” प्यार और वासना” ….एक चिंतन भरी चर्चा..भाग 2 अंश 2 ★★कमल भंसाली ★★

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“वासना” शब्द कि विडम्बना यही है, एक जायज क्रिया के साथ नाजायज की तरह व्यवहार किया जाता है। अंदर से सबका इससे आंतरिक रिश्ता होते हुए भी, इस के प्रति अवहेलना और तिरस्कार पूर्ण नजरिया रखते है। आखिर, वासना से इतनी घृणा क्यों ? क्या वासना प्रेम की एक जरूरत नहीं, क्या वासना आकांक्षाओं का सुंदर स्वरुप नहीं है ? ऐसे और भी सवाल है, जिनके उत्तर हम यहां तलाशने की कोशिश करते है, पर उससे पहले हमें वासना का सही परिचय प्राप्त करना होगा। वात्सायन ऋषि थे, उन्होंने वासना एक स्वरूप कामवासना के बारे में बहुत कुछ लिखा, उन्होंने भी स्वीकार किया, बिना वासना प्रेम का अस्तित्व नहीं है, हकीकत में बिना वासना प्राणी जीवन धरती पर आ नहीं सकता। ये संसार बनानेवाले की महत्व पूर्ण चिंतन का वास्तविक कारण है, अतः वासना शब्द से नफरत करना कहीं भी जायज नहीं लगता। यहां यह बताना जरुरी है, अभी, हम यहां कामवासना नहीं, सिर्फ वासना के बारे में बात कर रहे है। दोनों में बुनियादी फर्क इतना ही है, काम का शरीर से, और वासना का मन से सम्बन्ध है। अतः कामवासना का मतलब हुआ, मन की दैहिक या शारीरिक वासना। जब की वासना का इंगित रुख सिर्फ मन और आत्मा से जुड़ा है, जिसे इंग्लिश में हम “Lust” के नाम परिचित है, हालांकि दोनों जीवन साथी है।

वासना का शाब्दिक अर्थ पर बिना गौर किये, उसके बारे में सही मूल्यांकन प्राप्त करना असंभव है, वासना का सही अर्थ है, कामना, इच्छा ( जैसे मन की वासना ), भावना ( जैसे काम वासना ), अज्ञान, ( जैसे वासना का तिरोहित होना )। गौर कीजिये, कौन सा प्रेम है, जिसमे कामना, भावना और अज्ञान का समावेश न हों। किसी भी रिश्ते के प्रेम में इसके किसी एक तत्व का समावेश तो रहेगा। माँ के रिश्ते पर गौर करे, तो इसमे भविष्य की सुरक्षा तिरोहित है। हमारी विडम्बना है, हम सत्य से दूर भागते रहते है, उसका सामना करना, हमारे वश कि बात नहीं है। हम प्रेम की बात करते है, पर जब वासना से सम्बंधित कोई चर्चा आती है, तो मानों हम असभ्य लोगों के प्रदेश का सफर कर रहे है। समझने की बात है, शरीर प्रेम से बना है, और जिंदगी भर प्रेम पाने में अपना अस्तित्व खो देता है, ज्यादातर असफल होकर इस संसार से विदा भी हो जाते है। असफलता का एक ही कारण है, उसने प्रेम में तो वासना को ढूंढा, पर वासना में प्रेम ढूंढने से वो कतराता रहा। मूल के प्रति उसका लगाव कम होता, ब्याज के आकर्षण में ही फंसता है, यह मानव स्वभाव है।

वासना शारीरक और मानसिक क्षमता को पूर्ण करने वाला महत्वपूर्ण सूत्र है, इसकी अवहेलना करना, अपने अस्तित्व को नकारना जैसा है। शरीर सम्बन्धी वासना एक दैहिक क्रिया है, इसके अलग अलग स्वरुप है। भारतीय संस्कृति इसके एक ही स्वरुप को मान्यता देती है, वो है, पति-पत्नी के रिश्तों में, जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त हो गई है। पर, वास्तिवकता यहीं है, अब यह एक विश्वास का प्रश्न है, जिसका उत्तर भी शायद सही न हो, पर यह सही है, आज रिश्तों के दूसरे दायरों में भी इसे स्वीकार किया जाता है। दैहिक वासना का स्वरूप आधुनिकता ने इतना बिगाड़ दिया, की समलैंगिता के सम्बंधों की मान्यता के लिए आंदोलन होने लगे है, कई देशो में जिनमे हमारा देश भी शामिल है, उन्हें मान्यता देने के करीब पँहुच रहे है। हकीकत यही कहती है, जो भी कर लो, अपने स्वार्थी आयाम बदल लो, पर प्रकृति अपने उद्धेश्य से कभी नहीं भटकती है, मानव भटकता है, और अपना नाश वो खुद ही अपनी हरकतों से खुद ही कर लेता है। चूँकि हमारा यह विषय यहां नहीं है, अतः हम इसे वक्त के ऊपर ही छोड़ देते है। बाकी हम को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए, कि वासना से हम भी वंचित नहीं रह सकते, परन्तु उचित और अनुचित के दायरे में रहे, तो जीवन निर्णायक पथ का हकदार बन जाता हैं।

