****असहजता के शिकार आपसी सम्बन्ध****भाग 1★★कमल भंसाली

आज संसार अपनी ही तैयार की हुई विषमताओं की खाई में बेठा हजारों तरह से बीमार सम्बंधों के कारण जीवन की मूल्यता का अफ़सोस न कर उन्हें ही आरोपित करने की गलती कर रहा है। अपनी चेतना और संवेदनाओं को शायद वो आज के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिवेश में भूल गया है।

विषय को आगे बढ़ाये उससे पहले हमें दो प्रसिद्ध दार्शनिको के इन कथनो पर जरा गौर कर लेना उचित लगता है। “Epictetus” एक यूनानी स्ट्रोक दार्शनिक थे उन्होंने जीवन का गंभीरता से अध्ययन किया और सिखाया “दर्शन” से जीवन जीने का तरीका सैद्धान्तिक अनुशासन नहीं होता खासकर आपसी नजदीकी सम्बंधों में, जिन्हें आहत होने का खतरा हर समय बना रहता है।

“Clear thinking requires proper training so that we are able to properly direct our will, stick, with our true purpose and disover the conections we have to others and the duties that follow from those relationship”.

Confucius एक चीनी दार्शनिक थे, उन्होंने जीवन के सम्बन्ध में लगभग कुछ ऐसा ही कहा
कि जीवन तो सरल साधा ही होता है, हमारे आपसी सम्बन्ध ही इसे जटिल बनाता है। “Life is really simple, but we insist on making it complicated”

आज हम जिस धरा पर अपना जीवन व्यतीत कर रहे है, वो प्रकृति के नियमोनुसार आज भी हमें सही रास्ते चलाने की कोशिश करती है, जिससे हर प्राणी का अस्तित्व सुखपूर्ण बना रहे। पर हम इस पहलू पर गौर ही नहीं करते क्योंकि हम सच्चाई से हमारे जीवन को दूर ले जा रहे है। मानव मस्तिष्क का अगर तेजी से विकास नहीं होता तो शायद आज भी मानसिक सुख की मात्रा अपनी उत्तमता के साथ प्राप्त करता। महत्वकांक्षा उसके पास उतनी ही होती जितने की वो कामना करता परन्तु वस्तुस्थिति विपरीतता का संकेत दे रही है। आज कृत्रिम आधुनिक साधनों के बाजार से जीवन ऊपरी सतह पर चमत्कारिता भरा उत्साह पूर्ण और सुखी सम्पन्न लगता है, परन्तु भीतर से निरहि, निराशावादी और तन्हाईयों का शिकार हुआ ही है, अगर हम ईमानदारी से इस तथ्य पर गौर करे तो। मानवता का निर्माण कोई एक दिन में सम्पन्न नहीं हुआ न ही आज की सामाजिक व्यवस्था का। मानव विकास की प्रक्रिया और उसके सामाजिक विकास का इतिहास आज हमारा चिंतन का विषय नहीं पर उसके तहत जीवन के सुख दुःख के निर्माण में हमारी आपकी भूमिका की तलाश अब जरूरी हो रही है, क्योंकि जीवन को सुख की छांव देने वाले रिश्ते और सम्बन्ध कई लाईलाज आत्मिक और शारीरिक बीमारियों से ग्रसित हो रहे है। गंभीर चिंतन अगर करे तो भविष्य ऐसीअनहोनी होनें के संकेत दे रहा है कि सबके रहते इंसान अकेला हो रहा है और मानवता धीरे धीरे धरती से अपना नाता तोड़ रही है। इसके क्या परिणाम भविष्य के गर्भ में कहा नहीं जा सकता ? पर कुछ समझा जरूर जा सकता है। आइये, कोशिश करते है, सबसे पहले दाम्पन्त्य जीवन के बनते बिगड़ते स्वरूप का, आज के युग के वातावरण अनुमोदन अनुसार।

सन्दर्भ चर्चा :वर्तमान
देश : भारत
व्यवस्था :सामजिक
चिंतनीय सम्बन्ध : पति- पत्नी
जीवन क्षेत्र : दांम्पत्य जीवन
प्रभावित क्षेत्र : आज का जीवन भविष्य के अन्तर्गत

हालांकि हमारी चर्चा इस महत्वपूर्ण विषय पर है पर संसार निर्माणकारी यह सम्बन्ध आज नई नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। हमारे देश में इस सम्बन्ध से गरिमामय जीवन की पहचान बनती है, ऐसा आज भी विश्वास किया जाता है। पर आज हकीकत कुछ और ही बयान कर रही कर्तव्यों और अधिकारों के चक्रव्यूह में इसका अस्तित्व आत्मिक न रहकर आधुनिक साधनों के अधीन हो गया है। आज के युग को आर्थिक युग का दर्जा देकर हमने कितनी बड़ी गलती की इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में जरुर कहीं न कहीं समाया है। उसके दुष्परिमाणों से पता नहीं हम कब तक अपने आप को बचाने में सफल होंगे, अभी फिलहाल कहना भी कठिन है।

हमारा देश की सामाजिक व्यवस्थायें कई किस्म के रीती रिवाजों से अंलकृत है, अतः पति-पत्नी के बन्धन दिवस पर उत्साह से इस बन्धन को सामाजिक मान्यता दी जाती है और ऐसे सम्बन्ध के लिए उपयुक्त शब्द “विवाह” का प्रयोग किया जाता है। हर धर्म में इसके लिए कुछ शपथों का भी उपयोग किया जाता है, जिससे सम्बन्ध सिर्फ शरीर तक सीमित न रहकर दिल के भीतर अपनी जगह तय कर ले। इस रिश्ते से दो शरीर के मिलन को विधिवत अनुमति दी जाती है, जिससे उनसे पैदा होने वाली सन्तान से परिवार का निर्माण जारी रहे, अतः हमारे धर्म- शास्त्रों के अनुसार ही इस बन्धन को कुछ मर्यादाओं का ख्याल रखने की हिदायत संस्कारों के तहत दी जाती है । जीवन की सुगमता को और सहज करने में विवाह की भूमिका बहुत ही सुंदर और स्वच्छ वातावरण तैयार करनें की होती है। तथ्य कहते है, नारी की गरिमा ही इस रिश्ते को विस्तृता या संकुचिता की ज्यादा जिम्मेदार होती है क्योंकि उसे प्रकृति ने कई संवेदनशील गुण पुरुष से अलग दिए है। नर- नारी दोनों ही जीवन की गति के सन्तुलित पहिये है।

