ये कैसी बयार…..कमल भंसाली…

image

ये, कैसी हवा, आज फिजा में बह रही
सांस लेने पर, थोड़ी घुटन सी हो रही
वक्त का दरिया, शायद धीरे से सूख रहा
हर कोई, वक्त के लिए परेशां, तरस रहा

समय बदल रहा, या फिर, इंसान बहक रहा
कुछ बात तो है, जो कोई, भी, नहीं समझ रहा
पूर्ण, परिवार का गुलदस्ता टूट कर बिखर रहा
हर फूल, अपना अलग अस्तित्व तलाश रहा

अर्थ की धरा पर, स्वार्थ के फूल उगाए जा रहे
मकसद की पूजा कर, उसी पर चढ़ाये जा रहे
दिखावटी प्रेम के लिए, हर कोई गले मिल रहा
बुरे, समय पर मिलने से, कतरा कर निकल रहा

ये कैसी बयार है, समय से पहले दिशा बदल रही
जवानी आने से , पहले बुढ़ापा का संकेत दे रही
आशाओं के बादल छितरा, शंकित तमस बिछा रही
प्यार के नाम पर, सूखे फूलों को हरा भरा बता रही

कथनी और करनी के फर्क का नहीं रहा,अफ़सोस
जहर पी रहे या अमृत, क्या फर्क,? बुझ रही प्यास
आडंबरों से सजा धर्म, सत्य, में नहीं करता विश्वास
अंहिसा के दामन से निकल रहा, हिंसा का प्रकाश

बागवां की बदनसीबी देखों, लगाया चमन बदल गया
खुशियों का पैमाना, बदनसीबी के आंसुओं से भर गया
कल तक की जिसकी निगरानी, वही फल दगा दे गया
जिंदगी के सारे अनुभवों को शर्मिंदगी का अहसास दे गया……कमल भंसाली

सुबह की अनुपम सैर

आ मेरे दिल, करे सुबह की अनुपम सैर
देख पर्वतों से निकल रही, सुनहरी भोर
कल कल बहता, नीर करे मृदुल मृदुल शौर
संजीदा होकर भास्कर, बिखर रहा चारों ओर
बहते झरनों का देख, नाच रहा मन का मोर
आ मेरे दिल…

देख दिल, मगन होकर गगन की ओर
कैसे झुक रहा, संगिनी वसुंधरा की ओर
कशिश संगमन बन रही, घटा घनघोर
बहती बयार से मन बन हो गया, चितचोर
देख सुहावनी सुबह हुई कितनी, मनहोर
आ मेरे दिल…

देख प्रकृति कैसे फूलों से सजाती, उपवन
कलियों की मुस्कराहट, भँवरो का गुंजन
तितलयों का उड़ना, पक्षियों का क्रंदन
पेड़ झूम झूम उड़ा रहे, जीवन का स्पंदन
मन बहक बहक कर भाग रहा, चारों और
आ मेरे दिल…..

नदी नाले देख, देख हरी भरी घाटिया
इंद्रधनुषी रंगों से सज रही, सारी वादिया
बीजांकुर हो रहे पौधे,गीत गा रही बिसुनी
प्रणय से भरपूर झील में तैर रहे, हंस हंसिनी
प्रफुलित मन संजो रहा, नव ऊर्जा धरोहर
आ मेरे दिल …..

शीत काल का आया सदाबहार, नवल दौर,
कर हर दिन दिल, युवा सुबह की सैर
सांसो में भर ले उषा ओजोन,भरपूर
स्वस्थ रहेगा, तूं होकर तनावों से दूर
खिलता रहेगा, तेरा “कमल” तेरे अंदर
आ मेरे दिल……

कमल भंसाली