“क्रोध”….एक चिंतन…कमल भंसाली

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हकीकत में, क्रोध हमारी दैनिक मजबूरी है, किसी न किसी बात पर हम क्रोधित होते रहते है, गुस्सा करते रहते है । यह जानते हुए भी कि यह शांति के विरुद्ध की क्रिया है, आ जाता है, तो इसका नियमन और संयमन करना काफी कठिन है ।आइये, जानने कि कोशिश करते है, क्यों क्रोध के आगे मजबूर हो जाते है ?, हालांकि स्वयं को नुकसान करने वाली यह क्रिया नुकसान ही ज्यादा करती है।

किसी ज्ञानी आदमी से जब किसी ने यह सवाल किया कि इंसान का सबसे बड़ी दुश्मनी कौन निभाता है,? तो महापुरुष ने जबाब दिया, ” क्रोध या गुस्सा उसका सबसे बड़ा शत्रु है, जिसे बिना नुकसान के नियंत्रण करना बहुत कठिन होता है।” महापुरुष ने सही जबाब दिया। आज के सामजिक परिवेश पर गौर करने से लगता है, देश, प्रदेश, समाज, धार्मिक पंथ और परिवार इस अवगुण के शिकार हो चुके है। क्रोध में ज्यादा अंश ज्वल शीलता का होने के कारण असहनीय होता है, और क्रोध करने वाला इसका स्वयं ही शिकार होता है, इससे उसके शारीरिक अंगों पर विपरीत और नुकसानदेह प्रभाव तो पड़ते ही है, साथ में मन और आत्मा भी नकारत्मक्ता से प्रभावित होती है। क्रोध की स्थिति में विवेक दिमाग से बाहर भाग जाता है, और अनिष्टता को तांडव मचाने की स्वतन्त्रता मिल जाती है। आइये, जानते है, क्रोध में शरीर की क्या स्थिति हो सकती है। शरीर विशेषज्ञो केअनुसार सबसे पहला असर इसका दिमाग के साथ ह्रदय के सम्पर्क पर पड़ता है, और इंसान के रक्त प्रवाह में अनियमिता शुरु हो जाती है, इससे दिल पर पड़नेवाला प्रभाव कभी कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है। निश्चित है, क्रोध रक्त प्रवाह को धमनियों में असहजता प्रदान करता है, और इस असहजता से हर मानव अंग घबराता है। हालांकि चिकित्सक कहते है, क्रोध एक स्वभाविक प्रक्रिया है, गलत लगने वाले किसी आचरण पर इसका आना सहज है, परन्तु सीमा रेखा के अतर्गत रहे, तो जीवन की सक्षमता को भी दर्शाता है।साफ़ हो जाता है, क्रोध को सिर्फ अवगुण की श्रेणी में हम नहीं रख सकते, जब तक इसका दायरा असहनीय न हों।अति क्रोध का दूसरा प्रभाव सम्बंधों और आपसी रिश्तों पर पड़ता है, कहना न होगा, इनसे रिश्तें टूटते है, और उनका वापस वास्तविक स्तर पर आना मुश्किल होता है। यहां संयम से गुस्सा या क्रोध को रोकना ही उचित होता है। चूँकि, क्रोध की विभिन्न किस्म होती है, तदानुसार उसका रुप भी अलग अलग नाम से जाना जाता है। गुस्सा, द्वेष, बदला, आघात, आक्रमण, ईष्या, रौद्र, भयंकर, आदि स्वरुप क्रोध परिवार के सदस्य है।

चूँकि क्रोध काफी हद तक भावनाओं से सम्बन्ध रखता है, खासकर जिनमें तनाव होता है, तो आदमी सिर्फ उसके एक ही पहलू पर गौर करता है, उसे लगता है, उसका इस परिस्थिति में क्रोध करना जायज था, चाहे उसका चिंतन सही न हों। क्रोध का बचपन गुस्सा है, जो किसी भी तरह की विपरीत स्थिति से पैदा होता है। गुस्सा जब तक जायज रहता है, तब तक एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह बाहर शांत रहता है, पर भीतर ही भीतर उसमें विद्रोह की ललक रहती है। इसलिए गुस्से को नियंत्रण की बात हर ज्ञानी आदमी करता है। कहते है, वो आदमी देवता होता है, जिसे क्रोध नहीं आता, परन्तु इसको सत्य नहीं कह सकतें, क्योंकि देवताओं की कहानियों में ऐसे बहुत उदाहरण है, जिसमे देवता भी कुपित होते है, परन्तु ज्यादातर उनका क्रोध अन्याय से सम्बंधित होने के कारण, उनके क्रोध को न्यायोचित बताया गया है।