आज नारी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का दावा हम जरूर कर सकते है, पर तथ्य कहते है नारी ने ज्यादा समय नर को समझने के लिये लगाया इससे उसके पास नर की जानकारी ज्यादा सक्षम होती है और पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था में वो उसे व्यवस्थित रखने में सफल भी हो जाती है।
चूँकि आज विवाह विवाद का विषय बन रहा है, कल के बन्धन आज टूट रहे है, रिश्तों के मधुरमय होने से पहले कई तरह के जायज नाजायज कारण विच्छेद की स्थिति तैयारी कर रहे है। सम्बंधों का बनना बिगड़ना आज साधारण सी बात लगने लगी । कानूनी प्रक्रियाओं में दोनों का जीवन
आंशका, भय, डर, ख़ौफ़ से रुग्ण और कमजोर पथ की तरफ अग्रसर होने लगता है। सामजिक कमजोरियों के कारण कानूनी दावपेंच से ही समाधान की कोशिश की जाती है, जिसमे समय, धन, और स्वास्थ्य की बलि निश्चित है बाकी परिणाम अनिश्चित रहते है।

समस्या काफी गंभीर होती है जब काफी सालों का साथ दोनों मे से किसी एक की गलत नासमझी से बिखर जाता है या टूटने के कगार पर पंहुच जाता है। इस तरह की परिस्थितियों का निर्माण एक दिन में नहीं होता पर आसार दिखने के उपरान्त भी कमजोर सामाजिक और पारिवारिक दीवारों के अंदर अंतिम परिणाम का शिकार हो जाता है, जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों के भविष्य पर घातक रूप से होता है। स्वार्थ भरा माता पिता का यह स्वरूप उन्हें अंदर तक खोखला कर सकता है। यहां सवाल जो उभर कर प्रगट होता है, उसमें कोई सभ्य शालीनता नहीं तलाशी जा सकती अतः उत्तर तलासना सिर्फ संशय का शोधन करना ही कहा जा सकता है।

मनुष्य काफी हद तक परिस्थितियों का दास है, दोनों ही प्राणी नर- नारी अपनी शारीरिक सरंचना के कारण स्वतः ही ऐसी स्थितियों का निर्माण कर लेते जो उनको चरित्रमय जीवन से दूर ले जाती है, जहां यथार्थ से ज्यादा अधूरी हसरतों की भूमिका होती है। भारतीय परिवेश के दाम्पन्त्य जीवन में आज अर्थ का महत्व काफी बढ़ गया है। नारी गृह की सशक्त गृहणी की भूमिका के दायरे से बाहर अपनी दूसरी क्षमताओं को तलाशने में लग गई, इससे पारंपरिक गृह स्वामिनी जैसा मान सम्मान की अब मोहताज भी नहीं है। समानता के आधार पर वो आज अपना जीवन साथी तलाशती है।

उपरोक्त चर्चा से यह कभी नहीं समझना चाहिए कि आपसी सम्बंधों में किसी एक की भूमिका की वकालत की जा रही है। जब भी किसी नाजुक सम्बन्ध का अनुशंधान किया जाय तो कुछ सत्यता भरे कटु अंशों को चर्चा में सम्माहित करना जरूरी होता है, अन्यथा बिना निष्कर्ष का ये लेख अधूरा ही रहेगा। इस चर्चा का ध्येय इतना ही कि जीवन पूरक इस सम्बन्ध की गरिमा को बनाये रखने कि जिम्मेदारी मर्द और औरत दोनों की आज के युगानुसार बराबरी की है और इस तथ्य को मानकर ही प्रेम भरे कर्तव्य से इस अटूट बन्धन को जीवन पर्यन्त निभाने का प्रयास करना चाहिए।

तथ्य कहते प्यार में चाहे शर्त न भी हो परंतु किसी भी प्रकार के सम्बन्ध के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। ध्यान यह भी रहे गर्मजोशी में बनाये गये किसी भी प्रकार के प्रेममय सम्बन्ध अति शीघ्र हिम बन पिघल भी सकते है। दिल की भावनाओं में अगर प्रेम की कदर होती है, तो बिना किसी सम्बन्ध के जीवन प्रेम का उपासक बना रहता है, हमारी भावनाओं में इस विचार को कभी भी गहराई नहीं देनी चाहिए कि दिल को तो भगवान ने टूटने के लिये बनाया है। मार्क ट्वैन का कथन इस सन्दर्भ में बहुत ही मार्मिक है ” Never allow someone to be your priority while allowing your self to be their option”। क्रमश….लेखक कमल भंसाली

🍂बेचैनिया 🍂उर्दु और हिंदी सम्पन्न मुक्तक शायरी युक्त रचना✍ कमल भंसाली

बेचैनिया मेरे दिल की बहुत कुछ कहती
आज भी उनकी सूरत इन निगाहों में रहती
बिन कुछ कहे वो इस जिंदगी से दूर चले गये
जिस्म को छोड़ गये रुह को साथ मे ले गये
बेचैनिया…..

ख़ुदा उनकी खैर करे मेरी तरह उन्हें मजबूर न करे
हसरतों का कहना कल से दिल उनका दीदार न करे
वफ़ा की कसमों में रुस्वाई अब और इंतजार न करे
दिल ही टूटा है, जाम तो आज भी मुझे बेकरार करे
बेचैनिया….

कयामत हुस्न गुलजार हो दिल पर जब छा जाता
आईना प्यार का बन चेहरे को नूरमहल बना देता
बेवफाई का एक पत्थर दिल के शीशे को तोड़ देता
दस्तूर प्यार का प्रेमित दिल टूट कर जुड़ नहीं पाता
बेचैनिया…

आश्कि दिल को कौन समझाए, मौहब्बत न कर
जग में और भी बहुत कुछ उन्हीं की इबादत कर
हुस्न जलजला दिल का परवान की खैर न करे
शमा में परवाना जल कर भी उसकी आरजू करे
बेचैनिया….

ख्वाईसे अब कहां रह गई उम्र उनके इंतजार में गई
उदासियों के लम्हों में उनकी धुंधली तस्वीरे रह गई
लगता है चांदिनी भी चांद के आलिंगन में सो गई
कसम से मकतूल दिल मे उनकी यादे खाक हो गई
बेचैनिया….

टूटी हुई हसरतों को लेकर जहां से दूर चला जाऊंगा
परछाइयों के श्मशान में दफन भी कर दिया जाऊंगा
तयशुदा जिंदगी जुस्तजू दीदारे यार की अब न करे
कोई नाजायज पलश्त नयन बूंद जनाजे पर न गिरे
बेचैनिया…..

कलम से✍💔कमल भंसाली

💖प्रेमसत्यम💖 कमल भंसाली

दर्द ऐ दास्तां
बहुत कुछ कहती
जिंदगी
गमगीन गेरो से नहीं
अपनों से होती
मोह के चक्रव्यूह में
प्रेम को ढाल समझ
चुप, छुप सब कुछ सहती
जग ने जाने
इसी ख्याल में
तमाम उम्र की पीड़िता बन जाती
मानसिक विक्षप्ता से त्रस्त हो
स्वयं में स्वयं को तलाशती
अफ़सोस से कहती
काश उसे
“अपनों के अपनेपन की समझ होती ” !