वासना का मनोज्ञान करना है, तो “आत्मा” शब्द पर आस्था जरुरी है, जो इस सरंचना के पक्ष को नहीं पहचाने की कोशिश करते, उनके लिए वासना दरिंदगी से ज्यादा कुछ नहीं हो सकती, हकीकत में वो सामाजिक सुरक्षा पर आक्रमण करने वाले दानव बन जाते है। काम, शरीर की स्वभाविक और प्राकृतिक क्रिया है, सुंदरता से काम विचलित होता है। काम जब संयमित नहीं रहता, तो उसका सौंदर्य बोध अपराधिक आकार में बदल जाता है, और अत्याचार और दुराचार की सारी सीमाये लांघने की कोशिश करता है। आत्मा की पवित्रता इसे रोकने की जबरदस्त कोशिश करती है, धर्म के प्रति आस्था की बातें समझाती है, इसके बावजूद भी अगर वासना का रुप नहीं बदलता, तो मानवता को अनिष्टता झेलनी पड़ती है। आज साधनों की अतिरिक्तता ने हमारी चाहतों पर तेज गति के पंख लगा दिए है, हमारी इच्छायें अनियमित हो रही है, काया को सुखी करने माया की जरुरत बढ़ रही है, तब हमें समय कहां, ये चिंतन करने का कि नैतिकता हमारी आत्मा में किधर सो रही है।

जेस सी स्कॉट के अनुसार “मानव कला का बेहतरीन नमूना है”। कुछ मानको में ऐसा ही लगता है, बनाने वाले ने उसमे हर तरह के रंग का प्रयोग किया है। जब चित्र सुंदर हो तो निश्चित है, उसकी चाहत सभी को होती है, नारी-पुरुष का शरीर जब कलाकार की उत्तम कृति हो, तो चाहत को वासना के सन्दर्भ ही मूल्यांकित करना ठीक होगा, प्रेम तो भीतरी तत्व है, उस में चाहत को तलाशना, सही नहीं कहा जा सकता। नो रस से बना प्राणी, किसी भी रस से अछूता कैसे रह सकता है ? ज्ञानी से ज्ञानी आदमी कह नहीं सकता, उसके पास एक भी चाहत नहीं है। जयशंकर प्रसाद का एक काव्य ग्रन्थ ” कामायनी” है, उनकी इस रचना की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है, हमें अहसास दिलाता कि मानव मन का दर्पण गुण और अवगुण नहीं दिखाता, वो तो उसकी सही मानसिकता की पहचान कराता है, समयनुसार वो उनसे अपनी बुद्धि और विवेक से उनसे अपना श्रृंगार करता है। फ्रायड ने वासना को दैहिक जरूरत माना, और उसने इसकी सीमित स्वतंत्रता को उचित ठहराने में कई परीक्षणों का उदाहरण दिया। कार्ल जुंग स्विट्जरलैंड के एक प्रतिभाशाली मनोवैज्ञानिक और धर्म शास्त्रों के जानकार थे, शुरुवाती दौर में वो फ्रायड के मनोविज्ञान के ज्ञान से प्रभावित थे, परन्तु वो उनकी इस बात से कभी सहमत नहीं हुए कि मानव वासना एवं अन्य इच्छाओं का दास है। 1937, में जुंग भारत आये, और महर्षि रमन के सानिध्य से समझ गए कि ” मानव के भीतर असीमित शक्तियां है, यदि वासनाओं एवं इच्छाओं का रूपांतरण कर दिया जाय तो मानव जीवन एक अनमोल वरदान साबित हो सकता है”।