आखिर, क्रोध आता ही क्यों है ? मानते है, क्रोध जीवन का हिस्सा है, हमारा यह संसार क्रोध के कई कारणों को एक के कार्य से दूसरों को एक कारण क्रोध का दे देता, जब उसमे किसी की भावनाओं को ठेस पंहुचती है। हम अपने जन्म के बाद कई ऐसे दृश्य देखते जिनमे क्रोध, गुस्सा या उसके समकक्ष कोई तत्व हमें आहत करता है, वो जब हमारे चेहरे पर नापसंदगी का भाव दिखाता है, और गुस्से की प्रक्रिया से हम वाकिफ हो जाते है। फ़्रांस के मनोवैज्ञानिक जैक्स लुकान के अनुसार “क्रोध एक मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध है, किसी भी तरह के हमले का अहसास होने पर स्वत: ही हमारी शारीरक प्रणाली उसके लिए तैयार हो जाती है, सक्षमता से मुकाबला करने के लिए”। वो आगे यह भी मानते है, कि यह कमजोरी को छुपाने का मानव ब्रह्मशस्त्र है। हमें. क्रोध जब आता है, जब हम आहत होते दिल से, पर क्रोध और आहत में एक दुरी है, इस दुरी में ही अगर हम संयमित हो जाते है, तो क्रोध को आने से रोका जा सकता है।

क्रोध को कभी भी प्रमाणिक नहीं माना जा सकता, न ही उसे शीघ्र अनुशासित किया जा सकता, क्योंकि यह सदा विवेक के विरुद्ध काम करता है। क्रोध का कारण कुछ भी हो सकता है, झूठ, अन्याय,फरेब, हिंसा, ईष्या, द्वेष, जलन, व्यवस्था, सम्बन्ध या और कोई के प्रति असन्तोष, क्रोध और गुस्सा का कारण हो सकता है। मान लीजिये, कभी हमें कोई काम के लिए, कहीं अति शीघ्र पहुंचना है, और रास्ता किसी कारणवश जाम है, तो अनायस ही हमें ट्रैफिक व्यवस्था पर गुस्सा आने लगता है, यहीं से क्रोध की प्रारम्भिक अवस्था शुरु हो सकती है, अगर जाम किसी कारण काफी देर तक नहीं हटे। प्रारम्भिक अवस्था में क्रोध को सन्तुलित किया जा सकता है। अगर इसे यहां सन्तुलन नहीं करते, तो पता नहीं आगे जाकर यह कहां बिना बरसने वाले बादल की तरह फटेगा, और इसका शिकार वो भी हो सकता है, जिस का कोई दोष नहीं।

क्रोध मानव स्वभाव की एक स्वभाविक क्रिया है, इससे बचने से किसी भी नई समस्या का आगमन रुकता है। अतः जब हम कभी आहत होते है, तो दिल हि दिल में यह स्वीकार कर लेना चाहियें कि हाँ, यहां “मैं आहत हो रहा हूं, पर मुझे धैर्य रखना हैं”। यह चिंतन, गुस्सा कम करने में काम कर सकता है। सारांश यही है, क्रोध, गुस्सा या इसका कोई भी रुप किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, ये किसी भी नगण्य कारण को विध्वंसक बना सकता है। जायज या नाजायज का क्रोध से कोई तालुकात नहीं, अनिष्ट्टता को जन्म देते, इसे देरी नहीं लगती। किसी भी सम्बन्ध और रिश्ते के लिए यह परमाणु बम से कम नहीं है। परन्तु इसका यह भी मतलब नहीं कोई हमेंआघात दे रहा है, हमारे दिल को ठेस पंहुचा रहा है, हम उसे सहन करते रहें, तो हम एक कमजोर व्यक्तित्त्व वाले इंसान कह लाये जा सकते है। संयम, धैर्य और मजबूत चिंतन से हम उसका प्रतिरोध कर सकते है। कहते है, इंसान की आँखों में उसके ठोस इरादों की झलक रहती है, और सामनेवाले के लिए यह समझने की समझ, कि उसके सामने कौन है ? अतः बहादुरी रखे, अनायास क्रोध को धैर्य से वापस भेज दे। इससे हम पूर्ण सुखी न हो, पर हमारी शारीरिक क्षमता को आघात नहीं पँहुचेगा, यह तय है।