समझ अगर
इतनी ही रखे जिंदगी
कोई किसी का कुछ नहीं
किसी की “साँसों” पर,
कोई भी सम्बन्ध न्यौछावर नहीं
शब्दों का खेल है
“प्रेम”
इसमें उलझे नहीं
दस्तूर स्वार्थ के
सब हंस के निभाये
ताकि तीर निशाने पर लग जाये
इसलिए सब “प्रेम” “प्रेम” की रट लगाये

सार यही समझ में आया
दर्द के पहलू में
अपनों का दिया जब गम समाता
प्रत्यमित्र जिंदगी को बना देता
अफ़सोस से
भीतर भीतर ही जिंदगी कुलबुलाती
शायद बुदबुदा कर कहती
काश ” सच्चे प्रेम” और ” मोह” का अंतर समझती
तो प्रेम को प्रदूषित नहीं बनाती
जग में “प्रेम” को परिभाषित कर पाती
।।प्रेम ही “सत्यम, सुंदरम”।।

रचियता कमल भंसाली

🙆”मा”🙅 रिश्तों का व्यवहारिक आंकलन 👧 एक उद्धेषपूर्ण अनुसंधान चर्चा 👼भाग 1

जब भी हम कभी जिंदगी के सन्दर्भ में बात करते है, तो अहसास भर होता है कि जिंदगी को समझने की जरुरत होती है । जिंदगी बहुमूल्य होते हुऐ भी हम इसकी कीमत का शायद ही कभी मूल्यांकन करते है, यह हमारी शायद कोई नीतिगत कमजोरी है और इसका हर्जाना हम काफी बार क्षमता से ऊपर चुकाते है। एक सत्य जीवन का जो हमारे सामने कई प्रश्न खड़ा करता है, वो है आपसी रिश्तों का तालमेल, साधारण स्थिति में भी रिश्तों का निबाहना आजकल काफी चिंतन का विषय कहा जा सकता है। विपरीत परिस्थियों में तो हमारा आपसी सम्बन्ध निम्नतम रक्तचाप से भी नीचे चला जाता है। आखिर ऐसा क्यों है, कि सबसे सक्षम धरती का प्राणी अपनों से ही पराजित हो जाता है ! आज हम रिश्तों के विज्ञान की समीक्षा करेंगे परन्तु उससे पहले यह जानलेना जरूरी है, आखिर रिश्तों से हमारा क्या तातपर्य है ? सम्बंधों की रूपरेखा के अंतर्गत ही हमारा चिंतन होना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि इनपर हम अपना कुछ अधिकार मानते है। हम किसी भी रिश्ते का मूल्यांकन करे उससे पहले यह समझलें कि हर रिश्ता चाहे वो खून का हो या परिस्थितियों से बना हो दोनों में ही आपसी विश्वास की मात्रा बराबर होनी जरुरी होती है। विश्वास के धागों में प्रेम के मोतियों की कीमत अनमोल होती है, इस सत्य से परिचित इंसान हर रिश्ते का सही सम्मान करता है और आजीवन सुख का स्पर्श उसे प्राप्त होता रहता है, ये एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है।

रिश्तों की दुनिया विचित्र और सचित्र होती है, इसमे नये नये रिश्ते जो व्यवस्था और अर्थ अर्जन के अंतर्गत बनते और बिगड़ते है, उनके वजूद की सीमा सीमित होती है, अतः उनसे ज्यादा न सुख मिलता न ही दुःख। परन्तु इंसान को जन्म लेने के बाद जिन दो जीवन पर्यन्त रहने वाले आत्मिक रिश्तों से प्रथम साक्षात्कार होता है, वो दुनिया के सबसे बड़े विश्वास के ग्राहक होते है। जी, हाँ, मैं माता- पिता व सन्तान के अनमोल रिश्ते की बात कर रहा हूँ। शास्त्रों की बात माने तो दोनों ही रिश्तों को भगवान के समकक्ष पूज्य और सम्मानीय माना गया है। चूँकि माता- पिता का रिश्ता प्रेम और भावुकता के अमृत भरे तत्वों से संचालित रहता है अतः दुःख और सुख दोनों को अनुभव जीवन पर्यन्त करता रहता है। इसे जीवन विशेषज्ञ उम्मीद, आशा और भविष्य के तत्वों से पोषक रिश्ता भी बतलाते है, जो काफी हद तक सही मूल्यांकन लगता है। आज हम इसी रिश्ते के सन्दर्भ में अपना चिंतन आगे बढ़ाते है क्योंकि ये जीवन का प्रथम रिश्ता है, जिसे विधाता हमें धरती पर पहला उपहार देता है।

सबसे पहले हम मर्मस्पर्शी, ममतामयी व स्नेह से भर पूर “माँ ” के रिश्ते से अपनी विवेचना से शुरुआत करे तो शायद हम जीवन के इस मधुरमय रिश्ते का सर्वांग आनन्द प्राप्त करने की कोशिश करे। कहते है, “माँ “अगर स्नेह से भरपूर नहीं होती तो प्रेम की परिभाषा में अमृत्व नहीं झलकता अतः उचित हो जाता इस पवित्र रिश्ते के आत्मिक और सात्विक तथ्यों का मानसिक और संसारिक दृष्टि से विश्लेषण करने की चेष्टा करे।

इस पवित्र अनमोल रिश्ते की शुरुआत उसी दिन से शुरु हो जाती है, जब जीव “माँ” के गर्भ में जगह पाता है। हर “माँ” इसका प्रथम अहसास पाते ही स्नेहयुक्त तत्वों से इसकी सुरक्षा के लिए जागरूक हो जाती है। हालांकि “माँ “शब्द की महिमा को हर क्षेत्र से परिभाषित किया गया परन्तु आज तक सभी परिभाषायें सम्पूर्णता से अधूरी ही लगती। महाभारत महाकाव्य के रचयिता महर्षि वेदव्यास ने माँ के बारे में जो लिखा वो काफी सारगर्भित लगता है।

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः ।
नास्ति मातृसंम त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया ।।

( यानी माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है। )

इसे हम तकनीकी रुप से समझना चाहते है, तो ” माँ ” शब्द की गरिमा को समझना होगा। प्रथम सांस के साथ नव प्राण प्राप्त शिशु जब प्रथम स्पर्श का मूल्यांकन सुरक्षित पालन पोषण के लिए करता है, तो “माँ “का दूध उसके आँचल में मचलने लगता है।ये अमूल्य रिश्ता है, जिसको मंत्र के रुप हर दुःख के समय याद किया जाता है। जो, माँ की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगाते है, उन्हें अपना शैशव जरूर याद करना चाहिए। एक माँ अपनी सन्तान का पालन पोषण कितना तपस्यामयि हो जाती है, ये जानना भी संक्षिप्त में जरूरी भी है। वो सन्तान को गर्भ धारण कर नौ महीनें तक उसे वहां सब दायित्व निभाते हुए सुरक्षित रखती, प्रसव पीड़ा सहन करती। जन्म देने के बाद स्तन पान करवाती, रात भर जागती, खुद गीले में सो कर बच्चे को सूखे में सुलाती, उसका हर दैनिक कार्य करती, उसे सदा आंचल में छुपा कर रखती और उसकी रक्षा के लिए सब कुछ दाव पर लगा देती। ” माँ ” की महिमा और उसके आंचल की ममता को शब्दों में बयान करना मुश्किल होता है, पर महसूस किया जा सकता है।

