चलना था, चलता ही रहा….

मानव जन्म, इम्तिहान है,
इसलिए
जीवन, कठिनता देता रहा
रास्ता, बीहड़ होता रहा
मंजिले,लाख बार मुझ से दूर होती रही
पर
जिन्दगी महकती रही, मैं मुस्कराता रहा
चलना था, चलता ही रहा…

याद नहीं कब आया, अँधेरा
कहां गुजरा तब था, सवेरा
कब हुई, खुशियों की बरसात
कब टूटे, मेरे दिल के जज्बात
जिन्दगी भटकती रही, मैं संभलता रहा
चलना था, चलता ही रहा….

याद नहीं, कहां कड़ी धूप आई
कब, मैने सुखद छांव पाई
कहां मैं जीता, कहां हार पाई
कहां रुका, कहां मैने मार खाई
जिन्दगी झुकती रही, मैं उठता रहा
चलना था, चलता ही रहा…

याद नहीं, कौन था,अपना
कौन था पराया, अप्रिय सपना
कर्म ही था, उनसे मेरा मिलना
नियति थी, उनसे बिछड़ जाना
जिन्दगी उलझती रही, मैं देखता रहा
चलना था, चलता ही रहा

याद नहीं कौन थे, मेंरे वो
उनके आकार में,खोता रहा
उनकी, आँखों को निहारता रहा
जीवन को सहलाता रहा
जिन्दगी मायूस होती रही, मैं प्रार्थना करता रहा…

कमल भंसाली