चलते चलते…आइये पढ़ते है, क्रोध पर कुछ महापुरुष क्या कहते है…

” क्रोध वह तेज़ाब है, जो किसी भी चीज पर, जिस पर वह डाला जाये, से ज्यादा उस पात्र को अधिक हानि पंहुचा सकता है, जिसमे वह रखा है” ****मार्क ट्वेन
” क्रोध वो हवा है, जो बुद्धि का दीप बुझा देती है” **** रॉबर्ट ग्रीन इन्गे सोर्ल

” क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है, इससे आप ही जलते है” ***** भगवान गौतम बुद्ध

” हर एक मिनट जिसमे आप क्रोधित रहते है, आप 60 सेकेण्ड की मन की शांति खोते है” ***** रॉल्फ वाल्डो इमर्सन

इसके अलावा दोस्तों, भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय 2 श्लोक 63 में क्रोध पर कहा है…

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम: ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।। 2-63 ॥

( क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से मानव अपनी स्थिति से गिर जाता है।)

सन्त कबीर दास जी ने क्रोध पर सही चिंतन धारा दी, उस पर एक नजर डालते है ।

जहाँ दया वहां धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध वहाँ काल है, जहाँ क्षमा वहाँ आप ।।

आज के आधुनिक युग में अति क्रोध आर्थिक नुकसान भी करता है, इसके कई उदाहरण हमारे सामने आते है, जब मान सम्मान के मुकदमों के निर्णय हम तक पहुंचते है।

चिंतन यही है, गुस्सा आने से पहले हम चिंतन करे ” क्या अति गुस्सा जायज है” ?…….कमल भंसाली

नकारत्मकता से सकारत्मक्ता का सफर.एक दृष्टिकोण ..बेहतर जीवन शैली भाग ११ अंश २

सच ही कहा है, किसी ने नजरअंदाज कर देने से कोई भी अदृश्य नहीं होता, यह रवैया जिंदगी के कर्म क्षेत्र में शायद ही हमें कोई सफलता का सूत्र दे , अपितु हमारा एक कदम असफलता की तरफ मोड़ सकता है। नकारत्मक्ता जिंदगी की से पैदा हुई समस्याओं का कोई भी उपचार सरल नहीं होता, सामने कोई कठिन समस्या हमें आती दिख रही हो, और हम उस पर गौर नहीं करे, यह हमारी सकारत्मक सोच तो नहीं कह जा सकती। बेहतर जीवन शैली एक यात्रा ही है
नकारत्मकता से सकारत्मक्ता की, क्यों नहीं आज हम इसी यात्रा सम्बंधित चर्चा करे।

भगवान बुद्ध ने कहा जिसने मरण को समझ लिया, उसने जीवन को समझ लिया। उन्होंने जिस भी सन्दर्भ में कहा हो,
पर इसमे एक संकेत है, जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते, यही की हर प्रारंभ्भ का अंत जरुर है। हमारी दैनिक दिनचर्या की जब हम शुरुआत करते है, तो कई कार्यों में कुछ अनसुलझी समस्याएं भी रहती है। हमें उन समस्याओं का समाधान अगर करना है, तो उनका सही विश्लेषण ही कारगर उपाय सूझा सकता है। अगर हम सही परिणाम के विरुद्ध जाते है तो शक्ति क्षय ही होना है। ऐसी समस्याओं में उनके विपरीत परिणाम को मानने से क्षति भी सीमित होगी। एक बात यहां स्पष्ट करनी जरुरी है, कि जहां सही सिद्धान्तों की रक्षा करनी जरुरी हों, वहा संघर्ष जारी रखना उचित होगा। हमारा देश आज भी नैतिकता के मामले में कमजोर हो रहा है, जबकि शिक्षा का विस्तार तेजी से हो रहा है। धर्म, कर्म के महत्व पूर्ण ज्ञान की यहां नदियां बहती है, परन्तु उसका सदुपयोग कम होता है। आडम्बरों से दूषित होने वाली ज्ञान गंगा को सब साफ़ रखने की हिदायत तो जरुर देते है, पर जरुरत पड़ने पर वहीं उसको मैली करने में संकोच नहीं करते है। इसे हम हमारी कमजोरी ही माने, यह ही सही होगा।