आज युग बदल गया, सब तरह के सम्बन्ध स्वार्थ के धागों में बंध गए परन्तु आज भी “माँ “एक मात्र सम्बन्ध रह गया जिससे कोई नुकसान की कल्पना भी नहीं करता। परन्तु आज हकीकत यह भी है, अर्थ के प्रभाव ने ” माँ ” की भूमिका भी बच्चों के लालन पालन की बदल गई। आज की कुछ शिक्षित माँये बच्चों को आया के सहारा उनका लालन पालन करना पसन्द करती है, इस तरह के और भी कारणों से वर्तमान की कई घटनाये माता के प्रति सन्तान का रवैया कुछ रूखापन महसूस कर रहा है। ये वक्त की मजबूरी कहिये या अर्थ तन्त्र की मेहरवानी की माँ की शुद्ध भूमिका कमजोर हो रही है। पुराने समय से जब तक अर्थ का प्रभाव नहीं बढ़ा तब तक मजाल थी, कोई इस रिश्ते के प्रति नकारत्मक विचार बदलता परन्तु वर्तमान में भूर्ण हत्या ने कुछ संशय को प्रोत्सहान दिया है, फिर भी “माँ “तो “माँ” होती है, अंतस में तो इस पर उसे पश्चाताप जरूर होता होगा। कुछ वक्त के कारणों को छोड़ दे तो आज भी “माँ” बेमिसाल होती है।

कुल मिलाकर, हर धर्म माँ की अपार महिमा को स्वीकार करता है। हर धर्म और संस्कृति माँ की जीवन निर्माण की भूमिका को स्वीकार किया है। हिन्दू धर्म हर देवी को माँ के रुप में माना गया है, मुस्लिम धर्म ने माँ को पवित्र माना है। हजरत मोहम्मद कहते है ” माँ के चरणों के नीचे स्वर्ग है “। ईसाईयों के पवित्र ग्रन्थ ने स्पष्ट माना है ” माँ के बिना जीवन ही नहीं “। कहने का इतना ही सार है, कोई भी देश, कोई भी संस्कृति, कोई भी सभ्यता या किसी भी भाषा में माँ के प्रति असीम प्यार व सम्मान मिलेगा। भाषा परिवर्तन से माँ शब्द की गरिमा कभी अपरिचित नहीं रहती। हिंदी में “माँ”, संस्कृत में “माता”, इंग्लिश में “मदर”, “ममी” या “ममा” फ़ारसी में “मादर” और चीनी में “माकून”शब्द का प्रयोग होता है। भाषायी दृष्टि से “माँ “के चाहे भिन्न भिन्न रुप हो लेकिन ममता और वात्सल्य से हर माँ एक ही तरह की होती है।

अगर हम मनोवैज्ञानिक दृष्टि से “माँ” और सन्तान के सम्बंधों का विश्लेषण करने की कोशिश करे तो प्रथम समझना होगा, हर रिश्ते की बुनियाद भावनाऐं होती है । देश, जाति, धर्म तथा समय काल हर रिश्ते की गहनता को प्रभावित जरुर करते है, पर माँ का रिश्ता अंदर से अप्रभावित ज्यादा रहता है। माँ का रिश्ता बेटे के लिए या बेटी के लिए बिना कोई अलग् धारणा के एक जैसा रहता है यह और बात है, सन्तान गलतफेमियों के कारण इसे कम, ज्यादा में कभी कभी मूल्यांकित कर लेती है। हमारे देश में रिश्तों की नैतिकता बरकार रखने के लिए सदियों से प्रयास किया जाता रहा संस्कार निर्माण द्वारा बच्चों को बचपन से हर रिश्ते की गरिमा से अवगत कराया जाता इस प्रणाली माँ की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। कड़वा सच यह भी है आज माँ की खुद की आस्थायें परिवार के नियमों के प्रति कम हो रहीं है, जो वर्तमान और भविष्य के लिए शायद सही नहीं है।

भावुकता से ओतप्रोत ” माँ” का रिश्ता गीतकार और कवियों को इतना भावुक कर देता कि माँ उनके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन जाती। चरित्र निर्माण में “माँ ” की शिक्षा संतान को वक्त के अनुसार तैयार करने की क्षमता व मार्गदर्शन करती है। इतिहास गवाह है, संसार में बलशाली, बुद्धिमान, चरित्रवान आदि गुण युक्त व्यक्तित्व उभारने में ” माँ ” का सहयोग और मार्गदर्शन गुरुत्व केंद्र होता है।

फ़िल्म दादी माँ (1966 ) के इस गीत में ” माँ “की महिमा को मार्मित ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिसे ह्रदय द्रवित हो जाता है, और आँखों में स्नेहमयी “माँ” की नमन योग्य तस्वीर उभर आती है।

“उसको नहीं देखा हमने कभी
पर इसकी जरूरत क्या होगी
ऐ माँ….ऐ माँ! तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी ।।”

दोस्तों संसार में सब कुछ मिल सकता सिवाय माँ के, अतः अगर आप के पास आज भी माँ का सौभाग्य है, तो
इस अनमोल रिश्ते का सम्मान सहित आनन्द लीजिये ।माता- पिता को सुखी रखकर नहीं चुकाने वाले कर्ज के ब्याज के रूप में ही सही। माँ- बेटे के रिश्ते की विवशता ही कहिये जिंदगी भर माँ जिस बेटे को समझने की कोशिश करती वो ही बेटा वक्त के साथ क्षीण होती माँ की काया व मन को सुख नहीं दे सकता। कहते है एक माँ कई सन्तानों को संभाल लेती पर सब सन्तान मिल कर भी एक माँ को अच्छी तरह संभालने में ज्यादातर असफल ही रहते है।

आगे बढ़े उससे पहले यही कहना सही होगा:-

“माँ” तेरा नहीं कोई मोल
तूं सदा रही अनमोल
तूं न होती तो
शायद ही बन पाता
जग का ये घूमता भूगोल”

रचियता और लेखक: कमल भंसाली **क्रमश कभी और…..

