के लिए बीमारी और मृत्यु का सहारा लिया। मानव मन में कमजोरी के रुप में कई अवगुण एक साथ निवास करते हैं। और वे काफी स्थान पर अपना वर्चस्व रखने की कोशिश करते है। जोअच्छे गुण होते है, उन्हें कम जगह प्राप्त होती है । जो,मानव सयंम और धैर्य को आत्मा में पूर्ण स्थान देते है, उनके जीवन में प्रेम की कमी शायद ही रहती है। आवेश, क्रोध, लालच, स्वार्थ प्रेम के सबसे बड़े दुश्मन है, उनसे आत्मा जितनी दूरी रखेगी, उसे प्रेम की कमी कभी नहीं महसूस होगी।

यह बात ध्यान में रखने की है, कि अति शारीरिक प्रेम को वासना के रुप में जाना जाता है, बिना प्रेम का यह मिलन शरीर की अतिरेक इच्छाओं की पूर्ति जरुर कर देता है।परन्तु, हर शुद्ध आत्मा इस शर्मिन्दिगी को सहज नहीं लेती, क्योंकि जो पवित्र विचारों के निर्मल जल से जो रोज नहाती, उसके लिए क्षणिक गन्दगी सहन करना सहज नहीं होता।आज नैतिकता के आँचल में अनैतिकता शरण लेकर् जो उत्पात कर रही है, वो प्रेम के रिश्तों को अविश्वासनिय बना कर जीवन को असहजता की आग में झोंकने की चेष्टा कर रही हैं। यह तय है, प्रेम की अनुभति चाह से शुरु होकर मिलन की गंगा में विलीन होती है। जब दो शरीर आत्मिक एक होकर मिलते तो उनका सुमधुर मिलन प्रकृति का विकास करते है, जिसमे कोई ख़ौफ़ नहीं होता, कहना न होगा, यह मिलन दाम्पत्य जीवन में हीं हो सकता है। हालांकि आजका आधुनिक जीवन शरीर मिलन ज्यादा चाहता हैं, चाहे आंतरिक प्रेम उसमे नहीं के बराबर हो। आज का परिवार स्वतंत्रता के नाम पर कई समस्याओं से इसी लिए ज्यादा जूझ रहा है।

प्रेम के हजारों पवित्र रुप होने के बावजूद मानव वासना के चंगुल में जल्दी फंस जाता है, यह कमजोर मानसिकता का संकेत है। आइये, जानते है प्रेम और वासना अलग क्यों है। सबसे पहले वासना को परिभाषित करने की चेष्टा करते है।
ये तो तय है, वासना प्रेम का ही एक रुप है, परन्तु प्रेम में यह रुप कई सीढ़ियों चढ़ने के बाद आता है। वासना शरीर और मन की जुड़ी मिलिभगति से कभी भी किसी रुप में तन में आ सकती है, इसका आत्मा से कोई लेना देना नहीं होता।
जबकि प्रेम भावनात्मक सम्बंधों के साथ शुरु होता है, काम और वासना शारीरिक स्पर्श से। कवि दिनकरजी ने “उर्वशी” में लिखा है,” कामजन्य प्रेरणाओं की व्यापित्यां सभ्यता और संस्कृति के भीतर बहुत दूर तक पहुंची है। यदि कोई युवक किसी युवती को प्रशंसा की आँखों से देख ले, तो दूसरे ही दिन से उस युवती का हाव-भाव बदलने लगते है”। दिनकर जी के कथन की सच्चाई पर कोई सवाल नहीं किया जाना चाहिए। अततः यह तो सच ही है कि स्त्री और पुरुष का प्रथम आकर्षण ही प्रेम का प्रारभ्भ हैं। यह अलग बात है, भारतीय दर्शन में प्रेम को शारीरक और मानसिक दो अलग तत्वों में बाँट दिया। अवांछित शारीरिक सम्बंधों को वासना की परिधि में रखा गया और आपसी रिश्तों में पत्नी के अलावा सभी रिश्तों में शारीरिक प्रेम को निषेध किया गया। कई मायनों में यह व्यस्था स्वस्थ और सही लगती है। हम शायद यह तो स्वीकार करेंगे की अंतरंग प्रेम लेने में नहीं देने में विश्वास करता है, जब की वासना सब कुछ लेना चाहती है। प्रेम की उम्र लम्बी होती है, वासना की कोई उम्र नहीं होती।

आचार्य रजनीश ने संसार को ही वासना माना है। वो कहते है “संसार का अर्थ है, भीतर फैली वासनाओं का जाल। संसार का अर्थ है, मैं जैसा हूं, वैसे से ही तृप्ति नहीं, कुछ और होऊं, तब तृप्ति होगी। जितना धन है,उससे ज्यादा हो। कितना सौंदर्य है, उससे ज्यादा हो, जितनी प्रतिष्ठा है, उससे ज्यादा हो। जो भी मेरे पास है,वो कम है। ऐसा कांटा गड़ रहा है, वही संसार है। और ज्यादा हो जाए, तो मैं सुखी हो सकूँगा। जो मैं हूँ, उससे अन्यथा होने की आकांक्षा संसार है”। यानी अति ही वासना है।

यह गौर करने की बात है, कि जीवन में नवरंग ,नवरस, या नव भाव प्रमुख है, उनसे उपेक्षित सन्यासी का जीवन भी नहीं रहता, परन्तु आत्मिक सयंम से हर भाव पर उनका शरीर से, मन से और आत्मा पर सयंमित शासन रहता है। जानने के लिए जरुरी है, नव रस के यह नौ प्रकार भरत मुनि के अनुसार क्या है? उनके अनुसार…

