🍹प्यार करो🍦कमल 💜भंसाली💛

पाश्चात्य देशों से आयातित “वैलंटाइन डे” जिसका कल हमारे देश का एक बड़ा धनाढ्य शिक्षित वर्ग खासकर नव जीवन को पसन्द करने वाले बड़ी गर्मजोशी से स्वागत करेंगे। ये युवक – युवतियों के लिए प्रेम का इजहार करने का दिन माना जाता है। संकोच की सब सीमाओं को लांघकर मनाया जानेवाला यह दिवस भारतीय संस्कृति के अनुरूप कहीं भी नजर नहीं आता, पर बदलते समय के प्रभाव को नकारना आज मुश्किल है।अगर उपरोक्त इंग्लिश शब्द का हमारी भाषा के अंतर्गत परिभाषित किया जाय तो “प्रेम दिवस” एक सही सटीक परिभाषा होगी। हकीकत में हमारी संस्कृति के अनुरूप यह दिन कोई नया महत्व नहीं रखता, क्योंकि भारत में हर रिश्ते में प्रेम हर रोज छलकता है। परन्तु पाश्चात्य देशों के इस त्यौहार में जिस प्रेम को महत्व दिया गया वो प्रेमी – प्रेमिका के आपसी रिश्तों को नजदीकियों की विशेष छूट देने का बहाना ही लगता है। इस कविता का सार इतना ही तथाकित प्रेम- दिवस को हमारे देश के सामाजिक रीति- रिवाजों के अंतर्गत ही आगे बढ़ाना सही है, इससे ज्यादा कुछ और नहीं……कमल भंसाली

***”प्यार” करो ***

हां,
“प्यार” करो
इससे इंकार न करो
“प्यार”
जीवन का श्रृंगार
प्यार
मन की उपासना
दिल से इसे स्वीकार करो

बिन प्यार
जीने को नहीं मिलता
कोई आधार
प्यार हर एक अधिकार
इसका दुरूपयोग न करो
फिर, प्यार करो
जी भर कर करो

पर ध्यान रहे
प्यार न हो मोहताज
सिर्फ एक दिन का
ये तो सतरंगी
सुरमई प्रेमांग
इसके हर ढंग पर
विश्वास को न्यौछावर करो
फिर, प्यार करो…

सुबह की हर कली
भास्कर की किरणों से खिलती
धवल चांदनी भी
प्यार से ही मुस्कराती
हर आवश्यकता की जननी
जिंदगी
प्यार की चाहत से ही
आगे बढ़ती
इस पर जरा गौर करो
फिर, प्यार करों….

प्यार
को प्यार ही रहने देना
इसे रिश्तों की
बस्ती में बसा देना
कोई इल्जाम न देना
उपहारों से कीमत न आंकना
आज के मिलन को
व्यापार का नाम न देना
बन्धन है प्यार
इसकी नाजुकता बनाये रखना
सपनों में बसा
इसे टूटने न देना
हो सके
तो तपस्या के फूलों से
जीवन के
गुलदस्ते में सदाबहार रखना
मेरी इस बात को
थोड़ा समझ कर स्वीकार करो
फिर, प्यार करो

एक दिवस का प्यार
बिन बंदिश बहक जाता
जिस से जिस्म दहक जाता
फिर प्यार नहीं
वासना का शूल इसे चुभ जाता
जिंदगी को
दर्द की गहरी खाई में
अस्तित्व विहीन कर जाता
जाते जाते
बदनामी के आँचल से ढक जाता
कड़वे सच की औषधि
“संयम” की आज के लिए स्वीकार करो
फिर, प्यार करो

वक्त बदल ता रहता
जिंदगी का दामन भी ढीला पड़ जाता
पर सच्चा प्यार
जीवन की हर राह को हर्षाता
एक आंसू
जब न रहे, तो
अगर किसी के नयनों गिरता
तो प्यार
प्रार्थना बन उपाषित हो जाता
धरती को
मकसदों का गुलशन बना देता
इस तपस्या को “आत्मा” से स्वीकार करो
फिर, प्यार …….