🌷मंगलकामनाएँ उन्नतमय नववर्ष की🌷कमल काव्य सरोवर🌻 कमल भंसाली🌻 शायर भंसाली द्वारा

🌹 ⏰🌹 दोस्तो, “कमल काव्य सरोवर” ब्लाग साइड (wordpress.com )तीन साल की अवधि में अब तक लगभग चालीस देशों से 25000 लोगों के द्वारा दृश्यत किया गया और 110 फॉलोअर से जुड़ा और लगभग 500 रचनाओं से सजा इसके लिए सभी को नववर्ष की शुभकामनाओं सहित अभिवादन करता है। आप सभी हिंदी भाषी साहित्यिक प्रेमियों का साथ सुहाना और मन प्रफुल्लित करने वाला हमें सदा मिलता रहे, ये हमारी भी प्रार्थना है। ‘शायर’ मेरी सिर्फ जीवन साथी ही नहीं है, वो मेरी सारी रचनाओं का अंतिम सम्पादन करती है, उसे भी नववर्ष की मंगलकामनाए। ” नया वर्ष शुभता भरा हो आपके लिए सफल वर्ष रहे” शुभकामनाओं सहित✍💘कमल भंसाली

नव वर्ष का आया नया सवेरा
चारों दिशाओं में है, उजियारा
हर दिशा से एक ही है,प्रार्थना
हर जीवन सुखी हो, यही कामना
नव वर्ष…..
🌞

नए आयामों का हो, हर नया सफर
पथ में हो कई सफलताओं की डगर
रिश्तों में छाई रहे मृदुलता की बहार
सद् भावनाओं के खुलते रहे नए द्वार
नववर्ष….
🎁

हर मानव का हो,प्राणी मात्र से प्यार
अहिंसा का ही हर दिल में हो विस्तार
कल का दुःख, आज में कभी न समाये
ईष्या, द्वेष की भावना कभी मन न लाये
नववर्ष…
🔔

हम उसी राह चले, जहां धर्म के फूल खिले
हमें सदा स्वस्थ, स्वच्छ पर्यावरण ही मिले
प्रयास हो, हर कोई एक दूजे से गले मिले
साल जब ले विदा, तो प्रेरणा उसी से मिले
नववर्ष…
📚

साल यह सबके लिए हो पूर्ण सुखद व परोपकारी
समृद्धि, प्रसन्नता, सम्पन्नता के सब हो अधिकारी
स्नेह, प्रेम, स्वास्थ्य न हो, किसी की कोई मजबूरी
मंगलकामनाये, शुभता की बरसात सदा रहे जारी
नववर्ष…
🌜⭐🌟🌟🌟🌛

(नया साल आप को स्वस्थ, सम्पन्न व सुखी बनाये
इन्ही भावनाओं के साथ नव वर्ष की शुभकामनाएं…🎂.***शायर भंसाली 💝 कमल भंसाली***🎁

🌞उपहारमय⭐ 🎡२०१८ 🎡 आपके लिये ✍कमल भंसाली

यह साल भी हमारे जीवन में अपना अंतिम क्षण तक का सफर तय कर अपनी मंजिल की पूर्णता की ऒर बढ़ रहा है,और एक नये साल का तोहफा हमें देने की तैयारी भी कर रहा है। हमें उसके इस तोहफा का अहसास है, हम भी उसके स्वागत के लिए कई तरह की तैयारी कर रहे है, इस आशा से शायद यह मेहमान हमारे जीवन को आनन्दित और मंगलमय करेगा। मेरी भी यही प्रार्थना हम सबके लिए है, कि हम अपने जीवन को आनेवाले साल में सुखी जीवन का आधार बनाये, और उसे प्रफुल्ल और आनन्दित बनाये। कोई भी मेहमान जीवन भर हमारा साथ नहीं निभाता परन्तु उसके साथ बिताये क्षण जीवन को बहुत कुछ ऐसा अहसास करा देता है, जिससे हमें यह अहसास तो जरुर हो सकता है, कि हम भी यहां मेहमान है, हमारी भी जीवन अवधि है, हमको भी किसी ख़ास जरुरत के अंतर्गत ही यहां मेहमान बन कर आना पड़ा है। अतः हमारा जीवन सदा प्रेरणामय बने, यही अगर हमारा इस साल का अपने आपसे एक पूर्ण वादा रहें और हम अपने इस मकसद को इस साल की उपलिब्धि का प्रेरक लक्ष्य बनाये, निश्चित है, नया साल हमारे लिए मंगलकारी होगा।

“जीवन एक अनबूझ पहेली” पता नहीं किस दार्शनिक ने किस सन्दर्भ में जीवन को इस स्वरुप में परिभाषित किया, हो सकता है जीवन की कुछ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष न समझने वाली घटनाओं ने उस दार्शनिक को मजबूर किया हो, जीवन को इस तरह परिभाषित करने को। परन्तु सभी को जीवन इस तरह का अनुभव नहीं करा सकता क्योंकि जीवन की अपनी कोई विरासत नहीं है, वो तो लयमय ही चलता है। चूँकि निरन्तरता ही उसका स्वभाव है, अतः हर क्षण चलना उसकी मजबूरी है। जीवन की जिम्मेदारी प्राणी के शरीर, मन, और आत्मा अनुमोदित कार्य को सम्पूर्ण करना है। अतः हमारे लिए जरुरी है, हम अपने जीवन का आंकलन सूक्ष्मता और समझदारी से करे, तो जीवन हमें मित्र ही लगेगा l सही जिंदगी स्वभाविक रफ़्तार से प्रेम, स्नेह, और आपसी समझ का सही उपयोग करती है, तो कहना नहीं पड़ सकता की जिंदगी न समझने वाली कोई वस्तु या फिर कोई असामान्य सूत्र है।

जिंदगी का फलसफा उम्र के हिसाब से न चलता, तो सफलता और असफलता का अनुभव कोई प्राणी शायद ही कर पाता और अनुभव की कभी कोई कीमत भी नहीं आंकता। धरती पर जन्म के बाद जब इंसानी शरीर को कपड़े के आवरण से ढका जाता है, तो हकीकत में उसे समझ में आ जाता है, कि उसे एक ऐसा जीवन मिला है, जो संसार के लिए जरुरी है और प्रेम और स्नेह से उसका स्वागत हुआ है, तो निश्चित है, उसे भी अपने कर्मो की जिम्मेदारी धीरे धीरे समझनी होगी और जब किसी की मौत से उसका पहला साक्षात्कार यह समझा देता है कि जीवन मिलना भाग्य की बात है और मृत्यु होना समय की बात है। तब उसकी समझ में यह भी आ जाता है कि दूसरों के दिल में रहना ” अच्छे कर्मो” की बात है। अगर शास्त्रो की बात करे, तो वो भी ऐसे दर्शाते है कि कर्म ही जन्म निर्माण में लम्बी भूमिका निभाते है। इंसानी शरीर काफी विकट होता है, वो जल्द मौत को स्वीकार नहीं करता तभी तो एक आदमी के मरने के बाद भी उसका ह्रदय 10 मिनट, मस्तिष्क 20, आँखे 4 घंटे, त्वचा 5 दिन, हड्डिया 30 दिन तक जीवित रह सकती है। सूक्ष्मता से अवलोकन करने से जीवन स्थिति और आधार को कुछ हद तक हम अपने जीवन उद्देश्यों को सही मार्ग और सन्तोषमय बनाने की कोशिश कर सकते है, जो उचित भी है। एक साधारण मानव का जीवन सिर्फ दो स्थितियों का अनुभव ज्यादा करता है, सुख, और दुःख का उन्हें आप आनन्द, गम या और कोई अनुकूल शब्द दे सकते है पर जीवन यहीं लक्षित करना भी गलत होगा क्योंकि आत्मिक सन्तोष का जब तक जीवन को अनुभव नहीं हो, तो वो अधूरा ही रहता है। भारतीय पूरातन सभी शास्त्र हमारे जीवन को काफी गंभीरता से लेकर उसे श्रेष्ठ बनाने में विश्वास करते है, तभी उन्होंने जीवन को सहज प्रक्रिया के तहत् न रखकर सृष्टिकर्ता का दिया उत्तम उपहार माना।