“रतिहासश्च शोकश्चक्रोधत्साहौ भय तथा ।
जुगुप्सा विस्मयश्चैति स्थायिभावा: पर्कीर्तिता:” ।

(अर्थात रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा,विस्मय तथा निर्वेद, ये नौ स्थायी भाव माने गये है।)

बेहतर जीवन शैली प्रेम को ही आधार मानती है, यह भी मानती कि वासना से जीवन कभी अपनी श्रेष्ठता नहीं पा सकता। आज के आधुनिक युग में मन की कमजोरियों के कारण बिना उचित कारण, अनुचित शारीरिक सम्बन्ध कई तरह की बीमारियां और समस्याओं का निर्माण करता रहता हैं। वासना का निदान धर्म शास्त्रों में सयंम और आत्मिक चिंतन ही बताया गया है। जीवन में अगर कभी ऐसी परिस्थिति का निर्माण हो, तो उससे बचना ही उचित होगा। …..क्रमश….कमल भंसाली

कमल भंसाली

मन मगन मुठ्ठी में गगन…बेहतर जीवन शैली भाग १० अंश ३


मन मगन, मुठ्ठी में गगन…बेहतर जीवन शैली में हमने मन की जरूरतें और उसका हमारे व्यक्तित्व निर्माण में योगदान पर चर्चा की। मन की हर अवस्था प्रेरणात्मक नहीं हो सकती, परन्तु इसके लिए पछतावा करना उचित नहीं कहा जा सकता । मन की अंतरंगता भावनाओं से जुड़ी है, भावुकता का समावेश अगर भावनाओं में ज्यादा होता है, तो मन में कमजोरी का आना लाजमी है, और यही वो तत्व है, जो हमारी कामयाबी और नाकामी को परिणाम देते है। हमें अपनी हर असफलता को कभी भी इतनी वजह नहीं देनी चाहिए कि मन दूसरे प्रयास के चिंतन की हिम्मत छोड़ दे। आखिर, हमारा संबल हमारा अपना मन हीं है।

Harry Emerson Fosdick का मानना है, हर आदमी का चिंतन ही उसके व्यक्तित्व का धरातल है। जितनी मजबूत मन की नीवं उतना ही मजबूत उसका व्यक्तित्व हो सकता है। तभी वो कहते है “The more one studies the biographies of men like Washington. or women like Florence Nightingale, the more one feels that they might conceivably have been lost in the crowd. What most of all gives them distinction is that they identified themselves with a cause greater than themselves so that when you think of it you think of them”

हर हार पर खुद की आलोचना मत कीजिये, संक्षिप्त चिंतन सहज है, परन्तु मन आघातिक चिंतन उचित नहीं कह सकते। हम अच्छी तरह समझते है, समस्याओं का समाधान ही जीवन है, बिना संघर्ष से प्राप्त उपहार क्षणिक खुशी का मालिक होता है, थोड़ा समय बीत जाने के बाद उसकी ख़ुशी कपूर की तरह उड़ जाती है। संघर्ष और मेहनत से हासिल ख़ुशी जीवन धरोहर होती है, क्योंकि उसमे मन की कस्तूरी छिपी रहती है। इस लिए मन कभी भी खराब न करे, विपरीत क्षणों में भी।मन को सुंदर विचारों से सजाने से हमारा मन सदा स्वस्थ रहेगा, नकारत्मक प्रतिरोध की क्षमता उसकी बनी रहेगी। निश्चित है, वो स्वस्थ तो हम स्वस्थ।

आइये हम मन को स्वस्थ और सार्थक गहनों से सजाने की बात करते है।….
1. मन को हर परिस्थिति की सच्चाई बेहिचक स्वीकार करने की स्वतंत्रता
2. विनय पूर्वक बुद्धिमानी व्यवहार
3. क्रोध और आवेश से दुरी बनाये रखने कि कौशिश
4. निर्णय पर कायम रखने की शक्ति
5. कर्म ही धर्म है, कर्म से लगाव ही जीवन सार
6. ईष्या, द्वेष, अति लालच, हिंसा, आदि हानिकारक तत्वों से बचाव
7. प्रेम, स्नेह, सेवा, सदाचार, अहिंसा आदि शक्तिवर्द्धक गुणों युक्त दैनिक जीवन
8. दान, सेवा, आदर, मान सम्मान के प्रति जागरूकता
9. देश, परिवार और समाज के प्रति स्वस्थ मानसिकता
10.धर्म ग्रन्थ और अच्छे साहित्य का अध्ययन
11. अन्याय करना नहीं, अन्याय सहन कभी नहीं करना

जीवन सहज और सरल नहीं है, सब समय सब गहनों को पहन कर चलना साधारण आदमी के बस की बात नहीं है, परन्तु समय का मूल्यांकन कर अगर हम निर्भीकता से जीवन पथ पर अग्रसर हो तो बहुत सी उपरोक्त बातें हमें अपने जीवन को बेहतर और सफल बनाने में सहयोग कर सकती है। जीवन के लिए कोई समय सीमा तय नहीं होती, जब जागो तभी सवेरा, ये न आपका, न ही मेरा..अमानत है, बाकी अपना चिंतन और मन…..
चलते चलते….
Don’t run away from adventures of the mind which you find hard to understand. Keep an open mind for the things “practical” people say won’t work. Perhaps we have more “senses” than we think. For thousands of years electricity was all around us and we could not use it. How can we be sure there aren’t powers of the mind which we understand as little but could as well if we knew how ?……..Ardis Whiteman…

कमल भंसाली

उलझन मन की सुलझें ना…..बेहतर जीवन शैली.. भाग..१०..अंश २…कमल भंसाली..


