👿रिश्ते👿कमल भंसाली

जिन रिश्तों में दिल नहीं दिमाग नजर आये
उनमें अपनेपन की छावं कम ही नजर आये
अति पास होकर भी दूर की आवाज बन जाये
रिश्तों का ये स्वरुप देखकर मन घबरा जाये

माना स्वयं स्वार्थ में रचा बंधा है जग सारा
पर प्यार के सैलाब में ही बहता जग सारा
टूट जाता जब दिल तो कोई अपना नहीं लगता
रिश्तों की दुनिया मे आदमी अकेला सब सहता

कुछ रिश्तों की अपनी ही होती मजबूरिया
नजदीक के होकर भी उनकी अपनी दूरियां
दस्तूर निभाता जीवन ये सब कुछ सह लेता
पर अपनों के दिये दर्द से कभी उभर न पाता

नये युग का एक ही फलसफा है मेरे भैया
इस युग में प्यार से बड़ा है ठनठनाता रुपया
बुद्धि और भाग्य से जिसने भी इसे जब पाया
वो रिश्तों के प्रति संकुचित होते नजर आया

पर कुछ भी कह लो रिश्तों का पेड़ अब भी हरा
शरीर जब जबाब दे तब रिश्तों से मिलता सहारा
सम्बन्ध होते बुनियादी हर अस्तित्व के ये प्रहरी
रिश्तों बिना संभव नहीं होती है दस्तूरी दुनियादारी

“फूल से भी नाजुक से होते रिश्ते
व्यवहार की खाद से पोषित होते
अपनेपन के जल से सींचे जाते
त्यागी धूप से सदा फूल बन खिलते
“महक है जीवन की” हम, कहते हर “रिश्ते”

रचियता✍💝कमल भंसाली

🚩सुख निर्माण 🙋कमल भंसाली

दुःखी मन सुख की चाह न कर
ये संसार सिर्फ तुम्हारा ही नहीं
जो मिल रहा उसी पर गुजारा कर
परछाइयों का कोई अस्तित्व नहीं

आशा निराशा जीवन की डगर
चलते रहना, छोटा सा है, सफर
कोई नहीं अपना, न कोई पराया
रिश्तों की माला में दुःख समाया

बन्धित रिश्तों में दुःख बेशुमार
जलन ज्यादा, मन रहता बीमार
जो तेरा पिछले जन्म का उधार
चुकता करता, इस जन्म का प्यार

लेन देन में रचा गया मिथ्या संसार
कैसे बन सकता सुख का आसार !
तेरे मेरे की बुनियाद में उलझा प्यार
ख़ुशी के कुछ पल ही करता तैयार

भोले से मन बिन पर्यश्रु कर यह स्वीकार
निस्पृह आत्मा ही है.सुख का दृढ़ आधार
मुस्करा कर दे दे, भ्रमित अंधेरों को विदा
“त्याग” ही सुख निर्माणक , याद रख सदा