आज जो संसार का स्वरुप नजर आ रहा है, उसमे शायद मानवता कठिनतम यात्रा के पड़ावों से गुजर रही है। समझदार होती मानवता नासमझी को अपनी बुद्धिमानी समझ उसका उपयोग कर रही है। जीवन की जो न्यूनतम जरुरत होती है, उसमे भोजन, पानी तथा हवा का शुद्ध होना हर एक प्राणी के लिए अत्यंत जरुरी है, नहीं तो जीवन को शारीरिक सुख का अनुभव होना मुश्किल ही लगता है। आज वो इनको ही अर्थ उपार्जन का साधन समझ कर इनका दुरुपयोग करने में नहीं हिचकिचा रहा। नैतिकता के हजारों पाठ पढ़ने वाला इंसान अपनी लालची मन की सीमाओं संयमित करने की जगह उसे बढ़ावा दे रहा है। अच्छी तरह से जानते है हम, सदाबहार नहीं हम परन्तु सुख दुःख की परिभाषाओं के अंतर्गत ही तो जीवन मापते है, और आज हम सबसे ज्यादा तनावग्रस्त जीवन जी रहे है। क्या ये हमारी स्वयं निर्मित मजबूरी है ? आप और हम शायद संकोच वश इस प्रश्न का उत्तर देने में टालमटोल करे, पर हकीकत यही है,इंसान ही इंसान का आज शत्रु ज्यादा मित्र कम नजर आ रहा है। इसका एक ही कारण है, हम अशुद्ध विचारों के मालिक बनते जा रहे है, पवित्रता हमारी सिर्फ जबानी जमा खर्च का हिस्सा बन कर रह गई। इसलिए जीवन एक पहेली बन कर रह गया। हर रोज इसकी हर नई पहेली का उत्तर देना हमारी जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है। अपेक्षाओं के संसार में हमारी निरहिता स्पष्ट झलक दे रही है, और हम बेखबर आज भी उस जीने में लगे जो शायद समय गुजारने के अलावा कुछ भी नहीं लगता।

दोस्तों, नये साल की नई सुबह की पहली किरण से अपनी चेतना को अगर स्फूर्ति, आनन्द देना का ध्यान हों तो कुछ नया चिंतन कर आप उसे अपने जीवन को प्रभावकारी बनाने में सफल हो सकते है, एक अंग्रेजी कहावत है “A good begning makes a good end” ।

हमारे जीवन के कुछ क्षेत्र है, हो हमारी दैनिक जीवन को महत्वपूर्ण बनाता है, उन्हें याद कर उनसे निर्मित गुणों के चवनप्राश का रोज उपयोग करे, तो शायद ही हम इस साल में निराशा को अपने आसपास फटकने दे, और गतिमय जीवन की लय बिना रोकटोक अपनी मंजिल की तरफ अग्रसर होती रहेगी।

मुख्य क्षेत्र जो जीवन साधना के हिस्से है, उनमें जो हमें महत्वपूर्ण बना सकते है, उनकी एक संक्षिप्त सूची नीचे तैयार कर, हमें इस साल इन पर गौर करना चाहिए, वो हो सकती है….( मेरे अनुसार)

1. अमूल्य समय की सही उपयोग की समझ
2. व्यवहारिक सन्तुलन हर कार्य और सम्बंधों के निर्वाह में
3. हर रिश्ते की गरिमा पहचान उसका मान बढ़ाना
4. प्रेम और स्नेह का दिल में स्पंदन
5. समझदारी से पूर्ण संवेदनशीलता
6. चारित्रिक सक्षमता को मजबूत रखना
7. ईष्या, द्वेष, लोभ, हिंसा, कपट को रोज जीवन द्वार से बाहर फैंकना
8. स्वास्थ्य और पर्यावरण को स्वस्थ रखना
9. आशा, आस्था, सत्य और विश्वास का जीवन में सदुपयोग करना
10. संघर्ष, संयम, नैतिकता, देश, धर्म, दया समावेश जीवन में रहना
11. हार को जल्दी से स्वीकार न करना, सतत प्रयासी जीवन जीना
12. आर्थिक, सामाजिक जीवन को मजबूत बनाना

नववर्ष के आगमन को अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण अंश बनाने के लिए हमें कुछ शक्तिवर्द्धक सिद्धान्तों को समझ कर उनका शुरुवात से ही पालन करने की दृढ़ता होनी चाहिए। इसका प्रभाव आनेवाला वर्ष हमें एक सार्थकता आभास जरुर दे सकता है, जो जीवन को एक अद्धभुत मानसिकता तो देगा ही, साथ में हमें कभी भी किसी चुनोती के सामने लज्जित नहीं होने देगा। शायद यही सफलता का सही मापदण्ड होता है।

कुछ जीवन विशेषज्ञों के अनुसार कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हर जीवन को सार्थकता अनुभव करा सकते है, उनमे से कुछ तथ्य उदाहरण स्वरुप प्रस्तुत करने की कोशिश की है। आप भी अपनी जरुरत के अनुसार बना कर उन्हें अपनाने की चेष्टा अगरआनेवाले साल के प्रारंभ से कर सके तो शायद यह सोने में सुहागा जैसा प्रयोग आपके जीवन में माना जा सकता है।

1. आशा किसी से भी नहीं करना।
2. सत्य बहुत सी आफतों को दूर रख सकता है।
3. आलोचना दैनिक जीवन में सिर्फ वैचारिक तो हो पर व्यक्तिगत नहीं।
4. अपनी गलती का मूल्यांकन कर, स्वीकार करना उचित है।
5. सात्विक और पौष्टिक आहार स्वास्थ्य और मन दोनों को दमदार बनाता है।
6. समय के अनुरुप अपना बदलाव उचित होता है
7. मितव्यता और संयम को सच्चे दिल से अपनाना सही है।
8. सही दिनचर्या समय का सही उपयोग करा सकती है।
9. अच्छा साहित्य सही जीवन दर्शन का ज्ञान करा सकता है।
10. सिर्फ सार्थक परिश्रम से जीवन को आर्थिक व सामाजिक महत्व मिलता है।