उलझन सुलझें ना
रास्ता सूझे ना
जाऊं कहां मैं
जाऊं कहां….. फ़िल्म धुंध का यह गीत बड़ी खूबसूरती से जीवन में मन की कमजोरी को दर्शाता हैं, इस गीत में मन की लाचारी का सुंदर चित्रण किया गया है। मन की सबसे बड़ी खूबी भी यही है, कि हार को सहजता से सहन नहीं कर सकता। अगर शास्त्रों की माने, तो मन ही वर्तमान है, हर क्षण में इसकी भूमिका रहती है। कहते है,बिना मन के तो वो भी नहीं थे, जिन्होनें हमें इस संसार में भेजा, हकीकत में तो यह दुनियां भी उनके मन की देन है। खाली मन की सुनने वाले इन्सान को जिंदगी ज्यादा राहत नहीं दे सकती, क्योंकि दुनियां सिर्फ हमारे एक मन पर नहीं चलती। इस दुनियां में अगर हमें सार्थकता से जीना है, तो तय करना होगा की मन के अनुरूप संयम भी रखेगें और इस चिंतन के बाद ही कोई मह्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे । प्रतिकूल परिणाम की अवस्था को सहजता से सहन भी करेंगे।

कर्म ही धर्म….. जीवन को बेहतर तभी हम बना सकते है, जब हमारा मन किसी भी कार्य में अपनी पूर्णता को उसमें लगा दे। मन और उम्र इनकी आपसी समझ ही हमें सही कर्म करने का बोध करा सकते है। मनुष्य एक विचित्र प्राणी है, वो, अपने मन की सबसे ज्यादा तो सुनता ही है, पर कभी कभी उसके कारण अपनी नैतिकता भरी आत्मा का भी समर्पण अनैतिकता के सामने करवा देता है,और ऐसे कार्यो का परिणाम जीवन के लिए सुखद नहीं हो सकते। जो भी संसार में सफल हुए, उनका मन पर पूर्ण सन्तुलन रहा, तभी तो साधारण तरह से जी कर वो अपने कर्म से असाधारण बन गए। कर्म में लगा मन असफलता से कभी नही घबराता, उलटे उसको सफलता का कारण बना देता है।
स्टीफन डोली ने तभी तो कहा ” अगर आदमी कुछ करना चाहता, तो वो रास्ता निकाल लेता है, और जो नहीं कुछ करना चाहते वो मन का बहाना बना लेते है”।

इस लिये बेहतर जीवन शैली यही सलाह देती है कि मन की जरुर सुनिए पर उससे कर्म क्षेत्र को कभी प्रभावित मत होने दीजिये, क्योंकि कर्म ही धर्म है, बिना कर्म का जीवन शर्म है, हताशा है।

सयंम ही जीवन ..जैसे, बिना ब्रेक की गाड़ी का दुर्घटनाग्रस्त होना एक बार नहीं कई बार तय है, वैसे ही, बिना सयंम का जीवन सदा मुसीबतों को आमन्त्रित करता रहेगा। हम आखिर इन्सान है, कितनी मुसीबतों का मुकाबला एक साथ करते रहेंगे। Reverend Jesse Jackson लिखतें है कि ” storms come, and they are so personal, they seem to know your address and have the key to your house” कहना न होगा, अप्रत्यक्ष रुप में वो मन की ही बात कर रहे है, तूफानों को निमंत्रण असंयत मन ही दे सकता है। परन्तु, यहां कहना यह भूल नहीं होगी की मन आत्मा का पावर हाउस है, उसके बिना जीवन में अन्धकार ही रहता है, अत: मन को समझना जितना जरूरी है, उतना ही उसे अनुशासन में रहने का प्रशिक्षण देना। आत्मविश्लेषण मन को पवित्र करता है, और ध्यान उसे अमृत पान करा, उसे देवता बना देता है। अत: बेहतर जीवन शैली हम सबकों यह याद दिलाती है:-

“खुदी को कर बुलंद इतना
कि हर खता से पहले
खुदा, खुद बन्दे से पूछे
की बता, तेरी रजा क्या है”

कहने की बात यही है, की समझदार इंसान अपने मन से ही सारे सवाल कर उसे समझदार बनाता है, और मन को ऐसे संभाल कर रखता है, जैसे अपनी दौलत को। मन को नकारिये भी मत, समझदारी से उसे अपना बनाना हमें ही सीखना होगा। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम आर्थिक युग में रह रहे, हम आपसी समझदारी को भूल जीवन के हर नैतिक क्षेत्र की अवहेलना अर्थ प्राप्त करने के लिए करते है।अपने किसी भी जीवन मूल्य सिद्धांत को अर्थ के लिए दाव पर लगाना जितना सहज होता है,उतना ही असहज हो जाता है, उसका दूरगामी परिणाम सहन करना। संयम से अगर मन को हम यहां न समझाते है, तो निश्चित है, हम अपनी आत्मा को लालच के दलदल में फंसा रहे और कह नहीं सकते उसका इस दलदल से कब उद्धार होगा ?

