💖पिया का सावन💖 ✍कमल भंसाली

मधुरत्व हो सावन आया
मनोहर हो मौसम भी छाया
तरस कर नयन पर्यश्रु हो गये
सावन आया पर प्रिय न आये

हरी भरी भीगी सी वादियां
पुकारे आजा मेरे साथिया
खिले फूल खिली कलियां
नीलोफर की बन सखियां
मानो परिहास्य की पर्याय
तुम भी आ जाओं प्रेममय
दिल कहे होकर पुकारमय
स्वागतम 🌷स्वागतम

काले गहन बादल छाये
प्यासी वसुंधरा में समा जाये
विरहन का दर्द राहत पाये
पर साजन न आये दिल उदास हो जाए
बिन प्रियतम तन से बूंदे फिसल जाए
नयनों की प्यास अवरिल बढ़ती जाए
झूम झूम सावन मन को छद्म हो भटकाये

सावन की बरसात में
तड़पती तरसती गहन
आधी अंधेरी रात में
चाँद सितारे न छाये
पर पिया याद आये
अंगडाइयो के हर जज्बात में
अंग अंग फरियाद करे
घर आ जाये
चाहे सावन जाये
आकर बस जाओ मन चमन में
डूब जाओ झील बनी बंद पलकों में
इस अहसास से मन मेरा सावन गीत गाये
स्वागतम 🌷स्वागतम तूं हर दिल में मेघ बन छा जाये
रचियता: कमल भंसाली

प्राणों की दासी ■■ जिंदगी■■ कमल भंसाली


संभावनाओं के चबूतरे पर बैठकर
“जिंदगी” कितनी बतियाती
कभी खिलखिलाती
कभी मुस्कराती
सखी सहेलियों की सूरत में
गम से छुटकारा पाने के
आयाम गुपचुप तलाशती
अपने दर्द को पी
उन्हें कुछ समझाती
बुदबुदाती
रही मैं, प्यासी की प्यासी
आखिर हूँ, प्राणों की दासी

प्रियत्तम बड़े
मनमौजी रसिया
छेड़ते रहते
कभी प्यार सब दे देते
कभी अवसाद से झिड़क देते
अपनी बिछड़ी गलती का
इल्जाम लगा देते
खोई कामयाबी पर
जश्न मनाते, बेरुखी बाहों में
मैं, कितना कसमसाती
पल पल में, पिघल बह जाती
कैसी है, यह उदासी
आखिर…

फुर्सत के क्षण
करते रहते बैचेन
सामने खड़ी हो दर्पण के
स्वयं को निहारती
नंगी हो अस्तित्व तलाशती
जिसके लिए श्रृंगार करती
उसकी ही व्यर्थता में
निरर्थक होकर
क्यों समर्थता को तलाशती ?
ये, सवाल अक्सर
जब खुद से करती
तो, बन्धन में स्वतन्त्रता तलाशती
कैसी यह मेरी खामोशी ?
आखिर…….
कमल भंसाली