रचियता….कमल भंसाली

संगम दो जीवन का ★★🎂 कमल भंसाली🎂

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दोस्तों, जीवन के दो रिश्ते दिल की आपसी सहमति से तय होते है, एक “पति-पत्नी” का, दूसरा “दोस्ती” का। दोनों ही रिश्तों की कमजोरी होती है, “गलत फहमी”, दोनों को हि विश्वास की डोरी चाहिए। दोस्ती के रिश्ते में दरार आने के कई कारण हो सकते है, परन्तु दाम्पत्य जीवन में गलतफहमी सबसे खतरनाक बीमारी मानी जाती है, इससे बचना बहुत जरुरी होता है, क्योंकि यह जीवन समर्थक बन्धन है। अभिमान में कोई भी कह सकता है, मैं क्यों परवाह करुं पर हकीकत यही कहती है, यह रिश्ता परवाह करने के लिए बनाया गया है। धर्म शास्त्रों ने इस रिश्ते में अपनी सारी शुभता दी है, ताकि मानव अपने आपको विषम स्थिति में अकेला अनुभव न करे, अपने लिए सुखद भविष्य तैयार कर सके। नर-नारी सृजनकारी होते है, उनसे भविष्य निर्माण होता है, सभी के लिए। कितना अभूतपूर्व है, यह बन्धन। फिर भी आज, इतने “तलाक” ! विस्मय की बात जिस बन्धन में दिल बिना कोई गाँठ बंधा रह सकता है, उसमे ही गाँठ लगाने की जरुरत हो जाती है। मेरा प्रयास इतना ही है, आज के युगल इस बात को समझे, और थोड़ी नम्रता से चिंतन करे, “प्रेम” अमृत की बून्द है, सुख-दुःख झेलनेवाली छतरी है। गलतफेमियों का शिकार इस रिश्ते को न बनाये, वक्त उन्ही को सुखी करता, जो हर रिश्ते की कदर करते है। मैं कोई प्रशिक्षित कवि नहीं हूं, सिर्फ अपनी भावनाये प्रकट करने के लिए लिखता हूं, अतः इसे एक संदेश ही समझे। मैंने इस विषय पर और भी कविताये लिखी है, जो इस ब्लॉग साईड पर उपलब्ध है, पढ़कर सुझाव जरुर दे। “धन्यवाद”।

उस राह की क्या बात करुं
जो तुम तक नहीं पहुंचती
उस याद को क्या समझुं
जो तुम्हे कभी नहीं आती

प्यार किया, उससे इंकार नही
पर गुलाम कहलाऊँ, स्वीकार नहीं
हकीकत यही है, प्यार बन्धन है
दो दिलों की एक नायाब मंजिल है

वक्त कोई फ़रिश्ता नहीं
पर कसौटी है, हर रिश्ते की
जिस सम्बन्ध की डोर कमजोर
तय,उस की उम्र ज्यादा नहीं

चाह थी, गुलशन का हर फूल
जैसी तेरी मुस्कान रहे
हम दोनों की निगाहों में
आपसी दर्द की पहचान रहे

भूल हुई हमसे, छोटी सी सही
कुछ तुमने की, कुछ मुझ से हुई
रास्ता, जब एक सामने
पता, नहीं, फिर
मंजिल, हमसे क्यों दूर हुई

आओं, गिला, शिकवा को
नाप लेते
फिर, से दिल
टटोल लेते
एक बून्द “प्यार” की
अपने दिल में तलाश लेते

न तेरे पास हों, अभिमान
न मेरे पास शान
अब है, दो जान
और एक प्राण
यही है, वो सवेरा
यह घर न तेरा, न मेरा
है, सिर्फ “हमारा”

हम दो
छोटी सी जिंदगी
उसमे कितना कुछ कर जाते
अब नादानी को
अलविदा कहकर, मुस्करा जाते
हमसफ़र है, दोनों
“आ”
दूनिया अपनी, फिर सजा लेते…कमल भंसाली

आत्मिक बन्धन…१५, फ़रवरी, १९७६ ..एक याद “शायर” के नाम….कमल भंसाली

दोस्तों, हकीकत यही कहती है, कि जीवन सचमुच, एक सुहाना सफर ही नहीं, एक रोमांचित करने वाली जीवन यात्रा है। इस यात्रा में अनेक तरह की राहों से गुजरना पड़ता है, कई तरह के मोड़, कई तरह की चुनौतियां का सामना करना पड़ता है। हमने भी आज से उनचालीस साल पहले माता पिता के शुभ आशीष से जीवन साथी बन एक जिम्मेदारियों पूर्ण यात्रा का शुभारंभ किया। समय की गति के बदलाव के साथ, कई स्टेशनों का अवलोकन करते करते, हम आत्मिक जीवन पर्यटन स्थलों की और निरन्तर अग्रसर है, आशा है, आप सभी की शुभेच्छाओं से यह यात्रा अंत तक रोमांचक और सही लक्ष्य तक हमारे संयुक्त जीवन को ले जायेगी….
“शायर”, जीवन संगिनी की भूमिका को सशक्ति से आज भी निभा रही है, प्रभु से यही प्रार्थना है, उसे स्वस्थ और खुश रखे।
उपहार स्वरूप् प्यार और स्नेह भरी चन्द पंक्तिया जो दिल से लिखी गयी…..