बेहतर जीवन शैली कभी भी अर्थ उर्पाजन का विरोध नहीं करती, खाली हमें यह बताना चाहती है, कि आखिर नैतिकता भी तो जीवन में मायना रखती है, जीने का मकसद खाली शान शौकत भी नहीं होना चाहिए। कोई हमे यह आश्वासन भी नहीं दे रहा कि इस जन्म की सारी सुविधाएं हम अगले जन्म के लिए, स्थांतरण कर सकते है। हजारों उदाहरण शास्त्रों और इतिहास में मिलेंगे, जब राजा महाराजाओं ने अपनी विलासिता छोड़ सन्यासी बन गए और जीवन को नये आयाम देकर अपने ही लिए नहीं पूरी मानवता का मार्ग दर्शन किया। आधुनिक युग में भी बहुत कम उदाहरण ऐसे मिलते है, जिन्होंने सब कुछ सुलभ होते हुए भी संयम और कम साधनों से जीवन को आंतरिक सुंदरता का उपहार दिया। कहना न होगा की इस सन्दर्भ में गांधीजी और शास्त्रीजी का जीवन प्रेरणा लेने लायक रहा।…….क्रमश…

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली…भाग ९..अंश १..प्रेम..अमृत बेहतर जीवन का..कमल भंसाली

माना, हमारी आजकी जीवन शैली में “प्रेम” शब्द बड़ा भ्रमित करता है, परन्तु इसके बराबर अमृतमय शब्द शायद ही दूसरा होगा। इसकी सही परिभाषा को मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है जितना इसका प्रयोग दैनिक जीवन में दूसरों को आश्वस्त करने में किया जाता है । हालांकि कबीर दास जी इसे अढ़ाई अक्षरों का महत्व्पूर्ण जीवनसूत्र बताते है, परन्तु उनकी यह मीमांसा आज के दौर में कितनी सार्थकता रखती है, कह नहीं सकते। गौर करते है, जरा कबीर दास जी की इस परिभाषा पर जो उन्होंने दोहें के रुप में इस तरह सुनाया।
‘ पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोई
ढ़ाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होई’
कबीर दास जी के अनुसार सिर्फ ग्रन्थ पढ़नें से कोई ज्ञानी नहीं होता, अगर कोई इन्सान अढ़ाई अक्षर वाले प्रेम को जान ले, तो उनके अनुसार उससे बड़ा ज्ञानी इस संसार में कोई नहीं है । सही भी है, क्यों की बिन प्रेम जीवन अधूरा ही लगता है ? चाहे हम अपने आपको कितना ही ज्ञानी और सफल इन्सान मानें, प्रेम बिना सेवा और भक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।

कहते है, युग बदलता है, जीवन उद्धेश्य बदलते है और उनके साथ परिभाषाऐं भी बदल जाती है। संत कबीरदास ने जिस प्रेम को समझने का जिक्र किया, वो उनके युग के अनुसार सहज था। शायद उस समय प्रेम प्रदर्शित नहीं होते हुए भी अहसासिस्त था। अनुभूति का विकास प्रेम तत्व के अनुसार ही मन में जगह बना लेता था । प्रेम की प्राप्ति से मनुष्य आत्म ज्ञानी हो जाता था क्यों कि अर्थ और विज्ञान का संक्षिप्त प्रभाव आदमी की जीवन शैली पर था, नैतिकता और संस्कार को जीवन शैली में मुख्य दर्जा प्राप्त था। प्रेम को परिभाषित करने से पूर्व उसे आंतरिकता की शुद्ध तराजू पर अहसास के बाटो से तोलना जरुरी है। मन में हजारों तत्व का समावेश होता है, उसमे प्रेम और शक की भूमिका से जीवन को अछूता नहीं रखा जा सकता। क्योंकि आज का प्रेम अवधि के धरातल पर अपनी सही जगह तलाशने में असमर्थ सा है ? प्रेम का महत्व जीवन में हर उम्र के लिए अति जरुरी है। मनुष्य जिस क्षण धरती पर आता है, उसी क्षण से प्रेम को समझने की कोशिश करता है, सच तो यही है कि मनुष्य प्रेम की क्रिया का ही उत्पादन है। बच्चा बन कर वो प्रेम के अहसास से अपने को पहचाने की कौशिश करता है, उम्र ज्यों ज्यों आगे बढ़ती है, वो प्रेम के अनुसार ही अपने जीवन को सजाने में लगा रहता है। आज हम बेहतर जीवन शैली में प्रेम के अनुदान पर विस्तृत चर्चा करना चाहेंगे, आइये, उस से पहले प्रेम शब्द की परिभाषा पर नजर डालते है।

प्रेम का शाब्दिक अर्थ होता है, प्रीति, प्यार, माया, लोभ और लगाव आदि, परन्तु इसमे कई उपसर्ग जोड़कर कई साहित्यिक परिभाषा तैयार की गई । इन परिभाषाओ के अलावा ऐसे कई शब्द भी है, जिनमे प्रेम का भरपूर अनुदान रहता है, जैसे ममता,आशक्ति और भक्ति।

अंग्रेजी में LOVE, AFFECTION आदि शब्दों द्वारा प्रेम को व्यक्त या उसका इजहार किया जाता है। बड़ी विडम्बना है कि हम अपनी भाषा के शब्दों की जगह विदेशी भाषा का सहारा अपने अहसास को जताने में करने लगे है। कई ज्ञानी गुरुओं का मानना है, “प्रेम शब्द जितना खुड़दरा है उतना ही शुद्ध है, इसको जितना शब्दों की पोलिश से चमकाया जायेगा
उतनी इसकी कीमत प्रेम के बाजार में बढ़ती जायेगी”। परन्तु प्रेम हीरे की तरह स्थूल नहीं है अत: इसकी चमक की अवधि अस्थायी ही मानी जाती है । प्रेम को परिभाषित करके कबीरदास जी ने प्रेम की अवधि और सार्थकता के बारे में कुछ इस तरह बताया..
‘घड़ी चढे, घड़ी उतरे , वो तो प्रेम न हो
अघट प्रेम ही ह्रदय बसे, प्रेम कहिये सोय’
कबीरजी इस दोहें के द्वारा यह समझाना चाहते हैं कि हर क्षण बदलने वाला स्वभाव प्रेम को आत्मसात नहीं कर सकता अतः उसे प्रेम नहीं कहा जा सकता, जिसमे कुछ रूपांतर नहीं बदलता और स्थिरता रहती वो ही प्रेम कहला सकता हैं।