प्रेम और वासना दोनों को समझना आसान नहीं होता, ऊपरी सतह पर हम इनका विश्लेषण आत्मा और शरीर की प्रक्रिया के रुप में ही करते है, पर जब कभी हमें प्रेम को कसौटी पर कसना पड़ता है, तो हमें लगाव रुपी वासना का सामना करना ही पड़ेगा। वासना मानव मन की सबसे बड़ी दुर्बलता है, क्योंकि जिन तीन तृष्णाओं से मन बंधा दासत्व भोगता है, उसमें कामतृष्णा, भव तृष्णा और विभव तृष्णा
तीनों का संगम होता है। समझने की बात है, संसार पुरुष और नारी द्वारा बना है, उनका आपसी आकर्षण असामान्य नहीं हो सकता क्योंकि दोनों के लिए रुप, शब्द, गंध, रस और स्पर्श से बढ़करअन्य कोई आलंबन नहीं होता । ओशो यानि आचार्य रजनीश के अनुसार “निषेध” मन के लिए निमंत्रण है, विरोध मन के लिए बुलावा है, और मनुष्य जाति इस मन को बिना समझे आज तक जीने की कौशिश करती रही है। सारांश यहीं है, प्रेम निराकार होता है, ह्र्दय से अहसास किया जा सकता है, पर वासना आकारित होती है, अतः चेहरे की रुप रेखा में सम्माहित होती है, किस रुप में, कब पैदा होगी, कहा नहीं जा सकता।….क्रमश…कमल भंसाली

मन की हार…कभी नहीं, स्वीकार.. बेहतर जीवन शैली भाग १० ..प्रथम अंश..कमल भंसाली

माना, संसार सुख-दुःख की अनुपम मिसाल है, पर ज्यादातर जीवन पर दुःख ही शासन करता नजर आता है। सुख की चाह ही पहला दुःख हैं, इस चाह में आदमी कितने ही अविवेकपूर्ण निर्णय लेता हैं,पर अंत तक शायद ही सही सुख पाता हो। जन्मतें ही रोना शुरु करने वाला इंसान अपने जीवन में शायद हंसने के अनुपात में ज्यादा रोता ही नजर आता है। बिरले ही कुछ होते हैं, जो सुख की क्षणिकता से परिचित होते और हर परिस्थिति में सामान्य नजर आते है। बेहतर जीवन शैली ऐसे ही इंसानों को तैयार करने में विश्वास करती है। आइये,आज हम इसी चिंतन पर विचार करें कि हम हर स्थिति में सामान्य कैसे रह सकते है।

सबसे पहले यह स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए की आज के आर्थिक संसार में सुख की परिभाषा भोगवादी संस्कृति से लिपटी हुई है, तथा जीवन उपयोगी साधनों का समुचित प्रयोग करना हर आम आदमी की चाहत है। इसके बाद ही वो नैसर्गिकी भावनाओं की तरफ अग्रसर होकर जीवन के नये आयामों को गूंथने की सतत चेष्टा करता है।

मानव मन की इन्हीं भावनाओं का सहारा लेकर अपने जीवन को सुखी और स्वस्थ बनाता है। यहां यह जान लेना जरुरी है, कि हमारा सारा चिंतन एक साधारण मानव से असाधारण मानव का सफर हैं। साधू, सन्यासी या महापुरुष और ज्ञान-गुरू हमारे दायरे से बहुत ऊपर होते है, क्योकिं वे स्वयं अपना ही नहीं, हम सब का भी जीवन उत्तम करने का प्रयास करते है ।

किसी ने कहा ” जीवन फूलों की सेज नहीं है”, सही भी और हकीकत भी यहीं है, परन्तु यह बात भी सही है, ” जीवन “खाली काँटों” का भी सफर नहीं है। हम अगर जीवन को समझना चाहते है, तो पहले हमें अपने शरीर के महत्व को ही समझना होगा। भारतीय दर्शन में शरीर का भौतिक मूल्य ज्यादा तर जगह नकारा गया है, आध्यात्मिक परिवेश में पले, हम इसको कुछ साँसों का मोहताज समझते है। पर हकीकत यही कहती है, जब तक जीयें, इस चिंतन से थोड़ी दूरी रखनी जरुरी है, और अपने अंतिम पड़ाव का असर निरन्तर जीने वाले जीवन पर इतना ही रहे कि हर अति से बच कर रहे।