भगवान बुद्ध ने मरण को समझने की बात कहकर बहुत से दृष्टिकोणों की तरफ इशारा किया, मरण यानी मृत्यु या फिर मौत हम इसे किसी भी नाम से पुकारे, हकीकत यही है, कि यह जीवन रेखा का अंतिम किनारा है। यह रेखा सिर्फ प्राणियों के लिए ही नहीं, अपितु संसार की सभी संचालित पद्धतियों पर भी लागू होती है। दूसरे रुप में इसका स्वरुप बदल जाए, पर सीमा यह तय ही रखती है। हम किसी भी समस्या को ले ले, उसका भी अंत तो तय है, स्वरुप और परिणाम चाहे हमारे पक्ष में नहीं भी हो। वास्तिवकता यही कहती है, हम अगर यह समझ जाते है, तो कोई भी परिणाम हमे झकझोर नहीं सकता और शायद न ही जर्जर और कमजोर कर सकता।

कहते है, बहुत सारी मानवीय समस्याएं परिस्थितियों से नहीं मानव के व्यवहार से पैदा होती है, और उनका निदान प्राकृतिक गुणों से ही सही ढंग से किया जाता। यह भी हमें बताया गया कि ‘क्रोध’ और ‘असंयम’ दो ऐसे जीवाणु है, जो अगर जीवन में लग गए तो विनाश का प्रथम चरण शुरु कर देते है, प्रारम्भ में ही अगर इनका इलाज “प्रेम” से कर दिया जाय, तो कैंसर की तरह फैलने की कम संभावना रहती है। सवाल उठ सकता है, “प्रेम” ही क्यों ? इसका सबसे बड़ा कारण मनोवैज्ञानिकों ने बताया प्रेम में शीतलता और विश्वाश दोनों का समावेश रहता है, जो पीड़ित को सकारत्मक ऊर्जा प्रदान करता है। किसी भी इलाज की पहली जरुरत है, कि हम अपने दिमाग को व्यवहार सिखाये, उसे सही के लिये सहमत होना जरूरी है। महान चिंतक अलफ्रेड नार्थ के अनुसार ” We cannot think first and act afterward”। अलेक्स. फ. ओसबोर्न ने अपनी पुस्तक “Applied Imagination” में किसी भी समस्या का समाधान करने के लिए कुछ सुझाव दिए है, उस मे सबसे महत्व्पूर्ण पहला कदम किसी भी समस्या के समाधान की शुरुआत उसका सही विश्लेषण बताया। उनके अनुसार समस्या की कोई न उम्र होती है और न ही उसकी सीमारेखा। सही और सटीक एक कदम किसी भी समस्या का निदान करने की क्षमता रखता है। वहीं बुर्क बार्टन के अनुसार ” जो अपने में विश्वास नहीं करते, वो कोई भी समस्या को नहीं सुलझा सकते”।भारतीय चिंतकों की अगर बात करे तो वो ज्यादातर भगवान का सहारा लेने की बात करते है। परन्तु हकीकत के पन्ने यही कहते है, जिसने बिना फल की आशा किये, कर्म को महत्व दिया, वो अपनी कई समस्याओं का समाधान स्वतः ही पा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म का सही संदेश दिया है, यही काफी सही समाधान हमारी समस्याओं का कर सकता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोsस्त्वकर्मणि ।।
(कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर नहीं। कर्म को फल की इच्छा से कभी मत करो, तथा कर्म ना करने में भी कोई आशक्ति न हो।)