आइये, हम आगे बढ़ते है, और यह जाननें की बेहतर कोशिश करते है कि शारीरिक संरचना में प्रेम क्या भूमिका मानव जीवन में और संसार के अन्य प्राणियों में निभाता है ? यह तो तय हैं की प्रेम एक तत्व है, जिसके बिना किसी भी सजीव जीव का प्रसार होना नामुमकिन है । सृष्टि की संरचना करने वाले को इसका सहारा लेना पड़ा क्योंकि इसके बिना सृष्टि का विकास होना मुश्किल था। पर क्या अकेला प्रेम इसमे सक्षम था, नहीं, अतः उसने इंसानी शरीर को दो स्वरुप् में बनाया। एक पुरुषत्व युक्त दूसरा नारीत्व युक्त, दोनों में कुछ अंतर शारीरिक और मानसिक स्तर पर रखकर दुनिया में उनकी भूमिका तय कर दी, दोनों ने ही सृष्टिकर्ता को निराश नहीं किया। कई विपरीत तत्वों का समावेश दोनों में होते हुए भी उनका प्रेम के मामले में एकागार होना आश्चर्यजनक और अभूतपुर्व ही कहा जाएगा।

प्रेम अदृश्य तत्व होकर भी काफी महत्व पूर्ण भूमिका संसार संचालन में निभा रहा है, प्रेम बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती उसी तरह हमारी दैनिक जीवन शैली इसके बिना बेहतर नहीं हो सकती। हमारा अब तक चिंतन प्रेम की रुपरेखा समझने तक ही सीमित था, जिससें हम प्रेम के महत्व को समझ सके।

आइये, हम जानने की कोशिश करते है, मनोवैज्ञानिक प्रेम के बारे में क्या विचार रखते है।…..
एरिक फ्रॉम में प्रेम की परिचित मान्यताओं का मूल्यांकन कर अपनी पुस्तक ” The art of loving “में कबीर दास जी के सूत्र को सम्बल दिया कि प्रेम को ज्ञान की जरुरत होती है। उनका यह भी मानना था, कि जो खुद से प्रेम कर सकता है, वही दूसरों से भी प्रेम कर सकता है। हकीकत में, फ्रॉम ने स्त्री-पुरुष के प्रेम को साक्ष्य मानकर ही नहीं दूसरे कई पहलुओं पर गौर कर प्रेम के सभी स्वरूपों का विस्तार से विश्लेषण किया। फ्रॉम ने फ्रायड के ‘लिबिडों’ सिद्धान्त को नकार दिया जिसमे उनके मुताबिक़ प्रेम सिर्फ यौन संवेगों की अभिव्यक्ति है। फ्रॉम ने माना प्रेम का मतलब मातृत्व प्रेम, बन्धुवत प्रेम, रागात्मक प्रेम, इश्वरीय प्रेम और आत्म-प्रेम।
भारतीय दार्शनिक गुरु रजनीश कहतें है कि ” अततः देह और दिमाग की सारी बाधाओं को पार कर जो व्यक्ति प्रेम में स्थित हो जाता है, सच मानों वही सचमुच का प्रेम करता है। उसका प्रेम आपसे कुछ ले नहीं सकता, आपकों सब कुछ दे सकता है। तब ऐसे प्रेम का परिणाम करुणा ही माना जाना चाहिए”।
क्रमश……

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली भाग ५ अंतिम अंश…..कमल भंसाली

“परिवार”..इन्सान की सबसे सुंदर व्यवस्था, कई प्रकार के संक्रमणकारी रोगों से ग्रस्त हो गया है, अपनी कमजोरी के कारण बुलन्द आवाज में नहीं धीमे आवाज में अपनी अंतिम स्थिति का आगाज सभी को दे रहा है । आज “बेहतर जीवन शैली”के इस भाग में, हम अंतिम बार यह चर्चा करें कि आखिर क्या परिवार का अस्तित्त्व बचाया जा सकता है ? परन्तु उस से पहले जानते है, कि आखिर परिवार की प्रभाव शालीनता पर कौन से घातक हथियारों ने आक्रमण किया ?
इतिहास के पन्नों में एक उदाहरण प्रभावशाली परिवार का हम याद करें, जिसमे भगवान राम ने पिता के आदेशों का पालन कर परिवार की गरिमा को एक नया मजबूत स्थान दिया. जबकि वो स्वयं भगवान थे । युग परिवर्तन के आज के दौर से थोड़े समय पहले तक परिवार अपनी लय में चल रहा था, परन्तु आदमी को जैसे जैसे अति स्वतंत्रता का चस्का लगा, वैसे वैसे परिवार नवीन रोगों से ग्रसित होने लगा। इसी सन्दर्भ में हम दो प्रमुख कारणों का अवलोकन करते है ।