आखिर शरीर है, क्या ? एक ऐसा सवाल जिसके हजारों जबाब हो सकते हैं। परन्तु, जीने वाले के लिए यह उसका साक्षात अस्तित्व बोध है, कि वह इस संसार में किसी के द्वारा भेजा गया है, किसी महान उद्धेश्य की पूर्ति हेतु, और उसकी भूमिका काफी संक्षिप्त होते हुए भी बहुत महत्वपुर्ण हो सकती है। शरीर की सरंचना पर गौर करने से हम एक बात दावे के साथ कह सकते है, कि बनानेवाले ने किसी भी तरह से हमे अपूर्ण नहीं बनाया। हमारा एक एक अंग अपना काम समयनुसार सहीं ढंग से संपन्न करना चाहता है, और करता भी है। शरीर के स्थूलता में भी उसने गति प्रदान करने के अंगों को सशक्त और मजबूत बनाया, तथा जीवन के कार्यक्रम जाननें के लिए हमें एक आधुनिक और निरन्तर विकसित दिमाग भी दिया। इन सबसे ऊपर जो बात है, वो हमें सदा याद रखने वाला जीवन दिया है। जिसके अंत का एहसास और उसकी समय सीमा की परिधि बोध की सच्चाई को स्वीकार करने की हिम्मत दी तथा हमें जीनें की लालसा दी।

शरीर की ऊपरी सतह पर चमड़ी का सुंदर आवरण देकर उसने इन्सान को संसार में सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ठ बनाया। दुनिया बनानेवाले ने हर सजीव जीव, जन्तु और प्राणी को एक सीमितता दी, परन्तु ‘मानव’ को एक असीमित दायरा दिया, स्वभाविक है, कि जिम्मेदारी का बोध भी उसे दिया। इंसान को अपनी कसौटी पर जांचने के लिए बनानेवाले ने उसके शरीर में एक द्वार बनाया जिसका बोध इन्सान को कम रहता है, और उसे हम “आत्म-द्वार” कह सकते है, संक्षिप्त में हम इसे आत्मा के नाम से भी पुकारते है। कहते है, ना, आत्मा ही “परमात्मा”।

शरीर में विधाता ने कितने ही ऐसे तत्वों को हमारे बहने वाले खून में डाले जिन्हें हम गुण-अवगुण के रुप में परिभाषित करते है, और इनका प्रभाव हमारे शरीर के साथ हमारी संचालक “आत्मा” पर भी पड़ता है। आत्मा की सकल अनुभूति ही जीवन का सार है, उसकी सार्थकता है। मानव चेतना का एक स्वरुप् “मन” है,जो मसितष्क का हि एक प्रकार्य है। यही मसितष्क की उन क्षमताओं का विकास करता है, जिनका चिंतन कर मानव अपने जीवन स्वरुप को गति प्रदान कर सकता है।

आइये, हम हमारे विषय “मन की हार, कभी नहीं” के मूल तत्वों पर गौर करते है।

ओशो, कहतें है कि “हम जो भी करते है, वह मन का पोषण है। मन को हम बढ़ाते है, मजबूत करते है। हमारे सारे अनुभव, हमारा ज्ञान, हमारा संग्रह, सब हमारे मन को मजबूत और शक्तिशाली करने के लिए है”। उनका तो यही मानना है, कि सिर्फ पूर्ण सन्यासी अ-मन की ओर चलता है, बाकी सब मन से शासित होकर चलते है, और यही सुख-दुःख की वजह है। कबीर दास जी मन को गंगाजल की तरह निर्मल मानते है, जिसे आत्मा संचालित करती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मन दो भागों में विभक्त है, एक चेतन दूसरा अचेतन।फ्रायड का मानना था कि मन का सबसे बड़ा भाग अचेतन होता है। उनके अनुसार अचेतन मन व्यक्तिगत होता है और इसका सम्बन्ध मानव के अपने व्यक्तिगत जीवन से होता हैं। उसके अचेतन मन में वही सारी इच्छायें या विचार होते है, जो पहले उसके चेतन मन में थे। हम सभी जानते है की इच्छाएं नैतिक और अनैतिक दोनों प्रकार की होती है। मानव को सिर्फ नैतिक साधनों का उपयोग कर जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उसकी सफलता जितनी निष्कलंक होगी, उतनी ही पवित्र और याद करने योग्य होगी।…..क्रमश……

कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली…भाग ९..अंश १..प्रेम..अमृत बेहतर जीवन का..कमल भंसाली

माना, हमारी आजकी जीवन शैली में “प्रेम” शब्द बड़ा भ्रमित करता है, परन्तु इसके बराबर अमृतमय शब्द शायद ही दूसरा होगा। इसकी सही परिभाषा को मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है जितना इसका प्रयोग दैनिक जीवन में दूसरों को आश्वस्त करने में किया जाता है । हालांकि कबीर दास जी इसे अढ़ाई अक्षरों का महत्व्पूर्ण जीवनसूत्र बताते है, परन्तु उनकी यह मीमांसा आज के दौर में कितनी सार्थकता रखती है, कह नहीं सकते। गौर करते है, जरा कबीर दास जी की इस परिभाषा पर जो उन्होंने दोहें के रुप में इस तरह सुनाया।
‘ पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोई
ढ़ाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होई’
कबीर दास जी के अनुसार सिर्फ ग्रन्थ पढ़नें से कोई ज्ञानी नहीं होता, अगर कोई इन्सान अढ़ाई अक्षर वाले प्रेम को जान ले, तो उनके अनुसार उससे बड़ा ज्ञानी इस संसार में कोई नहीं है । सही भी है, क्यों की बिन प्रेम जीवन अधूरा ही लगता है ? चाहे हम अपने आपको कितना ही ज्ञानी और सफल इन्सान मानें, प्रेम बिना सेवा और भक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।

कहते है, युग बदलता है, जीवन उद्धेश्य बदलते है और उनके साथ परिभाषाऐं भी बदल जाती है। संत कबीरदास ने जिस प्रेम को समझने का जिक्र किया, वो उनके युग के अनुसार सहज था। शायद उस समय प्रेम प्रदर्शित नहीं होते हुए भी अहसासिस्त था। अनुभूति का विकास प्रेम तत्व के अनुसार ही मन में जगह बना लेता था । प्रेम की प्राप्ति से मनुष्य आत्म ज्ञानी हो जाता था क्यों कि अर्थ और विज्ञान का संक्षिप्त प्रभाव आदमी की जीवन शैली पर था, नैतिकता और संस्कार को जीवन शैली में मुख्य दर्जा प्राप्त था। प्रेम को परिभाषित करने से पूर्व उसे आंतरिकता की शुद्ध तराजू पर अहसास के बाटो से तोलना जरुरी है। मन में हजारों तत्व का समावेश होता है, उसमे प्रेम और शक की भूमिका से जीवन को अछूता नहीं रखा जा सकता। क्योंकि आज का प्रेम अवधि के धरातल पर अपनी सही जगह तलाशने में असमर्थ सा है ? प्रेम का महत्व जीवन में हर उम्र के लिए अति जरुरी है। मनुष्य जिस क्षण धरती पर आता है, उसी क्षण से प्रेम को समझने की कोशिश करता है, सच तो यही है कि मनुष्य प्रेम की क्रिया का ही उत्पादन है। बच्चा बन कर वो प्रेम के अहसास से अपने को पहचाने की कौशिश करता है, उम्र ज्यों ज्यों आगे बढ़ती है, वो प्रेम के अनुसार ही अपने जीवन को सजाने में लगा रहता है। आज हम बेहतर जीवन शैली में प्रेम के अनुदान पर विस्तृत चर्चा करना चाहेंगे, आइये, उस से पहले प्रेम शब्द की परिभाषा पर नजर डालते है।

प्रेम का शाब्दिक अर्थ होता है, प्रीति, प्यार, माया, लोभ और लगाव आदि, परन्तु इसमे कई उपसर्ग जोड़कर कई साहित्यिक परिभाषा तैयार की गई । इन परिभाषाओ के अलावा ऐसे कई शब्द भी है, जिनमे प्रेम का भरपूर अनुदान रहता है, जैसे ममता,आशक्ति और भक्ति।