आप अपने जीवन को जिस तरह दृष्टिमय बनाना चाहते, उसी अनुसार उन क्षेत्रो को और जोड़ हर नये साल को और नवीनतम कर सकते है। सिर्फ ध्यान रखने की बात यही है की ” आप जब तक कुछ हासिल नहीं करोगे, जब तक उसकी शुरुवात नहीं करोगे”।


आशा सहित, मंगलकामनाये, नया साल आप सभी को प्रफुल्लित और आनंदित जीवन का उपहार दे।…….लेखक💐.कमल भंसाली💐

नये वर्ष के नये संकल्प🌺भाग 3🌷आत्मिक अनुसंधान चर्चा🌲कमल भंसाली

जब कभी प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता हमारी नजरों से टकराती है तो निश्चित है उसकी इस सुंदरता से हमें आनन्द और प्रसन्नता का अनुभव होता है। ठीक ऐसे ही जब किसी असाधारण व्यक्तित्व से हम मिलते है, तो हम उस मिलन को अपने जीवन की एक धरोहर समझते है। हमारी विडम्बना भी यही है कि हम उसके दूसरे पहलू पर कभी या तो गौर नहीं करते या हमारे अंदर इस तरह के जज्बातों को समझनें की समझ नहीं है कि व्यक्तित्व किसी का योंही प्रखर और आकर्षक नहीं होता उसके पीछे उसकी दृढ़ स्वयं परिवर्तन की चाह और क्षमता होती है। क्यों नहीं कुछ प्ररेणा उनसे स्वयं के जीवन को मिले ! जीवन सिद्धान्त तो यही कहता है, ऐसे व्यक्तित्व प्रेरणा के स्त्रोत होते है और उनसे हम भी जीवन को आकर्षक और लुभावना बना सकते है। शुरुआती जिंदगी से हर कोई एक साधारण गुण और अवगुणों से युक्त इंसान होता है, यह उस विशिष्ट इंसान की मानसिकता थी, उसने अपने जीवन के कुछ अवगुणों पर गौर किया और अपने जीवन से उन्हें धीरे धीरे स्थानांतरित कर उनकी जगह सही गुणों का विकास कर उन्हें महत्व दिया। इस तरह के परिवर्तन की सोच का सही समय अभी हमारे लिए भी है, जब आनेवाला साल हमें बेहतर ढंग से जीने का आह्वान करता है। पिछली हमारी चर्चाओं में हमने इस बारे में काफी चिंतन और अध्धयन किया अब समय आ गया कि उनके अनुरूप हम स्वयं को कुछ नये संकल्पों से सुधारे, ध्यान इतना ही रहे संकल्प सिर्फ संकल्प बन मर न जाये, उन्हें सदाबहार रख हम उन के द्वारा प्राप्त सकारत्मक परिवर्तन को अपने जीवन तत्वों में समाहित कर ले।

पीछे, हमने जिन तीन क्षेत्रों की चर्चा की हकीकत में उन्हीं से प्रभावित हो हमारा जीवन अपना काफी विस्तार करता है और एक दिन अपनी पूर्णता को प्राप्त भी करता है। कहते है, जीवन के अंतिम पड़ाव पर प्राणी में गंभीरता आ जाती है क्योंकि वो उस समय अपनी सफलताओं से ज्यादा अपनी असफलताओं से पीड़ित रहता है। मनन करता अपनी उन कमजोरियों का जिससे उससे उसका जीवन कठिन हुआ। उसका अपनी प्राप्त सांसारिक उपलब्धियों के प्रति प्रेम भी नगण्य हो जाता है । संसार से विदा लेते समय अपनी आत्मा की गहनता में जाने का मन होता है, जिस पर वो कभी कभार ध्यान देता था या देता भी न था।अगर हम कभी अपने दैनिक जीवन के तौर तरीको का स्वयं अवलोकन करते तो शायद सहज में ही समझ में आ जाता कि छोटी छोटी उपलब्धियों के लिए हमने अपनी बड़ी बड़ी खूबियां दाव पर लगा दी है। यानी अपने किसी नैर्सिगक गुण या गुणों की आहुति इस तरह के यज्ञ में दी है, तत्काल के परिणाम का क्षणिक ख़ुशी में विलीन होते ही हमें सहज महसूस हों जाता है, कहीं न कहीं ये हमारी आत्मा की हार है। अर्थ क्षेत्र की उपलब्धियों पर ही गौर करे तो हमें ऐसे कई एहसास आज भी हो सकते है । ज्यादा अर्थ संचय की चाह के लिये स्वास्थ्य पर किया गया किया गया अत्याचार जीवन की समय सीमा को कमजोर करता है इसलिए दोस्तों, वर्ष की सुंदर व स्वस्थमय शुरुआत से पहलें हम अपने मन व दिल को दुरुस्त कर लेना चाहिए । अपने लिये स्वयं तय किये नये निर्देशों व संकल्पों का पालन कर जीवन को सही व्यक्तित्व का उपहार देने का प्रथम दृढ़ संकल्प स्वीकार कर लेना उचित लगता है।

कुछ संकल्पों की एक सूची तैयार करे उससे पहले हमें इस सोच पर ध्यान देना होगा कि गुजरा समय कभी वापस नहीं आता पर हर क्षण के प्रभाव से हमारे जीवन को प्रभावित कर जाता। एक क्षण का उच्चतम चिंतन आदमी को पुरस्कार का हक दिला देता और एक क्षण का निच्चतम चिंतन जेल का दरवाजा भी दिखा देता। नैतिकता की कितनी भी हम अवहेलना अपने जीवन में करे पर जब स्वयं की चाही नैतिक जिम्मेदारी हमें दूसरों से नहीं मिलती तो कभी यह क्यों नहीं सोचते कि इसका तिरस्कार तो हमारा भी किया हुआ है। धर्म शास्त्रों ने तो सदा इंगित किया ” जैसी करनी वैसी भरणी” । अतः हमारे संकल्प जीवन सुधारक ज्यादा हो, तो निश्चित है समाज से प्राप्त होने वाले सुख से हम कभी वंचित नहीं रहेंगे।