1.. विचार धाराओं की टकराहट….एक आदमी अपने जीवन काल में कम से कम तीन पीढ़ियों का सामना करता है, एक जिस से आया, दूसरी खुद की, तीसरी अपनी सन्तान की । प्रथम से वो सीखता, दूसरा यानी,खुद पालन या संशोधन करता, तीसरी को वो जो विरासत में आगे दे जाता। हर पीढ़ी के अपने कुछ परिवर्तन होते है, जो समय, काल और जगह के कारण जरूरी बन जाते है, उनकी अवेहलना करने से आपसी टकराहट की संभावनाये परिवार में बढ़ जाती है । बड़े बुजर्ग के पास अनुभव और संयम होते हुए आजकल तटस्थ की भूमिका में रहते, क्योंकि यह राम का युग नहीं, कलियुग है, जहां आदेश पालन कराना,मुश्किल ही होता है। यह बात नहीं की पहले भी विरोध नहीं होता था, परन्तु नीति गत और विधि गत विरोध को समर्थन सामाजिक मूल्यों पर ही मिलता। समाज की पृष्ठभूमि आज से ज्यादा सशक्त उस समय थी। उस समय खान पान और पहनावे सब तय थे, उनमे संस्कारों के कारण विद्रोह कम था, शिक्षा से ज्यादा आत्मा का प्रयोग चिंतन में किया जाता था। सर्व हिताय: सर्व सुखाय: को ध्यान में रख कर ही इंसानी चिंतन रहता था।
देश स्वतंत्र हुआ, कई परिवारों का पलायन अपने निश्चित स्थानों से देश विभाजन के कारण करना पड़ा। आर्थिक तंगी का दौर था, फिर भी परिवार अपनी गरिमा नहीं भूला। परन्तु मानव मन अब अपना संयम अब खो चूका है। वो भोगवादी और लालसा वादी पाश्चात्य संस्कृति का दीवाना बन गया। दीवानगी में विचारों का महत्व नगण्य ही होता है।अतः यह रोग लाइलाज है, क्योंकि इसमे परिवार के सभी तंतु विपरीतता में काम करते है.

2. असंस्कारित आजादी…पहले परिवार में सीमित आजादी होती थी, परिवार एक अपने ही संविधान से बंधा होता था। राजनीति के चतुर खिलाड़ीआचार्य चाणक्य की उस समय की सर्वश्रेष्ठ परिवार की परिभाषा का आज नगण्य अस्तित्व ही नजर आता है, फिर भी एक बार गौर करते है, उन्होंने क्या कहा,
“जहां सदा आनंद की तरंगे उठती हैं, पुत्र और पुत्रिया बुद्धिमान और बुद्धिमती, पत्नी मधुरभाषिणि, परिश्रम से कमाया विपुल धन, उत्तम मित्र, पत्नी से अनुराग, नौकर से अच्छी सेवा मिलती हों। अतिथि का आदर, परमात्मा की उपासना, श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग होता रहे- ऐसा घर धन्य और प्रशंसनीय है”
आचार्य चाणक्य का बताया पूर्ण ऐसा परिवार अब कल्पना की सीमा रेखाओं से दूर होकर एक सुहावनी कल्पना ही रह गया, परन्तु सत्य यह भी है की ऐसे परिवारों का पहले अस्तित्व था । आज जीवन पूर्ण निजी हो गया, अतः परिवार भी स्वार्थी हो गया और भीतरी राजनीति का शिकार हो गया। परिवार और देश का अस्तित्व का आंकलन तभी किया जा सकता है, जब उनमे कुछ झलक सार्वजनकिता की हों।

उपरोक्त दो कारणों के अलावा परिवार और भी कई छोटी छोटी बीमारियों से ग्रसित है, जब तक उसकी उम्र है, परिवार बेहतर जीवन शैली का एक पहलू सदा रहेगा । देवलोक और नर्क का अगर अस्तित्व हम नहीं नकारते तो परिवार बिना कैसे बेहतर जीवन शैली की कल्पना की जा सकती है।

दोस्तों बेहतर जीवन शैली के इस भाग में परिवार के बारे में हमने काफी अंतरंगता से चिंतन किया, आप अपने विचार और अनुभव अगर लिखना चाहते है, तो अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।भारतीय समाज और संस्कृति परिवार का सुख सदा लेती रही हैं, आज भी परिवार ये सुख देने के लिए तैयार खड़ा है, हम ही अपनी नादानी और नासमझी से इस सुख से धीरे धीरे विमुख हो रहे है । नई पीढ़ी को इस पर कुछ समय निकाल कर मनन करना चाहिये कि परिवार का अस्तित्व ही उनके लिए सुरक्षित भविष्य की रुपरेखा तैयार कर सकता है।जवानी के सारे भ्रम बुढ़ापा और बीमारी इन्सान को दर्द की प्रस्तर मूर्ति बना देता है।

समय अब भी है, परन्तु बागडोर नई पीढी के स्वयं के हाथों में है, उन्हें ही तय करना है, अपना भविष्य !
ये जरूर याद रखे… परिवार से अच्छी सौगात इस संसार में दूसरी हमें मिलनी आसान नहीं होगी, क्योंकि “सुखी परिवार ही सच्चा जीवन आधार”।

चलते चलते…..

जवानी रम है, तो बुढ़ापा गम
परिवार है तो नशा भी कम
दर्द और गम दोनों भी खत्म
परिवार यानी जीवन का संगम..

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली…भाग ५ अंश २..संपन्नता का आधार..परिवार

भारतीय परिवेश में परिवार की उष्णता आज भी बरकरार है, हालांकि,आर्थिक और संचारिक प्रणाली ने कहीं इसकी गरिमा बढ़ाई तो कहीं इसकी आस्था को ठेस भी पँहुचाई । आज दोस्तों, हम परिवार की आत्मा के बारे में चिंतन करने की चेष्टा करते है। अगर शास्त्रों की माने तो परिवार का इतिहास मानव विकास के हजारों वर्ष बाद हुआ। शुरुआती मानव, दैनिक देह कर्म में ही लगा रहता, प्रकृति के दिए फल और शिकार आदि से अपनी क्षुधा शांत करता।परन्तु, जब से उसने दिमाग से काम लेना शुरु किया, तब उसने परिवार और समाज का निर्माण करना शुरु कर दिया। आज परिवार शब्द कई नई कठिन परिस्थितियों का सामना कर संकुचित होने कि स्थिति में जा रहा है। हम अभी तो यह नहीं कह सकते कि आनेवाले समय में “परिवार” शब्द इतिहास बन जाएगा, परन्तु यह तो तय है कि स्थिति खतरनाक मोड़ पर है ।अगर हम इस विचारधारा के कायल है और हम मानते है कि परिवार का अस्तित्व मानव कल्याण के लिए जरुरी है, तब हम साथ में बने रहे और अपने विचारों से इस प्रयास को साथ दे, कि परिवार सुखी जीवन के लिए जरुरी है।