रचियता: कमल भंसाली

🌼ठंडे फूलों की चाहत🌼कमल भंसाली

तमस सर्दी का अति गहराया
भास्कर कहीं भी नजर न आया
बर्फीली हवाओ ने रूह को कंपकपाया
अधखिली कलियों की खुशबू ने जताया
देखो, सर्दी का सुहावना मौसम आया

पत्तों ने फूलों से कहा
कल तुम चले जाओगे
किसी गर्म गुलदस्ते में
सहजता से सज जाओगे
किसी खूबसुरत अंगुलियो का
तपिस भरा स्पर्स पाओगे
माहौल की मधुरता में खो जाओगे
हमें तो तुम शायद भूल ही जाओगे

फूल सर्द होकर बोले
भूलना कहां होता आसान
जब तक साथ थे जिंदगी निखरी सी लगती
सुहानी मधुरतम सर्दी प्रतिसंगी प्रेम प्रच्छादन कराती
उष्णता क्षण दो क्षण ही अच्छी लगती
जब सच्ची “दोस्ती”पास होती
सर्द ऋतु तो योंही ठिठुरती अच्छी लगती…..रचियता *कमल भंसाली*

🙏कुछ बात तो तुम में है जिंदगी💃कमल भंसाली

कुछ बात तो तुम में है जिंदगी
जो उदासियों में भी मुस्करा लेती
रिश्तों के दिए नादां दर्द को
हंस कर सहन कर लेती
कुछ….

गम गैर के दिये हो तो न घबराती
पर सवाल जब अपनों का आता
तो शांत हो उन्हें दिल मे समा लेती
टीस का अनुभव कर पीठ घुमा लेती
कुछ…..

कल की आशा में अपने आज को पूरा ही लूटा देती
मोह की कूचिका से सपनों की तस्वीर भी बना लेती
आशा की कलियों से उनमें चाहत के सब रंग भर देती
जब तस्वीर कभी बिगड़ भी जाती तो मंद मुस्करा देती
कुछ…

तूं कितनी खूबसूरत जानकर भी अनजान बन रहती
दूसरों के वजूद के लिए अपना संवरना भी भूल जाती
फूल आंगन के जब कभी सुख जाते आँचल फैला देती
मरती आशा को भी झूठे दिलाशो से वापस प्राण देती
कुछ बात…

सच है जिंदगी तू अनूठी और है अलबेली
कभी सहज कभी न समझ आनेवाली पहेली
कभी तू लगती दुश्मन कभी तू बन जाती सहेली
कभी चार दिन की चांदनी कभी अमावस की दिवाली
कुछ बात…..

हकीकत यही सब की तू है राज दुलारी
प्यार तेरी कमजोरी वफ़ा तेरी है मजबूरी
सांस अंतिम जब लेती तब सब वापस कर जाती
जग का समान जग को सांसे भी प्रभु को लौटा जाती
कुछ बात…..

रचियता✍ कमल भंसाली✍

👒 मुस्करा मन मुस्करा👒कमल भंसाली

मुस्करा मन मेरे जरा मुस्करा
दूर कर आसपास का अँधेरा
आशाओं का दीप जला जरा
आगे तेरे खड़ा है सुनहरा सवेरा
मुस्करा मन…

मन मेरे, जरा सीख ले मुस्कराना
गा जरा कोई उमंगों भरा तराना
क्या परवाह दुनिया के नखरों की
क्यों परवाह करे अपने अधरों की
मुस्करा मन…

सागर की उछलती लहरों संग बह
किनारों से टकराने की चोट सह
सहने में ही जिंदगी की हर लय
न कर भय, तेरी मुस्कराहट अक्षय
मुस्करा मन…