सच और झूठ:-

जीवन कैसा भी हम जीये, सच और झूठ से वंचित रहना नामुमकिन होता है। इसकी मात्रा के उपयोग से ही सुख दुःख का स्वरूप भी बनता है। तय है किसी भी तरह के झूठ का बाहरी चेहरा कृत्रिमता के कारण आकर्षक और सुंदर होता है परन्तु सच की पवित्रता के सामने सदा ही फीका लगता है। सच में नैतिकता का तप समाहित होता और शुद्ध सच तो किसी भी तरह के आवरण से परेहज भी करता है। हम अगर अर्थ के नफे, नुकसान के सिद्धांत की जरूरत के अनुसार भी अगर झूठ का अति प्रयोग कर रहें है तो हमें किसी के बताये इस तथ्य पर भी ध्यान देना सही होगा ” सच वह दौलत है जिसे पहले खर्च करों और जिंदगी भर आनन्द करों, झूठ वह कर्ज है जिससे क्षणिक सुख या राहत पाओं पर जिंदगी भर चुकाते रहो” । चूंकि, हम संसारिक जीवन जीते है और सब तरह की परिस्थितियों से जीवन को गुजरना पड़ता है अतः आज के युग अनुसार झूठ के प्रयोग को पूरा बन्द नहीं किया जा सकता क्योंकि कभी कभी ये भी सोचना पड़ता है “लोहा को लोहा” काटता है। विपरीत परिस्थितयों में रिश्तेदार व सम्बंधियों का रुख भी अविश्वासकारी व असहयोगी हो जाता है, और सच यहां खतरनाक स्थिति पैदा कर देता है, ऐसी स्थिति में सब जगह सत्य का प्रभाव इन्सान को कमजोर करता है। चाणक्य सिद्धांत कठिन परिस्थितियों में प्रयोग योग्य कहा जा सकता है, कि “प्रेम और युद्ध” में सब जायज है। अतः दोस्तों आज की जिंदगी में सच और झूठ का प्रयोग बहुत ही समझदारी से करना चाहिए पर हर जगह झूठ को पहल देना आत्मिक कमजोरी ला सकता है और यह गलती ज्यादा न हों यह ध्यान नये वर्ष में हमें जरुर रखना चाहिए, सत्य को मन के पास रखकर। कोशिश करे नये साल में झूठ से ज्यादा सत्य वचन कहे।

सम्बन्ध :-
रहीम के दो दोहों पर गौर करते है ।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय ।
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय ।।
(रहीम कहते है कि प्रेम का नाता नाजुक होता है, इसे झटका देकर तोडना उचित नहीं होता। यदि यह प्रेम का धागा एक बार टूट जाता है तो फिर इसे मिलाना कठिन होता है और यदि मिल भी जाए तो टूटे हुए धागे के बीच में गाँठ पड़ जाती है।
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रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सो बार।
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टुटा मुक्ता हार।।
( यदि आपका प्रिय सौ बार भी रूठे, तो भी रूठे हुए प्रिय को मनाना चाहिए, क्यों कि यदि मोतियों की माला टूट जाए तो उन मोतियों को बार बार धागे में पीरो लेना चाहिए।

रहीम दास जी कि इस सीख का हम अपने जीवन में कितना महत्व दे ये आज के वातावरण में कहना कठिन लगता है पर ये तय है हर सम्बन्ध की गरिमा प्रेम के तत्व पर ही निर्भर की करती है। प्रेम आत्मा से निकल कर आता है और हर सम्बन्ध को गरिमा से मान सम्मान देता है, हमें इसे स्वस्थ और स्वच्छ रखना भी चाहिए।सब के साथ प्रेम से रहने का संकल्प जीवन को भरपूर ऊर्जा की संपन्नता प्रदान कर सकता है। परन्तु, दुनिया सब लहजे से बदल रही है, सम्बन्धी, रिश्ते- नाते, समाज के आपसी सम्बन्ध कल तक जो दुनियादारी के हिस्से थे, आज वो सब व्यक्तिगत हो गए। यहां तक की एक ही छत के निचे रहनेवाले पति-पत्नी के सम्बन्ध में कुछ हिस्सा ही आपसी रह गया है। दिल की बाते अब दिल में ही रहती है, अपनों के वनिस्पत बाहरवालों के सहारे ही जिंदगी की समस्याओं का हल ढूंढना सही लगता है। व्यवहारिक दुनिया में आर्थिक क्षमता का भीतरी मूल्यांकन ही रिश्तों की प्रगाढ़ता तय करती है। आप किसी भी रिश्ते का खून का सम्बन्ध होनें पर भी उस पर प्यार और स्नेह का दावा नहीं कर सकते। समय आ गया है, आपसी खून से सम्बंधित रिश्तेनातों के प्रति हमें कुछ बदलाव अपनी सोच में करना पड़े जिससे कम से कम हमारा बाहरी प्रेम बना रहें। इनके बारे में ज्यादा सोचने से इंसान खुद ही तनाव भोगता है, जिससे जीवन को अप्रसन्नता ही मिलती है। कार्यकालि रिश्ते को हम अगर मधुर व्यवहार और कुछ आत्मिक प्रेम से संजो कर रखे तो वो हमारे लिए काफी सहयोगी हो सकते है। बाकी जिन घरों में आज भी प्यार और मान सम्मान का महत्व है, वहां किसी भीं नये संकल्प की जरूरत नहीं होती। समय अनुसार स्वयं को बदलने का संकल्प ही उचित है।

आत्मिक संकल्प:-

वर्ष जैसे विदा हो रहा है वैसे एक दिन हमें भी विदा होना है। हम में और उसमें एक ही सबसे बड़ा फर्क है, उसको हमने बनाया और हमें किसी अनजान शक्ति ने। हमनें वर्ष को सिर्फ गिनती तक ही मान्यता दी पर हमें तो नियति ने हजारों गुण – अवगुणों से युक्त होनें का मौका दिया है, जिससे हम अपने आने का उद्देश्य स्वयं में ही ढूंढ कर उस शक्ति को दुनिया से जाकर निराश न करे। हमारी रचना में दो पहलू पर शायद उसने ज्यादा ध्यान दिया और आत्मिक तथा संसारिक प्राणी हमें बनाया। धर्म और अधर्म की तराजू पर ही हमारी अगली गति तय होती है ऐसा हर धर्म शास्त्र बताता है और हमारा विश्वास भी यही है। हमारे सारे संकल्पों में सारे धार्मिक तत्व न हों पर नीति शास्त्रों पर विश्वास कर हमें हर संकल्प में अगर नैतिकता, संयम, प्रेम, धर्म, विश्वास जैसे तत्वों का विकल्प रखे तो निश्चित है, साल मधुरमय, ज्ञानोदय और आत्मिक हो सकता है। सभी के लिए नव वर्ष शुभता से सजकर आये, ये ही कामना लेखक करता है। गुजारिस भी है, इस लेख को उपदेश पाठ न समझे अपितु इसे जीवन सुधार विवेचना के रुप में ही परखे क्योंकि “To be beautiful means to be yourself. You don’t need to be accepted by others.You need to accept yourself”.-Thich Nhat Hanth.
**लेखक: कमल भंसाली**