कल का जीवन
मुझे, आज भी लगता सुहावना
क्योंकि, तुम आज भी जानती हों
मेरा, हर कदम का साथ निभाना

कल की ही, तो बात है
हाँ, मुझे याद है,
उन चालीस साल पहले
कि, वो शुभ सुहावनी
आज की जैसी रात
हमारी जवानी, हमारे अहसास
बन्ध गये थे, लेकर अनजाने विश्वास
उससे आज तक का सफर
हर दिन बना दिया
तुमने उत्तरोत्तर, बेहतर,बेहत्तर

जीवन संगिनी,
शुक्रगुजार हूँ, तुम्हारा
वक्त ने किया
जब भी किनारा
तुम्हीं ने दिया
अपने कन्धों का सहारा
दूर होती मंजिले
पास होने का
अहसास देती रही
जिंदगी यों ही
चलती रही
तेरी हल्की सी मुस्कान
राह बताती रहीं

आ, मिल कर
फिर, दीप जलाते
यादों के सफर
के मुसाफिर बन
गहराई से प्रेम को
आत्मा की
ज्योति बनाते
तन को मन के
पवित्र धागों से
बाँध, फिर एक बार
आत्म-मिलन
की सुहानी रात बनाते
संग रहकर
प्रार्थनामय होकर
मांगे वरदान
जन्मों जन्मों तक
तेरा, मेरा, साथ रहे
हम, जैसे भी रहे
खुश रहे, मनमीत रहे……

कमल भंसाली

गौतम का मोक्ष बन्धन……कमल भंसाली….


“जैन शास्त्रों में कहीं एक प्रसंग आता है, उसके अनुसार भगवान महावीर के विशेष शिष्य के रुप में “गौतम” का नाम आता है। यह भी माना जाता है, कि विशेष होते हुए भी गौतम को निर्वाण नहीं प्राप्त हों रहा था, जबकि उनसे बाद में बनने वाले कई शिष्यों को केवलज्ञान प्राप्त हो गया। कहते है, गौतम हताशा के शिकार हो गये और भगवान महावीर ने उन्हें सपनें में उसका कारण उनके प्रति गौतम का मोह बताया और इस स्थिति पर आत्म चिंतन कर आत्मा को सब तरह के सांसारिक बन्धनों से मुक्त करने के करने की राय दी। इस कविता का “गौतम” सिर्फ कविता का सम्पर्क शूत्र ही है। भगवान महावीर का गौतम तो अति विशिष्ठ थे । मेरा गौतम तो एक आम इन्सान है और संभाविक है, की और कई तरह की बाधाये मोक्ष के चिंतन में आती हों। इसे अति रुप में न ले, क्योंकि आज का मानव मोक्ष के प्रति इतना चिंतनशील नहीं है, अत: गुजारिश है, कविता को किसी भी रुप में हस्तक्षेप न समझे…बस, पढ़ कर जीवन तथ्यों पर ग़ौर करें”…..कमल भंसाली

‘मुक्ति’ बोध
अनुबन्ध है, प्रकाश का
अन्धकार में
तत्व पुंज
आत्म विकास का
या शायद,
फिर आत्म कल्याण का !

तपस्या कर पर्याप्तत:
“गौतम” हुआ गंभीर
निर्वाण का द्वार
मोक्ष क्यों उस से
हो रहा है, अति दूर ?
भक्त की भक्ति
आशंकाओं की शक्ति
में समाया,
एक अनबुझ सवाल
मन और आत्मा में
तो नहीं, कहीं, कोई बवाल ?