कौन अपना कौन पराया
जिंदगी पर मौत का साया
पल की सांस में कैसा दावा
मुस्करा मन बन बहती हवा
मुस्करा मन…

रंगमंच है यह दुनिया
यहां सब है कलाकार
अभिनय कर मस्त मस्त
न कर तुम इससे इंकार
मुस्करा मन…

अहंकार खलनायकी किरदार
न निभाना इसे एक भी वार
मृदुलता के छेड़ सारे तार
जीवन नहीं मिलता बार बार
मुस्करा मन…

एक मुस्कराहट तेरी करेगी जब स्वर्ण झंकार
मान मेरी, उठेगा, खिलखिलाहटों का ज्वार
हलचल मच जायेगी, धुर्वी फूल खिलेंगे बेशूमार
खुशबूओं में निहित तुम्हे मिलेगा प्यार ही प्यार
मुस्करा मन…..

🌷आशा के फूल🌷कमल भंसाली🌵

गुमा नहीं था हवाओं में
इतना जहर फैल जाएगा
जीने का मकसद ही खो जाएगा
जहरीले नस्तर चुभायेगी यों जिंदगी
मखमली चादर पर भी नींद नहीं आएगी

जिनकी उम्मीद के गीत दिल गाता रहा
उनसे ही दिल टूट कर टुकड़े हो जाएगा
मेरे ईमान पर कोई सवाल कर जाएगा
मुझे, मेरे ही दर्पण में नंगा देख जाएगा

काँटों की चुभन से नहीं डरता
तो दर्द का कोई भ्रम नहीं रहता
सुख की एक छांव की कीमत
पीड़ा की किश्तों में नहीं चुकाता

आरजू करता फिर बहार आये
चमन हर तरह से निखर जाए
आशंकाए सारी निरस्त हो जाए
सघन आशा के फूल खिल जाए

★★आस्था का फूल★★कमल भंसाली

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अपनी ही मंजिल का हूँ, दीवाना
उसी राह का मस्त सा हूं, परवाना
सही राह पर मुझे चलते ही जाना
क्या फर्क पड़ेगा, दुश्मन बने जमाना

एकपथ की कठिनता से नये रास्ते बनते
आलोचना से ही गंभीर पुष्प जन्म लेते
मासूमियत से ही आता हर रोज सवेरा
कैसा भी हो अन्धेरा ? सपना है, सुनहरा

जो दुनिया की करते परवाह, वो ठहर जाते
न वो जीते, न वो मरते, बुत बनकर रह जाते
कौन किसका ? सम्बंधों में प्यार जो तलाशते
हकीकत में वो दर्द के काँटों से ही दामन भरते

कल के अफ़साने, आज काम नहीं आ सकते
शीशे के घर में रहकर पत्थर नहीं फैंक सकते
निर्लोभ, निर्लेप को डर भी ख़ौफ़ नहीं दे सकते
अस्तित्व के भय से, कभी मंजिल नहीं पा सकते

कहते है, बिगड़ी हुई चाहते जब सुधर जाती
जिंदगी कुछ विशेष पूरक पहचान बन जाती
दीप के लिए बाती, तैल में डूब मगन हो जाती
उजाला बन अंधेरो को कुछ अहसास दे जाती

मस्त मस्त मुसाफिर, मैं अपनी ही राहों का
क्यों परवाह करु, खुदगर्ज दुनिया की बाहों का
सफर मेरा है यह है, कर्मफलों से पराग पाने का
समझ गया खेल है, जिंदगी, शमा और परवाने का

चल रहा आज, कल तक हद दुनिया की पार कर जाऊंगा
जाने से पहले, यकीन कर दुनिया, तुझे क्षमा कर के जाऊँगा
इतनी सी राय मेरी, गैर की खिड़कियों में न करे तेरे नैन प्रवेश
फूल ही चुनना है, “कमल” का, तो फिर अंदर का कीचड़ ही तलाश…..कमल भंसाली