‘गीता’ ही नहीं प्रा:य सभी धर्मो के ग्रन्थों ने कर्म और परिश्रम को ही जीवन बदलने वाला शस्त्र माना है। परन्तु कर्म में जब तक आस्था का समावेश न हो, तो परिणाम अनचाहे ही मिलेंगे। जीवन सब दिन परिवर्तन के अनुरुप अपनी क्षमता का विकास तभी करता है, जब हम अपने जीवन को स्वच्छ और साफ़ रखे। सहनशीलता, धैर्य, प्रेम, धर्म, सच्चाई ये पांच तत्व है, जो जीवन को बेहतर जीवन शैली प्रदान करते है। दैनिक जीवन में आधुनिकीकरण से नकारत्मकता की जड़े काफी मजबूत हो गई, इसका कारण उपरोक्त पांच तत्वों का समावेश दैनिक जीवन में काफी कम हो गया। अब अनुसन्धान करने वाले भी मान रहे है कि कई विपदाये तो मनुष्य से ही निर्मित ही होती है। प्रकृति ने प्राणियों को सुख के साधन देने में कभी कोताही नहीं बरती पर मानव ने सदा उसका दुरुपयोग ज्यादा किया, निश्चिन्त है, कीमत तो चुकानी ही होगी। इसलिए हमारा सुधार होना जरुरी है, हमे अपनी आदते, चिंतन,कर्म का तरीका सभी को प्रकृति अनुकूल बनाना शुरु कर देना चाहिए।

नकारत्मक चिंतन अगर हमारे जीवन को धुंधला कर रहा है, हमें असमाजिक दृष्टि से देखा जाता है, और हम ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे और हमारा व्यक्तित्व दबा दबा रहता है। मनोविज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करने से कुछ दिशा निर्देश हमें मिल सकते है। कुछ संकेत उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है। उनसे हम अपने दृष्टिकोणों का समय समय पर मूल्यांकन करे, तो जीवन को सही राह की तरफ ले जाया जा सकता है।

1. हमारी आयु अनिश्चित है।
2. जितना उपयोग हम साधनों का करते है, उससे स्वास्थ्य और दिमाग का सन्तुलन न बिगड़े।
3. नैतिकता पर ही हमारी स्वतन्त्रता इतराती है, नैतिकता का अवमूल्यंन न हो, यही सही दृष्टिकोण है।
4. सही कर्म से ही जीवन को आनन्द मिलता है।
5. गुनाह कितना ही छोटा क्यों न हो, हानिकारक ही होता है। सांप का बच्चे का क्या छोटा ,क्या बड़ा होना ?
6. एक असत्य आदमी को कई तरह से बीमार करता है, संभव हो तो बचना चाहिए।
7. आधी से ज्यादा समस्याएं एक सत्य के द्वारा सुलझाई जा सकती है।
8. अनुशासन जीवन को बांधता नहीं, उसे बहुमूल्य बनाता है।
9. प्रेम में विश्वास की विशेष भूमिका होती है।
10. आस्था ही धर्म का पहला चिंतन है।
11. रिश्तों की गरिमा ही उत्सव प्रदान करता है
12. मानवता के प्रति हमारी गंभीर जिम्मेदारी होती है।
13. प्रकृति का सही उपयोग ही हमें स्वस्थ रख सकता है।
14. इज्जत और सम्मान की जितनी चाह हमारी, उतनी ही सबकी।
15. माता, पिता और परिवार से खुशियों का आभाश हो सकता है।

ऐसे और भी कई जीवन उपयोगी चिंतन हम साहित्य और धार्मिक गर्न्थो से प्राप्त कर जीवन को बेहतर शैली से सुंदर बना सकते है।

माँ पूर्णानन्द ने अपने किसी प्रवचन में कहा ” जो मैं अपनी इच्छा से करता हूं, वो मेरे दिमाग की अपनी दासता है। जो मुझे करना चाहिए,वो करता हूं, सफलता पाने के लिए। परन्तु जो कुदरत के अनुसार घटित होता है,उसे सच्चे दिल से स्वीकार करता हूं, वो भगवान की कृपा है” घटनाकर्मो से युक्त संसार में अगर हम धैर्य से सब सुख-दुःख सहजता से सहन कर लेते है, तो यकीन मानिए हम जीवन बेहतर जीवन शैली के अनुसार ही जी रहे है। एक सन्तोषपूर्ण जीवन आनन्द का अनुपम स्त्रोत होता है। हमें नहीं भूलना चाहिए आखिर इस संसार में हम कुछ समय के यात्री है, हमारा उद्धेश्य यहां की व्यवस्था को प्रेम, भक्ति, संयम, धैर्य, और कर्म के द्वारा समझ आनन्द सहित निष्कलंक वापस लौट जाना है।…….कमल भंसाली

कमल भंसाली