एक सवाल
हिम खण्ड बन
हजारों उत्तरों में
पिघल रहा
एक किरण का
परिवर्तय तत्व
शायद कहीँ
खिन्न बह रहा
आत्म का इतरेतर भाव
नहीं बदल रहा
निर्वाण का स्वभाव

ध्यानस्थ हो, निहंग, गौतम
स्वंय को कर स्थापित
बना धर्माधिपति
चक्षु मण्डल की आभा में
गुरु मोह की स्मृति
बनी, विकृति की स्वीकृति
अंतिम चरण तक
कि लक्ष्मण रेखा
स्वर्ण मरीचिका को
मोह की अंधी आँखों
से ही, आज तक देखा
बन्द ही रखा, आत्मा ने
अपना, हर झरोखा
यहीं खा गया धोखा
मोक्ष अभिलाषी “गौतम”
भूल गया
निर्विकल्प है, निर्वाण
निर्वसन, आत्मा का
है, परीक्षण काल
गौतम, अपने को संभाल
हो, स्वजित
न की पराजित

प्रथम, आहट से ही
वैभव तक का सफर
संस्कृतीकृत, पर जर्जर
विषाक्त नागपाश
है,आसक्त विश्वाश
रुधिर विहिन सारांश
है, मुक्ति का प्रथम अंश
कामना वासना वंचित
हो, कर रहा, गौतम,
आत्म वंचन प्रयास
एक भूल में सब वशूल
जीवन उसी में मशगूल

रात्रि का अंतिम उपहार
जीवन लेता रहा, उधार
नासमझ मन, समझ गया
पाखण्डी, प्रेम का व्यापार
अकेला, असत्य, अधूरा ही
घूम रहा, चारोंओर
दुनिया का आधार
मोक्ष है,कहीं ओर

कुछ भी नहीं, विशुद्ध
फिर भी मृतक कौशिकायें
हो,अभिमान से हो तृप्त
पर्यश्रु, नाच रही
अभिशप्त,फलसफा जिंदगी का
स्वच्छ तप विरुद्ध
मुक्ति के झूले में झूल रहा, तन
हिलोरे ले रहा, बहता मन
आत्म उन्नति की चाह में
अस्त हो गया, हर दिन

पर्यय, कल का सूरज
भूल गया पथ
विरहन क्षण
मना रहा मातम
कहां बह गया, “गौतम”
सोच नहीं पाया
अंत नहीं, अंतिम कदम
सांस ही, सिर्फ हो रही बेदम

एक बून्द का भवसागर
कर रहा प्रतिष्टंभ
सामने मुक्ति स्तंभ
बन्धन रहित हो
मोह, तृष्णा से
कोई, एक “गौतम”
पा जायेगा, मोक्ष वंदन
यही है, चन्दन सुहासित
आत्म और मन का बन्धन
यही है, शायद
एकाकार, विशुद्ध
वीतराग, निर्वाण
और,
नश्वर जीवन का
“मुक्ति बन्धन”

कमल भंसाली

बस, एक बार मुस्करा दो, जरा …..कमल भंसाली

बस, एक बार मुस्करा दो, जरा
तस्वीर में यही रंग होता, सुनहरा
न कुछ कहों, जरा
नयनो ने भरकर सवेरा
फिर, एक बार मुस्करा दो, जरा

खुशबूओं से सीखलो, प्रस्तरना
फूलों की तरह है , इठलाना
कलियो से ले लो,अल्हड़पन
आवाज दो, बुलाओं बचपन
साँसों में भर लो, सत्य हरा
बस, एक बार मुस्करा दो, जरा

पेशानी पर नहीं हो, परेशानी
कल की बात आज, कभी नहीं
छोटी सी ही होती, ये जिंदगानी
यहां कुछ नहीं होता तेरा, मेरा
जागो तो भोर, नहीं तो अँधेरा
बस, एक बार मुस्करा दो, जरा

जग है रंगमच, बाकी कलाकार
करना है, अभिनय सदा बहार
कभी करना इकरार, कभी इंकार
ये ही है , इन साँसों का व्यवहार
समझो, क्या जादू है , इनमे भरा
बस, एक बार मुस्करा दो, जरा

मुस्कराना ही है है, जीवन बन्धन
मृदु संयोजी बन कर ही है, जीना
खामोशी में रहे, अमृत स्पंदन
नयनों को कभी नहीं है, झुकाना
मुस्कराहट का वरदान, हो तुम्हारा
बस, एक बार मुस्करा दो, जरा……

कमल भंसाली