समय साक्षी रहेगा, जो nuclear family (एकल परिवार) के शुभचिंतक है, उन्हें अपनी भूल समझ में आ जायेगी परन्तु तब तक शायद बहुत देर हो जाए । वक्त की बात है कि जो परिवारों के सहयोग से बने, आज वही इस व्यवस्था का विरोध कर रहे है ।इतिहास भी गवाही दे सकता है, कि महान आत्माए परिवार के संस्कारों के ही प्रयास से निखरती है। सभी जानते है की आज साधन और अर्थ जीवन की महत्व पूर्ण जरुरत है, परन्तु ऐसा तो पहले भी वक्त के अनुसार रहता था। सवाल उठता है कि, फिर परिवार को क्यों नकारा जाता है ? क्यों परिवारों में स्नहे, प्यार, सहानुभूति, और सेवा की कमी हो गई । माँ, बाप और बुजर्गो के साथ युवकों के सम्बन्ध क्यों गरिमापूर्ण नहीं रहे ? क्यों नारी का संस्कारी स्वभाव अपनी सुंदरता खो रहा है ? क्यों भाई, बहन, सासु, ससुर, बहू के समबन्ध नई परिभाषा खोज रहे है ? रिश्तेदार और पड़ोसियो के समबन्ध अजनबी बन रहे है ? सवाल कई है, जिन्हें समझना और उनका समाधान निकलना अब मुश्किल ही लग रहा है। फिर भी आशा यही करेंगे की भविष्य के गर्भ में कुछ सुधार के रास्ते जरुर निकलेंगे और हर परिवार फिर से मुस्करायेगा।

परिवार आखिर किस बात की कमी महसूस कर रहा है, जिससे आज वो उदासियों का दर्द भोग रहा है, यह जानना भी नितांत जरूरी है, अतः इसके बारे मे अगर थोड़ी चर्चा करें तो अनुचित नहीं होगा ।

आखिर परिवार में ऐसा क्या मिलता है, जो हम इतनी चिंता करते है ?…..

1 सुरक्षा.. परिवार बुरे समय में छतरी का काम करता है। कभी जब इंसान शारीरिक, मानसिक और आर्थिक लाचारी भोगता है, तो उस समय परिवार अपनी पूर्ण संगठित शक्ति से उसका सहयोग करता है । विभिन्न परिसिथ्तियों में अगर कोई सकारत्मक ऊर्जा प्रदान करता है, उसे परिवार के नाम से जाना जाता है ।

2.संस्कार….संसार में व्यवहार ही अर्थ के साथ चलता है, समय पर अर्थ के बिना व्यवहार काम निकाल देता है। सहयोग व्यवहार से ही मिल सकता है, धन साधन खरीद सकता है, पर सहयोग दिल से नहीं। व्यवहार संस्कार के बिना नहीं मिलता और संस्कार का विश्वविद्यालय परिवार ही होता हैं ।

3. सहयोग… बिन मांगे सहयोग देने कोई आता है, वो परिवार ही होता है ।

4. दर्द निवारक.. आज शारीरिक और मानसिक दर्द इतनी तरह के पनप रहें कि हर दर्द के पीछे किसी तन्हाई की कहानी होती है, पर सुनने वाले नदारद है । ऐसी स्थिति के जिम्मेदार आज हम ही है, जो आर्थिक मजबूरी के बहाने अपनों से दूर हो गये। अगर यह दुरी रिश्तों के प्रति सही भावना से होती तो हम सिर्फ शरीर से ही दूर होते, मन से नहीं। अति स्वतन्त्रता की चाह तथा मार्ग दर्शन की कम अपेक्षा ने, जीने के सही तत्वों को नकार दिया। परिवार इस तरह के भटकाव को रोकने में पूर्ण सक्षम होता है। स्नेह भरे दो शब्द चाहे किसी भी तरह के सम्बन्ध से मिले तो गम काफी कमजोर पड़ जाते है । कभी एक कहानी सुनी थी, किसी विधवा माँ का एकलौता बेटा युद्ध के मैदान में शहीद हो गया, जब उसका शव माँ के पास भेजा गया तो सारा गांव इस शौक के समय उस के घर के बार इकठ्ठा हो गया। माँ ने जब अपने इकलौते पुत्र को इस अवस्था में देखा तो दुःख से जड़ हो गयी। वों बिना पलके झपके मृत बेटे का शव एक टक काफी देर तक अपलक देखती रहीं, न मुंह से कोई बोल फूटे, न ही क्रंदन किया। हालात ने उसे गम के तासीर का यही रुप दिया, वो अबला अपने बिगड़ते भविष्य के सामने लाचार खड़ी थी। गांववाले भी चिंतित थे, अचानक कई बुजर्गों की आवाज हवा में फैल गई की इसे रुलाना जरूरी है, नहीं तो यह दुःख से मर जायेगी। अतः अथक प्रयास के बाद उसे रोना आया, उसे कई तरह के दिलासें दिए गए। इस तरह उसे वापस जीवन धारा में लाया गया।
यह चिंतन और मनन की बात हैं कि परिवार और समाज बिना क्या जीवन सुरक्षित रह पायेगा ? खासकर जब परिस्थितियां विपरीत दिशा में जा रहीं हो

