🏃हम कहाँ जा रहे है🏃कमल भंसाली

शिर्षक : हम कहाँ जा रहे है ?

सबके अधरों पर मुस्कानों की बहार हो
हर दिल में सिर्फ, एक प्यार ही प्यार हो
ऐसा दिन आये, जिसमें स्नेह भरपूर हो
उस दिन इंसान में, देवता का अवतार हो
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आज हिंसा की बड़ी तूफानी हवाएं बह रही है
बदलती इंसानी आदतें दानवी कहर ढा रही है
आधुनिकता की दौड़ में मंजिले भटका रही है
अर्थ की पूजा में सँस्कारो की बलि चढ़ रही है

शिक्षा के बदलते आधार में बचपन जा रहा है
समय से पहले जवानी का जलवा बिखर रहा है
अंतरँगी रिश्तों को ऐतबार का बुखार सता रहा है
सेवा धर्म है, ये इश्तहार, बाजार में खूब बिक रहा है

शादी बंधन प्यार का, किस्सों में अच्छा लगता है
हक़ीक़क्त में घर के अंधेरों में, जुगनू बन रहता है
बच्चे आज भी भविष्य, अगर सब कुछ सही होता है
बढ़ते हुए गुनाहगारों से, इतिहास भी शर्मिंदा होता है

मान-सम्मान का सूर्य अब उजालों का मोहताज है
प्रतिष्ठाओं के सितारों में न चमकने वाला अंदाज है
चाँदनी जल रही है, अब ऐसी खबरों का रिवाज है
हम कहाँ जा रहे है ? अब ये, एक अंतिम ही राज है
✍️ कमल भंसाली

तिरंगे का दर्द….कमल भंसाली

दूर शहर की
छोटी सी
कच्ची तंग गली में
एक छोटे से
स्कूल में
स्वाधीनता दिवस पर
देश का
कोई कर्णधार
तिरंगा झंडा
फहरा रहा
पास में बैठे
कई अधनंगे
बच्चें मुस्करा रहे
ताली बजा रहे
कीचड़ भरी उनकी
आँखों में शायद
उनका उन्नत भविष्य
झंडे की तरह
इधर उधर लहरा रहा
लहराते झंडे ने जब
उस ओर देखा
बिन कपड़ों के
जर्जर तन की
असहाय
मुस्कराहट पर
रोना आया
उसे अपने लहराने पर
लज्जा का साया
नजर आया
सिमट कर
चिपक गया
अस्तित्व के
डंडे से
मानों मुरझा गया
सोच रहा
अब नहीं लहराना
अब नहीं इतराना
इससे अच्छा तो
शहीदों के शरीर पर
लेट जाना
तय किया लाख बार
कोई फहराले
जब तक निरीह आँखिन की
दूर नहीं हो मजबूरी
तब तक स्वाधीनता का
नहीं, मेरा देश अधिकारी
न ही उचित है, मेरा लहराना
हे प्रभु, शहीदों के इस देश
को जरा संभालना
जानता हूँ, अब तक
जो मुझे फहराते
मेरी सफेद पट्टी पर
कालिख लगाते
झूठे वादों के पुलिंदों में
अपने खुद के घर सजातें
इन मासूमों का हिस्सा भी
इन्हें नहीं पंहुचाते
शर्म, मुझे आ रही
देश उन्हें माफ़ कर रहा
करोड़ों के लुटेरे
मुझे फहरा रहे
निरीहता से ताली
बजवा रहें
हद है, उनकी बेशर्मी की
अब भी, गुनगुना रहे
जन गण मण….