अंग्रेजी में LOVE, AFFECTION आदि शब्दों द्वारा प्रेम को व्यक्त या उसका इजहार किया जाता है। बड़ी विडम्बना है कि हम अपनी भाषा के शब्दों की जगह विदेशी भाषा का सहारा अपने अहसास को जताने में करने लगे है। कई ज्ञानी गुरुओं का मानना है, “प्रेम शब्द जितना खुड़दरा है उतना ही शुद्ध है, इसको जितना शब्दों की पोलिश से चमकाया जायेगा
उतनी इसकी कीमत प्रेम के बाजार में बढ़ती जायेगी”। परन्तु प्रेम हीरे की तरह स्थूल नहीं है अत: इसकी चमक की अवधि अस्थायी ही मानी जाती है । प्रेम को परिभाषित करके कबीरदास जी ने प्रेम की अवधि और सार्थकता के बारे में कुछ इस तरह बताया..
‘घड़ी चढे, घड़ी उतरे , वो तो प्रेम न हो
अघट प्रेम ही ह्रदय बसे, प्रेम कहिये सोय’
कबीरजी इस दोहें के द्वारा यह समझाना चाहते हैं कि हर क्षण बदलने वाला स्वभाव प्रेम को आत्मसात नहीं कर सकता अतः उसे प्रेम नहीं कहा जा सकता, जिसमे कुछ रूपांतर नहीं बदलता और स्थिरता रहती वो ही प्रेम कहला सकता हैं।

आइये, हम आगे बढ़ते है, और यह जाननें की बेहतर कोशिश करते है कि शारीरिक संरचना में प्रेम क्या भूमिका मानव जीवन में और संसार के अन्य प्राणियों में निभाता है ? यह तो तय हैं की प्रेम एक तत्व है, जिसके बिना किसी भी सजीव जीव का प्रसार होना नामुमकिन है । सृष्टि की संरचना करने वाले को इसका सहारा लेना पड़ा क्योंकि इसके बिना सृष्टि का विकास होना मुश्किल था। पर क्या अकेला प्रेम इसमे सक्षम था, नहीं, अतः उसने इंसानी शरीर को दो स्वरुप् में बनाया। एक पुरुषत्व युक्त दूसरा नारीत्व युक्त, दोनों में कुछ अंतर शारीरिक और मानसिक स्तर पर रखकर दुनिया में उनकी भूमिका तय कर दी, दोनों ने ही सृष्टिकर्ता को निराश नहीं किया। कई विपरीत तत्वों का समावेश दोनों में होते हुए भी उनका प्रेम के मामले में एकागार होना आश्चर्यजनक और अभूतपुर्व ही कहा जाएगा।

प्रेम अदृश्य तत्व होकर भी काफी महत्व पूर्ण भूमिका संसार संचालन में निभा रहा है, प्रेम बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती उसी तरह हमारी दैनिक जीवन शैली इसके बिना बेहतर नहीं हो सकती। हमारा अब तक चिंतन प्रेम की रुपरेखा समझने तक ही सीमित था, जिससें हम प्रेम के महत्व को समझ सके।

आइये, हम जानने की कोशिश करते है, मनोवैज्ञानिक प्रेम के बारे में क्या विचार रखते है।…..
एरिक फ्रॉम में प्रेम की परिचित मान्यताओं का मूल्यांकन कर अपनी पुस्तक ” The art of loving “में कबीर दास जी के सूत्र को सम्बल दिया कि प्रेम को ज्ञान की जरुरत होती है। उनका यह भी मानना था, कि जो खुद से प्रेम कर सकता है, वही दूसरों से भी प्रेम कर सकता है। हकीकत में, फ्रॉम ने स्त्री-पुरुष के प्रेम को साक्ष्य मानकर ही नहीं दूसरे कई पहलुओं पर गौर कर प्रेम के सभी स्वरूपों का विस्तार से विश्लेषण किया। फ्रॉम ने फ्रायड के ‘लिबिडों’ सिद्धान्त को नकार दिया जिसमे उनके मुताबिक़ प्रेम सिर्फ यौन संवेगों की अभिव्यक्ति है। फ्रॉम ने माना प्रेम का मतलब मातृत्व प्रेम, बन्धुवत प्रेम, रागात्मक प्रेम, इश्वरीय प्रेम और आत्म-प्रेम।
भारतीय दार्शनिक गुरु रजनीश कहतें है कि ” अततः देह और दिमाग की सारी बाधाओं को पार कर जो व्यक्ति प्रेम में स्थित हो जाता है, सच मानों वही सचमुच का प्रेम करता है। उसका प्रेम आपसे कुछ ले नहीं सकता, आपकों सब कुछ दे सकता है। तब ऐसे प्रेम का परिणाम करुणा ही माना जाना चाहिए”।
क्रमश……

कमल भंसाली