5.आनन्द का स्त्रोत… कभी मैंने ताराचन्द बड़जात्या की बनाई पारिवारिक फ़िल्म “हम आपके हैं कौन ” देखी थी। भारतीय फ़िल्म इतिहास में परिवार पर इससे सुंदर फ़िल्म शायद ही बनी हो, उस में दर्शाया गया की परिवार के साथ में मिलकर रहने से उल्लास किन किन नई परिभाषाओं से जीवन सजाता है, जब हम परिवार और समाज से जुड़े होते है । अकेली और बिना नियम की स्वतन्त्रता सिर्फ तन्हाई ही ला सकती है, एक अच्छा और विशिष्ठ भविष्य नहीं ।

6. मार्ग दर्शक…मैं अनजान हूं, किसी शहर में और मुझे अपने गन्तव्य तक पहुंचना है, मैं नहीं समझ पा रहा कि मुझको को किधर जाना तो इन परिसिथतियों में निश्चित ही जरूरत होगी, कि मुझकों कोई सही रास्ता बताये और मैं शीघ्र ही अपनी मंजिल तक पँहुच जाऊ। ठीक इसी तरह कभी हमें जीवन के चौराहे पर खड़ा होना पड़े और असमंजस स्थिति हों तो परिवार या कोई अच्छा दोस्त ही हमें सही मार्ग का अवलोकन करा सकता है ।

7, चरित्र निर्माण… एक कहावत हम सभी ने सुनी है की अगर धन चला गया, कोई बात नही, स्वास्थ्य कमजोर पड़ रहा तो चिंता की बात है, परन्तु चरित्र चला गया तो फिर जीवन कहां है ?,चरित्र चरित्र ही रहेगा, उसके बिना शरीर बिना आत्मा का हो जाता है। आधुनिकता के दर्प में अगर कोई चरित्र को झुठलाना चाहता है, तो समय उसे खोखला कर देता है। किसी भी व्यवसायिक क्षेत्र में हम चले जाए, हमारे चरित्र के प्रति पहली उत्सुकता जरूर आंकी जायेगी। नौकरी को ही लीजिये, हमें चरित्र प्रमाण पत्र की जरूरत जरूर पड़ती है, या नौकरी प्रदाता हमारे चाल चलन के बारे में जानकारी जरुर करेंगे ।
ध्यान देने की बात है, उनके लिए, जो परिवार को नकारने की कौशिश कर रहे है । वो जिस सफलता को अपनी बता रहे है, उसकी बुनियाद या नीव किसने रखी..जानता हूँ, उत्तर यही होगा..माता,पिता,परिवार और गुरु । सोचिये, हम अपने बच्चों को क्या दे रहे है, हमारा दायित्व उन्हें क्या देने का बोध करा रहा है ?

8. संपति निर्माण…आज का युग आधुनिकता के साथ, असंयमित विचारों का है। हर रोज नये नये आराम और मनोरंजन के साधन मनुष्य को ललचाकर उसे भोगवादी बनाने को प्रेरित करने में, विज्ञापनों का भरपूर उपयोग करने में लगे है, और असहाय मानव इस जाल में बुरी तरह जकड़ गया। हाल यह हो गया की, हर साधन आवशयक लगने लगता है। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया वाली कहावत सत्यता स्थापित करने लगी। महीना शेष नहीं होता उससे पहले इतने बिल के कागज जेब में भर जाते कि, उन्हें चुकाने की परेशानी से तनाव ग्रस्त हो जाता है। इस समय परिवार ही एक ऐसा साधन है, जो इस समस्या का समाधान काफी हद तक संयुक्त प्रयोग प्रणाली के द्वारा काफी बिना जरूरत के खर्चो को बचत में बदल सकता है। शर्त यही है, की परिवार में प्रेम और आपसी समझ हो, तथा संपति निर्माण में सभी की रूचि हो।
Morio Puzo, ने अपने उपन्यास The Family में लिखा ” The strength of family , like strength of army, is in its loyalty to each other” . इतिहास के पन्नों में हमारे देश कुछ परिवार अपने पारिवारिक समूह के नाम से आज भी पहचाने जाते है, जैसे बिड़ला, टाटा, मोदी और मफतलाल तथा इस तरह के और भी छोटे छोटे कई परिवार हमें आसपास दिखायी देते है, जिनकी आर्थिक सफलता का राज, उनका संगठित होना है।तय है, सम्पत्ति सम्मति से ही बढ़ती है ।

9. धर्म और मानव कल्याण….. ये दो भावनाये परिवार की पृष्ठ भूमि से ही जन्म लेती है। धर्म इन्सान को कर्म के पथ पर सात्विक ऊर्जा प्रदान करके, उसे साधनो के अति उपयोग से होने वाले आत्मिक हानि का बोध कराता रहता है, और मानव कल्याण अति विशिष्ठ होने को प्रेरित करता रहता हैं।

Marianne E Neifert ने Dr. Mom’s Parenting guide में लिखा की ” The family is both the fundamental unit of society as well as the root of culture. It – is a perpetuate source of encouragement, advocacy, assurance and the emotional refuelling that empowers. a child to venture with confidence into the great world and to become all that he can be”…….MARIANNE E NEIFERT …..DR. MOM’S PARENT IN GUIDE.

क्रमश ……

चलते चलते….
दोस्तों…….
कुछ आस्था आधार ढुंढलो
कुछ अपनों पर एतवार करलों
परिवार का सुखद अनुभव पाकर
संसार मुट्ठी में कर लों……..

कमल भंसाली